Saturday, 28 February 2026

न्यायपालिका में रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस होना चाहिए


बीते दो दिनों में न्यायपालिका से जुड़ी दो खबरों से एक बार फिर न्याय प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं चल पड़ी हैं। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा कक्षा आठवीं की एक पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय शामिल किए जाने पर देश के मुख्य न्यायाधीश भड़क उठे और तत्काल उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा माफी के बावजूद कड़ा रुख दिखाते हुए उन्होंने मामले को जारी रखने की बात कही।  पुस्तक  से विवादित अध्याय भले हटा दिया गया किंतु इससे न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं  हट सकेगा जिसे अनेक पूर्व न्यायाधीश भी खुले आम स्वीकार कर चुके हैं। एन.सी.ई.आर.टी सरकारी विभाग है लिहाजा उस पर तो धौंस काम कर गई  लेकिन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर न जाने कितने लेख प्रकाशित होने के अलावा गोष्ठियां होती हैं। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश कहां - कहां रोक लगाएंगे ये बड़ा सवाल है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के सरकारी निवास में रुपयों के बंडल मिलने के बाद भी अब तक उन्हें पद से नहीं हटाया जा सका। यदि उनकी जगह कोई अन्य सरकारी अधिकारी होता तब कम से कम उसका निलंबन तो हो ही जाता। दरअसल  न्यायाधीश कानून के रखवाले होते हुए भी कुछ मामलों में उससे ऊपर हैं जिन्हें कदाचरण के बावजूद हटाने के लिए संसद में महाभियोग पारित होना जरूरी है। सामान्य तौर पर देखें तो ये कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है। न्यायाधीशों को विशेष अधिकार और संरक्षण पूर्णरूपेण उचित है किंतु नैतिकता भी कोई चीज होती है। गत दिवस दिल्ली की एक निचली अदालत ने बहुचर्चित शराब घोटाले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित 27 आरोपियों को पूरी तरह निर्दोष मानकर सीबीआई के आरोप पत्र को खारिज करते हुए जांचकर्ता सीबीआई अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश दे दिया। अब श्री केजरीवाल  आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें झूठा फंसाकर जेल में डाल दिया गया। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के  इतर देखें तो जिस तरह अदालत ने  जांच अधिकारी की जांच  का आदेश दिया क्या उसी तरह उन न्यायाधीशों की जांच नहीं होनी चाहिए जिन्होंने आरोप पत्र को प्रथम दृष्टया विचार योग्य मानते हुए मुकदमे की अनुमति तो दी ही, साथ ही गिरफ्तार होने वालों की जमानत याचिका लम्बे समय तक निरस्त की जाती रही। निचली अदालत ने अपने फैसले में संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के विरुद्ध  प्रकरण दर्ज़ करने में सावधानी बरतने की नसीहत भी जांच एजेंसी को दे डाली । लेकिन जिस आरोपपत्र की एक भी बात अदालत ने सही नहीं मानी उसे प्राथमिक तौर विचार योग्य मानने वाले न्यायाधीश भी तो सवालों के घेरे में हैं । जिस तरह श्री केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य नेता सीबीआई  और सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, कल को वैसी ही बातें उन्हें बरी करने वाले न्यायाधीश के बारे में भी कही जाएंगी। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इस तरह के फैसलों की समीक्षा भी विभागीय स्तर पर हो जिसमें एक तरफ अदालत  आरोपियों की  जमानत अर्जी  टालती रही वहीं दूसरी तरफ पूरा आरोपपत्र रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक समझा गया। अब यदि सीबीआई की अपील पर उच्च न्यायालय निचली अदालत के फैसले को उलट दे तब क्या निचली अदालत के न्यायाधीश शक के दायरे में नहीं आएंगे? ऐसे ही सवाल और भी हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश ने एन.सी.ई.आर.टी की किताब से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाला पाठ हटवाकर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कितनी बचाई ये तो विश्लेषण का विषय है। लेकिन उनके रवैए से ये जरूर साफ हो गया कि न्यायपालिका में भी असहिष्णुता बढ़ रही है। संसद द्वारा न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का जो प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित किया गया उसे सर्वोच्च न्यायालय ने इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि उसके लागू होने से न्यायाधीशों की नियुक्ति में उसकी दखलंदाजी खत्म हो जाती। सही बात ये है कि विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करने वाली न्यायपालिका को अपने कार्यक्षेत्र में किसी की प्रकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं होने से लोकतंत्र के उक्त तीन स्तंभों के बीच संतुलन और परस्पर सम्मान का भाव गड़बड़ा रहा है। इस स्थिति में सुधार तभी संभव है जब न्यायपालिका में अपनी रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस हो।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 February 2026

केजरीवाल - सिसौदिया दोषमुक्त लेकिन सीबीआई कठघरे में



दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया सहित दो दर्जन आरोपियों को बहुचर्चित शराब घोटाले में स्थानीय राउज एवेन्यू अदालत द्वारा दोषमुक्त मानकर सीबीआई के जांच  अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश दे दिया। अदालत ने सीबीआई द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र में खामियां पाते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह आरोपियों के विरुद्ध समुचित प्रमाण और साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। उल्लेखनीय है केजरीवाल सरकार द्वारा लागू की गई शराब नीति को लेकर काफी हल्ला मचा था। सीएजी रिपोर्ट में उक्त नीति से दिल्ली सरकार को दो हजार करोड़ रु. के नुकसान का खुलासा होने के बाद कांग्रेस ने उपराज्यपाल से शिकायत करते हुए जांच की मांग के साथ ही श्री केजरीवाल से त्यागपत्र भी मांगा। हालांकि बाद में जब उनकी गिरफ्तारी हुई तब कांग्रेस ही उनके बचाव में कूद पड़ी। यहां तक कि दिल्ली में विपक्ष की एक रैली में सोनिया गांधी ने मंच पर उनकी पत्नी को अपने बगल में बिठाकर सबको चौंकाया। इस मामले में केजरीवाल सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के  अलावा तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता भी गिरफ्तार हुई थीं, जिनका संबंध दक्षिण भारत की उस शराब लॉबी से बताया गया जिसकी उक्त शराब नीति में बड़ी भूमिका चर्चा में रही। बहरहाल निचली अदालत के  फैसले से श्री केजरीवाल और उनके दाहिने हाथ श्री सिसौदिया को राहत मिल गई। इसमें दो मत नहीं कि गत वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय के पीछे उक्त विवाद का भी योगदान रहा। आम आदमी पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी छवि को शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी ने बुरी तरह धूमिल कर दिया। हालांकि सीबीआई निचली अदालत के फैसले से संतुष्ट नहीं है । उसके वकीलों के अनुसार वे फैसले का अध्ययन करने के उपरांत उच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध अपील करेंगे। उच्च न्यायालय इस फैसले पर क्या रुख अपनाता है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है लेकिन निचली अदालत ने सभी आरोपियों को पूरी तरह दोषमुक्त मानने के जो कारण बताए उनसे सीबीआई की क्षमता पर एक बार फिर सवाल खड़े होंगे। सीएजी रिपोर्ट में शराब नीति से दिल्ली सरकार को हुए नुकसान पर कांग्रेस ने उपराज्यपाल को शिकायत देकर जांच की मांग की थी । उसी के बाद इस मामले ने जोर पकड़ा। बाद में सीबीआई के साथ ही ईडी भी जांच में शामिल हो गई । निचली अदालत ने शराब नीति में भ्रष्टाचार के आरोपों को रद्द  करने के जो कारण बताए  उनसे सीबीआई कठघरे में खड़ी हो गई । फैसले में साफ कहा गया है कि एक हजार पृष्ठ का आरोप पत्र अपर्याप्त प्रमाणों के अभाव में स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश देकर मामले को नया मोड़ दे दिया। इस फैसले से सीबीआई की साख एक बार फिर गिरी है। यही हाल ईडी का भी है। दोनों जांच एजेंसियों पर विपक्ष ये आरोप लगाता है कि वे सरकार के दबाव में काम करती हैं। ये बात भी सही है कि इन एजेंसियों द्वारा शुरुआत तो धमाकेदार अंदाज में की जाती है लेकिन ज्यादातर मामलों में वे आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहतीं। इसका एक कारण उन पर काम का जबरदस्त बोझ भी है। इस फैसले के बाद शराब घोटाले संबंधी सीएजी की रिपोर्ट पर भी उंगलियां उठेंगी क्योंकि उसी के आधार पर कांग्रेस ने पहली शिकायत दर्ज करवाई थी। हो सकता है सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील करते हुए इस फैसले पर स्थगन प्राप्त करने में कामयाब हो जाए लेकिन निचली अदालत द्वारा उसके आरोप पत्र को सिरे से खारिज किया जाना इस बात का प्रमाण है कि उसने ठीक से जांच नहीं की और इसीलिए वह समुचित प्रमाण और गवाह पेश करने में विफल रही। इस फैसले से केंद्र सरकार को भी आलोचना का शिकार होना पड़ेगा क्योंकि सीबीआई उसी के अधीन है। भले ही कांग्रेस ने शराब नीति के विरुद्ध मोर्चा खोलकर केजरीवाल सरकार के लिए मुसीबत खड़ी की हो किंतु आज के फैसले के बाद विपक्ष को ये कहने का अवसर मिल गया कि केंद्र सरकार सीबीआई का दुरुपयोग विपक्ष को घेरने के लिए करती है। आरोप मुक्त होने वाले नेताओं ने भाजपा पर आरोप लगाना शुरू भी कर दिया। अब उच्च न्यायालय में इस फैसले के  विरुद्ध की जाने वाली अपील का क्या हश्र होता है ये तो भविष्य बताएगा किंतु निचली अदालत के फैसले ने जहां सीबीआई और केंद्र सरकार को जबरदस्त झटका दिया है  वहीं आम आदमी पार्टी को खुलकर होली खेलने का अवसर प्रदान कर दिया।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 26 February 2026

हमास की मूर्खता से खून के आंसू पीने मजबूर हैं फिलीस्तीनी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे समय इजराइल  गए जब ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका से समूचा विश्व परेशान है। यदि डोनाल्ड ट्रम्प  ईरान के शासक खामेनेई को हटाने  के लिए सैन्य कार्रवाई करते हैं तो  वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल जाएगी। दरअसल इस्लामिक देशों में ईरान पर ही अमेरिका का बस नहीं चलता। ज्यादातर अरब देश  अमेरिकी प्रभाव में हैं । ईरान भी रूस और चीन के खुले समर्थन के कारण अमेरिका से ऐंठता है। हालांकि उसका अपना सैन्य सामर्थ्य भी बाकी अरब देशों की तुलना में अधिक है। इजराइल और हमास की जंग में जब इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए तब  उसने पलटवार करते हुए राजधानी सहित इजराइल के अनेक स्थानों पर मिसाइलों की बरसात कर दहशत फैला दी। उसी वजह से इजराइल भी युद्धविराम के लिए तैयार हुआ। हालांकि तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। ऐसे हालातों में श्री मोदी का तेल अवीव जाना बड़ी कूटनीतिक पहल है। हालांकि इसके पीछे  नए रक्षा सौदों को कारण माना जा रहा है किंतु इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ  करीबी रिश्ते होने से इस यात्रा में  भू - राजनीति की मौजूदा स्थिति और उसमें भारत की भूमिका पर भी चर्चा होगी। लेकिन भारत में कुछ लोगों को यह यात्रा नागवार गुजर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने तंज किया है कि इजराइल द्वारा फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे अत्याचार को नजरअंदाज कर श्री मोदी तेल अवीव जा रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने भी दौरे की आलोचना की। वहीं प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि वे इजराइली संसद को संबोधित करते समय फिलीस्तीन का मुद्दा उठाएं। उल्लेखनीय है कांग्रेस हमेशा से इजराइल के साथ प्रगाढ़ संबंध रखने के विरोध में रही है । ओवैसी का इजराइल विरोध भी स्वाभाविक है जिन्होंने लोकसभा की शपथ के बाद फिलीस्तीन के पक्ष में नारा लगाया था। इजराइल - हमास जंग के दौरान प्रियंका भी कंधे पर फिलीस्तीन लिखा झोला टांगकर संसद में नजर आई थीं। निःसंदेह मासूम बच्चों , महिलाओं और वृद्ध - लाचार लोगों पर हमले करना मानवीयता के विरुद्ध है। गाजा में  इजराइली हमलों के कारण  बिजली , पानी , दवाइयां, दूध - भोजन का अभाव होने से लाखों लोग अकल्पनीय यातनाएं झेलने बाध्य हुए। लेकिन संकट के उस दौर में इजिप्ट सहित पड़ोसी मुस्लिम देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं ताकि गाजा से शरणार्थी उनके यहां प्रवेश न कर पाएं। आज भारत में जो लोग मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए इजराइल की आलोचना करते हैं उनके मुंह से एक शब्द भी इजिप्ट के विरोध में नहीं सुनाई दिया। स्मरणीय है इजराइल के साथ जो समझौता यासर अराफात के समय हुआ उसमें गाजा और वेस्ट बैंक नामक फिलीस्तीन के दो हिस्से बने। इजराइल दोनों के बीच में हैं। गाजा को बिजली सहित अन्य जरूरी सुविधाएं वही प्रदान करता था। 2006 में हमास नामक इस्लामिक सैन्य संगठन ने गाजा की  सत्ता हथिया ली । ईरान सहित तमाम इजराइल विरोधी मुस्लिम देशों का समर्थन और संरक्षण मिलने से वह मजबूत होता गया। 7 अक्टूबर  2023 को अचानक हमास ने इजराइल पर ड्रोन के जरिए हमले किये और मिसाइलें भी बरसाईं जिससे सैकड़ों इजराइली मारे गए। हमास के लड़ाके इजराइल में घुसकर सैकड़ों लोगों को बंधक बनाकर ले गए। उसी के बाद नेतन्याहू ने आर - पार की जंग छेड़ने का ऐलान करते हुए हमास की कमर तोड़ने का अभियान शुरू किया। आज  फिलीस्तीनी जो भोग रहे हैं उसका कसूरवार  हमास तथा उसकी पीठ पर हाथ रखने वाला ईरान ही है।  सर्वविदित है कि ईरान ने हमास को इसके लिए उकसाया था क्योंकि कुछ  दिनों बाद  ही इजराइल और सऊदी अरब में ऐतिहासिक समझौता होने वाला था ।  ईरान  उसे रुकवाना चाहता था। इसलिए उसने हमास के कंधे का इस्तेमाल किया। इस प्रकार गाजा की बर्बादी और फिलीस्तीन के अस्तित्व पर नए खतरे का जिम्मेदार हमास है। इसलिए भारत में जो राजनीतिक दल फिलिस्तीनियों के लिए आंसू बहा रहे हैं उन्हें हमास की आलोचना करना चाहिए जिसने गाजावासियों को खून के आंसू पीने मजबूर कर दिया। अतीत को  किनारे कर दें तो गाजा में 7 अक्टूबर 2023 के बाद इजराइल ने जो किया वह हमास के पागलपन का दुष्परिणाम  था। ऐसे में इजराइल से पहले हमास को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन न तो ओवैसी ऐसा करेंगे और न ही कांग्रेस क्योंकि ऐसा करने से भारत के मुसलमान नाराज हो जाएंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 February 2026

