Friday, 27 March 2026

भारत की विदेश नीति कसौटी पर खरी साबित हुई


मध्यपूर्व में युद्ध के कारण उत्पन्न तेल और गैस संकट के लिए भारत की विदेश नीति पर उंगलियां उठाने वालों के लिए ये खबर निराशा उत्पन्न करने वाली होगी कि ईरान ने होर्मुज़ समुद्री मार्ग से पांच देशों के जल पोतों को आने - जाने की सुविधा प्रधान कर दी है। ईरान के विदेश मंत्री के अनुसार भारत, रूस , चीन , पाकिस्तान और ईराक चूंकि मित्र देश हैं इसलिए इनके लिए होर्मुज खुला रहेगा। इसके पहले भी भारत के अनेक जल पोत तेल और गैस लेकर उक्त समुद्री मार्ग से सुरक्षित स्वदेश लौट चुके हैं। युद्ध की शुरुआत में विपक्ष  के अलावा सरकार विरोधी लॉबी आरोप लगाती रही थी कि युद्ध के ऐन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान उन्हें  इसकी जानकारी मिल गई थी। ईरानी  नेता खामेनेई के मारे जाने पर राष्ट्रीय शोक नहीं मनाने के फैसले पर भी सवाल उठे। हालांकि  विदेश सचिव ने ईरान के दूतावास जाकर शोक पुस्तिका में श्रद्धांजलि देकर कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा। कुछ दिनों बाद भारत में नौसैनिक अभ्यास से लौट रहे ईरानी युद्धपोत को श्रीलंका के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने डुबो दिया तब भी केंद्र सरकार की आलोचना हुई। लेकिन कुछ दिनों बाद ही एक अन्य ईरानी जल पोत द्वारा तकनीकी खराबी के कारण सहायता मांगे जाने पर उसे कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति देकर भारत सरकार ने ईरान की सहानुभूति अर्जित कर ली। साथ ही उसे दवाइयां एवं अन्य जरूरी सामग्री भेजकर मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया। इससे  नाराज कतर नामक  देश ने भारत को गैस न देने की  धमकी दे डाली , जो हमारा सबसे बड़ा गैस आपूर्तिकर्ता है। लेकिन सरकार ने उसे दो टूक समझा दिया कि भारत अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग है। प्रधानमंत्री मोदी और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की निकटता जगजाहिर है।  भारत और इजराइल के बीच अस्त्र - शस्त्र के अलावा युद्ध तकनीक के सौदे भी सर्वविदित हैं। लेकिन इस युद्ध के दौरान भारत सरकार ने सावधानी भरी चतुराई का परिचय देते हुए संतुलन बनाए रखा। वहीं ईरान के  स्कूली बच्चों को मारे जाने की आलोचना करते हुए शांति से विवाद हल करने की अपील भी की। सबसे बड़ी बात ये रही कि युद्ध प्रभावित देशों में रहने वाले भारतीयों को सुरक्षित निकाल लाने के अभियान सफलतापूर्वक संचालित हुए। ईरान  में फंसे भारतीय नागरिकों की वापसी बड़ी समस्या थी जिसे कूटनीतिक पहल से हल किया गया। युद्ध के आगे बढ़ते ही पेट्रोल , डीजल और गैस की कमी होने लगी। ईरान द्वारा तेल उत्पादक देशों पर किए हमलों से वहां या तो उत्पादन बंद करना पड़ा या उसमें काफी कमी आ गई। लेकिन उससे बड़ी समस्या ईरान द्वारा हार्मुज समुद्री मार्ग अवरुद्ध किए जाने से उत्पन्न हुई। ऐसे में एक तरफ तो केंद्र सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों से खरीदी शुरू की वहीं ईरान को भी इस बात के लिए राजी किया कि वह हार्मुज़ से उसके टैंकर निकलने की अनुमति दे। सौभाग्य से दोनों प्रयास सफल रहे। उल्लेखनीय डोनाल्ड ट्रम्प ने जब  भारत पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बनाया तब श्री मोदी ने अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों का दौरा कर तेल और गैस के सौदे कर लिए थे। वह बुद्धिमत्ता आज काम आ रही है और भारत अमेरिका, अर्जेंटीना, नाइजीरिया और ऑस्ट्रेलिया के  अलावा अनेक छोटे देशों से तेल और गैस की खरीदी कर उनकी कमी रोकने में काफी हद तक कामयाब हुआ जबकि पड़ोसी देशों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। तेल कंपनियों द्वारा कीमतें बढ़ाए जाने की आशंका के बीच आज केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज घटाकर जो बुद्धिमत्ता दिखाई वह समय की मांग है। हालांकि अनेक शहरों से पेट्रोल और गैस के अभाव की खबरें आ रही हैं लेकिन स्थिति में सुधार भी दिख रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ईरान सहित युद्ध में शामिल अन्य देशों के राष्ट्रप्रमुखों से बातचीत कर बेहतर संबंध बनाए रखे। दूसरी तरफ विदेश मंत्री जयशंकर भी सक्रिय रहकर वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव को बनाए रखने में जुटे हैं। आज प्रधानमंत्री द्वारा राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात कर संकट की इस घड़ी में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की पहल भी समझदारी भरा कदम  है। एक महीने से चल रहे इस युद्ध से खुद को दूर रखते हुए संबंधित पक्षों के साथ रिश्ते बनाए रखना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने ये कर दिखाया क्योंकि बीते कुछ सालों में हमारी विदेश नीति काफी व्यापक हुई है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का मखौल उड़ाने वाले भले न मानें किंतु उनका फायदा अब  दिखाई दे रहा है। भारत को इसी नीति पर आगे भी चलते रहना चाहिए जिसमें बजाय भावनाओं में बहने के विशुद्ध राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 March 2026

बाहरी मदद के बिना लंबी लड़ाई नहीं लड़ सकेगा ईरान


मध्यपूर्व में भड़की आग ने ईरान और इजराइल के साथ ही अनेक खाड़ी देशों को लपेट  लिया है। अमेरिका और इजराइल की सैन्य शक्ति के मुकाबले के साथ ही ईरान ने सऊदी अरब , कतर , बहरीन , यू. ए. ई, ओमान और तुर्किये तक मिसाइलों से हमले किए।  विशालकाय अमेरिकी युद्धपोतों तक पर निशाना साधने में वह पीछे नहीं रहा। यहां तक कि हिन्द महासागर में स्थित ब्रिटेन और अमेरिका के सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया तक पर हमले का दुस्साहस कर बैठा। सैन्य मोर्चे के साथ ही ईरान ने होर्मुज नामक समुद्री मार्ग से जल पोतों की आवाजाही रोककर पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस का संकट उत्पन्न कर दिया । दरअसल होर्मुज ईरान का तुरुप का पत्ता है। इसीलिए अमेरिका के मित्र देश भी अपना दामन बचाने में लग गए। ट्रम्प द्वारा युद्धविराम की घोषणा का मजाक उड़ाते हुए ईरान ने अपनी शर्तें जाहिर करते हुए कह दिया कि वह अमेरिका के सामने नहीं झुकेगा और उसने अपना हमलावर रुख जारी  रखा। युद्ध  रोकने की जो पहल अमेरिका ने की वह इज़राइल को भी रास नहीं आई और उसने ईरान के साथ ही लेबनान पर हमले तेज कर दिए। इस युद्ध में  सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इजराइल से भी दो कदम आगे बढ़कर सऊदी अरब ने अमेरिका से मांग की है कि ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूत किया जाए जिससे मध्यपूर्व उसके आतंक से मुक्त हो सके। खाड़ी के अन्य मुस्लिम देश भी ईरान की कमर तोड़ने के समर्थक हैं जिन्हें लगने लगा है कि ईरान यदि इस युद्ध में से सकुशल निकल आया तब वह एक सैन्य महाशक्ति के तौर पर स्थापित हो जाएगा और उस स्थिति में उन देशों की सुरक्षा पर खतरे के बादल मंडराते रहेंगे। सबसे बड़ी चिंता उन्हें अपने तेल और गैस के परिवहन की है क्योंकि  युद्ध बिना किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचे रुक गया तो ईरान  होर्मुज के जरिए अनुचित दबाव बनाने से बाज नहीं आएगा। इस युद्ध ने उसे इस समुद्री रास्ते का रणनीतिक महत्व समझा दिया है। इसीलिए भावी परिस्थितियों का अंदाज कोई नहीं लगा पा रहा। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि लड़ाई लंबी चलने पर ईरान आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक तौर पर पूरी तरह टूट चुका होगा। वहीं  राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व का सफाया होने से उसकी निर्णय क्षमता खत्म होने के बाद वह अव्यवस्था और अराजकता में फंसकर रह जायेगा। उस स्थिति में जिन पड़ोसी मुस्लिम   देशों को उसने अपना दुश्मन बना लिया वे भी हिसाब चुकता करने आगे आयेंगे। बड़ी बात नहीं ईरान भौगोलिक तौर पर विखंडन का शिकार हो जाए। डोनाल्ड ट्रम्प के लिए इस लड़ाई में जीत हासिल करना जीवन - मरण का सवाल है। इजराइल तो हर लड़ाई में कुछ न कुछ हासिल कर लेता है। लेबनान की काफी जमीन पर अपना कब्जा जमाकर उसने अपनी सीमा का विस्तार कर लिया। उससे भी ज्यादा फायदा उसे ये मिल रहा है कि सऊदी अरब के साथ ही खाड़ी के तेल संपदा सम्पन्न  देश ईरान के डर  से इज़राइल के साथ खड़े होने मजबूर हो गए। इस  कारण ईरान अकेला पड़ गया है। जो एक - दो इस्लामिक देश उसके साथ हैं वे भी कूटनीतिक और सामरिक तौर पर उतने ताकतवर नहीं हैं। ऐसे  में कहा जा सकता है कि ज्यादा बहादुर साबित होने के फेर में ईरान ने अपनी बर्बादी की पटकथा तैयार कर ली। उसे चाहिए था कि पड़ोसी देशों पर हमले से बचे क्योंकि इससे वे तटस्थ बने रहने बाध्य हो जाते। दूसरी गलती उसने होर्मुज से आवाजाही रोककर कर दी क्योंकि इस कदम ने उसे दुनिया की नजर में खलनायक बना दिया।  चीन और रूस भी सतही तौर पर उसके पक्ष में नजर आते हैं परन्तु  तेल और गैस की आपूर्ति रोके जाने के कारण वे भी ईरान से खुश नहीं हैं। ट्रम्प इस समुद्री मार्ग को खोलने का जो दबाव डाल रहे है उसका उद्देश्य भी तेल और गैस संकट दूर करना है । हालांकि ईरान ने भारत सहित कुछ देशों के जलपोतों को निकलने की सुविधा का ऐलान किया है किंतु अमेरिका ने अपनी चेतावनी के मुताबिक हमले तेज किए तो यह रास्ता फिर बंद हो जाएगा। ऐसी स्थिति में ईरान को चाहिए वह एक साथ सभी मोर्चे खोलने के बजाय जंग रोकने की बुद्धिमत्ता दिखाए। उस स्थिति में अमेरिका और इजराइल भी वैश्विक दबाव में आएंगे क्योंकि तेल और गैस का संकट पूरी दुनिया को परेशान किए हुए है। ईरान को ये बात समझ लेना चाहिए कि बिना  बाहरी मदद के वह ज्यादा समय तक लड़ नहीं सकेगा। वर्तमान परिस्थितियों में रूस यूक्रेन  में फंसा होने से उसकी सहायता करने में असमर्थ है। सीरिया में असद की सत्ता को भी वह इसीलिए नहीं बचा सका। रहा सवाल चीन का तो वह बहुत ही चालाक है। उसे ईरान का तेल तो चाहिए किंतु वह इस बात के लिए हमेशा सतर्क रहता है कि दूसरे को बचाने में उसका हाथ न जल जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 March 2026