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक


नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग ( NCERT)  की तरफ से कक्षा 8 के लिए सोशल साइंस की जो नई पुस्तक जारी की गई उसके एक अध्याय को लेकर खूब चर्चा हो रही है जिसमें भारतीय न्यायपालिका  की भूमिका के साथ ही इसमें भ्रष्टाचार की भी बात कही गई है। पुस्तक में लिखा गया है कि हमारी  न्यायिक व्यवस्था में अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। साथ ही यह भी बताया गया है कि  अदालतों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है उनमें भ्रष्टाचार भी एक है। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय से लेकर बाकी तमाम अदालतों में लंबित पड़े मामलों का भी जिक्र करते हुए इसे  बड़ी समस्या बताने  के अलावा लंबित  प्रकरणों के आंकड़े भी दिए  गए हैं। भ्रष्टाचार की बात को साबित करने के लिए पूर्व मुख्य  न्यायाधीश जस्टिस बी. आर गवई के एक बयान को  इस अध्याय में शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका के भीतर खामियों की बात कही थी। लेकिन आज इस अध्याय को लेकर नया विवाद उत्पन्न हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत से इसका का संज्ञान लेने का अनुरोध करते हुए कहा कि इससे न्यायपालिका की छवि खराब होगी। इस  पर प्रधान न्यायाधीश  ने कहा कि वह किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं देंगे। श्री सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें इस विषय पर कई फोन और संदेश मिले हैं और  पूरी तरह से मामले से अवगत हैं । उन्हें पता है कि इससे कैसे निपटना है। उन्होंने संकेत दिया कि यह एक सुनियोजित और सोची-समझी कोशिश लगती है वे इस पर अभी ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहते, लेकिन उचित कदम उठाए जाएंगे। अब चूंकि खुद मुख्य न्यायाधीश ने संज्ञान ले लिया है इसलिए माना जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय उक्त अध्याय को हटाने के लिए दबाव बनाया जाएगा और सरकार भी न्यायपालिका की नाराजगी से बचने के लिए उसके आदेश को शिरोधार्य कर लेगी। ये भी संभव है कि जिस विभाग ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे संवदेनशील विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने का दुस्साहस किया उसके दो - चार अधिकारियों पर गाज गिर जाए। न्यायपालिका से जुड़े संगठन भी वैसा ही बवाल मचा सकते हैं जैसा कि हाल ही में यूजीसी द्वारा जारी नियमावली के विरोध में देखने मिला था। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो न्यायापालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है। उसे विद्यालयीन छात्रों को पढ़ाए जाने के औचित्य पर सवाल उठ सकते हैं किंतु समय आ गया है जब इस बारे में राष्ट्रीय विमर्श हो। जो न्यायपालिका भ्रष्टाचार के दोषियों को दंड देती है यदि उसके दामन पर भी दाग लगने लगें तो समूची व्यवस्था के प्रति अविश्वास और नाराजगी उत्पन्न होगी ही। कुछ हद तक इसका एहसास होने भी लगा है। पुस्तक में जो सामग्री समाहित है उसकी समीक्षा कर आपत्ति जताने का न्यायपालिका को पूरा अधिकार है किंतु जितनी तत्परता इस मामले में दिग्गज अधिवक्ता और माननीय न्यायाधीश दिखा रहे हैं वैसी ही अन्य जरूरी मामलों में नजर क्यों नहीं आती उसका उत्तर कौन देगा? सही बात ये है कि भ्रष्टाचार गाजर घास की तरह राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है और न्यायपालिका भी  अछूती नहीं है। हालांकि आज भी न्यायाधीशों का बड़ा वर्ग अपनी कर्तव्यनिष्ठा के लिए विख्यात है किंतु सभी के बारे में ऐसी गारंटी नहीं ली जा सकती। भले ही ये बात अच्छी न लगे किंतु अधिवक्ता समुदाय भी इस पवित्र संस्था की छवि खराब करने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। त्वरित और सस्ते न्याय के आश्वासन केवल उपदेशों तक सीमित रह गए हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति के उपरांत उन्हें दिए जाने वाले पदों को लेकर तरह - तरह की चर्चाएं सुनाई देती हैं। बेहतर हो न्यायपालिका इन विषयों का संज्ञान लेकर जनमानस में अपनी छवि को सुधारने आगे आए क्योंकि विश्वास के बढ़ते संकट के बीच वही है जिससे कोई उम्मीद है वरना तो पूरे कुएं में भांग घुलने वाली स्थिति है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 February 2026

भ्रष्टाचार के बोझ से ढह रहे विकास रूपी पुल


म.प्र में जबलपुर - भोपाल हाइवे पर शहपुरा के निकट बना पुल गत दिवस ढह गया। इसका एक हिस्सा कुछ माह पहले क्षतिग्रस्त होने के कारण उसकी मरम्मत चल रही थी । लेकिन दो दिन पहले दूसरे हिस्से का भी वही हश्र हुआ। उस पुल के नीचे से रेल की पटरी गुजरती है। जिस समय पुल टूटा तब कोई रेलगाड़ी वहां से नहीं गुजरी अन्यथा बड़ी अनहोनी घट जाती। पुल ढहने की खबर फैलते ही शासन - प्रशासन हरकत में आया और ठेकेदार सहित निर्माण कार्य की देखरेख करने वाली  कंपनी को ब्लैक लिस्ट करने के अलावा अपराधिक प्रकरण दर्ज करवा दिया गया। लोक निर्माण मंत्री ने पुल निर्माण की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की पेंशन रोकने जैसी घोषणा भी कर डाली। इस मार्ग के यातायात को वैकल्पिक रास्तों पर मोड़ दिया गया। पुल को दोबारा उपयोग लायक बनाने में कितना समय लगेगा ये कहना कठिन है और तब तक जबलपुर से सड़क मार्ग जाने वाले वाहनों को अपेक्षाकृत कम बेहतर रास्तों से आवागमन करना होगा जिससे ज्यादा समय लगने के अलावा जाम की स्थिति भी बनना तय है जो पहले दिन से ही दिखाई देने लगी। जनता की मांग है कि इस हिस्से का टोल टैक्स तब तक न वसूला जाए जब तक पुल पर दोबारा यातायात शुरू न हो।  जाहिर है विपक्ष  प्रदेश सरकार को घेरेगा जो उसका अधिकार भी है और दायित्व भी। लोकनिर्माण मंत्री ने इसीलिए बिना देर लगाए हादसे के जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की पहल कर दी। सवाल ये है कि ऐसे  निर्माणों में इस तरह की लापरवाही और भ्रष्टाचार कब तक होता रहेगा? देश भर में आए दिन सड़क , पुल - पुलिया में घटिया निर्माण की बात सामने आती है। और फिर वैसा ही कर्मकांड होता है जैसा संदर्भित घटना के बाद देखने मिल रहा है। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है। हाइवे और एक्सप्रेस हाइवे के कारण सड़क मार्ग की यात्रा आरामदेह हो गई। परिणामस्वरूप देश के ऑटोमोबाइल उद्योग को भी पंख लग गए। फ्लाय ओवर और एलीवेटेड सड़कें बदलते भारत की तस्वीर पेश करते हैं। दो दिन पूर्व ही दिल्ली से मेरठ के बीच वंदे भारत प्रारंभ होने से ढाई - तीन घंटे की यात्रा एक घंटे में संभव हो गई। बुलेट ट्रेन शुरू होने का समय भी नजदीक आ रहा है। आधारभूत संरचना ( इंफ्रास्ट्रक्चर) पर विशेष ध्यान दिए जाने से देश का आत्मविश्वास बढ़ा है। लेकिन जिस एक बात की कमी खलती है वह है गुणवत्ता का अभाव। इसके पीछे केवल लापरवाही हो तो समझ में आता है किन्तु असली समस्या है भ्रष्टाचार । बिहार में तो एक पुल ऐसा भी है जो निर्माण के दौरान जितनी बार ढहा वह एक रिकॉर्ड है। गुजरात में भी एक नदी पर बने पुल का नवीनीकरण होने के बाद वह ढह गया जिससे दर्जनों लोग डूबकर मर गए। ऐसे जाने कितने हादसे यदा - कदा सुनने में आते हैं जिनमें जनहानि होने के बाद सरकार मुआवजा बांटकर दाएं - बाएं हो जाती है। जांच के दिखावे के बाद कुछ बलि के बकरे हलाल किए जाते हैं और फिर भ्रष्ट व्यवस्था अपनी गति से चल पड़ती है। यही वजह है कि विकास के ज्यादातर काम गुणवत्ता की कसौटी पर फिसड्डी साबित हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ठेकेदार , इंजीनियर , अधिकारी और नेताओं के इस अपवित्र गठबंधन से देश को आज़ादी कब मिलेगी ? जब हम विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का हौसला दिखा रहे हैं तब हमें ये भी देखना होगा कि वहां भ्रष्टाचार करने वाले को किस प्रकार का दंड दिया जाता है ? सबसे ज्यादा जीडीपी पर  अपनी पीठ ठोकने के साथ ही ये सोचने की भी जरूरत है कि कहीं वह भ्रष्टाचार  के बोझ तले दबकर न रह जाए। देश में सैकड़ों वर्ष पुराने  मंदिरों , किलों और महलों के अलावा पुल भी हैं । आजादी के पहले बने अनेक छोटे - छोटे बांध आज भी खड़े हैं। चूंकि निर्माण में ईमानदारी बरती गई थी इसलिए इनकी मजबूती आज  भी यथावत है। लेकिन स्वाधीन भारत में जो सरकारी निर्माण हुए उनमें कुछ अपवाद छोड़कर बाकी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है।  ये कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है कि  देश में भ्रष्टाचार और बेईमानी में वृद्धि की दर जीडीपी से कहीं ज्यादा है। जबलपुर के निकट ढहा पुल कहने को तो छोटा सा हादसा है क्योंकि उसमें कोई हताहत नहीं हुआ। लेकिन देखने वाली बात ये है कि वह पुल बहुत पुराना नहीं है। इस घटना के बाद पूरे प्रदेश से अनेक ऐसे पुलों की जानकारी आ रही है जो घटिया निर्माण के कारण कभी भी गिर सकते हैं। राज्य सरकार और संबंधित विभागों का ये दायित्व है कि उन सबकी फौरन जांच करवाकर जो भी उचित हो किया जावे जिससे आने वाले खतरे को समय रहते टाला जा सके। और ये भी कि इन सबके लिए जो भी दोषी हों उन्हें इतना कड़ा दंड मिले जिससे भ्रष्टाचार करने वालों का कलेजा कांपे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 23 February 2026

शीर्ष धर्माचार्यों के आचरण की समीक्षा करने की व्यवस्था जरूरी


हाल ही में दो और हिन्दू धर्माचार्य यौन शोषण के आरोप में घिर गए। उत्तम स्वामी नामक आध्यात्मिक हस्ती के विरुद्ध राजस्थान की एक युवती ने शोषण की शिकायत कर सनसनी फैला दी। आरोप लगते ही स्वामी  जबलपुर के निकट अपने आश्रम में हो रही कथा छोड़कर कहीं चले गए। ये महाशय कुछ समय पहले म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस कारण नाराज हो गए थे क्योंकि वे उनके आयोजन में समय देकर भी नहीं पहुंच सके। सौजन्यतावश श्री यादव ने आभासी माध्यम से उनसे क्षमा भी मांगी किंतु बजाय क्षमा याचना स्वीकार करने के स्वामी ने उन्हें खूब फटकारा। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार भाजपा के बड़े - बड़े नेता इनके अनुयायी हैं। दूसरी घटना बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य  होने का दावा करने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ी है जिनके विरुद्ध पास्को कानून में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश न्यायालय ने जारी किया है। इसका आधार वह शिकायत है जिसके अनुसार उनके किसी आश्रम में कुछ बालकों का भी यौन शोषण हुआ। उल्लेखनीय है दो पीठों के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद की मृत्यु उपरांत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य बने किंतु उनकी नियुक्ति शुरुआत से ही विवादों में घिरी रही। जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सहित अनेक धर्मगुरु और अखाड़ा परिषद तक उन्हें विधिवत नियुक्त शंकराचार्य नहीं मानती। ये विवाद भी न्यायालय में विचाराधीन है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को चर्चा में रहने का शौक भी है। हाल ही में प्रयागराज के माघ मेले में भी इन्होंने बखेड़ा खड़ा कर दिया जिसके  बाद बिना स्नान किए ही इन्हें वापस जाना पड़ा। उसके बाद से ये उ.प्र के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ के पीछे पड़ गए। वैसे तो वे प्रधानमंत्री से भी चिढ़ते हैं। यद्यपि इनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद जी भी ऐलानिया तौर पर कांग्रेस समर्थक माने जाते थे किंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस तरह की कड़वाहट दिखाते हैं उससे उनकी छवि एक आदतन असंतुष्ट व्यक्ति की बन गई। उनके विरुद्ध जो प्रकरण दर्ज हुआ उसमें यदि वे गिरफ्तार हुए तब उनकी स्थिति भी आशाराम बापू जैसी होकर रह जाएगी। लेकिन यहां सवाल किसी उत्तम स्वामी या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नामक व्यक्ति का नहीं बल्कि सनातन धर्म की परंपरा के ध्वजावाहक आध्यात्मिक विभूतियों के चरित्र पर लगे लांछन का है।  इन जैसे अन्य किसी भी धर्मगुरु पर जब इस तरह का आरोप लगता है तब उससे केवल उनकी प्रतिष्ठा ही तार - तार नहीं होती अपितु सनातन धर्म में आस्था रखने वाले असंख्य लोगों की भावनाएं आहत होती हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि अनेक साधु - संन्यासी  पद , प्रतिष्ठा, विलासितापूर्ण जीवनशैली के मोहपाश में बंधते जा रहे हैं। उनके पास नेता , अधिकारी , बिल्डर और अन्य  ऐसे तत्व भी मंडराते दिखते हैं जो उनकी आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और बदले में वे उनके सुख - सुविधा का प्रबंध करते हैं। जैन मुनियों के विपरीत सनातन धर्म से जुड़ी अध्यात्मिक विभूतियों में सांसारिकता के प्रति जो लगाव बढ़ता जा रहा है उससे  सनातन धर्म के आलोचकों को मुंह चलाने का अवसर बिन मांगे मिल जाता है। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोपों की सत्यता तो जांच के बाद ही सामने आएगी किन्तु सनातन धर्म के संचालन की जो वर्तमान व्यवस्था है उससे जुड़े महानुभावों को अपने आभामंडल की चिंता छोड़कर ऐसी आचार संहिता बनानी चाहिए जिससे साधु - संन्यासी का चोला ओढ़कर धर्म विरोधी आचरण करने वालों पर लगाम कसी जा सके। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोप की जांच करना और दोषी पाए जाने पर दंडित करना तो अदालत के अधिकार में आता है लेकिन धर्म से जुड़ी विभूतियों के आचार - व्यवहार का निर्देशन  - नियंत्रण करने के लिए धार्मिक क्षेत्र की ही कोई नियामक संस्था होनी चाहिए। अखाड़ा परिषद, विद्वत परिषद और चारों शंकराचार्यों को मिलकर धर्म संस्थान से जुड़े प्रमुख लोगों के आचार - व्यवहार पर नजर रखने के साथ ही समय - समय पर उसकी समीक्षा भी करनी चाहिए। साधु के आवरण में शैतानी के उदाहरण पौराणिक काल से मिलते रहे हैं किंतु तब की दंड प्रक्रिया भी प्रभावशाली थी। बड़े - बड़े धर्माचार्य बात - बात में ये दुहाई तो देते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं तब ये प्रश्न भी उठता ही है कि फिर उनके धर्मविरुद्ध आचरण पर दंड देने का अधिकार किसे है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 February 2026

ए .आई समिट में उपद्रव से कांग्रेस की ही छवि धूमिल हुई



राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक विरोध की अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक समाज की पहचान है। विपक्ष में बैठे दल और उनके नेता सरकार को घेरने का कोई अवसर अवसर नहीं छोड़ते। लेकिन जहां देश का हित और प्रतिष्ठा जुड़ी हो वहां दलीय मतभेद किनारे रखते हुए एकजुटता का प्रदर्शन जरूरी होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब देश पर उत्पन्न संकट के समय और राष्ट्रीय गौरव से जुड़े किसी भी प्रसंग के अवसर पर सर्वदलीय एकता देखने मिली। लेकिन अब दलीय स्वार्थ को प्राथमिकता देते हुए देश के सम्मान से खिलवाड़ किया जाने लगा है। उदाहरणार्थ गलवान घाटी और ऑपरेशन सिंदूर में सेना द्वारा प्रदर्शित पराक्रम पर सवाल उठाए गए। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर भी संदेह जताया गया। ताजा प्रकरण है दिल्ली में चल रही ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा कपड़े उतारकर प्रदर्शन और नारेबाजी करना। कांग्रेस पार्टी के अनुसार उसके कार्यकर्ता भारत - अमेरिका ट्रेड डील का विरोध करने गए थे। इस डील का विरोध करने का कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों को पूरा अधिकार है। यदि उसमें कहीं भी देश के हितों के साथ समझौता हुआ हो तो उसके विरुद्ध आवाज उठाने में कोई बुराई नहीं है। संसद में भी विपक्ष उसके कुछ प्रावधानों पर अपनी आपत्तियां दर्ज करवा चुका है जिसके उत्तर में सरकार के मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि भारत के किसानों सहित अन्य वर्गों के हितों की सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। अमेरिकी सरकार ने भी कुछ स्पष्टीकरण दिए। ऐसे में बेहतर होगा विपक्ष और उक्त डील पर ऐतराज जता रहे अन्य संगठन अंतिम फैसला होने तक प्रतीक्षा करते। यदि उन्हें अपनी सक्रियता ही दिखानी है तो विरोध के और भी तौर - तरीकों और मंचों का उपयोग किया जा सकता था। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ए. आई समिट जिसमें अनेक राष्ट्रप्रमुखों के अतिरिक्त दुनिया की दिग्गज बहुराष्ट्रीय आई. टी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी , देशी - विदेशी उद्योगपति एकत्र हुए हों, उसके आयोजन स्थल में घुसकर जिस तरह का प्रदर्शन कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया उससे पार्टी की विवेक शून्यता एक बार फिर उजागर हो गई। ए. आई समिट भाजपा का आयोजन नहीं है। अपितु उसकी मेजबानी भारत सरकार द्वारा की गई। दुनिया भर की हस्तियों की उपस्थिति से ये साबित हो गया कि भारत के तकनीकी कौशल और प्रबंधन क्षमता के प्रति विश्वास बढ़ा है। गूगल सहित अन्य विदेशी कंपनियों द्वारा ए. आई के क्षेत्र में अरबों - खरबों के निवेश की घोषणा इस आयोजन की सफलता का जीता - जागता प्रमाण है। कांग्रेस को यदि ये इसलिए अच्छा नहीं लग रहा कि समिट में आए राष्ट्रप्रमुखों और कार्पोरेट जगत की शीर्ष वैश्विक हस्तियों ने प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रशंसा की तो ये उसकी खीझ दर्शाता है । उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि इस समिट ने भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि की है और ए. आई के क्षेत्र में वह विश्व का नेतृत्व करने की हैसियत में आ गया। ये बात भी सही है कि इसका श्रेय श्री मोदी को मिल रहा है और मिलना भी चाहिए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस समिट की आलोचना की थी किंतु उन्हीं की पार्टी के वरिष्ट नेता शशि थरूर ने खुलकर उसकी प्रशंसा की। बावजूद इसके कांग्रेस को इस आयोजन में रही कमियों पर उंगली उठाने का पूरा अधिकार है किंतु भारत - अमेरिकी ट्रेड डील के बहाने आयोजन स्थल में घुसकर उत्पात करने का औचित्य समझ से परे है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री और भाजपा का उग्र विरोध कर अपना राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल करना चाह रहे हैं । लेकिन उसका जनमानस पर प्रभाव क्यों नहीं पड़ता इसका विश्लेषण उन्हें करना चाहिए। लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ जाने से उन्हें ये लगने लगा था कि श्री मोदी की चमक कम हो गई किंतु उसके बाद जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें कांग्रेस का दयनीय प्रदर्शन श्री गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करने पर्याप्त है। ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अशोभनीय प्रर्दशन इस बात का प्रमाण है कि पार्टी में अपनी गलतियों से सीख लेने की प्रवृत्ति समाप्त हो चुकी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 20 February 2026

मुफ्त योजनाओं को रोकने सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आना होगा


कुछ साल पहले भी सर्वोच्च न्यायालय यही बात कह चुका है। गत दिवस एक बार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित दो अन्य न्यायाधीशों की संयुक्त पीठ ने सरकार द्वारा चलाई जा रही मुफ्त  योजनाओं पर तंज़ कसते हुए कहा कि यदि सबको मुफ्त खाद्यान्न और नगद राशि दी जाएगी तो लोग काम क्यों करेंगे ? न्यायालय ने जरूरतमंदों को  लाभान्वित किए जाने के औचित्य को तो स्वीकार किया किन्तु जो साधन संपन्न हैं उन्हें ही सरकारी सहायता दिए जाने पर ऐतराज जताया। उसने इस बात का उल्लेख किया कि मुफ्त योजनाएं चुनाव जीतने का औजार बनती जा रही हैं और धीरे - धीरे केंद्र के अलावा राज्यों ने भी इस तरीके को अपना लिया। न्यायालय ने राज्यों द्वारा कर्ज में डूबे होने के बाद भी  सरकारी खजाना लुटाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए समझाइश दी कि बजाय मुफ्त में खिलाकर निठल्ला बनाने के सरकार लोगों को रोजगार दे और अपना धन विकास कार्यों में खर्च करे । पीठ ने निर्धन और साधनहीन विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता देने की पैरवी करते हुए कहा कि सरकारी सहायता उन्हीं को मिले जो इसके सुपात्र हैं। उल्लेखनीय है इसकी शुरुआत दशकों पहले तमिलनाडु से हुई जब के. कामराज ने शालाओं में बच्चों के निःशुल्क आहार की योजना लागू की।  बाद में जितने मुख्यमंत्री आए उन सबने मुफ्त योजनाओं में नया कुछ जोड़ा और जयललिता के आते तक तक मिक्सी , मंगलसूत्र और टी.वी बांटकर चुनाव जीतने का प्रबंध होने लगा। इससे प्रेरित होकर अन्य राज्यों में भी  सत्ता हासिल करने और फिर उसमें बने रहने के लिए सरकारी खजाने को लुटाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ वह शेर की सवारी का रूप ले चुका है  जिस पर रोक लगाना राजनीतिक आत्महत्या करना होगा। गत  वर्ष दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री ने जब आदमी पार्टी सरकार  की मुफ्त योजनाओं को रेवड़ी कहकर उनकी आलोचना की तब जवाब में अरविंद केजरीवाल ने  ये प्रचार शुरू कर दिया कि भाजपा सत्ता में आई तो वह मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं की बस यात्रा पर रोक लगा देगी । इस प्रचार से घबराई भाजपा ने  आश्वासन दिया कि सभी मुफ्त सुविधाएं जारी रहेंगी और झुग्गी वासियों को पक्के मकान दिये जाएंगे। भाजपा ने आम आदमी पार्टी द्वारा महिलाओं को प्रति माह 2100 रु. के वायदे से आगे बढ़कर 2500 रु. देने का वायदा कर दिया। विडंबना ये है कि सभी दल एक  - दूसरे पर खैरात बाँटकर चुनाव जीत लेने का आरोप लगाते हैं किंतु खुद  उससे परहेज नहीं करते। आशय ये है कि खेल सभी एक जैसे  रहे हैं किंतु हारने वाला विजेता पर बेईमानी  का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ये पूछ चुका है कि सरकार मुफ्त अनाज कब तक बांटेगी? कांग्रेस भी मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावे का मजाक उड़ाते हुए कहती है कि ऐसा है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है ? लेकिन  मुफ्त अनाज वितरण जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किया जा रहा है वह सोनिया गाँधी की पहल पर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा ही  पारित करवाया गया था। कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ही सरकारी गोदामों में अनाज के सड़ने की शिकायतों पर कहा था कि इससे बेहतर है वह गरीबों में बाँट दिया जाए। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जब निःशुल्क अनाज वितरण शुरू किया तब वह समय की मांग थी जिसे अब वह चाहकर भी  बंद नहीं कर पायेगी । चुनाव आयोग भी कह चुका है कि ऐसा करना उसके लिए तभी संभव होगा जब संसद उसके लिए कोई कानून बनाए जिसके कोई आसार नजर नहीं आते। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं के वायदे किये जाने पर रोक क्यों नहीं लगाता? अनेक मामलों में वह ऐसा कर भी चुका है। ये मुद्दा भी विचारणीय है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के बाद भी इस तरह के वायदे करने का क्या औचित्य है जिनके कारण विकास सहित अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होते हैं।  लोकतंत्र में कमजोर वर्ग का संरक्षण सरकार का दायित्व होता है। भारत के अलावा अन्य देशों में भी अनुदान के जरिये लोगों की मदद की जाती है। लेकिन संपन्न देश तो सक्षम हैं जबकि विशाल आबादी वाले भारत जैसे देश में  मुफ्त योजनाओं को स्थायी बना देना व्यवहारिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है। चूंकि राजनीतिक नेताओं को मुफ्त योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतना आसान लगता है इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना बेकार है। चुनाव आयोग में पदस्थ नौकरशाहों में भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आकर स्वतः संज्ञान लेते हुए ठोस कदम उठाना चाहिए जिससे सत्ता हासिल करने के लिए सरकारी धन का अनुचित उपयोग रोका जा सके।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 February 2026

कर्ज का बोझ बजट में दिखाए सपनों पर भारी पड़ सकता है


म.प्र सरकार द्वारा आगामी वित्तीय वर्ष का बजट गत दिवस विधान सभा में प्रस्तुत किया गया। जहां तक प्रतिक्रियाओं का सवाल है तो सरकार समर्थक जहां वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा द्वारा पेश इस बजट  को क्रांतिकारी मानते हुए प्रदेश के सर्वांगीण विकास में सहायक बताते नहीं थक रहे वहीं विपक्ष की नजर में यह आंकड़ों की बाजीगरी के सिवाय और कुछ भी नहीं। इसी तरह व्यापार और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों की राय भी  भिन्न - भिन्न है। जिस उद्योग या व्यवसाय को वित्तमंत्री ने कोई सौगात अथवा राहत प्रदान की वह  इसकी प्रशंसा में जुटा है किंतु जिनके हाथ कुछ नहीं लगा वे जाहिर तौर पर नाखुश हैं। क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसा ही अनुभव किया जा सकता है।  जिस इलाके की विकास योजनाओं के लिए धन का प्रावधान किया गया , उनके लिए यह बजट स्वागत योग्य है और जो क्षेत्र वंचित रह गए उनमें बिना लाग लपेट के इसे विकास विरोधी माना जा रहा है। शासकीय कर्मचारियों, बेरोजगार नौजवानों और गृहिणियों के बीच भी बजट को लेकर प्रतिक्रियाएं तात्कालिक लाभ या नुकसान पर आधारित है। वित्तमंत्री ने लाभार्थियों के लिए जी भरकर खजाना खोला है। शिक्षा , स्वास्थ्य और  आधारभूत संरचना के लिए भी आकर्षक प्रावधान किए गए हैं। विकास के कुछ बड़े प्रकल्पों का संकल्प भी उन्होंने दर्शाया है। लेकिन सबसे बड़ी बात है श्री देवड़ा ने  किसी भी प्रकार का नया कर नहीं लगाया । हालांकि ये एक तरह का  फैशन सा बन गया है जिसके जरिए बजट को लोक - लुभावन बनाने का प्रयास किया जाता है। वैसे भी आम जनता को बजट का तकनीकी  पक्ष उतना पल्ले नहीं पड़ता जितना ये कि उस पर कितना बोझ  बढ़ेगा या कितनी राहत मिलेगी? दरअसल नया कर लगाने से परहेज कर ज्यादातर वित्तमंत्री खुद को जनता का शुभचिंतक साबित करने का प्रयास करते हैं और वही श्री देवड़ा ने बड़ी ही खूबसूरती से किया। म.प्र में 2003 से अब तक मात्र 15 माह की कमलनाथ सरकार छोड़कर भाजपा ही सत्ता पर काबिज है। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस अवधि में प्रदेश उस दयनीय अवस्था से  काफी हद तक बाहर आया है जो 10 साल कांग्रेस  की सरकार चलाने वाले दिग्विजय सिंह छोड़ गए थे। उनके शासनकाल में बिजली, सड़क और पानी की जो शर्मनाक स्थिति थी उसमें जबरदस्त सुधार हुआ है और यही कारण रहा कि कभी बीमारू राज्य के तौर पर बदनाम यह प्रदेश कृषि और उद्योगों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर सका। सड़कों और बिजली की भरपूर उपलब्धता ने बड़े औद्योगिक घरानों को यहां निवेश हेतु आकर्षित किया वहीं पर्यटन भी बढ़ा। लेकिन यह उपलब्धि कुछ क्षेत्र विशेष तक सीमित रहने से जो क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न हो गया है उसे दूर करना बेहद जरूरी हैं । प्रदेश में जनकल्याण की जो योजनाएं प्रारंभ की गईं उनकी वजह से जहां भाजपा का जनाधार मजबूत हुआ वहीं समाज के पिछड़े वर्ग की स्थिति में भी सुधार हुआ। इन योजनाओं की सफलता का असर पूरे देश में देखने मिल रहा है। 2023 में शिवराज सिंह चौहान द्वारा लागू की गई लाड़ली बहना योजना तो तकरीबन प्रत्येक राज्य में अलग - अलग नामों से लागू की जा रही है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो डॉ. मोहन यादव की सरकार के इस महत्वाकांक्षी बजट के आकर्षक प्रावधानों को प्रदेश पर बढ़ते जा रहे कर्ज का बोझ झटका दे सकता है। ऐसे में ये प्रश्न सहज रूप से उठता है कि कर्ज पर आधारित  अर्थव्यवस्था उन लक्ष्यों को पूरा करने में कहां तक कामयाब हो सकेगी जो बजट में निर्धारित किए गए। यदि वित्तमंत्री के इस स्पष्टीकरण पर विश्वास कर भी लिया जाए कि जितना भी कर्ज लिया गया उसका उपयोग आधारभूत संरचना एवं अन्य विकास कार्यों में ही किया गया तो भी ये प्रश्न तो उठेगा ही कि बिना नया कर लगाए जनकल्याण योजनाओं और नई विकास परियोजनाओं के लिए राशि कहां से आएगी? जब तक प्रदेश में तमिलनाडु , गुजरात और महाराष्ट्र जैसा सघन औद्योगिकीकरण नहीं हो जाता तब तक करों की आय के अलावा बेरोजगारी की स्थिति में भी सुधार होना मुश्किल है। बजट में हजारों नई सरकारी नौकरियों का प्रावधान स्वागतयोग्य है किंतु प्रदेश सरकार का स्थापना व्यय और बढ़ने से नई परेशानियां सामने आए बिना नहीं रहेंगी। बजट में किसानों , महिलाओं , युवाओं सहित हर वर्ग को लुभाने के प्रावधान हैं किंतु ले देकर वही बात आ जाती है कि बिना आय बढ़ाए ये सपने पूरे कैसे होंगे?  विकासशील अर्थव्यवस्था में कर्ज लेना बुरा नहीं बशर्ते उसकी अदायगी के लिए दूरदर्शी नियोजन किया जाए। उधार लेकर घी पीने की महर्षि चार्वाक की सलाह तात्कालिक सुख तो दे सकती है किंतु कालांतर में कष्टकारक होती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 February 2026