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला धर्मांतरण करने वालों को बड़ा धक्का


सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े दलित ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। अगर कोई दलित  धर्मांतरण कर ईसाई बनता है तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देगा। इसका कारण यह है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म में ही अनुसूचित जातियां मौजूद हैं। फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि कानून इस बात की इजाजत नहीं देता कि व्यक्ति  ईसाई धर्म का पालन करते हुए अनु . जाति को मिलने वाले लाभ ले। आंध्र प्रदेश में ईसाई धर्म अपनाने के बाद पादरी बन गए एक दलित ने किसी व्यक्ति पर जातिसूचक गाली देने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज करवाया किंतु उच्च न्यायालय ने उसे सुनने से मना करते हुए कहा कि ईसाई बनने के बाद वह अनु. जाति के अंतर्गत प्राप्त संवैधानिक लाभ तथा संरक्षण का पात्र नहीं रहा। उस फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई जिसने उच्च न्यायालय के निर्णय को सही मानते हुए साफ कर दिया कि जो व्यक्ति अनु. जाति में नहीं आता, वह एससी-एसटी एक्ट का लाभ नहीं ले सकता। ऐसे मामलों में सामान्य धाराओं के तहत ही केस दर्ज करना होगा। इसके अलावा एक  और महत्वपूर्ण बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कही गई कि कोई दलित अन्य धर्म अपनाने के बाद दोबारा मूल धर्म में लौटता है, तो सिर्फ  इसकी घोषणा ही पर्याप्त नहीं होगी। उसे मूल समुदाय द्वारा अपनी घर वापसी को स्वीकार किए जाने संबंधी प्रमाण प्रस्तुत करना होगा जिसमें स्पष्ट हो कि वह पुरानी रीतियों का पालन कर रहा है।  सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भित फ़ैसला इसलिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से ये मांग सुनने में आ रही है कि ईसाई बने दलितों को भी अनु. जाति के अंतर्गत उससे जुड़े लाभ मिलें। अब सर्वोच्च न्यायालय ने  ही दो टूक कह दिया कि हिन्दू , बौद्ध और सिखों में ही जाति व्यवस्था है इसलिए ईसाई बने किसी दलित द्वारा आरक्षण से जुड़े संरक्षण या अन्य लाभों का दावा करना गैर कानूनी है। इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। विशेष रूप से से हिन्दू समाज के दलित समुदाय के लोगों का ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन करवाने के अभियान के लिए ये फैसला किसी धक्के से कम नहीं। उल्लेखनीय है धर्मांतरण करने के बाद भी कुछ दलित अपने नाम के साथ जुड़ा जातिसूचक उपनाम नहीं बदलते। इसका उद्देश्य अनु. जाति को मिलने वाले लाभ प्राप्त करते रहना है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने  फैसले से अनेक भ्रांतियों को खत्म करते हुए स्पष्ट कर दिया कि जाति व्यवस्था हिन्दू , सिख और बुद्ध समुदाय में ही लागू है। ईसाई धर्म में इसका कोई प्रावधान नहीं है। इसीलिए हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई बन जाने वाला दलित आरक्षण या उससे जुड़े अन्य अधिकारों से अपने आप वंचित हो जाता है। इस फैसले का असर पंजाब में भी होगा जहां बड़ी संख्या में ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में आकर दलित श्रेणी के सिख , ईसाइयत अपनाते जा रहे हैं। इस फैसले से वे भी अनु. जाति को मिलने वाले लाभ की पात्रता खो बैठेंगे। हो सकता है दलितों की राजनीति करने वाले राजनीतिक नेता सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले को दलित विरोधी बताकर उसकी आलोचना करने लगें और सर्वोच्च न्यायालय से पुनर्विचार की अपील भी की जाए। बड़ी बात नहीं संसद में उक्त फैसले को उलटने की मांग भी उठे। उल्लेखनीय है अनु. जाति और जनजाति को जातिगत भेदभाव के नाम पर भड़काने के साथ ही लालच देकर ईसाई बनाने का अभियान निरंतर जारी है। हालांकि 2014 के बाद केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले धर्मांतरण में कमी आई है। मिशनरियों को विदेशों से मिलने वाले आर्थिक अनुदान पर भी शिकंजा कसा गया। उत्तर पूर्व के राज्यों में भी राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ने से मिशनरियों की गतिविधियों पर नियंत्रण लगा है। म.प्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा , महाराष्ट्र, आंध्र, झारखंड में व्याप्त नक्सली आतंक के सफाए से भी ईसाई मिशनरियों का अभियान कमजोर हुआ है। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला उन राजनीतिक ताकतों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं जो विदेशी इशारे पर दलित समुदाय को मूल धारा से अलग कर देश में अलगाववाद को बढ़ावा देने में जुटी हुई हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 March 2026

युद्धविराम: ट्रम्प की बात का कोई भरोसा नहीं


गत दिवस इसी स्तम्भ में ईरान युद्ध में आने वाले कुछ घंटे महत्वपूर्ण होने की जो संभावना व्यक्त की गई थी वह सत्य साबित हुई । और शाम होते तक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आगामी पांच दिन तक ईरान के ऊर्जा केंद्रों पर हमला नहीं करने की घोषणा कर दी। उनके ऐलान से पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली जिसका परिणाम  कच्चे तेल की कीमतों में 11 फीसदी जैसी बड़ी  गिरावट के रूप में देखने मिला। ट्रम्प के अनुसार ईरान से बातचीत के बाद उक्त फैसला लिया गया। दूसरी तरफ ईरान ने उनके दावे को गलत बताते हुए कह दिया कि लड़ाई रोकने जैसी कोई चर्चा नहीं हुई और वह अपने हमले जारी रखेगा। साथ ही युद्धविराम के लिए अपनी  पुरानी शर्तों को दोहरा दिया। इसी तरह इजराइल ने भी स्पष्ट कर दिया कि ईरान और लेबनान पर उसके हमले जारी रहेंगे। ईरान और इजराइल द्वारा ट्रम्प के उलट घोषणा किए जाने से तनाव जारी रहने की आशंका प्रबल हो गई है। इसीलिए कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट आज तेजी में बदलने लगी। आज ही ट्रम्प का एक और गैर जिम्मेदाराना बयान आ गया जिसमें कहा गया कि ईरान पर हमला उन्होंने अपने रक्षा सचिव के कहने पर किया था। ये खबर भी आ गई कि उपराष्ट्रपति वेंस इस हमले के विरुद्ध थे। ट्रम्प प्रशासन के भीतर भी इस मामले को लेकर मतभेदों की जो खबरें बाहर आ रही हैं उनके अनुसार अमेरिका को केवल ईरान की परमाणु इकाइयों को नष्ट करना था किंतु वह बड़े युद्ध में उलझ गया। इस  संबंध में ट्रम्प के बयान पहले दिन से ही विरोधाभासी रहे हैं। दो दिन पहले तक वे ईरान  को पूरी तरह कमजोर करने का दावा कर रहे थे।  48 घंटे में होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही नहीं खोलने पर उसके ऊर्जा केंद्रों पर हमले की उनकी धमकी के जवाब में ईरान ने भी वैसा ही करने की धौंस दे डाली। इसके बाद इस लड़ाई के खतरनाक रूप लेने की सम्भावना बढ़ने लगी। उधर टर्की , मिस्र और कतर सहित कुछ अन्य मुस्लिम देश भी युद्धविराम के लिए कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय हो गए। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि ट्रम्प इस बाबत पाकिस्तान से बात कर रहे हैं जिसकी न ईरान से पटरी बैठ रही है और न ही इजराइल से कोई रिश्ता है। ऐसे में इस युद्धविराम का कोई ठोस कारण और फायदा किसी की समझ में नहीं आ रहा। होर्मुज से समुद्री यातायात खुलवाने में अन्य देशों द्वारा सहायता  नहीं करने के बाद ट्रम्प ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि जिन्हें इसकी जरूरत हो वे ही आगे आएं। लेकिन इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं है कि ईरान पर हमले के पहले उसने किसी से  चर्चा क्यों नहीं की? बहरहाल मौजूदा स्थिति में सबसे ढुलमुल स्थिति अमेरिका की है। ट्रम्प रोजाना नए - नए दावे करते हैं। संभवतः वे पहले ऐसे  राष्ट्रपति हैं जिनकी विश्वसनीयता अमेरिका के परम्परागत मित्र देशों तक में नहीं बची। इसमें दो राय नहीं कि यदि नाटो में शामिल सभी देश ईरान के विरुद्ध मोर्चा खोल देते तो उसकी अकड़ कम हो जाती। संयोग से इजराइल और अमेरिका दोनों भौगोलिक दृष्टि से  काफी दूर होने से उनकी फौजों के लिए ईरान में प्रवेश काफी कठिन है। इसीलिए ये जंग हवाई माध्यम से ही लड़ी जा रही है। वैसे ट्रम्प का सिरफिरापन देखते हुए ये कहना मुश्किल है कि वे युद्धविराम की घोषणा पर कायम भी रहेंगे । बड़ी बात नहीं  होर्मुज  और खार्ग द्वीप की घेराबंदी के लिए व्यूह रचना बनाने उन्होंने समय लिया हो। कूटनीतिक क्षेत्रों में ये चर्चा भी है कि ईरान द्वारा घुटना टेकने से इंकार किए जाने से ट्रम्प की हताशा बढ़ रही है और वे किसी तरह अपना पिंड छुड़ाना चाह रहे हैं । हालांकि ऐसा करना इजराइल के साथ धोखा होगा । बीते कुछ दिनों से ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच मतभेद की खबरें भी आती रही हैं। दरअसल इजराइल इस जंग को अंजाम तक पहुंचाना चाहता है ताकि ईरान रूपी खतरा हमेशा के लिए खत्म हो जाए। मध्यपूर्व  के अन्य देश भी उसके साथ हैं। लेकिन ट्रम्प की हरकतों से लगता है वे इजराइल के साथ भी यूक्रेन जैसा व्यवहार करते हुए उसे अधर में फंसाकर चलते बनेंगे। असल में ट्रम्प ने इस युद्ध से कुछ लक्ष्य तो हासिल कर ही लिए। पहला ईरान को इस तबाही से उबरने में दशकों लग जाएंगे और दूसरा मध्यपूर्व के तेल उत्पादक देशों की क्षमता घट गई जिसके कारण अमेरिका अब वेनेजुएला का तेल और अपनी गैस बेचकर धन  कमाएगा। तीसरा लाभ उसे ये हो गया कि दुनिया भर में डॉलर के विरुद्ध जो मोर्चेबंदी चल रही थी उस पर विराम लग गया। ट्रम्प की नीतियों में कूटनीति से ज्यादा व्यापारिक हित  नजर आते हैं इसीलिए अपने लाभ के लिए वे किसी को भी धोखा देने में संकोच नहीं करते।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 March 2026