ए. आई के क्षेत्र में भारत ने सही समय पर कदम बढ़ाया


दिल्ली में चल रहे ए. आई ( आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) सम्मेलन में कई देशों के दिग्गज उद्यमियों के साथ ही  इस विधा में हाथ आजमाने के इच्छुक नए खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। सूचना क्रांति के दौर से निकलकर अब दुनिया ए. आई नामक चमत्कारिक खोज के पीछे चल पड़ी है जो मानव मस्तिष्क का कृत्रिम रूप है। रोबोट नामक मशीनी मानव से शुरू यह यात्रा जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए  माना जाने लगा है कि जो उसके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेगा वह विकास की दौड़ में  पिछड़ जाएगा। जब कम्यूटर आए थे तब उन्हें स्वीकार करने में पूरी दुनिया ने थोड़ा समय लिया था किंतु ए. आई चूंकि उसी में से विकसित होकर निकला लिहाजा उसके प्रति काफी उत्साह नजर आने लगा। शुरुआत में इस कृत्रिम बौद्धिकता के प्रयोग की सफलता पर संदेह के बादल मंडराते रहे। नैतिकतावादियों ने भी  अपनी आपत्तियां दर्ज करवाईं। समाजशास्त्रियों के बीच भी ए. आई को लेकर बहस चल रही है। पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक पात्रों का वर्णन है जो किसी वरदान के परिणामस्वरूप अत्यधिक शक्ति संपन्न बन गए। साथ ही उनमें असाधारण कार्य करने की क्षमता उत्पन्न हो गई जिसके चलते वे समाज के लिए खतरा बन गए। स्थिति बेकाबू होते देख वरदान देने वाले ने ही उन्हें नष्ट किया। ए. आई से होने वाली समस्याओं और खतरों को लेकर दुनिया भर में अनेक फिल्में भी बनीं किंतु इस सबका कोई असर देखने नहीं मिला और तकनीक के विकास में लगे वैज्ञानिकों ने ए. आई की उपयोगिता को इतने प्रभावशाली ढंग से पेश किया कि चाहे न चाहे पूरे विश्व को ये मान लेना पड़ा कि इसको अपनाने के सिवाय उसके पास और कोई विकल्प नहीं है। लेकिन बात यहां खत्म नहीं हो जाती। मनुष्य की खोजी बुद्धि ने एक ऐसा तंत्र और यंत्र खोज निकाला जो मानव मस्तिष्क के सोचने की शक्ति और बुद्धि कौशल में उससे भी कई गुना आगे है। कैलकुलेटर जैसी छोटी सी चीज शुरुआत में आश्चर्यचकित कर देती थी। फिर सूचना तकनीक ने और छलांगे लगाईं। कंप्यूटर से सुपर कंप्यूटर तक की यात्रा ने पूरे विश्व की तकदीर और तस्वीर दोनों बदलकर रख दी। डिजिटल तकनीक और फिर इंटरनेट के उपयोग करने में सक्षम एंड्रॉयड मोबाइल फोन ने विकास के नए झंडे गाड़ते हुए पूरी दुनिया को जोड़ दिया। आज यदि एक क्षण के लिए भी मोबाइल बंद कर दिया जाए तो लोग परेशान हो उठते हैं। कंप्यूटर और इंटरनेट की जुगलबंदी ने पूरी दुनिया को ऐसे शिकंजे में कस दिया है जिससे मुक्त होना असम्भव है। शुरू में ये आशंका व्यक्त की जाती थी कि कम्प्यूटर परंपरागत रोजगार छीन लेगा। कुछ समय तक ये हुआ भी लेकिन जल्द ही स्पष्ट हो गया कि बिना उसके इंसानी जिंदगी में ठहराव आ जाएगा। कंप्यूटर का ज्ञान शिक्षित होने का पैमाना बन गया। अब तो छोटे बच्चे तक उसमें पारंगत हो गए हैं। ये कहना भी गलत न होगा कि कम्प्यूटर , इंटरनेट और मोबाइल ने जिंदगी सरल बनाई है और सुविधाएं बढ़ीं हैं। सूचना प्रेषण और संपर्क को इसने जो आसानी दी उसने विकास की नई परिभाषा गढ़ दी। लेकिन ए. आई के बारे में जो कुछ भी सामने आया है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह मानवीय मस्तिष्क का मशीनी रूपांतरण है जिसे खुद मनुष्य ने ही बनाया है। इसकी क्षमता, कार्यक्षेत्र और सटीक कार्यशैली कल्पनातीत होते हुए भी वास्तविकता है। आज ए. आई तकनीक सर्वत्र चर्चा का विषय बन चुकी है। इससे मिलने वाले लाभों को लेकर सर्वत्र उत्सुकता भी है। लेकिन इसके साथ ही भय भी है क्योंकि जिस मशीनी मानव का विकास ए. आई के रूप में किया गया उसमें इंसान से सैकड़ों गुना क्षमता और प्रतिभा तो है किंतु वह भावना शून्य होने से हमारे सुख - दुख को कितना बांट सकेगा इसमें संदेह है। इसके अलावा ये सवाल भी उठ  रहा है कि क्या मनुष्य ए. आई का विकास कर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहा क्योंकि एक  रोबोट जितना काम कर सकता है उतना कई मनुष्य नहीं कर सकते। लेकिन महज इस आधार पर उसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसके जरिए मानवीय चिकित्सा और शिक्षा जैसे क्षेत्र में  चमत्कारिक सुधार संभव हैं। साथ ही इसकी मदद से विज्ञान के विकास को पंख लगने के कारण नए रोजगार उत्पन्न होंगे। ये संतोष का विषय है कि भारत ने समय रहते ए. आई के रास्ते पर अपना कदम बढ़ा दिए हैं। वैश्विक सम्मेलन में देश के उद्योगपतियों सहित अन्य लोगों ने जो भी रुचि और उत्साह दिखाया वह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के हमारे प्रयास को सफल बनाने में सहायक होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 February 2026

पंजाब में खालिस्तानी आतंक का सिर उठाना खतरे का संकेत


पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान अस्पताल में भर्ती हैं। खालिस्तान समर्थक एक संगठन द्वारा भेजे गए ईमेल में उस अस्पताल को उड़ाने की धमकी के साथ ही उन्हें  पोलोनियम नामक विषैले पदार्थ से संक्रमित किए जाने का खुलासा किया गया है। खालिस्तान नेशनल आर्मी के नाम से आए ईमेल में पंजाब को खालिस्तानियों का बताते हुए श्री मान का हाल भी पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत  सिंह जैसा किए जाने की धमकी दी गई है जिन्हें खालिस्तानियों ने मानव बम से उड़ा दिया था।  मुख्यमंत्री को विषैली चीज से संक्रमित करने और बेअंत सिंह जैसा हाल करने जैसी धमकी के बाद सुरक्षा बल चिंता में है। राज्य में कानून व्यवस्था की निरंतर बिगड़ती स्थिति के बाद खालिस्तानी आतंक के सिर उठाने से राज्य में अस्सी - नब्बे के दशक का वह दौर वापस आने की आशंका बढ़ती जा रही है जब वहां देश विरोधी ताकतों ने दहशत फैला रखी थी।  अनेक नेता और पत्रकार मारे गए। अमृतसर के ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त पर ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी सैन्य कार्रवाई हुई जिसमें खालिस्तानी सरगना जरनैल सिंह भिंडरावाला मारा गया। बाद में उसी के प्रतिशोधस्वरूप प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उन्हीं के दो सिख अंगरक्षकों ने गोलियों से भून दिया। जिन जनरल वैद्य के नेतृत्व में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ उनकी भी सेवा निवृत्ति के बाद पुणे में खालिस्तानियों  द्वारा हत्या कर दी गई। जैसे - तैसे वह आतंक खत्म हुआ और पंजाब में शांति लौट आई। जो सिख समुदाय कांग्रेस से नाराज था उसने भी पुरानी बातें भूलकर उसे राज्य की सत्ता सौंपने की दरियादिली दिखाई। लेकिन बीते कुछ सालों में पंजाब की  धरती में दबे खालिस्तानी आतंक के बीज फिर अंकुरित होने लगे। इसका संकेत नवंबर 2020 से एक साल तक दिल्ली में चले किसानों के उस धरने में मिला जो था तो केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किन्तु धीरे - धीरे उसमें खालिस्तानी तत्व घुस आए। चूंकि उसमें पंजाब से आए सिखों की बड़ी संख्या थी इसलिए शुरुआत में   किसी को समझ में नहीं आया किंतु जब कुछ सिख नौजवान भिंडरावाले के चित्र अंकित टी शर्ट में नजर आए तब ये बात सामने आई कि किसानों की आड़ में खालिस्तानी तत्व सक्रिय हो गए। धीरे - धीरे विदेशी आर्थिक सहायता के संकेत भी मिले। विशेष रूप से कैनेडा और  ब्रिटेन में किसान आंदोलन के समर्थन में जिस तरह से भारत विरोधी उपद्रव देखने मिले उनके बाद ये संदेह पुख्ता होने लगा कि खालिस्तानी आतंक का पुनर्जन्म हो रहा है। उसी दौरान  गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली के लाल किले में की गई तोड़फोड़ के बाद एक निहंग सिख द्वारा लालकिले पर निशान साहब फहराने की हिमाकत भी दुनिया ने देखी। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के बाद धरना तो बेनतीजा समाप्त हो गया किंतु पंजाब में खालिस्तानी आतंक का बीजारोपण हो गया। उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को भारी सफलता मिलने के पीछे खालिस्तान समर्थक ताकतों का समर्थन भी चर्चा में रहा। आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे डॉ. कुमार विश्वास तो शुरू से ही आरोप लगाते रहे हैं कि पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल की खालिस्तानी  अलगाववादियों से संगामित्ती है। और जब श्री केजरीवाल ने श्री मान को मुख्यमंत्री बनवाया तब ये बात स्पष्ट हो गई कि इस सीमावर्ती संवेदनशील राज्य में बजाय किसी सक्षम राजनीतिक शख्सियत के उन्होंने ऐसे व्यक्ति को गद्दी पर बिठा दिया जिसे वे  कठपुतली की तरह नचा सकें। इस संबंध में एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री मान द्वारा पंजाब की गद्दी संभालने के बाद खाली की गई संगरूर लोकसभा सीट से अकाली दल ( अमृतसर) के सिमरनजीत सिंह मान जीते जो कट्टरपंथी सिख राजनीति से जुड़े थे। उसी के बाद से पंजाब में हत्याओं और हिंदुओं के धर्मस्थलों पर खालिस्तानियों के हमलों का सिलसिला शुरू हो गया। ये बात पूरी तरह सही है कि खालिस्तानी संगठनों को पाकिस्तान और कैनेडा से भरपूर सहायता मिलती है किंतु पंजाब में कमजोर सरकार और अपरिपक्व मुख्यमंत्री के होने से भी देश विरोधी ताकतों का हौसला बुलंद है। जब भगवंत सिंह मान को धमकियां मिलने लगीं और खालिस्तानी पंजाब को एक बार फ़िर आतंक की आग में झोंकने आमादा हो गए तब राज्य सरकार को होश आया किंतु सच्चाई ये है कि इस स्थिति के लिए मुख्यमंत्री मान के साथ ही आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी बराबरी का कसूरवार है जिसने सत्ता हासिल करने के लिए पंजाब में खालिस्तानी आतंक को दोबारा पनपने का अवसर दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 February 2026

बजट सत्र के बीच में लंबा अवकाश देना निरर्थक


संसद के बजट सत्र का पहला चरण गत सप्ताह पूर्ण होने के बाद सत्रावसान हो गया। अब 9 मार्च से दोबारा सत्र शुरू होगा जिसमें बजट  पारित किया जाएगा। साथ ही लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव पर भी सत्ता - और विपक्ष में गर्मागर्मी रहेगी। सत्र के पहले चरण में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा  में प्रधानमंत्री का भाषण हुए बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा किसी पत्रिका में प्रकाशित पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की कथित पुस्तक के अंश पढ़ने के कारण सत्ता और विपक्ष के  बीच हुए टकराव ने अप्रिय रूप ले लिया। सदन के  भीतर और उसके बाहर जिस प्रकार की रस्साकशी और व्यक्तिगत छींटाकशी देखने मिली उसके  कारण संसद की गरिमा तो तार - तार हुई ही सांसदों के आचरण का गिरता स्तर भी देश और दुनिया के सामने आ गया। विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर अशोभनीय आरोप लगाए तो सत्ता पक्ष ने भी जवाबी हमला करते हुए पंडित नेहरू और उनके राजनीतिक वारिसों की कलई खोलना शुरू कर दिया। राहुल ने एक पुस्तक का मामला उठाया तो भाजपा के निशिकांत चौधरी बस्ता भर किताबें लेकर आ गए। दोनों तरफ से हुई कीचड़ फेंक प्रतियोगिता में किसकी जीत और किसकी हार हुई ये कहाना मुश्किल है। विपक्ष ने अपनी खीझ लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पेश कर निकाली तो भाजपा की ओर से श्री गांधी की सदस्यता रद्द करने की पेशकश हो गई। कई दिन  इस मांग पर हंगामा होता रहा कि राहुल को बोलने दिया जाए। लोकसभा के विवाद की छाया राज्यसभा पर भी पड़ी जिससे वहां की कार्यवाही भी बाधित होती रही। जिन लोकसभा सदस्यों का निलंबन हुआ वे भी संसद के प्रवेश द्वार पर धरना दिए बैठे रहे। लेकिन जनरल नरवणे की जिस पुस्तक को लेकर संसद का बहुमूल्य समय और जनता के  करोड़ों रु. बेकार हो गए उसकी चर्चा सत्र का अवकाश होते ही बंद हो गई। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। पहले भी ये देखने में आया है कि संसद  में जिन मुद्दों को लेकर हंगामा होता है और विपक्ष सदन नहीं चलने देता वे सत्र के बाद ठन्डे बस्ते में चले जाते हैं। चूंकि सदन के भीतर लगाए गए आरोप - प्रत्यारोप कानून के क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं इसलिए दोनों पक्ष बिना डरे बहुत कुछ ऐसा बोल देते हैं जो बाहर अवमानना के अंतर्गत आता है। जनरल नरवणे की पुस्तक को लेकर दिल्ली पुलिस में प्रकरण दर्ज़ हो चुका है।  उसके प्रकाशक ने स्पष्टीकरण दे दिया है कि वह अभी तक अप्रकाशित है। श्री नरवणे वैसे तो इस विवाद पर मौन रहे किंतु प्रकाशक के स्पष्टीकरण का उन्होंने तत्काल अनुमोदन कर दिया।  बीते तीन दिनों में न ही श्री गांधी या अन्य किसी विपक्षी नेता ने पुस्तक के बारे में कुछ कहा और न ही सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर पलटवार का कोई प्रयास किया। रोज शाम को नेताओं और पत्रकारों को बिठाकर बहस करवाने वाले टीवी चैनलों ने भी दूसरे विषयों को पकड़ लिया। ये सब देखकर लगता है संसद केवल सनसनी फैलाने का मंच बनकर रह गई है। वह जमाना, जब सदन में मुद्दों पर पक्ष - विपक्ष से गंभीर चर्चा होती थी, अब केवल स्मृतियों में ही रह गया है। इसके लिए कौन कितना दोषी है इसका निर्णय करना कठिन है क्योंकि जो आज पक्ष में हैं वे भी विपक्ष में रहते हुए सदन को बाधित करने को संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा मानते थे। कुल मिलाकर संसद की गरिमा केवल दिखावे तक सीमित रह गई है। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी द्वारा हस्ताक्षर नहीं किए जाने पर कांग्रेस ने स्पष्टीकरण दिया कि स्पीकर को पद से हटाने के नोटिस पर नेता प्रतिपक्ष का हस्ताक्षर करना संसदीय लोकतंत्र में सही नहीं है। लेकिन क्या नेता प्रतिपक्ष के सामने उन्हीं की पार्टी के सांसदों द्वारा आसंदी पर कागज फेंकना और गर्भगृह में आकर नारेबाजी करना  संसदीय लोकतंत्र के लिए सही है ? राष्ट्रपति का अभिभाषण और बजट जैसे विषय विपक्ष के लिए अपना दृष्टिकोण रखने का बेहतरीन अवसर होते हैं जिसका लाभ उसे उठाना चाहिए क्योंकि जब सदन  नहीं चलता तब भी सत्ता पक्ष का काम तो जैसे - तैसे हो ही जाता है किंतु विपक्ष के हाथ कुछ नहीं लगता। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है लेकिन अन्य दलों के पास भी ऐसे सांसद हैं जो  अपनी बात प्रभावशाली तरीके से रखते हैं किंतु हंगामे की वजह से उन्हें बोलने ही नहीं मिलता। ये देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि होली के बाद जब संसद का सत्र दोबारा शुरू होगा तब भी इसी तरह का तनावपूर्ण माहौल बना रहेगा क्योंकि जिस उद्देश्य से ये अवकाश दिया जाता है उसके सदुपयोग के प्रति ज्यादातर सांसदों में लेश मात्र गंभीरता नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 February 2026

नेपाल के बाद बांग्लादेश में भी जेन - जी ठगा महसूस कर रहे



वर्ष 2024 के अगस्त माह में युवाओं के जबरदस्त आंदोलन के परिणामस्वरूप हालात इतने बिगड़े कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को जान बचाकर भारत आना पड़ा।  तब से वे दिल्ली के  निकट कड़ी सुरक्षा के बीच रह रही हैं। हालांकि भारत सरकार ने उन्हें आज तक औपचारिक तौर शरण नहीं दी। लेकिन बांग्लादेश के अनुरोध के बावजूद वापस भी नहीं भेजा। उनकी पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया लिहाजा वह चुनाव में भाग नहीं ले सकी।  गत दिवस आए परिणामों के बाद उनकी परम्परागत विरोधी बीएनपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी जिसके कारण हसीना की घर वापसी के आसार धूमिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अवामी लीग समर्थक मतदाता विशेष तौर पर  हिन्दू समुदाय ने कट्टरपंथी जमात - ए - इस्लामी के आतंक से बचने के लिए तारिक रहमान की बीएनपी को समर्थन देना बेहतर समझा।  सबसे चौंकाने वाली बात रही हसीना को सत्ता से हटाने के लिए हुए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्र नेताओं को मतदाताओं द्वारा तिरस्कृत किया जाना। उल्लेखनीय हैं श्रीलंका में हुए सत्ता परिवर्तन में युवाओं की प्रमुख भूमिका के बाद बांग्लादेश और नेपाल में भी उसी शैली में सरकार बलपूर्वक पलटी गई और गुस्साई जनता ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आवास में घुसकर लूटपाट की। उन दृश्यों को पूरी दुनिया में देखा गया। कुछ अन्य देशों में भी इसी तरह सत्ताधीश हटाए हटाए गए जिसके बाद जेन - जी नामक एक नया संबोधन चल पड़ा। लोकतांत्रिक देशों के युवाओं में  सत्ता के प्रति बढ़ते असंतोष की परिणिति हिंसक जनांदोलन के रूप में होने से भारत में भी ऐसा ही होने की आशंका व्यक्त की गई। इसके पीछे वही ताकतें हैं जो लगातार देश को अस्थिर करने के लिए प्रयासरत हैं। सी.ए.ए , एन. आर.सी  और कृषि कानूनों आदि के बहाने जो आन्दोलन खड़े किए गए उनमें अलगाववादी ताकतों की भूमिका स्पष्ट तौर पर दिखाई दी। जेएनयू, अलीगढ़ मुस्लिम , जादवपुर और उस्मानिया विवि में हुए छात्र आंदोलनों में भी वही झलक दिखाई दी। दिल्ली के शाहीन बाग धरने को नया प्रयोग नाम दिया गया। साल भर से ज्यादा दिल्ली में रास्ता रोककर किए गए किसान आंदोलन से किसानों का तो राई - रत्ती भला नहीं हुआ लेकिन पंजाब में खालिस्तानी आतंक का पुनर्जन्म अवधि हो गया। इसलिए बांग्लादेश और नेपाल में जब अराजक तरीके से सत्ता बदली गई तब भारत में भी कुछ लोगों को वैसे ही युवा आंदोलन की उम्मीद नजर आने लगी। वोट चोरी के नाम पर जनता को भड़काकर अव्यवस्था फैलाने का ताना - बाना बुना गया। उस मुहिम से  भी वही तबका जुड़ गया जो उसके पहले के सभी आंदोलनों में सक्रिय रहा। बिहार के मतदाताओं ने वोट चोरी का ढोल पीटने वालों के दुष्प्रचार पर जिस तरह पानी फेरा उसके बाद भारत में जेन - जी के नाम पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश विफल हो गई। उसके बाद  एस.आई.आर ( मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण) का विरोध कर जनता को भड़काने की चाल चली गई किंतु उसे भी जन समर्थन नहीं मिला। दरअसल इसका कारण ये है युवा शक्ति  आंदोलन तो खड़ा कर देती है किंतु जनता उसे सत्ता संचालन के लायक नहीं समझती। श्रीलंका और नेपाल में हुए सत्ता परिवर्तन में युवाओं की निर्णायक भूमिका के बाद भी नई सरकार में ले देकर फिर पेशेवर राजनेता ही लौट आए। और यही बांग्लादेश के चुनाव परिणाम दर्शा रहे हैं। जनता ने बीएनपी को  सरकार और जमात - ए - इस्लामी को तो विपक्ष में बिठा दिया। लेकिन जिन युवाओं के कारण बंगलादेश में बड़ी जनक्रांति हुई उनको पूरी तरह नकार दिया । इसी तरह नेपाल में भी जिन युवा नेताओं ने कुछ दिनों के भीतर सत्ता के महारथियों को उखाड़ फेंका उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान की देहलीज पर ही रोक दिया गया। उक्त उदाहरणों से ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जेन - जी का उपयोग एक औजार के रूप में किया जाता है। इसके पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होता है। बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं में इसका प्रमाण खुलकर सामने आया। संयोगवश भारत में युवा शक्ति को भड़काकर अराजकता के रास्ते पर ले जाने का षडयंत्र लगातार विफल हो रहा है। इसका कारण हमारे समाज का अहिंसक स्वाभाव है। इसलिए भारत में सत्ता परिवर्तन मतदान से होता है रक्तपात से नहीं। दुर्भाग्य से हमारे सभी पड़ोसी देशों पाकिस्तान , नेपाल , श्रीलंका , बंगलादेश, म्यांमार में लोकतंत्र कभी सेना तो कभी भीड़ के कदमों तले रौंदा जा चुका है किंतु देश विरोधी शक्तियों की तमाम कोशिशें भारत में नाकामयाब होती रही हैं। नक्सलवाद की जड़ें उखड़ जाना इस बात का ताजा प्रमाण है कि भारत की युवा शक्ति की लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरी आस्था है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 13 February 2026

विशाल बहुमत के बाद भी तारिक की राह आसान नहीं होगी




आखिरकार बांग्लादेश में चुनाव हो ही गए जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी को प्रचंड बहुमत मिला। अब इसके नेता तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना से सुनिश्चित है जो खालिदा जिया के बेटे हैं और गत 25 जनवरी को ही देश लौटे थे जिसके पाँच दिन बाद ही बेगम चल बसीं। तारिक के पिता जिया उर रहमान भी  राष्ट्रपति रहे थे । देश की राजनीति  50 सालों से मुजीबुर्रहमान और जिया उर रहमान के परिवार के बीच ही झूलती रही। जिया के बाद उनकी पत्नी सत्ता में आईं वहीं मुजीब की बेटी शेख हसीना भी लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं। और अगस्त 2024 में तख्ता पलट होने के बाद  भारत। आकर यहीं रह रही हैं जो दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट का बड़ा कारण है। बांग्लादेश की अदालत ने हसीना को मृत्युदंड सुना दिया जिसके बाद वह लगातार उन्हें वापस भेजने की मांग कर रहा है। कहा जाता है कि हिंदुओं पर अत्याचार के पीछे हसीना का भारत में रहना भी कारण है। हालांकि  बांग्लादेश बनने के कुछ सालों बाद  मुजीब की हत्या होने के उपरांत  सत्ता ज्यादातर भारत विरोधियों के हाथ रही जिससे हिंदुओं की हत्या , महिलाओं के साथ दुराचार , मंदिरों आदि को नष्ट करने जैसे अपराध सरकारी संरक्षण में होते रहे। शेख हसीना के 15 वर्षीय काल में जरूर कुछ कमी आई लेकिन हिन्दू आबादी और  धर्मस्थलों की पूरी तरह सुरक्षा नहीं हो सकी। हसीना को अपदस्थ करने के बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिंदुओं के साथ जो व्यवहार किया उसने 1947 की कड़वी यादें ताजा कर दीं। बावजूद इसके खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल हुए और उनके बेटे तारिक रहमान से निजी मुलाकात कर चर्चा की। संभवतः इसीलिए चुनाव घोषणापत्र में बीएनपी ने हिंदुओं की सुरक्षा का वायदा शामिल किया। प्रचार के दौरान भी तारिक भारत के साथ बेहतर रिश्तों की बात कहते रहे। इसीलिए हिन्दू मतदाताओं ने बीएनपी का समर्थन भी किया। मुख्य विपक्षी दल के तौर पर जमात - ए - इस्लामी उभरी जिसके नेता अजहरुल इस्‍लाम को मो. यूनुस की अंतरिम सरकार के बनने के बाद 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध करने के आरोप में युद्ध अपराधी मानकर मृत्युदंड सुनाने के साथ ही जमात को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी सजा रद्द कर  पार्टी का पंजीयन भी बहाल कर दिया। कहा जाता है जमात पर यूनुस का वरद हस्त था और वे उसे सत्ता में देखना चाह रहे थे। लेकिन खालिदा की आकस्मिक मौत के बाद बीएनपी के पक्ष में सहानुभूति पैदा हुई। जिस छात्र संगठन की हसीना की सत्ता उखाड़ फेंकने में प्रमुख भूमिका रही उसे भी मतदाताओं ने नकार दिया। तारिक  ने चुनाव के दौरान खुद को एक सुलझे हुए नेता के तौर पर पेश किया और भारत के साथ बेहतर संबंध रखने की उम्मीद भी जताई।  दूसरी तरफ जमात घोषित तौर पर इस्लामिक कट्टरपंथी व्यवस्था की वकालत कर रही थी।बहरहाल तारिक  को दो तिहाई बहुमत देकर मतदाताओं ने राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की । देखना ये है कि क्या हिंदुओं का थोक समर्थन मिलने से तारिक उनके प्रति संवेदनशील रहने के साथ ही भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ेंगे जो मो. यूनुस के आने के बाद बुरी तरह बिगड़ गए थे। ये सवाल भी है कि तारिक क्या यूनुस के प्रभाव से बाहर निकलकर फैसले ले पाएंगे क्योंकि कट्टरपंथी जमात नई सरकार को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बांग्लादेश के  कट्टरपंथियों पर पाकिस्तान जिस तरह डोरे डाल रहा है उसकी वजह से  भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने के प्रयास होते रहेंगे जिसका दुष्परिणाम हिंदुओं पर अत्याचार के तौर पर सामने आ सकता है। और ये भी कि क्या शेख हसीना के भारत में रहते तक तारिक उसके साथ नज़दीक आने का साहस बटोर सकेंगे?  सीमा और नदियों के पानी के अलावा घुसपैठियों की वापसी जैसे तमाम विवादित मुद्दे लंबित हैं। वहीं बांग्लादेश पर प्रभाव जमाने के लिए पाकिस्तान, अमेरिका और चीन प्रयासरत हैं। यूनुस ने वहां चीन की जड़ें जमाने में काफी सहायता दी। डोनाल्ड ट्रम्प भी एक द्वीप पर नजर गड़ाए हैं। ऐसे में तारिक के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बड़ी समस्या बनेंगे। हालांकि उनका और बांग्लादेश दोनों का हित तो भारत के साथ दोस्ती बढ़ाने में ही है किंतु उसमें शेख हसीना को पनाह देना बाधा बन सकता है जिनके राज में ही खालिदा जिया जेल गईं और तारिक को देश छोड़ना पड़ा। ये सब देखते हुए इस देश और नई सरकार के बारे में कोई भी भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी क्योंकि इस देश की सियासत शुरू से ही कड़वाहट से भरी रही। सबसे बड़ी बात यहां इस्लामिक धर्मांधता का बोलबाला है जिसके कारण इसकी आजादी के लिए खून बहाने वाले भारत को छोड़ ये देश पाकिस्तान के करीब जा पहुंचा जिसके हुक्मरानों और फौजियों ने बांग्लादेशी जनता और महिलाओं पर अमानुषिक अत्याचार किए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 12 February 2026

सांसदों की भीड़ में सर्वमान्य नेताओं का अभाव


ऐसा लगता है कि संसद के बजट सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता ही जाएगा । परिणामस्वरुप सार्थक चर्चा के बजाय आरोप - प्रत्यारोप  होते रहेंगे और इसी दौरान बजट पारित भी हो जाएगा। वैसे भी राहुल गांधी के आक्रामक भाषण और वित्तमंत्री के तीखे जवाब के बाद बहस में कोई आकर्षण नहीं रहा। सौभाग्य से राज्यसभा अपेक्षाकृत शांत है जहां चर्चा कुछ बेहतर तरीके से हो रही है। अब तक दोनों सदनों में जितने भी सांसदों ने बजट पर  विचार रखे उनमें सबसे सुलझा हुआ भाषण राज्यसभा में आम पार्टी के सदस्य राघव चड्ढा ने दिया जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। उन्होंने बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा की तो कुछ की आलोचना भी। लेकिन एक जिम्मेदार सांसद की तरह वित्तमंत्री को अनेक उपयोगी सुझाव भी दिए। उस दौरान निर्मला सीतारमण बड़े ध्यान से उन्हें सुनती रहीं। बेहतर हो जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में वित्तमंत्री द्वारा बजट पर हुई  बहस के जवाब में दिए भाषण की प्रशंसा की ठीक वैसे ही उन्हें श्री राघव की तारीफ भी करनी चाहिए जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए भी उत्तेजना फैलाने की बजाय उच्च सदन का सदस्य होने की पात्रता प्रमाणित की। बहरहाल लोकसभा में जो टकराव है उससे अप्रिय स्थितियां उत्पन्न होने की आशंका बढ़ रही है। कांग्रेस द्वारा लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव तो रखवा दिया गया किंतु तृणमूल कांग्रेस के साथ न आने से उसकी वजनदारी कम हो गई। कांग्रेस की चिंता ये है कि  प्रस्ताव धराशायी होने के बाद वह अध्यक्ष को लेकर क्या करेगी? दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार गलतियां करते जा रहे हैं। बजट पर बोलते हुए भारत माँ को बेचने जैसी हल्की बात बोलकर उन्होंने मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को गद्दार बोलने वाली गलती दोहरा दी। इसके अलावा अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में एपस्टीन फाइल का जो जिक्र किया वह भी अवांछित और अप्रासंगिक था। व्यापार समझौते का जितना भी विवरण सार्वजानिक हुआ उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे भारत के झुकने का संकेत हो। उल्टे अमेरिका ने कुछ बातों पर स्पष्टीकरण देकर विपक्ष द्वारा उठाई जा रही शंकाओं का समाधान कर दिया। सदन के बाहर संसद के परिसर में  प्रदर्शित वह बैनर भी संसदीय मर्यादा के विरुद्ध है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने घुटना टेककर बैठा दिखाया गया है। श्री गांधी के भाषण के कुछ अंशों पर सत्ता पक्ष ने विशेषाधिकार हनन कार्रवाई  की जो घोषणा की है वह निश्चित तौर पर पलटवार ही है । इसी तरह पूर्व थल सेनाध्यक्ष नरवणे की कथित अप्रकाशित पुस्तक की प्रति का प्रदर्शन करने के कारण कानून का शिकंजा नेता प्रतिपक्ष के इर्द -गिर्द कसता जा रहा है। इस मुकाबले में कौन विजेता होकर निकलेगा वह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि संसदीय प्रणाली की गरिमा बचेगी या नहीं? सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव नई बात नहीं। संसद के भीतर गर्मागर्मी भी होती रही है । लेकिन मौजूदा माहौल  वैचारिक विरोध से आगे बढ़कर शत्रुता का एहसास करवा रहा है। प्रधानमंत्री के प्रति राहुल जिस तरह की टिप्पणियां करते हैं वह उनकी अपरिपक्वता का परिचायक है। वहीं सत्ता पक्ष भी श्री गांधी की जरूरत से ज्यादा घेराबंदी करता है। बेहतर हो उनको भी अन्य विपक्षी नेताओं जितना ही महत्व दिया जाए । यद्यपि संसदीय प्रणाली में नेता प्रतिपक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण होता है और उसे भविष्य का  संभावित प्रधानमंत्री माना जाता है। साठ के दशक में पहली बार सांसद बने अटलबिहारी वाजपेयी के भाषण सुनकर पं.जवाहर लाल नेहरू ने उनमें भविष्य का प्रधानमंत्री देख लिया था। 1977 तक संसद में कांग्रेस का इकतरफा दबदबा हुआ करता था। लेकिन तब  विपक्ष की कम संख्या के बाद भी अनेक ऐसे सदस्य होते थे जो अपनी प्रतिभा और संसदीय ज्ञान के बल पर सरकार को झुका देते थे। लेकिन उनके और सत्ता पक्ष के बीच वैसी कटुता नजर नहीं आती थी जो आज स्थायी रूप ले चुकी है। दुर्भाग्य से  सैकड़ों सांसदों के बीच ऐसे नेताओं का अभाव हो गया है जो इस तरह के विवाद में दोनों पक्षों के बीच सुलह करवा सकें। और  जो हैं भी वे अपना सम्मान बचाए फिरते हैं। कुल मिलाकर संसद की  छवि जनमानस में लगातार गिरती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। राहुल गांधी सहित विपक्ष के अन्य नेताओं को ये ध्यान रखना चाहिए कि संसद के न चलने से सरकार को तो खास फर्क नहीं पड़ता परन्तु विपक्ष में बैठे सांसद अपनी बात रखने से वंचित हो जाते हैं। और ये भी कि श्री गांधी के नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र , दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 February 2026

अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल की दूरी से विपक्षी एकता खतरे में


लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध  अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल कांग्रेस ने हस्ताक्षर नहीं किए। पार्टी के अनुसार वह पहले विपक्ष की सभी मांगों को देखने के बाद ही इसकी समर्थन पर फैसला करेगी। लेकिन पार्टी का ये कहना उसके रुख का संकेत है कि अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव अंतिम हथियार होता है । इससे लगता है तृणमूल मतदान के समय अनुपस्थित रह सकती है। हालांकि राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं देने के विरोध में विपक्ष द्वारा उठाए गए कदमों में पार्टी साथ रही। जिन 8 सदस्यों को निलंबित किया गया उनमें तृणमूल के कल्याण बैनर्जी भी हैं। सदन के बाहर धरने में भी तृणमूल सांसद नजर आए। सदन के भीतर अध्यक्ष  और सरकार के विरोध में पार्टी सांसद मुखर रहे हैं। बावजूद उसके अविश्वास प्रस्ताव पर उसका पीछे हटना इंडिया गठबंधन में बढ़ रही दरार का प्रमाण है। स्मरणीय है प. बंगाल विधानसभा  चुनाव में कांग्रेस ने  अकेले लड़ने का जो फैसला लिया उससे ममता बैनर्जी नाराज हैं। पिछले दो चुनावों में कांग्रेस का वामपंथी मोर्चे से गठबंधन  था। लेकिन इससे उसका अपना जनाधार खिसककर भाजपा में चला गया। 2021 के चुनाव में तो वह शून्य पर अटक गई। गत लोकसभा चुनाव में भी ममता ने कांग्रेस को घास नहीं डाली जिससे लोकसभा में कांग्रेस  दल के नेता अधीर रंजन चौधरी तक चुनाव हार गए। उसके बाद  कांग्रेस को लगा कि वामपंथियों के साथ लड़ने से उसका परम्परागत मतदाता नाराज है क्योंकि वामपंथी सत्ता की डरावनी यादें आज भी ताजा हैं। कांग्रेस द्वारा वाम मोर्चे का दामन थामने से हिन्दू समाज विशेष तौर पर सवर्णों का  वोट बैंक खिसककर भाजपा की झोली में जा गिरा। इसके अलावा मुस्लिम मतदाता भी  कांग्रेस की कमजोर स्थिति देख तृणमूल की शरण में चले गए। ऐसे में जब कांग्रेस  एकला चलो की नीति पर लौटी तो तृणमूल के कान खड़े हुए। हालांकि प.बंगाल में इंडिया गठबंधन में दरार के लिए ममता ही जिम्मेवार हैं जो  अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए किसी अन्य पार्टी को आगे नहीं बढ़ने देना चाहतीं। राष्ट्रीय स्तर पर भले ही वे भाजपा के विरुद्ध कांग्रेस के साथ हों किंतु प. बंगाल में  कांग्रेस को  उभरने का अवसर नहीं देना चाहतीं। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर भी वे पसंद नहीं  करतीं। ऐसे में श्री बिरला के विरुद्ध कांग्रेस की पहल पर लाए गए अविश्वास प्रस्ताव से दूरी बनाकर ममता ने  आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को किनारे लगाने का इरादा स्पष्ट कर दिया । वैसे भी बीते वर्षों में अनेक अवसर आए जब संसद में तृणमूल ने एन वक्त पर कांग्रेस द्वारा सरकार के विरुद्ध शुरू की गई मुहिम को पलीता लगा दिया। अडानी समूह संबंधी विवाद को लेकर जेपीसी के गठन की मांग का भी तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया था। दरअसल ममता बैनर्जी को ये लगता है कि कांग्रेस के मजबूत होने से राहुल गांधी की संभावनाएं प्रबल होंगी जो उनकी महत्वाकांक्षाओं की राह में बाधा बनेगी। इसीलिए वे समय - समय पर कांग्रेस को झटका देती रही हैं। गोवा विधानसभा के पिछले चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारकर उन्होंने कांग्रेस के लिए खाई खोद दी। इसी तरह दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर कांग्रेस को शून्य से आगे नहीं बढ़ने दिया। वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की एकजुटता बनी नहीं रह सकी।  संसद के भीतर भी विपक्ष की साझा रणनीति नहीं दिखाई देती। बिहार विधानसभा के चुनाव में  करारी हार के बाद राहुल की  राजनीतिक समझ पर कांग्रेस के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। बिहार के जमीनी मुद्दों से इतर वे वोट चोरी की रट ही लगाए रहे। संसद के सत्रों में भी वे कोई न कोई विवाद खड़ा कर देते हैं जिससे वे तो चर्चा में आ जाते हैं किंतु शेष विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं मिलता। समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव भी राहुल की इस आदत से नाराज बताए जाते हैं। अंदरखाने की खबर तो ये भी है कि तमिलनाडु में द्रमुक भी आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को झटका देने की सोच रही है। उधर केरल में कांग्रेस की चुनौती के चलते वामपंथी पार्टियां भी उससे दूरी बना रही हैं। याद रहे वायनाड में पहले भी राहुल और  प्रियंका वाड्रा के लड़ने का वामपंथियों ने काफी विरोध किया था। इस प्रकार ये स्पष्ट है कि राहुल गांधी की कार्यशैली के कारण इंडिया गठबंधन में पहले  जैसी कसावट नहीं रही। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल द्वारा हस्ताक्षर नहीं करना साधारण बात नहीं है। इसके जरिए दरअसल ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को ये संदेश दे दिया कि उनके भाजपा विरोध को कांग्रेस का समर्थन समझने की भूल न करे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 February 2026

बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम कटने से भयभीत हैं ममता


प. बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई. आर) को रोकने के आखिरी प्रयास में भी राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  विफल रहीं। सर्वोच्च न्यायालय में दिग्गज वकीलों के साथ ही वे खुद भी पैरवी करने उतरीं और  उक्त प्रक्रिया को रुकवाना  चाहा किंतु उनकी दलीलें काम नहीं आईं।  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण रोकने से इंकार के बाद अब सुश्री बैनर्जी के पास  एस आई.आर में रोड़ा अटकाने के अवसर खत्म हो चुके हैं। गत  दिवस न्यायालय ने साफ शब्दों में  कहा कि  एस.आई.आर  जारी  रहेगी और  इस संवैधानिक काम में किसी की भी दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं होगी।  राज्य सरकार को ये आदेश भी दिया कि वह  आयोग की मदद के लिए 8 हजार  से अधिक अधिकारी तुरंत मुहैया कराए। इसके अलावा अदालत ने नामों में गलती वाले मतदाताओं को राहत देते  हुए कहा वे 14 फरवरी के एक हफ्ते बाद तक अपने कागजात दिखा सकेंगे। आयोग की इस शिकायत पर कि बंगाल में उनके अधिकारियों को काम करने से रोका जा रहा है और कुछ जगहों पर तो नोटिस तक जला दिया गया, सर्वोच्च ने नाराज  होकर कहा कि संविधान पूरे देश के लिए एक है और किसी को भी सरकारी काम में बाधा डालने की अनुमति नहीं है। इस प्रकार जैसे बिहार में विपक्षी दलों द्वारा ऐड़ी - चोटी का जोर लगाए जाने के बाद भी मतदाता सूचियों  पुनरीक्षण नहीं रुका वही स्थिति  बंगाल में भी बन गई । ममता ने तो बिहार में एस. आई. आर शुरू होते ही अपने राज्य में उसे रोकने की घोषणा जोर - शोर से की थी। राज्य के जिन शासकीय कर्मचारियों को चुनाव आयोग ने  पुनरीक्षण का काम दिया उनको भी असहयोग हेतु भड़काया गया। काम के बोझ से बी. एल. ओ की मौत का भी खूब प्रचार किया गया। छोटी - छोटी बातों को लेकर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए गए। लेकिन  सारी कोशिशें व्यर्थ साबित हुईं।  उल्लेखनीय है बिहार के बाद  पुनरीक्षण का काम अनेक राज्यों में शुरू हुआ लेकिन वहां प. बंगाल जैसी हाय - तौबा देखने नहीं मिली । ममता को इस बात का डर सता रहा है कि  उनकी सबसे बड़ी बैसाखी कहलाने वाले जिन मुसलमानों के नाम बड़ी संख्या में काटे गए उनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों की भी अधिकता है जो इस प्रक्रिया के शुरू होते ही  गायब हो गए।  ऐसे लाखों मतदाताओं ने आयोग के नोटिसों का जवाब भी नहीं दिया। ममता के डर का एक कारण ये भी है कि 30 फीसदी से भी अधिक मुस्लिम मतदाताओं के एकमुश्त समर्थन की गारंटी नहीं रही। कांग्रेस और वाममोर्चा इस बार अलग - अलग लड़ेंगे । जाहिर है वे भी मुस्लिम मतों में  सेंध लगाएंगे। लेकिन उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के अलावा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले तृणमूल के बागी विधायक हुमायूं कबीर का मैदान में उतरना है। बिहार में ओवैसी की सफलता से ममता घबराहट में हैं। ऊपर से बाबरी मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय जिस उत्साह के साथ हुमायूं कबीर के साथ जुड़ा उसने मुस्लिम मतों में बंटवारे की आशंका उत्पन्न कर दी। दूसरी तरफ घुसपैठियों को संरक्षण और मुसलमानों के जरूरत से ज्यादा संरक्षण के कारण हिन्दुओं में पहली बार ममता के विरुद्ध गोलबंद होने की संभावना बढ़ रही है। बांग्लादेश में बीते एक - डेढ़ साल से हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के अत्याचार की जो खबरें आ रही हैं उनके कारण भी हिंदुओं के बीच ये भावना तेजी से फैल रही है कि उन्हें अपने हितों का संरक्षण करने वाली सरकार चाहिए जिसकी गुंजाइश भाजपा में ही नजर आती है। हालांकि ममता की सत्ता को उखाड़ फेंकना भाजपा के लिए भी इतना आसान नहीं है क्योंकि जब तक उसे हिंदुओं के 70 - 75 फीसदी मत नहीं मिलते तब तक राइटर्स बिल्डिंग पर कब्जा नामुमकिन है। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खाली हाथ लौटा दिए जाने के बाद ममता पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा है। भाजपा इसका कितना फायदा उठा सकेगी ये कहना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि  ममता चुनाव की अधिकृत घोषणा के पहले ऐसी कोई चाल  चल सकती हैं जैसी बिहार में नीतीश सरकार ने महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करने के रूप में चली थी। हालांकि  एस. आई. आर की प्रक्रिया को रोकने के लिए उन्होंने जिस तरह से हाथ - पांव मारे वह  उन पर पराजयबोध के हावी होने का संकेत है। वरना विधानसभा में इतने विशाल बहुमत और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से काफी बेहतर प्रदर्शन के बाद भी वे मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने से इतनी विचलित नहीं होतीं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 February 2026

अमेरिका से समझौते की प्रशंसा और आलोचना में जल्दबाजी से बचें


भारत - अमेरिका  व्यापार समझौते  का जो प्रारूप जारी हुआ उसके पक्ष और विपक्ष में विभिन्न प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। उद्योग और व्यापार जगत के ज्यादातर दिग्गजों ने उसको देशहित में बताते हुए सरकार को बधाई दी है। इसका प्रमाण शेयर बाजार में तेजी बने रहना है। आज ये खबर भी आ गई कि  समझौता की तारीख तक भारतीय निर्यातकों पर लगे अतिरिक्त टैरिफ के 40 हजार करोड़ रु. अमेरिका उन्हें लौटाएगा जो बड़ी राहत है। लेकिन दूसरी तरफ कतिपय किसान संगठन प्रचार कर रहे हैं कि  भारत के कृषि और डेरी उद्योग  की बलि चढ़ा दी गई। इसे लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन की घोषणा भी की गई है। ऐसे में विपक्षी दल भला कहां चुप बैठते सो उन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के समक्ष झुकने वाला आरोप लगा दिया। किसानों और दुग्ध उत्पादकों को होने वाले नुकसान की बात किसान आंदोलन के अघोषित सलाहकार रहे योगेंद्र यादव सहित वह लॉबी भी कर रही है जो मोदी सरकार का विरोध करने के बहाने ढूंढ़ती रहती है। बहरहाल समझौते के विरोधियों ने अब तक जो मुद्दे उठाए उनमें आगामी 5 सालों में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदना भी है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का कहना है कि भारत को अमेरिका से होने वाले आयात में ढाई गुना वृद्धि करना पड़ेगी जो फिलहाल 40 - 42 अरब डॉलर प्रतिवर्ष ही है। साथ ही कुछ फलों और पशु आहार के आयात की छूट पर भी उंगलियां उठ रही हैं। लेकिन प्रधानमंत्री और इस समझौते के  प्रमुख पात्र वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि सरकार  किसानों के हितों की रक्षा करने प्रतिबद्ध रही है। लेकिन सबसे सटीक स्पष्टीकरण कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिया। उनके मुताबिक सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, अनाज, पोल्ट्री, डेयरी उत्पाद, केला, स्ट्रॉबेरी, चेरी, खट्टे फल, हरी मटर, काबुली चना, मूंग, तिलहन, एथनॉल और तंबाकू जैसे उत्पादों पर अमेरिका को  कोई रियायत नहीं मिली। वहां  से दूध, पाउडर, क्रीम, दही, छाछ, मक्खन, घी, बटर ऑयल, पनीर और चीज जैसे किसी भी डेयरी उत्पाद का आयात करने पर भारत राजी नहीं हुआ। उन्होंने भारतीय मसालों को भी  खतरे से बाहर बताया। लेकिन कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने उक्त समझौते की ये कहते हुए आलोचना की है कि सरकार ने कुछ उत्पादों के आयात की अनुमति देकर भारत के कृषि उद्योग को नुकसान पहुंचाने का रास्ता खोल दिया है। चूंकि अभी तक समझौते का प्रारूप ही जारी हुआ है इसलिए समर्थन और विरोध में किए जा दावों और प्रतिदावों की पुष्टि  संभव नहीं है। मार्च में जब समझौते पर हस्ताक्षर होंगे तब ही ये बात सामने आ सकेगी कि प्रशंसक सही हैं या आलोचक ? ट्रम्प के इस दावे पर भी सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि भारत ने रूस से कच्चा तेल आयात करना बंद कर दिया जिसके कारण 25 प्रतिशत की पेनाल्टी  घटा दी गई। रूस ने तो इसका खंडन कर दिया किंतु भारत सरकार की कोई टिप्पणी अभी तक नहीं आई। यद्यपि पहले भी ट्रम्प इस तरह के शिगूफे छोड़ते रहे हैं किंतु भारत ने तेल खरीदना जारी रखा। अमेरिका सरकार के अनेक प्रवक्ताओं का साफ कहना है कि भारत ने रूस से तेल खरीदी नहीं रोकी तब 25 का  टैरिफ दोबारा थोप दिया जाएगा। ऐसे में समझौते के विस्तृत प्रारूप पर हस्ताक्षर होने  के पहले भारत  को इस मुद्दे पर अमेरिका से दो टूक बात कर लेना चाहिए। ये बात तो सही है कि कोई भी समझौता एकपक्षीय नहीं हो सकता। अमेरिका यदि भारत के साथ होने वाले व्यापार घाटे को कम करना चाह रहा है तो ये उसका अधिकार है। हर देश इस बारे में प्रयासरत रहता है। चूंकि अभी तक अमेरिका हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा जो हमारे सामान पर शून्य टैरिफ लगाता था इसलिए 18 प्रतिशत का टैरिफ निश्चित रूप से भारी है। लेकिन उससे पूरी तरह कारोबारी रिश्ते तोड़ना अव्यवहारिक भी है और असम्भव भी । इसीलिए भारत ने  टैरिफ हमले के जवाब में अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि करते हुए विश्व व्यापार में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति का दांव चला। शुरू में तो ट्रम्प ने इसे हल्के में लिया किंतु जैसे ही यूरोपीय यूनियन से संधि हुई उनको चिंता सताने लगी जिसके बाद उन्होंने समझौता होने की घोषणा कर दी। यद्यपि गतिरोध खत्म होना तो खुशी की बात है किंतु अब कोई ऐसी मजबूरी नहीं है कि अमेरिका को वे रियायतें दी जाए जो  हमारे किसान ही क्यों  उद्योगपति और व्यापारी के हितों के भी विरुद्ध हों। सरकार लोगों की नाराजगी से बचने के लिए किसी बात पर अभी पर्दा डाल भी दे किंतु जब समझौता अपने विस्तृत रूप में सामने आएगा तब तो सब स्पष्ट होगा ही। इसलिए बेहतर है सरकार पूरी ज़िम्मेदारी से ही समझौते संबंधी जानकारी दे क्योंकि सूचना क्रांति के इस युग में कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। वैसे आलोचकों को भी जल्दबाजी से बचना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 February 2026