ईरान में चल रही जंग में आने वाले कुछ घंटे महत्वपूर्ण


ईरान से शुरू हुआ युद्ध प्रत्यक्ष तौर पर तो मध्य पूर्व और खाड़ी देशों तक सीमित है लेकिन इससे पूरी दुनिया में अभूतपूर्व ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा उत्पन्न टैरिफ संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले  ही अस्त - व्यस्त थी। लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल की इस जंग ने सब कुछ उलट - पुलट दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार ईरान अपना तेल चीन को बेचने  के अलावा होर्मुज समुद्री मार्ग से तेल टैंकरों को सुरक्षित निकलने के नाम पर अनाप - शनाप  की कमाई कर रहा है। जबकि सऊदी अरब सहित अन्य खाड़ी देशों में तेल और गैस का उत्पादन ठप पड़ जाने से आर्थिक संकट  है। ट्रम्प द्वारा युद्ध विराम की पेशकश पर ईरान ने  नुकसान की भरपाई के अलावा आगे हमला नहीं करने की शर्त रखकर  स्पष्ट कर दिया कि वह आसानी से हार नहीं मानेगा। ट्रम्प द्वारा 48 घंटे में होर्मुज नहीं खोलने पर उसके तेल और गैस भंडार नष्ट किए जाने की धमकी के जवाब में ईरान ने इजराइल सहित अन्य खाड़ी  देशों में समुद्री जल को पीने योग्य बनाने के लिए लगाए संयंत्रों पर  हमले का ऐलान कर दिया। कुल मिलाकर  अमेरिका और इजराइल के अलावा ईरान भी इतना आगे बढ़ चुका है कि किसी के लिए भी पीछे हटना आत्महत्या करने जैसा होगा। ये आकलन करना भी कठिन है कि अब तक किसका पलड़ा भारी है क्योंकि अमेरिका और इजराइल के  हमलों से ईरान ने न सिर्फ  बचाव किया अपितु पलटवार करने में भी कोई  कसर नहीं छोड़ी । यद्यपि ट्रम्प और नेतन्याहू ने ईरान के  राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की प्रथम पंक्ति को लगभग समाप्त कर दिया किंतु उसके बाद भी यदि वह हमले का जवाब उसी  शैली में दे रहा है तब ये मान लेना  होगा कि ईरान के बड़े नेताओं, सैन्य अधिकारियों और वैज्ञानिकों के ठिकानों की सटीक जानकारी लगाकर उन्हें मार देने में सफल होने के बाद भी अमेरिका और इजराइल ये जानने में विफल रहे कि उसके पास मिसाइलों का कितना भंडार है और वह कितने दिन तक जंग में टिका रह सकता है। ये  भी गौरतलब है कि अभी तक मुकाबला मिसाइलों और ड्रोन तक  ही सीमित है। अमेरिका और इजराइल ने जरूर ईरान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले कर बमवर्षा की लेकिन ईरान पूरी तरह मिसाइलों के जरिए ही आक्रमण कर रहा है। इजराइल ने जब ईरान के परमाणु संयंत्र पर हमला किया तो जवाब में उसने भी इजराइल के परमाणु संयंत्र पर मिसाइलें दागकर हिसाब बराबर कर दिया। इसी के साथ हिन्द महासागर में डिएगो गार्सिया स्थित ब्रिटिश और अमेरिकी अड्डे पर भी उसने मिसाइलों से हमला करने में संकोच नहीं किया। युद्ध विश्लेषकों का कहना है ईरान का ये दुस्साहस इस लड़ाई को नया मोड़ दे सकता है। कुछ तो इसकी तुलना दूसरे विश्व युद्ध में जापान द्वारा दक्षिण एशिया में पर्ल हार्बर के अमेरिकी अड्डे पर किए हमले से कर रहे हैं जिससे बौखलाकर अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिरवाकर उसे घुटने टेकने बाध्य कर दिया। यद्यपि डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू ईरान पर परमाणु हमले जैसा कदम तो नहीं उठाएंगे क्योंकि  विश्व जनमत इसे बर्दाश्त नहीं करेगा । लेकिन इजराइल ,  ईरान को घायल कर छोड़ने के पक्ष में नहीं है इसलिए संभावना  है कि वह अमेरिका के साथ मिलकर ऐसा कुछ अवश्य करेगा जिससे कि ईरान पूरी तरह से निहत्था और असहाय होकर रह जाए। सबसे महत्वपूर्ण ये है कि एक -  दो को छोड़कर बाकी पश्चिम एशियाई मुस्लिम देश भी इजराइल के सुर में सुर मिलाते हुए ईरान की कमर तोड़ने का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि  उनकी तेल संपदा को उसके हमलों से जो नुकसान हुआ उसके कारण उनका आर्थिक ढांचा चरमरा गया। खाड़ी देशों में होने वाले विदेशी पूंजी निवेश के दरवाजे भी ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमलों ने बंद कर दिए। अमेरिका के लिए भी ये लड़ाई प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है वरना उसका बचा - खुचा आभामंडल भी फीका पड़ जाएगा। जहां तक बात इजराइल की है तो इस जंग का अंतिम परिणाम जो भी हो किंतु जिन पड़ोसी मुस्लिम देशों पर ईरान ने हमले किए वे स्वाभाविक रूप से उसके साथ जुड़कर एक क्षेत्रीय गठबंधन बनाने के लिए बाध्य होंगे। आने वाले कुछ घंटों  में मध्य एशिया में किसी बड़ी घटना की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रशांत महासगर से अमेरिकी नौसैनिक ईरान के खार्ग द्वीप की घेराबंदी करने पहुंच रहे हैं। इसका उद्देश्य ईरान की आय के स्रोत को बाधित कर देना है। इसके बाद वह क्या पैंतरा दिखाता है उस पर इस लड़ाई का फैसला निर्भर करेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 March 2026

मौके का फायदा उठाकर चीन भी ताईवान कब्जाने की फिराक में



पहले रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला कर उसके बड़े भूभाग पर कब्जा करना, फिर अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठाकर ले आना और ग्रीनलैंड पर अधिकार जताना, ईरान पर इजराइल के साथ हमला करना और अब डोनाल्ड ट्रंप द्वारा क्यूबा पर कब्जे की धमकी देने से पूरी वैश्विक व्यवस्था अस्त व्यस्त हो चली है। ईरान द्वारा होर्मुज  समुद्री मार्ग से आवागमन अवरुद्ध करने से दुनिया भर में तेल और गैस का अभूतपूर्व संकट उत्पन्न हो गया है। अमेरिका की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने गत दिवस आपातकालीन बैठक बुलाकर होर्मुज खुलवाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चेबंदी का प्रयास किया। नाटो देश इस लड़ाई में अमेरिका की अपेक्षानुसार चूंकि सहयोग नहीं दे रहे इसलिए ट्रम्प उन्हें कायर बताकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। लगभग रोजाना वे दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य शक्ति को कमजोर कर दिए जाने से वह ज्यादा दिनों तक लड़ने लायक नहीं बचा किंतु उनके दावों को गलत साबित करते हुए ईरान , इजराइल सहित उन पड़ोसी देशों को भी निशाना बना रहा है जिन्हें अमेरिका समर्थक माना जाता है। आज तो उसने हजारों किलोमीटर दूर हिन्द महासागर स्थित डिएगो गार्सिया में अमेरिका और ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे पर मिसाइल हमला कर लड़ाई का दायरा और बढ़ा दिया। हालांकि एक मिसाइल को नष्ट कर दिया गया वहीं दूसरी लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही गिर गई किंतु ईरान के इस कदम से अब इस युद्ध में नया मोड़ आता दिख रहा है। कुछ दिनों पहले ईरान ने धमकी दी थी कि वह अमेरिका के तटीय इलाकों पर ड्रोन से हमला करने वाला है जिसके बाद अमेरिका में आंतरिक सुरक्षा के इंतजाम और कड़े कर दिए गए। अभी तक ईरान के समर्थन में रूस और चीन जैसी दो बड़ी विश्व शक्तियाँ मुखर हुई हैं किंतु वे इस लड़ाई से दूर ही हैं। इसी कारण ईरान को अकेले ही जूझना पड़ रहा है। जहां तक सवाल रूस का है तो वह यूक्रेन के साथ चल रही जंग में इतनी बुरी तरह उलझा हुआ है कि वहां से निकलकर ईरान की मदद करना उसके लिए न तो संभव है और न ही व्यवहारिक। लेकिन  ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा चीन इस लड़ाई में उसकी मदद को क्यों नहीं आगे आया ये सवाल विश्व राजनीति में रुचि रखने वालों के मस्तिष्क में कौंध रहा है। यहां ये भी उल्लेखनीय है कि वेनेजुएला से भी चीन बड़ी मात्रा में तेल खरीदता था किंतु उसके राष्ट्रपति का अपहरण कर अमेरिका द्वारा वहां के तेल भंडारों पर आधिपत्य जमाने के बावजूद चीन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इस बारे में स्पष्ट है कि चीन और अमेरिका के रिश्ते डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से तनावपूर्ण चल रहे हैं। रूसी तेल की खरीद के कारण ट्रम्प ने भारत सहित चीन पर भी भारी - भरकम टैरिफ थोप दिया । ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि चीन ईरान के बचाव में उतरेगा किंतु अब तक तो इसके कोई संकेत नहीं मिले। हालांकि चीन की तरफ से अमेरिका विरोधी बयान जरूर आए किंतु ऐसा कहीं से भी नहीं लगा कि वह खुलकर उसकी मदद हेतु आयेगा। वैश्विक मामलों पर नजर रखने वालों ने इसका जो कारण बताया वह बेहद चौंकाने वाला है। उनका मानना है कि रूस द्वारा यूक्रेन और अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में की गई कार्रवाई के बाद ईरान पर हमला और फिर ग्रीनलैंड के अलावा क्यूबा पर कब्जे को लेकर की जा रही बयानबाजी के कारण चीन भी ताईवान पर हमला कर अपनी वन चाइना की महत्वाकांक्षी कार्ययोजना को अंजाम देने पर भीतर - भीतर तैयारी कर रहा है। यद्यपि ताईवान की रक्षा हेतु भी अमेरिकी बेड़े सदैव तैनात रहते हैं लेकिन होर्मुज समुद्री मार्ग खुलवाने के लिए प्रशांत क्षेत्र से अनेक अमेरिकी पोत ईरान की तरफ रवाना होने से इस क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति प्रभावित हो रही है। चीन इसी स्थिति का लाभ लेकर ताईवान को हड़पने की फिराक में है। सामान्य परिस्थितियों में अमेरिका इतनी आसानी से उसे ऐसा नहीं करने देता किंतु वर्तमान में वह ईरान की जंग में बुरी तरह फंस गया है। सबसे बड़ी बात विश्व जनमत की ओर से होने वाले विरोध का डर भी कम हुआ है। चीन के वर्तमान नेतृत्व का सोचना है रूस और अमेरिका द्वारा किसी दूसरे देश की सार्वभौमिकता पर हमला किये जाने के बाद न तो संयुक्त राष्ट्र संघ उनका कुछ बिगाड़ पाया और न ही दुनिया के तमाम देश उन्हें रोक सके। और फिर ताईवान तो  मूल रूप से उसी का भूभाग रहा है। ये आशंका कितनी सच साबित होगी कहना कठिन है किंतु चीन और चालाकी एक दूसरे के समानार्थी हैं। ऐसे में यदि मौके का लाभ उठाकर वह ताईवान पर कब्जा करने की कार्रवाई करे तो उसे रोकना मुश्किल होगा। रूस और अमेरिका ने उसकी हिम्मत बढ़ा दी है। यदि ऐसा हुआ तब दुनिया  एक और जंग झेलने मजबूर हो जाएगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 20 March 2026

अपनी बर्बादी के लिए ईरान खुद जिम्मेदार


ईरान पर अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई के कारण भड़की लड़ाई तीन सप्ताह  के बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रही  किंतु ये स्पष्ट  है कि ईरान की कमर टूटने लगी है। यद्यपि वह इजराइल , कतर , सऊदी अरब , बहरीन , ओमान में मिसाइलें और ड्रोन छोड़कर  तेल और गैस भंडार तथा रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा रहा है । होर्मुज नामक समुद्री मार्ग से तेल और गैस की आपूर्ति रोककर उसने दुनिया को संकट में डाल दिया। दो दिन पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो देशों  से  होर्मुज खुलवाने सहयोग मांगा तब सभी ने ट्रम्प को  ठेंगा दिखा दिया किंतु अब वे  तैयार हो गए हैं। दूसरी तरफ सऊदी अरब ने भी ईरान को  चेतावनी दी है कि वह हमले बंद करे वरना उसके सब्र का बांध टूट जाएगा। ऐसी ही धमकी वे सभी देश दे रहे हैं जिन पर ईरान मिसाइलें दाग रहा है।  आज इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने तो पत्रकार वार्ता में उपस्थित होकर अपने जीवित रहने का प्रमाण दे दिया। वहीं अपने नेताओं के मारे जाने का सिलसिला जारी रहने से  कमजोर  होकर ईरान बदहवासी में हमले कर रहा है।  लेकिन इसकी कीमत उसे अपनी बर्बादी के तौर पर चुकानी पड़ रही है। अमेरिका और इजराइल के दावे कुछ हद तक अतिरंजित हो सकते हैं। लेकिन ईरान की नौसेना अमेरिकी घेराबंदी को तोड़ नहीं सकी। दुनिया भर में ईरान इस बात के लिए तो प्रशंसा बटोर रहा है कि उसने अभी तक अमेरिका के सामने घुटने नहीं टेके और इजराइल के अभेद्य सुरक्षा तंत्र में भी सेंध लगा दी परंतु अपनी ताकत का जरूरत से ज्यादा आकलन करने के साथ ही  ढेर सारे मोर्चे खोलकर उसने मुस्लिम देशों की  सहानुभूति  खो दी। लड़ाई लंबी खिंचेगी या युद्धविराम हो जाएगा ये  अभी अनिश्चित है क्योंकि इजराइल नहीं चाहेगा कि ईरान को घायल अवस्था में छोड़कर दोबारा सिर उठाने का मौका दिया जाए। मौके का लाभ उठाकर वह लेबनान की जमीन हथियाता जा रहा है। इधर अमेरिका और इजराइल  ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने के  लिए उसके सैन्य , व्यावसायिक, प्रशासनिक ठिकानों के साथ ही तेल और गैस भंडारों को नष्ट कर रहे हैं। शस्त्र भंडार और सैन्य उत्पादन इकाइयां जमींदोज हो जाने से उसका रक्षा उत्पादन ठप पड़ गया है। वहीं बैलेस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के भंडार खाली होने के कारण  मारक क्षमता भी दिन ब दिन घट रही है। यदि नाटो देश होर्मुज से समुद्री परिवहन के लिए एकजुट होकर आगे आए तब ईरान के लिए मुकाबला करना आसान नहीं रहेगा। आज उसे अपनी वह गलती कचोट रही होगी जब उसने हमास को उकसाकर इजराइल पर हमला करवा दिया। दरअसल मौजूदा युद्ध की नींव हमास के उस हमले से ही पड़ी । उस समय भी इजराइल ने पलटवार करते हुए हमास के संरक्षक ईरान पर जबरदस्त हवाई हमले किए थे। हालांकि वह लड़ाई  लंबी नहीं चली लेकिन गाजा पूरी तरह मलबे के ढेर में बदल गया । इस युद्ध का अंतिम परिणाम जो भी हो किंतु ईरान  में चौतरफा विनाश का जो मंजर दिखाई दे रहा उसे देखते  हुए उसकी कथित बहादुरी भी यूक्रेन की  तरह से ही हँसी का पात्र बनकर रह गई। ईरान की सत्ता जिन लोगों के पास है वे कितनी भी डींगें हांके किंतु हर पल बर्बादी उन्हें घेरती जा रही है जिसका परिणाम सिवाय पराजय के और हो ही नहीं सकता। इसके बाद ईरान मे खामेनेई शैली का इस्लामी कट्टरवाद जारी रहेगा, शाह रजा पहलवी वाला राजतंत्र लौटेगा या कोई नई व्यवस्था उत्पन्न होगी ये कह पाना कठिन है। अरब जगत के इस बड़े और ताकतवर देश के विनाश के लिये जाहिर तौर पर तो इजराइल और अमेरिका जिम्मेदार हैं लेकिन सही बात ये है कि खामेनेई के रहते अड़ियलपन और अव्यावहारिक नीतियां अपनाकर ईरान ने अपने पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली जिसके कारण  देश दशकों पीछे चला गया। और क्या पता युद्ध के बाद वह एकजुट  रहेगा या उसके कई टुकड़े हो जाएंगे। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 March 2026

कांग्रेस विहीन विपक्षी गठबंधन की संभावना बढ़ रही


पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद सभी की निगाहें विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति पर टिक गईं। इनमें असम , प. बंगाल, तमिलनाडु  और केरल जहां पूर्ण राज्य हैं वहीं पुडुचेरी केंद्र शासित । असम में भाजपा और कांग्रेस  ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया है वहीं प. बंगाल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा जहां अकेले मैदान में हैं वहीं कांग्रेस और वाममोर्चा गठबंधन तोड़ अलग - अलग मैदान में उतर रहे हैं। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक जैसे दिग्गजों के साथ क्रमशः काँग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल गठबंधन में हैं। अभिनेता विजय की नवोदित पार्टी ने तीसरी ताकत के तौर उतरकर चुनाव को रोचक बना दिया। वहीं केरल में मुकाबला इस बार बेहद कड़ा है।  वाममोर्चा सरकार 10 वर्ष से सत्ता में रहने के कारण सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है लेकिन कांग्रेस के  नेतृत्व वाला एल.डी.एफ अंतर्कलह के चलते उसका लाभ नहीं ले पा रहा।  केरल में भाजपा छिपा रुस्तम है जिसने हाल ही में तिरुवनंतपुरम की नगरनिगम पर कब्जा जमाकर  कांग्रेस और वाममोर्चे के लिए खतरे घंटी बजा दी है। पुडुचेरी जैसे छोटे  से राज्य की राष्ट्रीय राजनीति में वैसे तो कोई अहमियत नहीं है लेकिन वहां की गठबंधन सरकार में भाजपा की मौजूदगी दक्षिण में उसकी उपस्थिति का एहसास करवा रही है। लेकिन उक्त पांचों राज्यों के चुनाव में चौंकाने वाली बात ये है कि कांग्रेस की अगुआई  में भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने वाला इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा नजर आ रहा है। कहने को तो तमिलनाडु में उसके दो  प्रमुख घटक द्रमुक और कांग्रेस एकजुट हैं लेकिन कांग्रेस पूरी तरह द्रमुक की दयादृष्टि पर निर्भर है। गठबंधन में सबसे बड़ा बिखराव दरअसल केरल में  है जहां कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध खुलकर मैदान में हैं। हालांकि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी वे एक दूसरे के विरोध में खड़े रहे किंतु इस बार विरोध ने शत्रुता का रूप ले लिया जिसका दुष्परिणाम प. बंगाल में  कांग्रेस और वाम दलों  का गठबंधन टूट जाने के तौर पर देखने मिला। यहां इंडिया गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध तलवारें भांज रहे हैं। हालांकि ऐसा ही बिखराव हरियाणा और दिल्ली में भी दिखाई दिया था। बिहार में भी वह कांग्रेस और राजद के महागठबंधन में ही सिमटकर रह गया जिससे झामुमो नाराज हो गया। दिल्ली में तो कांग्रेस की ओर से आम आदमी पार्टी का विरोध करने खुद राहुल गांधी ने मोर्चा संभाला था। बची - खुची कसर पूरी कर दी सपा और तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के समर्थन में उतरकर। उसके बाद से इंडिया गठबंधन की न कोई बैठक हुई और न संयुक्त रणनीति  सामने आई। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव के ध्वनि मत से नामंजूर हो जाने के बाद कांग्रेस मत विभाजन की मांग करने का साहस नहीं दिखा सकी क्योंकि उसे डर था कि कुछ विपक्षी पार्टियां मतदान से दूर रह सकती हैं। एक बात खुलकर सामने आ रही है कि भाजपा तो उसके सहयोगी क्षेत्रीय दलों के मुकाबले अपना कद बढ़ाती जा रही है वहीं इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहतीं । ममता बैनर्जी ने तो शुरू से ही कांग्रेस को हाशिये पर रखा। बिहार में चारों खाने चित्त होने के बाद अब तेजस्वी और उनका परिवार भी कांग्रेस से बिदकने लगा है। उ.प्र में अखिलेश यादव भी दूरी बनाते दिख रहे हैं। हाल ही में राहुल गांधी द्वारा बसपा  संस्थापक कांशीराम की तारीफ किए जाने से सपा के कान खड़े हो गए हैं। वहीं शराब घोटाले में निचली अदालत द्वारा दोषमुक्त किए जाते ही अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के साथ ही कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उनका इशारा विभिन्न आरोपों से घिरे गांधी परिवार के सदस्यों के जेल न जाने पर था। ये सब देखते हुए लगता है उक्त पांच राज्यों के चुनाव के  बाद गुजरात, पंजाब और उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव के साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव के लिये एक नया विपक्षी गठबंधन आकार लेगा जिसमें  कांग्रेस नहीं होगी। दरअसल क्षेत्रीय दलों में राहुल के प्रति नाराजगी है जो राष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा विदेश यात्राओं को  महत्व देते हैं। क्षेत्रीय क्षत्रपों को धीरे - धीरे ये बात समझ में आ रही है कि कांग्रेस का साथ देने से उनका अपना जनाधार खिसकता जा रहा है। शरद पवार , उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव इसके उदाहरण हैं। इसीलिए ममता बैनर्जी कांग्रेस से छिटकती हैं। बड़ी बात नहीं विधानसभा चुनाव से निपटते ही वे केजरीवाल के साथ मिलकर कांग्रेस विहीन विपक्षी मोर्चे के गठन में जुट जाएं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 March 2026

तेल संपन्न इस्लामिक देश भी अब हथियारों की होड़ में शामिल होंगे


ईरान का अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध तीसरे सप्ताह में प्रविष्ट हो चुका है। लेकिन ये कहना कठिन है कि किसका पलड़ा भारी है? हालांकि  जो मोटे तौर पर नजर आ रहा है उसमें पहला ये कि ईरान की आक्रामक क्षमता दिन ब दिन घटती जा रही है । वहीं दूसरा यह कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान की क्षमता का कम आकलन किया।  डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू को उम्मीद रही कि  खामेनेई के कुनबे सहित मारे जाने के बाद ईरान  में गृहयुद्ध के हालात बन जाएंगे। इसके पीछे कुछ महीनों पहले महिलाओं द्वारा हिजाब सहित अन्य पाबंदियों के विरोध में किया गया आंदोलन रहा। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के कुछ स्थानों पर जनता द्वारा  खुशी मनाये जाने की खबरों से  इस्लामिक सत्ता के पलटने की उम्मीदें भी आसमान छूने लगीं। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और लड़ाई उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबी खिंचती दिखाई दे रही है। दरअसल अभी तक दोनों पक्ष ड्रोन और मिसाइलों के जरिए ही लड़ रहे हैं । खबर है अमेरिका अपने मैरीन कमांडरों को  ईरान के खार्ग द्वीप पर उतारकर लड़ाई को जमीन पर लाना चाहता है। ये द्वीप ईरान के तेल निर्यात की श्वास नलिका है। यदि यह मिशन  सफल रहा तब ईरान की कमर टूटना तय है। अन्य विकल्प फिलहाल अमेरिका और इजराइल के पास नहीं है क्योंकि ईरान की मुख्य भूमि पर सैनिक उतारने के खतरों से वे भली- भांति वाकिफ हैं। इसके अलावा  सबसे बड़ी बात इस जंग से निकलकर सामने आई वह है मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में एक - दो को  छोड़कर बाकी की ईरान से दुश्मनी हो जाना। इसका कारण ईरान द्वारा उनमें स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों  के अलावा हवाई अड्डों , होटलों और  तेल भंडारों पर मिसाइलों से किए गए हमले हैं। दुनिया भर के मुसलमानों की आस्था का केंद्र मक्का जिस सऊदी अरब में स्थित है वहां विश्व की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर किए हमले के बाद ईरान पूरी तरह अलग - थलग पड़ गया। यद्यपि जिन पड़ोसी मुस्लिम देशों को ईरान ने निशाना बनाया उनमें से एक ने भी उस पर पलटवार नहीं किया । वे केवल ईरानी ड्रोन और मिसाइलों से बचाव तक ही सीमित रहे। हालांकि अपनी गलती को भांपने के बाद ईरान ने उन सबसे माफी भी मांगी किन्तु उसके बाद किए नए हमलों ने हालात और खराब कर दिए। उल्लेखनीय है काफी समय से इस्लामिक नाटो के गठन की चर्चाएं सुनाई दे रही थीं। टर्की और पाकिस्तान इसमें काफी रुचि ले रहे थे। गत वर्ष भारत द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर नामक सैन्य कार्रवाई किए जाने के बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच  समझौता हुआ कि किसी एक पर हुआ हमला दूसरे पर माना जाएगा।  लेकिन ईरान द्वारा सऊदी अरब पर हमले के बाद पाकिस्तान उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया।  मौजूदा हालात में मुस्लिम देशों को ये बात समझ में आ चुकी है कि धर्म के नाम पर  एकता संभव नहीं रही। ईरान के साथ लेबनान और यमन जैसे देश भी हैं जिनकी इजराइल से सीधी लड़ाई है। बाकी के देश इस्लामिक कट्टरता से ऊपर उठकर आर्थिक विकास की राह पर चल पड़े हैं। इस जंग ने ईरान के साथ उनके रिश्तों में जो कड़वाहट घोल दी उसके बाद अब मध्य पूर्व के तेल संपदा सम्पन्न देशों को भी सुरक्षा संबंधी आत्मनिर्भरता का महत्व समझ आ गया है क्योंकि अमेरिकी अड्डों के बावजूद वे ईरान के  हमलों से नहीं बच सके। इसके अलावा ये संभावना भी है कि यदि अमेरिका और इजराइल मिलकर भी ईरान को पूरी तरह घुटनाटेक नहीं करा सके और कट्टर इस्लामिक सत्ता कायम रही तब मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ और बढ़ेगी जिसके परिणामस्वरूप संघर्ष का नया स्वरूप देखने मिल सकता है। लेकिन ट्रम्प और नेतन्याहू ईरान  में सत्ता पलटवाकर शाह युग की वापसी में सफल हो गए तब यह देश अमेरिका का उपनिवेश बन जाएगा। यद्यपि आज की स्थिति में जो दिखाई दे रहा है उसमें भले ही ईरान संपूर्ण पराजय से बच जाए किंतु लड़ाई रुकने के बाद वह  पहले जैसा शक्तिशाली नहीं रहेगा। लड़ाई का अंतिम परिणाम जो भी हो लेकिन मध्य पूर्व के समूचे मुस्लिम देश अब सैन्य सुरक्षा पर खर्च करने बाध्य होंगे और अमेरिका भी उनको तेल के बदले अस्त्र - शस्त्र बेचकर इस लड़ाई के नुकसान की भरपाई करेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 March 2026

ट्रम्प ने जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदा उसी में खुद गिर पड़े


पूरी दुनिया को टैरिफ रूपी हथियार से भयाक्रांत करने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुद को ऐसे रास्ते पर ला खड़ा किया है जहां से आगे बढ़ना जहां बेहद कठिन है वहीं पीछे लौटने पर उनके साथ ही देश की रही सही साख भी- धाक मिट्टी में मिल जाएगी। दोबारा राष्ट्रपति का पद संभालते ही ट्रम्प ने सर्कस के रिंग मास्टर की तरह हंटर फटकारना शुरू कर दिया। यूक्रेन संकट के समय अमेरिका के दबाव में यूरोप के जिन देशों ने रूस पर प्रतिबंध थोप दिये थी उन्हें भी ट्रम्प ने नहीं बख्शा। ये कहना गलत नहीं होगा कि ट्रम्प  कूटनीतिक सौजन्यता को ताक पर रखते हुए विशुद्ध गुंडागर्दी पर उतर आए। किसी भी राष्ट्रप्रमुख के प्रति स्तरहीन टिप्पणी करना मानो उनका स्वभाव बन गया। सं. रा. संघ तक को धमकाने की जुर्रत उन्होंने कई मर्तबा की। दुनिया भर में जंग रुकवाने का स्वघोषित श्रेय लूटकर नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त करने के लिए उन्होंने पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के संरक्षक देश से सिफारिश करवाने में शर्म महसूस नहीं की। धीरे - धीरे उनकी हरकतों से पूरा विश्व वाकिफ हो गया।इंतेहा तो तब हो गई जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को आधी रात में  शयनकक्ष से उठवाकर अमेरिका के जेल में बंद कर वहां के तेल भंडारों पर विशुद्ध माफिया के अंदाज में कब्जा कर लिया। उसके बाद ग्रीनलैंड को हड़पने की उनकी धमकी से पूरा यूरोप थर्रा उठा। लेकिन डेनमार्क सहित अनेक देशों ने उनका विरोध कर ये संकेत दे दिया कि यूरोप अब आँख मूंदकर अमेरिका का समर्थन नहीं करेगा। इसका प्रमाण बीते  दिनों देखने मिला जब ट्रम्प द्वारा ईरान पर  सैन्य कार्रवाई में सहयोग की अपील को अमेरिका समर्थक अनेक देशों ने ठुकरा दिया।  ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही रोकने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया। ट्रम्प चाह रहे थे कि नाटो देश सैन्य कार्रवाई में उनका साथ दें । लेकिन सभी ने  इंकार कर दिया। यहाँ तक  जिन खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं वे भी दाएं - बाएं होने लगे । इनमें से अनेक देशों ने अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों के साथ ही अपने सैनिक तैनात किए थे। जहां तक बात इस जंग की है तो ये बात पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है कि ईरान भले ही घुटने टेकने मजबूर हो जाए किंतु उसने अमेरिका को भी बुरी तरह लहू - लुहान कर दिया। और यही ट्रम्प की परेशानी का कारण  है। पहले हमले में खामेनेई सहित दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतारने में सफल होने के बाद ट्रम्प का हौसला बुलंद हो चला था। खामेनेई के अनेक परिजन सहित शीर्ष नेता और सैन्य अधिकारी भी मारे गए किंतु बजाय दहशत में आने के ईरान ने  अमेरिका और इजराइल सहित उन खाड़ी देशों पर भी मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए जहां अमेरिका ने सैनिक अड्डे बना रखे थे। साथ  ही सऊदी अरब , ओमान , बहरीन और कतर की तेल और गैस  इकाइयों को निशाना बनाकर उनमें उत्पादन रुकवा दिया। टर्की तक को नहीं बख्शा गया जो खुद को मुस्लिम देशों का नेता बनने का ख़्वाब देखने लगा था। दरअसल ईरान ने उन सभी देशों को संदेश दे दिया कि अमेरिका का साथ देने पर वे भी उसकी मिसाइलों से बच नहीं सकेंगे। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद समूचा यूरोप तेल और गैस के अलावा खाद्यान्न के लिए तरस चुका है ।अमेरिका समर्थक देशों को लगा कि ट्रम्प को खुश करने के लिए वे ईरान के कोप भाजन क्यों बनें? इसीलिये उन्होंने  अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दी।  इस प्रकार ट्रम्प को दोहरी किरकिरी झेलनी पड़ रही है। ईरान को घुटने टिकवा देने की उनकी डींगें अभी तक तो हवा - हवाई ही साबित हुई है। ऊपर से पुराने सहयोगी भी ठेंगा दिखा रहे हैं। इसे विश्व राजनीति का नया मोड़ कहा जा सकता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद बनी अमेरिका के  वर्चस्व वाली एकध्रुवीय व्यवस्था एक झटके में बिखरती लग रही है। इसके लिए डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतें ही जिम्मेदार हैं। जिन्होंने अपने साथ ही अमेरिका की विश्वसनीयता का भी जनाजा निकलवा दिया। पूरी दुनिया के लिए जो गड्ढा उन्होंने खोदा आज वे खुद उसी में गिरकर बचाव की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन कोई मदद को नहीं आ रहा । अमेरिका के राष्ट्रपति को दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति मानने वाली धारणा मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में पूरी तरह बदल चुकी हैं जिनके चलते ट्रम्प विश्व के सबसे निरीह व्यक्ति नजर आ रहे हैं।। इस युद्ध में ईरान की तबाही तो सुनिश्चित है किन्तु ट्रम्प की गलतियों से अमेरिका की चौधराहट भी खत्म होने को है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 March 2026

सिद्धांत और संगठन दरकिनार - चुनाव जिताते मुफ्त उपहार


चुनाव आयोग ने गत दिवस प. बंगाल, असम, तमिलनाडु , केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित कर दीं। इस बार प. बंगाल में दो चरणों में जबकि बाकी चार राज्यों में एक ही दिन मतदान होगा।  चुनाव की तारीखों की घोषणा के पहले उक्त सभी राज्यों की सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने वाली योजनाओं की घोषणा करने के साथ ही उन्हें लागू करते हुए खजाना खोल दिया। इनके अंतर्गत मतदाताओं के खाते में सीधे  राशि जमा की गई। इस प्रकार ये बात साबित हो चुकी है कि  चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल मुफ़्त रेवड़ियों पर ही निर्भर  होकर रह गए हैं। स्मरणीय  है असम और केरल में क्रमशः भाजपा और वामपंथियों की सरकारें हैं। ये दोनों अपनी विचारधारा और सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं।  कैडर आधारित संगठन इनकी असली ताकत है। प. बंगाल में ज्योति बसु ने तीन दशक से ज्यादा अपनी सरकार विचारधारा और कैडर के बलबूते चलाई। भाजपा भी गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे प्रदेशों में लंबे समय से काबिज है तो इसके पीछे उसके सिद्धांतों और संगठन का योगदान कहा जाता है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में विचारधारा और संगठन के  बजाय रेवड़ियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इसीलिये असम की भाजपा  सरकार और केरल की साम्यवादी सत्ता को मतदाताओं की जेब जनहित के नाम पर नगदी से भरनी पड़ रही है। बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव के पहले नीतीश सरकार ने  लाखों महिलाओं के  खाते में 10 हजार जमा करवाकर  जबर्दस्त सफलता हासिल की। उसके पहले ऐसा ही प्रयोग अनेक राज्यों में हुआ जिसका लाभ  सत्तारूढ़ पार्टी को मिला क्योंकि उसने चुनाव से पहले ही सरकारी खर्च से मतदाताओं की जेब गर्म कर दी। प.बंगाल , असम और केरल में लगातार एक ही पार्टी का शासन  चला आ रहा है। उसके बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी को चुनावी वर्ष में नई - नई योजनाओं के जरिए खैरात बांटने की मजबूरी झेलनी पड़े तो फिर ये मानना गलत नहीं होगा कि उनकी नीतियों और कार्यप्रणाली जनता को संतुष्ट नहीं रख सकी। तमिलनाडु तो इस मुफ्तखोरी का जनक  ही है। चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाना खाली करने के इस तरीके पर चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय अनेक अवसरों पर ऐतराज व्यक्त कर चुके हैं। लेकिन वे भी इस पर रोक लगाने का साहस नहीं दिखा सके। ये बात भी खुलकर सामने आ चुकी है कि इनके कारण राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। यहां तक कि  उसका ब्याज चुकाने तक के लिए नया कर्ज लेने की स्थिति बन रही है। इस  प्रकार ये मुफ्त योजनाएं राजनीतिक दलों के गले की फांस बनती जा रही हैं। एक बार उन्हें शुरू करने के बाद बंद करने का जोखिम उठाने की हिम्मत किसी में नहीं है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि मतदाता को भी उपभोक्ता मानकर ज्यादा से ज्यादा छूट जैसे आकर्षण देकर अपनी तरफ खींचना ही चुनावी सफलता का मंत्र बन गया है। चूंकि देश में हर साल कुछ राज्यों में चुनाव होते हैं इसलिए केंद्र सरकार भी मतदाताओं  की नाराजगी से अपनी पार्टी को बचाने के लिए आर्थिक स्तर पर कड़े फैसले नहीं ले पाती। लोक कल्याणकारी राज्य में जनता को खुश रखना सरकार का कर्तव्य है लेकिन घर फूँक तमाशा देखने की इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब कर्ज का बोझ असहनीय हो जाएगा और तब  जो होगा उसकी कल्पना भी भयभीत कर देती है। अनेक देश मुफ्त रेवड़ियां बांटने के बाद कंगाल होकर अराजकता का शिकार हो चुके हैं। ये  सब जानते हुए भी हमारे राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों के लिए जिस प्रकार सरकारी खजाना लुटाने पर आमादा हैं वह  मजबूत अर्थव्यवस्था के तमाम दावों को मिट्टी में मिला देगा। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद  इन मुफ्त योजनाओं की आलोचना कर चुके हैं किंतु केंद्र सरकार के साथ ही भाजपा शासित राज्य भी मुफ्त रेवड़ियां बांटने में सबसे आगे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 March 2026

लेकिन कांग्रेस में कमियों के लिए जिम्मेदार कौन


आजादी के बाद दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे और बसपा के संस्थापक स्व. कांशीराम की जयंती के दो दिन पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा उनकी प्रशंसा के पीछे  उनके प्रति  श्रद्धा नहीं अपितु आगामी वर्ष  उ.प्र विधानसभा के चुनाव में दलित वोट बैंक को दोबारा हासिल करना है जो कभी कांग्रेस की ताकत था। हालांकि कांशीराम थे पंजाब के लेकिन उन्होंने भांप लिया था कि  उ.प्र में जड़ें जमाये बिना बसपा राष्ट्रीय राजनीति में जगह नहीं बना सकेगी और इसीलिए उन्होंने  जाटव समाज की एक युवती मायावती को चुना। उ.प्र की होने से दलित वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बढ़ती गई और बैसाखियों के सहारे मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती ने 2007 में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सबको चौंका दिया। हालांकि वह दौर पांच साल में ढलान पर आ गया। आज उनकी पार्टी का एक भी सांसद नहीं है वहीं उ.प्र में मात्र एक विधायक। वे खुद भी सांसद या विधायक नहीं हैं। बीते कुछ चुनावों में पूरे दलित समुदाय की नेता होने के बजाय मायावती अपने सजातीय वर्ग तक ही सिमट गईं ।  हाल ही में उन्होंने लखनऊ में एक विशाल रैली का आयोजन कर अपना प्रभाव पुनर्स्थापित करने का प्रयास भी किया था। लेकिन उ.प्र में उनकी वापसी की संभावना न के बराबर है । अब सवाल ये है कि राहुल गांधी के मन में कांशीराम के प्रति प्यार क्यों उमड़ पड़ा और उन्हें भारत रत्न देने की मांग कांग्रेस की ओर से उछलने लगी। राजनेताओं की  हर बात के पीछे कहीं न  कहीं चुनाव होता है। राहुल ने भी कांशीराम की वंदना इसीलिए की। लेकिन वे यह भी बोल गए कि कांग्रेस में कमियां थीं, इसलिए कांशीराम सफल हुए। अगर कांग्रेस अपना काम करती तो कांशीराम सफल नहीं हो पाते। एक और चौंकाने वाली बात उन्होंने ये कही कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जीवित रहे होते तो कांशीराम कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। स्मरणीय हैं नेहरू जी 1964 में ही चल बसे थे जबकि कांशीराम 1978 में बामसेफ की स्थापना के साथ उभरे।  1984 में उन्होंने बसपा बनाई। श्री  गांधी के मुताबिक भारत का संविधान महात्मा गांधी, डॉ.अंबेडकर और कांशीराम के विचारों पर आधारित था। उनकी ये बात इसलिए हास्यास्पद है क्योंकि जब देश आजाद हुआ उस समय कांशीराम महज 13 साल और संविधान लागू होते समय 16 वर्ष के थे।  राहुल के कांशीराम प्रेम में भी विरोधाभास नजर आया। एक तरफ तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस की कमियों के कारण वे सफल हुए । इसका मतलब यदि कांग्रेस में कमियां न होतीं तब वह कांशीराम को सफल नहीं होने देती। वहीं दूसरी तरफ  ये शिगूफा छोड़ दिया कि नेहरू जी जीवित रहते तो वे कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते।  इस बात से ये सवाल उठ खड़ा होता है कि यदि कांग्रेस को बसपा नेता के प्रति यदि इतना लगाव था तब इंदिरा गांधी ने उन्हें उ.प्र का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया? इस संदर्भ में याद रखने वाली बात ये है कि 1977 के चुनाव में जब अपने दौर के सबसे बड़े दलित नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ दी तब दलित राजनीति में एक खालीपन पैदा होने लगा। दरअसल  उनके मन में प्रधानमंत्री न बन पाने की कसक थी जो जनता पार्टी में आने पर भी पूरी नहीं हो सकी। जब ये तय हो गया कि उनका राजनीतिक सफर समाप्त होने को है तभी 1978 में कांशीराम द्वारा बसपा का गठन कर दलित राजनीति को उसका अपना मंच दिया। सवाल ये है कि कांग्रेस ने युवा कांशीराम को अपने साथ क्यों नहीं जोड़ा ?कल लखनऊ में श्री गांधी ने कांशीराम को महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के समकक्ष रखते हुए कहा कि दोनों ने कभी समझौता नहीं किया। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंबेडकर जी की राजनीतिक दुर्गति करने में कांग्रेस कभी पीछे नहीं रही। पहले उन्हें नेहरू मंत्रिमंडल से निकलने मजबूर किया गया और फिर लोकसभा के चुनाव में हरवा दिया। यहां तक कि उन्हें भारत रत्न देने से भी परहेज किया गया। 1990 में गैर कांग्रेसी सरकार ने ये काम किया। ऐसे में श्री गांधी का ये कहना गले नहीं उतरता कि नेहरू जी जीवित रहते तो कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते। कांग्रेस द्वारा उन्हें भारत रत्न दिये जाने की मांग उठाना भी अटपटा है क्योंकि उनके जीवनकाल में पार्टी ने उनको कभी महत्व नहीं दिया।  बहरहाल , श्री गांधी की ये स्वीकृति सच्चाई के काफी करीब है कि कांग्रेस की कमियों के कारण ही कांशीराम आगे बढ़ सके। लेकिन उन्हें ये भी बताना भी चाहिए कि कांग्रेस में कमियों के लिए कौन जिम्मेदार है क्योंकि पार्टी पर नेहरू -  गांधी परिवार का एकछत्र आधिपत्य आज तक बना हुआ है। सही बात तो ये है कि कांग्रेस की कमियों के चलते ही न सिर्फ दलित बल्कि पिछड़े भी उससे दूर हो गए। और ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा कि पार्टी अपनी कमियों को दूर कर गलतियों से सीखने को तैयार है।


- रवीन्द्र वाजपेयी





Friday, 13 March 2026

अविश्वास प्रस्ताव पर खाली हाथ रहा विपक्ष


विपक्ष द्वारा प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव धराशायी होने के बाद लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला ने  साफ - साफ कह दिया कि सदन कानून से ही चलेगा।  उल्लेखनीय है  अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलते ही उन्होंने सदन में आना बंद कर दिया था। दोबारा सदन में आने पर उनके तेवर पूर्ववत ही दिखाई दिए जबकि विपक्ष अपराधबोध से ग्रसित था क्योंकि जिस व्यक्ति पर उसने तमाम आरोपों की झड़ी लगा दी थी उसी को माननीय कहकर संबोधित करना पड़ रहा है। वैसे भी प्रस्ताव पर बहस में विपक्ष अपेक्षित पैनापन नहीं दिखा सका । कई मर्तबा तो ऐसा लगा जैसे वह प्रस्ताव रूपी बोझ  को जल्द - से जल्द उतारना चाहता था। प्रस्ताव गिरना तो था ही लेकिन विपक्ष चाहता तो आए दिन उत्पन्न होने वाले गतिरोध को दूर करने का रास्ता निकालकर अपने लिए सुखद स्थिति बना सकता था किंतु वह एक बार फिर चूक गया। संसदीय प्रणाली  में अध्यक्ष /सभापति सदन का मुखिया होता है। विषय सूची ,  विभिन्न दलों को बोलने का समय निर्धारण के वेसाथ ही विवाद की स्थिति में व्यवस्था देने जैसे निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र में होते हैं। उसकी अध्यक्षता में एक कार्य मंत्रणा समिति  भी होती है जिसमें विभिन्न दलों का सदस्य संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व होता है। विपक्ष के समझदार नेता अध्यक्ष या सभापति से सौजन्यतापूर्ण संबंध बनाकर अपने लिए बेहतर स्थितियां निर्मित कर  लेते हैं। डॉ.राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, मधु लिमये,जॉर्ज फर्नांडीज, लालकृष्ण आडवाणी, सोमनाथ चटर्जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे  विपक्षी नेताओं को हर पीठासीन अधिकारी बोलने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं देते थे बल्कि उनके भाषण के बीच में टोकाटाकी करने वाले सत्ता पक्ष के सांसदों को फटकार भी लगाते थे। आज वैसे विपक्षी नेता संसद में  इक्का - दुक्का ही हैं । ऐसा ही आपसी सद्भाव प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष में हुआ करता था। पंडित नेहरू के दौर में विपक्ष की संख्या कम होने के बाद भी उसके कुछ सांसद सरकार को घेरने में कामयाब हो जाते थे। इंदिरा जी के समय में कटुता बढ़ी किंतु उसके बावजूद अटल जी और चन्द्रशेखर जैसे नेताओं के साथ उनका संवाद बना रहा। पी.वी नरसिम्हा राव और अटल जी के निजी रिश्ते भी जगजाहिर थे। हालांकि संसद में दोनों एक दूसरे की तीखी आलोचना में परहेज नहीं करते थे। लोकसभाध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति सामान्यतः सत्ता पक्ष से जुड़े होते हैं किंतु विपक्ष सम्मान का भाव रखते हुए शालीन व्यवहार करे तो वे भी उसे संरक्षण देने में पीछे नहीं रहते। विपक्ष को सरकार और आसंदी के विरुद्ध बोलने का पूरा अधिकार है किंतु उसमें मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। यदि श्री गांधी समय - समय पर प्रधानमंत्री और श्री बिरला से मेल - मुलाकात करते रहें तो इससे आपसी संबंध सुधरने के अलावा संसद का वातावरण भी खुशनुमा रहेगा। उनको  शरद पवार से सीखना चाहिए जो राजनीतिक मतभेद भुलाकर गाहे - बगाहे प्रधानमंत्री से मिलकर अपने क्षेत्र की समस्याओं को समाधान करवा लेते हैं। कुछ समय पहले प्रियंका वाड्रा ने सदन में विनम्रता पूर्वक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से अपने क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए चर्चा हेतु समय मांगा जिसे मंत्री ने तत्काल स्वीकार कर कहा कभी भी आइए। बाद में प्रियंका उनसे मिलीं। इसी कारण सत्तापक्ष के एक सांसद ने कहा भी प्रियंका को नेता प्रतिपक्ष होना चाहिए। स्मरणीय  है उक्त अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी ने हस्ताक्षर नहीं किए तब  कहा गया कि ऐसा संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का पालन करने के लिए लिया गया है, जिसमें विपक्ष के नेता  द्वारा सीधे स्पीकर के खिलाफ याचिका पर हस्ताक्षर करना उचित नहीं माना जाता। यदि यही सौजन्यता वे श्री बिरला से मिलकर व्यक्त कर आते तब बात इतनी नहीं बढ़ती। अब जबकि अविश्वास प्रस्ताव गिर चुका है तब विपक्ष को चाहिये वह सदन के वातावरण में घुल चुकी कटुता दूर करने अपने व्यवहार में लचीलापन लाए।  हर समय तैश में बोलना अथवा सत्ता पक्ष और प्रधानमंत्री पर व्यर्थ के कटाक्ष करने से श्री गांधी को कुछ लाभ नहीं होने वाला। बेहतर हो वे उन पूर्व विपक्षी नेताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व का का अनुसरण करें जिनका सम्मान सत्ता पक्ष भी करता था।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 March 2026

रूस और चीन के दूर रहने से ईरान फंस गया


ईरान पर अमेरिका और इजराइल के आक्रमण को दो हफ्ते बीतने जा रहे हैं। अब तक दोनों पक्ष एक - दूसरे को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के दावे कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प आदतानुसार रोज नया शिगूफा छोड़ते हुए दावा करते हैं कि ईरान तबाह हो चुका है और उसकी सैन्य क्षमता लड़ाई लंबी खींचने लायक नहीं बची। दूसरी तरफ ईरान भी बुलंद हौसलों के साथ कभी इजराइल तो कभी बहरीन और ओमान के तेल भण्डारों पर ड्रोन से बम वर्षा कर नुकसान पहुंचा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही रोककर ईरान ने तेल आपूर्ति रोक दी है। तेल से लदे दर्जनों टैंकर फंसे हुए हैं। एक - दो ने निकलने की कोशिश की तो ईरान ने उन पर हमला कर दिया। थाईलैण्ड का एक जलपोत कल ही ईरानी मिसाइल का शिकार हो गया जिसमें सवार लोगों को ओमान के सुरक्षा दल ने बचाया किंतु कुछ नाविक लापता होने से उनके मारे जाने की आशंका है। गत सप्ताह ईरान ने पड़ोसी मुस्लिम देशों पर किए गए हमलों के लिए माफ़ी मांगकर ये संकेत दिया था कि इजराइल और अमेरिका को छोड़ बाकी सब पर वह हमले नहीं करेगा। लेकिन उसने ये शर्त भी रख दी थी कि जिन मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं उनसे यदि हमले हुए तब उनके जवाब में ईरान भी पलटवार करेगा। हालांकि बहरीन और ओमान में उसके ताजा हमलों का कारण सामने नहीं आया। इस बीच लड़ाई रोकने के लिए किसी ठोस कूटनीतिक प्रयास की जानकारी नहीं मिली। यद्यपि ट्रम्प ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन से घंटे भर फोन पर बात की परंतु उसका कोई सार्थक परिणाम देखने नहीं मिला। अब तक इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है ये आकलन अच्छे - अच्छे सैन्य विशेषज्ञ नहीं कर पा रहे। कुछ का कहना है कि अमेरिका और इजराइल ने हमले करने में जल्दबाजी कर दी। उनके द्वारा ईरान की सैन्य क्षमता को कम आंका गया। इसके अलावा ये अंदाजा भी गलत निकला कि खामेनेई को मारते ही ईरान का मनोबल टूट जाएगा। आंतरिक विद्रोह की उम्मीद भी ग़लत साबित हुई। इसमें दो राय नहीं हैं कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया जिससे उबरने में उसे दशकों लग जाएंगे। इस बारे में उसकी तुलना यूक्रेन से करना सही होगा जो रूस के हमलों के कारण मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। ऐसी ही स्थिति इजराइल ने गाजा की बना दी। बावजूद इसके ईरान यदि मुकाबले में है तब ये मानना पड़ेगा कि अमेरिका और इजराइल से मिलने वाली धमकियों के चलते उसने अपने रक्षा तंत्र के साथ ही आक्रमण क्षमता को काफ़ी विकसित कर लिया था। ऐसा लगता है ईरान लड़ाई को लंबा खींचकर अमेरिका और इजराइल को थका देना चाहता है। वहीं ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की रणनीति ईरान को इतना नुकसान पहुंचाने की है जिससे वह मजबूर होकर घुटने टेके। हालांकि नुकसान इजराइल में भी कम नहीं हुआ लेकिन इस लड़ाई में ज्यादातर मुस्लिम देश उसके साथ होने से वह इस संकट से उबर जाएगा। अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देश भी उसके नुकसान की भरपाई कर देंगे लेकिन ईरान जिन रूस और चीन के भरोसे अमेरिका जैसी महाशक्ति से टकराने का दुस्साहस कर बैठा वे अब तक मदद हेतु नहीं आए। रूस तो खैर यूक्रेन संकट में फंसा हुआ है किंतु चीन परदे के पीछे रहकर ईरान की कितनी भी मदद करता रहा हो लेकिन सामने आने से बचकर उसने परोक्ष रूप से अमेरिका और इजराइल को ही सहायता दी। इसके पीछे की वजह ये है कि अनेक अरब देशों में इजराइल ने विभिन्न परियोजनाओं में भारी निवेश कर रखा है। यद्यपि ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार चीन ही है किंतु वह अपने आर्थिक हितों के प्रति भी सतर्क है। रूस और चीन द्वारा दूर से बैठकर धुआं देखने से ईरान मुसीबत में फंस गया है। इस जंग का परिणाम क्या होगा ये फिलहाल कोई नहीं बता सकता लेकिन इसके जारी रहते पूरी दुनिया ऊर्जा संकट में उलझकर रह गई है और यही वह ब्रह्मास्त्र है जिसका उपयोग कर ईरान  अपनी पराजय को टालना चाह रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि अंततः ईरान के मौजूदा नेतृत्व में फूट पड़ जाएगी। फिलहाल  अनिश्चितता की स्थिति है जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे के थकने का इंतजार कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 11 March 2026

समान नागरिक संहिता को सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी


हमारे संविधान में विधायिका (संसद और विधानसभा ) को नया कानून बनाने के साथ ही  प्रचलित कानूनों को संशोधित या समाप्त करने का अधिकार है। लेकिन न्यायपालिका उसे रद्द भी कर सकती है बशर्ते वह संविधान विरुद्ध हो। अतीत में कई बार अधिकार क्षेत्र पर विधायिका और न्यायपालिका में टकराव के चलते एक दूसरे के निर्णयों को रद्द करने का प्रयास भी हुआ किंतु उस  दौरान भी एक दूसरे के सम्मान का ध्यान रखते हुए संयम बरता गया। इसके दो चर्चित उदाहरणों में पहला था जब स्व.राजीव गांधी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शाहबानो मामले में तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता दिलाये जाने  वाले फैसले को संसद में पलटवा दिया।। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने किसी प्रकार की नाराजगी नहीं जताई। दूसरा प्रकरण है नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु बनाए न्यायिक नियुक्ति आयोग को  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर देना। उक्त प्रस्ताव को लोकसभा ने सर्वसम्मति से पारित किया वहीं राज्यसभा में मात्र राम जेठमलानी अकेले विरोध में रहे। लेकिन सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से टकराने की बजाय उक्त निर्णय को मान्य कर लिया। अक्सर सार्वजनिक मंचों पर सरकार और न्यायपालिका के प्रतिनिधि एक दूसरे की आलोचना करते हैं। लेकिन अब तक दोनों पक्षों ने किसी विवाद को प्रतिष्ठा का विषय बनाकर एक - दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं किया। बावजूद इसके कि  न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीति की भूमिका रहने से अनेक ऐसे व्यक्ति भी न्याय की आसंदी पर बैठ जाते हैं जिनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नहीं होती। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों को  राजनीति से प्रभावित माना जाता है। ये बात भी सही है कि जिस प्रकार सरकार  जनता की नाराजगी से बचना चाहती है ठीक उसी तरह सर्वोच्च न्यायालय भी  विवादित होने से बचते  हुए गेंद विधायिका के पाले में खिसका देता है। ताजा उदाहरण समान नागरिक संहिता संबंधी उसकी टिप्पणी है।  गत  दिवस मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन सम्बन्धी याचिका पर सुनवाई करते हुए देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और  आर. महादेवन की पीठ ने विधायिका से पर्सनल लॉ की वजह से पैदा होने वाली जटिलताओं से बचने के लिए काम करने का आह्वान किया। श्री बागची ने कहा कि पर्सनल लॉ को अमान्य घोषित कर एक शून्य की स्थिति पैदा करने से बेहतर  होगा , इसे विधायी विवेक पर छोड़ दिया जाए ताकि वह समान नागरिक संहिता पर कानून बना सके।  मुख्य न्यायाधीश ने भी उनसे  सहमति जताई। न्यायालय ने माना कि समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है, क्योंकि यह लैंगिक समानता और व्यक्तिगत कानूनों की विसंगतियों को दूर करने के लिए सबसे प्रभावी समाधान है। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शरीयत जैसे संवेदनशील व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव करना संसद  का कार्यक्षेत्र है, न कि सीधे अदालत का। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने संसद को आगे बढ़ने का संकेत दे दिया।  इस समय उत्तराखंड और गोवा में समान नागरिक संहिता है। पूरे देश में इसे लागू करने  पर केवल मुस्लिम समाज ही प्रभावित नहीं होगा अपितु  अनेक जनजातीय समुदायों में प्रचलित व्यवस्थाएं भी बदलेंगी । हालांकि आजादी के बाद से  विभिन्न  समुदायों द्वारा अपनी परम्पराओं और रीति रिवाजों में  समयानुकूल परिवर्तन किए गए हैं। ये बात भी सही है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण ये अल्पसंख्यक समुदाय मुख्य धारा से कटा हुआ है। भारतीय संविधान में सभी  को अपनी धार्मिक आस्थाओं से जुड़ने का अधिकार है। लेकिन कानून की नजर में सभी बराबर हैं। ऐसे में जब कानून से ऊपर शरीयत को मानने जैसी बातें सार्वजनिक रूप से सुनाई देती हैं तब धर्म निरपेक्षता का खोखलापन उजागर हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जो भी कहा उसके बाद अब पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की  पहल केंद्र सरकार को करनी चाहिए। ज़ाहिर है मुस्लिम समुदाय के अलावा मुस्लिम वोट बैंक के सौदागर भी इसका विरोध करेंगे। लेकिन देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी है कि जिस प्रकार दंड विधान संहिता सभी धर्मों के लिए एक समान है वैसे ही एक समान नागरिक कानून भी  होना चाहिए। सभी धर्मों का सम्मान और उनमें आस्था रखने वालों के अधिकार की सुरक्षा जितनी जरूरी है उतना ही महत्वपूर्ण है समाज की एकजुटता जो समान नागरिक संहिता से ही मजबूत होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 March 2026

संकुचित सोच के कारण एक नहीं हो पा रहा विपक्ष


बजट सत्र के पहले चरण में कांग्रेस के नेतृत्व में अनेक विपक्षी दलों ने लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया किंतु तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। अब बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होने पर तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध संसद में महाभियोग लाने की घोषणा के साथ ही शर्त रख दी कि वह उक्त अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन तभी करेगी जब बाकी विपक्ष श्री कुमार के विरुद्ध लाए जा रहे महाभियोग पर तृणमूल कांग्रेस का साथ दे। इसके बाद दोनों एक दूसरे का समर्थन करने राजी हो गए। उल्लेखनीय है प.बंगाल में मतदाता सूचियों के एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण ) के विरोध में ममता बैनर्जी ने आसमान सिर पर उठा रखा है। श्री कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग का दल राज्य के दौरे पर आया तो सुश्री बैनर्जी धरना देकर बैठ गईं। आयोग के लोगों को काले झंडे तक दिखाए गए। हद तो तब हो गई जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प. बंगाल आगमन पर उनकी अगवानी हेतु न तो ममता खुद उपस्थित रहीं और न ही अपने किसी मंत्री को ही भेजा। जबकि देश के संवैधानिक प्रमुख के स्वागत - सत्कार की बाकायदा नियमावली है। वैसे भी यह पद राजनीति से ऊपर होता है। लेकिन लंबे समय से मुख्यमंत्री पद पर आसीन सुश्री बैनर्जी को चुनाव आयोग द्वारा प. बंगाल में एस. आई.आर की प्रक्रिया में लाखों मतदाताओं के नाम काटने के कारण नींद नहीं आ रही। हालांकि जिन पाँच राज्यों में आगामी कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें केवल प. बंगाल की मुख्यमंत्री ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर आंदोलन कर रही हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