हमारी निजता धड़ल्ले से बिक रही और हमें पता ही नहीं



सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्स एप को लोगों की निजता का उल्लंघन करने के लिए डांट पिलाई है। सोशल मीडिया के इस मंच से करोड़ों भारतीय भी जुड़े हैं । निःशुल्क सेवा देने वाले व्हाट्स एप की कमाई उसका उपयोग करने वालों के डेटा ( निजी विवरण) के व्यावसायिक उपयोग से होता है। हालांकि केवल व्हाट्स एप ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफार्म अथवा इंटरनेट का उपयोग करने वाले की व्यक्तिगत जानकारी मार्केटिंग कंपनियों को बेचकर ये सब अनाप - शनाप धन कमाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय सहित अन्य नियामक एजेंसियां इस बारे में काफी सख्ती दिखाती रही हैं । मोटे जुर्माने भी लगाए गए किंतु डेटा बेचने का गोरखधंधा बेरोकटोक जारी है। दावा तो यहां तक होता है कि मोबाइल फोन पर की जाने वाली कोई बातचीत गोपनीय नहीं रहती। मोबाइल धारक किस समय किस स्थान पर है इसकी जानकारी भी आसानी से लग जाती है। इसी की मदद से अपराधी भी पकड़े जाते हैं। मोबाइल फोन पर बातचीत रिकॉर्ड करने की सुविधा के कारण ही अनेक व्यक्ति व्हाट्स एप पर बातचीत करते हैं। लेकिन ये बात बिना संकोच कही जा सकती है कि मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग करने वाले की निजता में खुलेआम डाका डाला जा रहा है जिसको रोकना न तो सरकार के बस में है और न ही न्यायपालिका के। यही वजह है कि अतीत में उठाए गए सख्त कदम बेअसर होकर रह गए। सही बात तो ये है कि जब से दुनिया एक बाजार बन गई है तब से उसमें रहने वाले हर व्यक्ति को उपभोक्ता मान लिया गया है। व्यापार करने वालों का जाल इतना घना है कि कितना भी सतर्क रहें उसमें फंसने से नहीं बचा जा सकता। मसलन एक व्यक्ति जैसे ही कहीं जाने के लिए रेल या हवाई जहाज की टिकिट आरक्षित करता है त्योंही उसके गंतव्य वाली जगह के होटल और टैक्सी वालों के संदेश मोबाइल पर आने लग जाते हैं। इसी तरह जैसे ही कोई व्यक्ति पर्यटन की योजना बनाने हेतु गूगल पर सर्च करता है त्योंही उसके पास तत्संबंधी संदेश आने लगते हैं । लगभग हर व्यक्ति के मोबाइल पर दिन पर प्रॉपर्टी बेचने वालों के फोन के अलावा निवेश योजनाओं के बारे में अनजान नंबरों से संपर्क किया जाना आम बात है। इसके अलावा कर्ज देने वाली संस्थाओं के अवांछित फोन भी परेशान करते हैं। यदि आप आरक्षित टिकिट पर रेल यात्रा कर रहे हैं तब गाड़ी चलते ही आपको रास्ते में भोजन सेवा उपलब्ध करवाने वालों के संदेश आने लगते हैं। एक कार के बारे में गूगल पर जानकारी एकत्र करने पर दूसरी कंपनियां भी आपको अपनी कार खरीदने के लिए संपर्क करने लगती हैं। गला काट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बाजार का उपभोक्ता तक पहुंचना अटपटा नहीं है । लेकिन इसके अतिरेक से होने वाली परेशानी भी कम नहीं है। सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले व्यक्ति की निजी रुचि के अलावा उसकी राजनीतिक विचारधारा तक का आकलन फेसबुक और एक्स पर उसकी गतिविधियों से कर लिया जाता है। इस डेटा का उपयोग चुनाव के समय प्रत्याशी और राजनीतिक पार्टियां भी करती हैं। इस सबसे स्पष्ट है कि डेटा विश्वव्यापी कारोबार बन चुका है जिसके चलते हर खास और आम के बारे में समूची जानकारी की खरीद - बिक्री होती है। हालांकि उसका उपयोग केवल व्यापारिक उद्देश्यों तक सीमित न होकर सरकारी योजनाओं के सर्वेक्षण हेतु भी होता है। लेकिन चिंता का विषय ये है कि जिस तरह आधार कार्ड और पैन कार्ड से किसी भी व्यक्ति के बारे में सारी जानकारी सरकारी एजेंसियां पता कर सकती हैं ठीक वैसे ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के उपयोगकर्ताओं की समूची जानकारी उसके संचालकों की अनुमति के बिना सहज रूप से बिना कुछ किए मिल जाती है जिसको बेचकर अकूत दौलत कमाई जाती है। इसीलिए किसी देश या व्यावसायिक प्रतिष्ठान की मजबूती उसके पास उपलब्ध डेटा से तय होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्स एप पर जो चाबुक चलाया उसका कितना असर होगा ये कहना कठिन है किंतु किसी व्यक्ति की निजता का सौदा उसकी जानकारी और मर्जी के बिना होना अनैतिक भी है और खतरनाक भी। सबसे ज़्यादा चिंता इस बात की है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट का पूरा नियंत्रण अमेरिका के चंद धनकुबेरों के हाथ में है। जिसके कारण ये डर बना रहता है कि कहीं उनकी कमान भी डोनाल्ड ट्रम्प जैसे सनकी के हाथ आ गई तब जो होगा उसकी कल्पना भी डराती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 6 February 2026

संसद केवल भाजपा और कांग्रेस की नहीं: अन्य सांसदों को भी बोलने का अधिकार


संसद में हंगामा जारी है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव संबंधी अपने भाषण में पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के अंश पढ़े जाने पर उत्पन्न विवाद बढ़ता चला गया। आसंदी पर  कागज फेंकने वाले कुछ विपक्षी सांसद पूरे  सत्र के लिए निलंबित भी किए गए। इसके विरोध में विपक्ष की कतिपय महिला सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री के आसन को घेरने के बाद किसी अप्रिय घटना की आशंका के चलते अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभिभाषण पर हुई बहस का उत्तर देने से रोक दिया। और फिर लोकसभा ने बिना उनका जवाब सुने ही धन्यवाद प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया। हालांकि प्रधानमंत्री ने गत दिवस राज्यसभा में 95 मिनिट के लंबे भाषण में विपक्ष पर तीखे हमले करते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया परंतु लोकसभा में अन्य विपक्षी दलों के नेता भी इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने से वंचित रह गए क्योंकि कांग्रेस ने सदन को बाधित करने की अपनी रणनीति जारी रखी। हालांकि बाकी विपक्ष भी ऊपरी तौर पर तो श्री गांधी की हां में हां मिलाता रहा किंतु निजी चर्चा में अनेक सांसदों ने इस बाद पर नाराजगी जताई कि राहुल लगभग प्रत्येक सत्र में कोई न कोई विवाद उत्पन्न कर सदन चलने नहीं देते जिसके कारण दूसरे विपक्षी दलों के सांसदों को  अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल पाता। राहुल की बहिन प्रियंका वाड्रा का कहना है कि सदन चलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है । अर्थात विपक्ष जो भी करे उसकी छूट उसे दी जाती रहे। लेकिन आजाद समाज पार्टी सांसद चंद्रशेखर आजाद ने विपक्ष को भी उसका दायित्व याद दिलाते हुए कहा कि हंगामे से अन्य दलों के सांसद अपने क्षेत्र के मुद्दे नहीं उठा पाते। हालांकि ये न तो पहला सत्र है जो हंगामे के कारण बाधित है और न ही आखिरी क्योंकि आजकल संसद और विधानसभाओं के सत्र केवल संवैधानिक बाध्यताओं के कारण ही होते हैं। उनमें गंभीर बहस होने के बजाय आपसी आरोप - प्रत्यारोप में समय खराब किया जाता है। बजट जैसे अति महत्वपूर्ण विषय पर भी कई बार चर्चा नहीं होती । राष्ट्रपति के अभिभाषण पर कांग्रेस के अलावा अन्य दलों के सांसद भी बोलना चाहते होंगे लेकिन हंगामे के कारण सदन स्थगित होता रहा। आज भी यही हुआ जिसके बाद लोकसभा सोमवार तक स्थगित कर दी गई जबकि विषय सूची के अनुसार अनेक सांसदों द्वारा पेश किए गैर सरकारी विधेयकों पर चर्चा होना थी। यदि यही हाल रहा तो बड़ी  बात नहीं बजट भी इसी तरह स्वीकृत हो जाएगा। अब सवाल ये है कि क्या संसद केवल भाजपा और कांग्रेस की है? ये बात इसलिए उठ खड़ी हुई क्योंकि जबसे राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बने तभी से वे खुद को चर्चा में रखने के लिए हर सत्र में ऐसा कुछ कर बैठते हैं जिससे सत्ता पक्ष उत्तेजित होता है और सदन चल नहीं पाता। ऐसे  में श्री गांधी तो खबरों में आ जाते हैं लेकिन बाकी दलों के ही नहीं बल्कि उनकी अपनी पार्टी के सांसदों का समय बर्बाद होता है। जहां तक सत्तारूढ़ भाजपा का प्रश्न है तो उसे भी ये स्थिति रास आती है क्योंकि सरकार जिस विधेयक या प्रस्ताव को पारित करवाना चाहती है वह बिना बहस के ही स्वीकृत हो जाता है। आने वाले कुछ महीनों में देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उनमें से चुनकर आए लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य इस सत्र में वहां के मुद्दे उठाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते होंगे किंतु यदि आगे भी सदन नहीं चला तब उनके पास सिवाय हाजरी लगाकर दैनिक भत्ता पकाने के और कोई रास्ता नहीं बचेगा। राहुल गांधी और सत्ता पक्ष के टकराव में सपा , द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस जैसे बड़े दलों के  सांसदों की सदन में  उपस्थिति भी चेहरा दिखाने तक सीमित है। बेहतर होता इनके जो नेता हैं वे कांग्रेस और भाजपा दोनों पर दबाव बनाते हुए  कहते कि उनकी खींचतान में बाकी दलों के सांसदों से बोलने का अवसर छीन लिया जाता है। सरकार और मुख्य विपक्षी दल जाहिर तौर पर सदन में प्रभावी और विशेषाधिकार सम्पन्न  हैं किंतु उनकी  रस्सा कशी में छोटे - छोटे दलों के सांसद सदन में बैठकर भी दर्शक बने रहते हैं। भारत की संसदीय प्रणाली बहुदलीय है। यहां तक कि निर्दलीय सांसद तक जीतकर आते हैं। ऐसे में सदन की कार्रवाई में सभी को भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा होता प्रतीत नहीं होता। लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को चाहिए कि वे ऐसी व्यवस्था करें जिससे सदन बड़ी पार्टियों के शिकंजे से बाहर निकले और कुछ नामचीन चेहरे लोकतंत्र के मंदिर के मठाधीश न बन सकें।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 February 2026

बिट्टू को बड़ा नेता बना दिया राहुल ने


पार्टी छोड़कर गए नेता को दल बदलू कहना आम बात है। आजादी के बाद से अब तक हजारों दलबदल हो चुके हैं। इक्का - दुक्का छोड़कर ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस से अलग हुए नेताओं द्वारा ही बनाई गईं। शुरुआती दौर में दलबदल के पीछे वैचारिक मतभेद हुआ करते थे किंतु धीरे - धीरे निहित स्वार्थ और सत्ता का आकर्षण इसकी वजह बनने लगा। आपसी मतभेदों के कारण भी लोगों ने दल बदला और पार्टियां टूटीं। अनेक  क्षेत्रीय पार्टियां तो परिवार के सदस्यों के बीच हुई खींचतान के कारण बिखराव का शिकार हो गईं। ये भी देखने मिला कि पार्टी छोड़कर जाने वाला कुछ समय बाद वापस लौट आया।   पार्टी से बगावत कर नया दल बनाने वाले नेता के साथ भी गठबंधन किया गया। इन्हीं सब बातों के कारण राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा में लगातार कमी आती चली गई। लेकिन नेताओं को इससे फर्क नहीं पड़ता। इसका उदाहरण गत दिवस संसद के प्रांगण में देखने मिला। प्रवेश द्वार पर कांग्रेस सांसद धरना दिए बैठे हुए थे जिनमें नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी थे। इसी दौरान केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को  आता देख श्री गांधी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा मेरा गद्दार दोस्त आ रहा है और फिर उनसे हाथ मिलाना चाहा। लेकिन श्री बिट्टू ने हाथ नहीं मिलाया और उन्हें गद्दार कहे जाने के जवाब में नेता प्रतिपक्ष को देश का दुश्मन कहकर बढ़ गए। उसके बाद श्री गांधी खिसियाहट में बोलते रहे चिंता मत करो   गद्दार दोस्त तुम वापस आओगे। इस घटना का दृश्य पूरे देश ने देखा। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई किंतु कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कुछ नेताओं ने रोका वरना बिट्टू और राहुल में हाथापाई भी हो सकती थी। उल्लेखनीय है रवनीत पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बेअंत सिंह के पोते हैं जिनके कार्यकाल में ही पंजाब में खालिस्तानी आतंकवादियों पर लगाम लगाई गई। लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी जब आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी। रवनीत 2024 में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गए थे। राहुल हमेशा अपनी दादी और पिता की हत्या का जिक्र करते हुए अपने परिवार के बलिदान का महिमामंडन करते हैं। संयोगवश वही विरासत रवनीत सिंह के पास भी है। इसीलिए उन्होंने  कांग्रेस पर सिखों के कत्लेआम जैसे आरोप लगाते हुए  उन्हें गद्दार कहे जाने को पंजाब और सिखों का अपमान बताते हुए पलटवार किया। इस विवाद के बाद ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि यदि बिट्टू गद्दार हैं तब राहुल को सबसे पहले पप्पू कहने वाले नवजोत सिंह सिद्धू क्या हैं जो भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए और जिन्हें पंजाब में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने अपनी लुटिया डुबो ली। और फिर श्री गांधी ने गद्दार कहते हुए बिट्टू की कांग्रेस में वापसी की जो उम्मीद जताई वह भी उनके बचपने का परिचायक है। भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए शत्रुघ्न सिन्हा को राहुल ने बिहार में टिकिट दी। हारने के बाद वे तृणमूल कांग्रेस में जाकर सांसद बन गए किंतु उन्हें गद्दार कहने की हिम्मत श्री गांधी में नहीं हुई। स्मरणीय है म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अनुज लक्ष्मण सिंह 2004 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विरोध कर भाजपा में चले गए और सांसद बन गए। लेकिन पाँच साल बाद फिर कांग्रेस में लौटकर  विधायक बन गए। उन्हें किसी ने गद्दार नहीं कहा। सबसे बड़ा विरोधाभास तो ये है  कि जिन शरद पवार ने सोनिया जी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कांग्रेस छोड़कर एनसीपी बनाई वे इंडिया गठबंधन के शीर्ष नेताओं में शुमार होते हैं और श्रीमती गांधी भी उनसे सलाह लेने में संकोच नहीं करतीं। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जिनमें दलबदल करने वाले नेता को दोबारा कांग्रेस ही नहीं अन्य पार्टियों ने भी गले लगाने में संकोच नहीं किया क्योंकि ऐसा करने में उन्हें राजनीतिक लाभ नजर आया। इसीलिए श्री गांधी द्वारा रवनीत सिंह बिट्टू के बारे में जो कहा वह राजनीतिक शालीनता के विरुद्ध तो था ही,  निजी तौर पर भी आपत्तिजनक है। राहुल की गिनती अब राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में होती है जबकि रवनीत का राजनीतिक कद उनके मुकाबले बहुत छोटा है। ऐसे में यदि राहुल उनसे सौजन्यतावश हाथ मिलाते तो उसका अच्छा असर होता और उन्हें देश का दुश्मन होने जैसा तीखा जवाब नहीं सुनना पड़ता। दरअसल ऐसी ही गलतियों के कारण श्री गांधी की छवि गंभीर नेता की नहीं बन पा रही जिसका नुकसान उनकी पार्टी को उठाना पड़ता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 February 2026

सड़क और सदन का अंतर समझने में विफल हैं राहुल


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लंबे समय से सांसद हैं। कांग्रेस  के महामंत्री और अध्यक्ष जैसे पदों का दायित्व भी निर्वहन कर चुके हैं। सोनिया गांधी की अस्वस्थता  के कारण अब वही पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। इसीलिए अपेक्षा रहती है कि वे जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर सत्ता पक्ष को घेरें। लेकिन वे अप्रासंगिक बातें उछालकर सनसनी फैलाने को ही राजनीति समझ बैठे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नीतिगत मामलों में निशाना साधना पूरी तरह उचित है। सरकार की गलतियों पर उसे कठघरे में खड़ा करना भी नेता प्रतिपक्ष से अपेक्षित होता है। लेकिन वे अपनी शक्ति ऐसे मुद्दों पर खर्च कर देते हैं जिनका समुचित आधार नहीं होने  से वे आम जनता को प्रभावित नहीं करते। हर बात में अडानी को घसीटने से उनकी खीझ ही जाहिर होती है। इसी तरह प्रधानमंत्री पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से दबने जैसी उनकी टिप्पणियां भी असर नहीं छोड़तीं। यदि ये सब उनके अपने दिमाग की उपज है तब तो कुछ कहने को बचता ही नहीं और यदि  सलाहकार ये सब बोलने के लिए प्रेरित करते हैं तब फिर ये मान लेना पड़ेगा कि वे उनके शुभचिंतक नहीं हैं । इन दिनों राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान उनके द्वारा पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल नरवणे  की अप्रकाशित पुस्तक के अंश पढ़ने को लेकर उठा विवाद चर्चा में है। किसी पत्रिका में प्रकाशित उक्त  अंशों को श्री गांधी ने सदन में पढ़ने का प्रयास किया जिस पर सत्ता पक्ष ने ऐतराज किया । दरअसल संदर्भित पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशक द्वारा नियमानुसार रक्षा मंत्रालय के पास स्वीकृति हेतु भेज दी गई।  जिससे सुरक्षा संबंधी कोई संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न हो। श्री गांधी ने जो अंश पढ़ा उसके जरिए वे ये साबित करना चाहते थे कि 2020 में  चीन जब हमारी भूमि की तरफ बढ़ रहा था तब सरकार ने सेना को समय पर निर्देश देने में विलम्ब किया । और सेनाध्यक्ष द्वारा कई बार निर्देश मांगने पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें प्रधानमंत्री का ये निर्देश दिया कि जो उचित लगे करो। सरकार की आपत्ति के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने श्री गांधी को वे  अंश पढ़ने से रोक दिया। इस पर  हंगामा होने से लोकसभा की कार्यवाही बाधित हो रही है।  जहां तक बात जनरल नरवणे की पुस्तक की है तो  प्रकाशन के पूर्व उसके किसी हिस्से को उद्धृत करना इसलिए गलत है क्योंकि रक्षा मंत्रालय की अनुमति के बाद ही उसे प्रामाणिक माना जाएगा। और यदि ये मान भी लिया जाए कि प्रधानमंत्री ने थलसेनाध्यक्ष को जो उचित लगे करो जैसा निर्देश  दिया तब तो यह प्रशंसा योग्य है। ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के पूर्व भी तीनों सेनाध्यक्षों को श्री मोदी ने ऐसे ही निर्देश दिए थे। वैसे  भी 2014 में इस सरकार के आने के बाद सेना को मोर्चे पर जवाबी कार्रवाई के लिए रोज - रोज ऊपर से आदेश नहीं लेना पड़ते। श्री गांधी द्वारा लोकसभा में  श्री नरवणे की पुस्तक का मामला छेड़ने के बाद दर्जनों ऐसे साक्षात्कारों की रीलें प्रसारित होने लगीं जिनमें पूर्व सेनाध्यक्ष ये कहते सुने जा सकते हैं कि 2020 के संघर्ष में भारत ने चीन की जो पिटाई की उसे वह लंबे समय तक नहीं भूलेगा। उन्होंने ये बात भी जोर देकर दोहराई कि चीन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सका। हालांकि श्री गांधी हमेशा आरोप लगाते रहे हैं कि चीन ने हमारी काफी जमीन उस संघर्ष में दबा ली। अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर भी उनकी प्रतिक्रिया उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थी। सबसे बड़ी बात ये रही कि बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गांधी को राष्ट्रपति के जिस अभिभाषण पर बोलना था उस पर वे बोले ही नहीं। जबकि इस अवसर का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष को अच्छे से घेर सकते थे। अब तक के उनके प्रदर्शन को देखते हुए कहा जा सकता है कि वे सांसद की भूमिका में समुचित प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं। जनरल  नरवणे की पुस्तक और अमेरिका से ट्रेड डील पर उनकी टिप्पणियां उनकी अपरिपक्वता को ही दर्शाती हैं। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रतिवर्ष सरकार की ओर से जवाब देते हुए विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और आज भी यही होगा। बजट जैसे महत्वपूर्ण सत्र में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन उसके निर्वहन के लिए समुचित अध्ययन और प्रभावी संबोधन जरूरी है। लेकिन श्री गांधी आज तक नहीं समझ पाए कि सड़क और सदन दोनों जगहों पर विरोध के तरीके अलग होते हैं। इसीलिये वे जनता को प्रभावित नहीं कर पाते। वोट चोरी का मुद्दा इसका प्रमाण है। निकट भविष्य में कांग्रेस को अनेक राजनीतिक चुनौतियों से जूझना है। लेकिन यदि श्री गांधी इसी तरह की सतही राजनीति करते रहे तब उसे महाराष्ट्र और बिहार जैसे नतीजे झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 February 2026

यूरोपीय यूनियन के साथ भारत की संधि से दबाव में आया अमेरिका


अमेरिका ने भारत पर लगाए गए टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कल रात हुई बातचीत के बाद ये खबर उजागर हुई। ट्रम्प ने श्री मोदी की प्रशंसा के पुल बांधते  हुए  भारत - अमेरिका के बीच व्यापार संधि होने की उम्मीद भी जताई। उनका ये भी कहना था कि भारत रूस से कच्चे तेल की खरीदी घटाने और अमेरिका से बढ़ाने सहमत हो गया है। ट्रम्प ये भी कह रहे हैं कि भारत को वेनेजुएला से भी तेल खरीदना चाहिए। उन्होंने जब भारत पर टैरिफ बढ़ाया  तब शुरुआत में वह 25 फीसदी था । बाद में रूस  से तेल खरीदी जारी रखने पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी भी दे डाली। इसके कारण भारतीय निर्यातकों को झटका लगा क्योंकि अमेरिका भारतीय वस्तुओं का सबसे बड़ा खरीददार रहा है। वहां बसे लाखों प्रवासी भारतीयों के अलावा पाकिस्तानी , श्रीलंकाई , बांग्लादेशी और नेपाल के लोगों के बीच भारतीय समान काफी लोकप्रिय है। चूंकि टैरिफ बढ़ने के कारण चीजें महंगी हो गईं इसलिए निर्यात पर बुरा असर पड़ा जिससे भारतीय उद्योगों की चिंता बढ़ गई। विपक्ष द्वारा श्री मोदी और ट्रम्प की कथित दोस्ती का मजाक बनाया जाने लगा। राहुल गांधी ये प्रचारित करने में जुट गए कि प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति से दबते हैं तभी उनकी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं देते। इस सबके बीच रूपये का डॉलर की तुलना में नीचे गिरने का सिलसिला भी जारी रहा और विदेशी निवेशकों ने भी भारतीय बाजारों से जमकर अपनी पूंजी निकाली। लेकिन अमेरिका के साथ  वार्ता जारी रखते हुए भी भारत ने टैरिफ युद्ध के जवाब में वैकल्पिक मोर्चे खोल दिए। ब्रिटेन और ओमान  के अलावा और भी अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि कर भारतीय निर्यातकों को नुकसान की भरपाई करने का मौका दिया। इसके बाद भी ट्रम्प की ऐंठ जारी थी लेकिन  गत सप्ताह भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार  संधि पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका की घबराहट बढ़ी जिसका परिणाम  7 प्रतिशत टैरिफ घटने के तौर पर सामने आया। भारत के पड़ोसी और दक्षिण एशिया के तमाम देशों पर कम टैरिफ होने से हमारे निर्यात पर बुरा असर पड़ रहा था। लेकिन 18 प्रतिशत की दर से भारत का हाथ ऊंचा हो गया। आज शेयर बाजार में आई उछाल से ये स्पष्ट हो गया कि टैरिफ में कमी भारत के हित में है। हालांकि ट्रम्प ने जो बातें कहीं उनकी पुष्टि न तो श्री मोदी ने की और न ही अन्य किसी ने। बहरहाल ये उम्मीद अवश्य जताई कि व्यापार संधि पर निर्णय अंतिम चरण में है । इस  बारे में एक बात तो स्पष्ट है कि अमेरिका से व्यापार सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ देना न तो संभव है और न ही व्यवहारिक। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि भारत जैसे विशाल देश के लिए किसी देश की धौंस सहना भी आत्मसम्मान के विरुद्ध है । फिर चाहे वह अमेरिका ही हो। इसलिए जब श्री मोदी ने ट्रम्प के ऊलजलूल बयानों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने से परहेज किया तब विपक्ष ने भले ही इसे उनकी कमजोरी बताया किंतु धीरे - धीरे ही सही किंतु ये बात सामने आ गई कि उन्होंने ट्रम्प से जुबान लड़ाने की बजाय अपनी शक्ति विकल्पों की तलाश में लगाई जिसका प्रतिफल सामने भी आया। दरअसल ट्रम्प के सामने टैरिफ में कमी किए जाने के अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं था। अमेरिका से व्यापारिक एवं कूटनीतिक रिश्ते बनाए रखना निश्चित रूप से जरूरी है किंतु उसके दबाव के सामने झुकते जाना राष्ट्रीय हित में नहीं होने से ही व्यापार समझौता लटका रहा। हालांकि अभी भी उस पर हस्ताक्षर होना बाकी है। ऐसे में ट्रम्प द्वारा टैरिफ घटाए जाने के ऐलान से संतुष्ट होना गलत होगा क्योंकि वे अव्वल दर्जे के अविश्वसनीय इंसान हैं। इसलिए जब तक समझौते का पूरा मसौदा सामने नहीं आता तब तक अंतिम निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी। विपक्ष  आरोप लगा रहा है कि इस समझौते में भारतीय किसानों के हितों की बलि चढ़ा दी गई। हालांकि इस बारे में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्मरणीय है अमेरिका अपने कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए भारतीय बाजार उपलब्ध करवाने का दबाव बना रहा था किंतु भारत के राजी नहीं होने से ही समझौता अटका  पड़ा रहा। भारत में अमेरिकी राजदूत के दावे के बावजूद अभी ये स्पष्ट नहीं है कि समझौते के प्रावधान क्या हैं? और फिर ट्रम्प जैसे अस्थिर दिमाग वाले व्यक्ति कब अपनी बात से पलट जाएं ये कहना कठिन है। लेकिन सतही तौर पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच हुई मुक्त व्यापार संधि से अमेरिका दबाव में आ गया जिसके बाद ही टैरिफ घटाने की पहल हुई।


- रवीन्द्र वाजपेयी



Monday, 2 February 2026

मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर संतुलित है बजट


यदि यही बजट कांग्रेस सरकार का होता तब भाजपा की टिप्पणियां भी वैसी ही होतीं जैसी कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों के नेताओं से सुनने मिलीं। वैसे भी बजट  पर तत्काल प्रतिक्रिया देना आसान नहीं होता। आम जनता की  रुचि  आयकर छूट में वृद्धि और दैनिक उपयोग में आने वाली  वस्तुओं की कीमतों में कमी या वृद्धि होती है। लेकिन बजट के कुछ प्रावधानों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं । वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लगातार नौवाँ बजट पेश करने से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री  को उन पर भरोसा है। हालांकि इस पद पर आसीन व्यक्ति को लोकप्रियता कम ही मिलती है क्योंकि सरकारी  योजनाओं एवं कार्यों का श्रेय या तो  प्रधानमंत्री को मिलता है अथवा संबंधित विभाग के मंत्री को। पहले  बजट के बारे में यही चर्चित होता था कि कि कर कितना बढ़ा और क्या महंगा , क्या सस्ता हुआ? रेलवे  बजट अलग  प्रस्तुत होने से मुख्य बजट का आकार भी  कम ही होता था । आजकल एक ही  बजट में  सरकार अपना आर्थिक नियोजन देश के सामने रखती है। लेकिन भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका के कारण अब दुनिया भर के विशेषज्ञ इसका विश्लेषण करते हुए भारत की आर्थिक सेहत  का आकलन करते हैं। इसीलिए अब उसे वैश्विक परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक तैयार किया जाता है। गत दिवस प्रस्तुत बजट में भी इसीलिए दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने का आत्मविश्वास व्यक्त किया गया है। इसीलिए कल  शेयर बाजार में आई गिरावट के बाद आज सकारात्मक संकेत आने लगे । हालांकि इस बजट में आम उपभोक्ता , व्यवसायी और उद्योगपतियों को सीधे लाभ होते भले न दिखे लेकिन उसकी बुनावट कुछ इस तरह की है जिससे सभी वर्गों को वित्तीय और व्यवस्था की दृष्टि से राहत मिलेगी। अधो संरचना के लिए भरपूर प्रावधानों के अलावा आयकर से जुड़ी तमाम परेशानियां दूर करने का प्रयास अच्छा कदम है। इसी के साथ विदेश में संपत्ति , विदेश यात्रा से लौटने पर लाये जाने वाले सामान पर शुल्क में सरलीकरण  से लोगों को लाभ मिलेगा। देश में विदेशी निवेश के आने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास भी स्वागतयोग्य है। चिकित्सा सुविधाओं के विकास की दिशा में जो सोच दर्शाई गई वह विकसित भारत की कल्पना को साकार करने में सहायक साबित होगी। आधुनिकतम तकनीक को अपनाकर उसका  विकास करना समय की मांग है जिसका वित्त मंत्री ने काफी ध्यान रखा। रक्षा खर्च में वृद्धि के अलावा इस क्षेत्र में आत्म निर्भरता हेतु  प्रावधान महत्वपूर्ण कदम है। कोरोना काल में उत्पन्न संकट से दुनिया उबर पाती उसके पहले ही रूस - यूक्रेन और इजराइल - हमास के बीच युद्ध होने से पूरी दुनिया हिल गई। बची - खुची कसर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सनकीपन ने पूरी कर दी जिसके चलते पूरी दुनिया में उथल - पुथल है। ट्रम्प ने भारत पर टैरिफ थोपकर उसे दबाने का काम किया किन्तु प्रधानमंत्री मोदी ने उसे न सिर्फ बेअसर किया बल्कि  वैकल्पिक बाजार खड़े कर भारत को संकट से उबारने का रास्ता तैयार कर दिया। इसीलिए इस बजट से  सीधे - सीधे फायदा लोगों को न दिखे किंतु  सूक्ष्म विश्लेषण करने पर  महसूस होता है कि इसमें मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रावधान हैं जिनसे कि अव्वल  तो लोगों पर बोझ न बढ़े और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें लाभान्वित भी किया जावे। आयकर छूट की सीमा चूंकि गत वर्ष बढ़ाई जा चुकी थी इसलिए उसे नहीं  छुआ गया किंतु आयकर संबंधी सुधारों के माध्यम से व्यवस्था के सरलीकरण का प्रयास जरूर किया गया। कैंसर सहित कुछ जीवनरक्षक दवाओं को आयात शुल्क से मुक्त करना  संवेदनशीलता का प्रमाण है। गत वर्ष  जीएसटी सुधारों से आम उपभोक्ता को सीधा लाभ पहुंचाया जा चुका है। इसीलिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सामने होने पर भी  लोक - लुभावन घोषणाओं से बचते हुए ऐसा बजट तैयार किया गया जिसमें सभी वर्गों का लाभ है। विकसित भारत  पर केंद्रित यह बजट देश के आत्मविश्वास  भी परिचायक है। अन्यथा विकास के नाम पर आम जनता और उद्योग - व्यवसायियों पर करों का भार बढ़ाया जाता। आयात और विदेश व्यापार  में दी गई  राहत  साहसिक कदम है। राजमार्गों के साथ ही रेल कारीडोर और विमानों का भारत में निर्माण महत्वाकांक्षी कदम हैं जिनसे दुनिया की नजर में देश की छवि सुधरती है। बजट में कुछ जोखिम भी उठाए गए हैं जिनका निहित उद्देश्य ट्रम्प टैरिफ से उत्पन्न हालातों का सामना करना है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मौजूदा  परिस्थितियों में इससे संतुलित बजट वित्त  मंत्री पेश नहीं कर सकती थीं। हालांकि इससे होने वाले फायदे और नुकसान सामने आने में थोड़ा वक्त लगेगा। फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि यदि बजट ने कुछ दिया नहीं तो  कुछ छीना भी नहीं। और जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है तब भारत में आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी बड़ी बात है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी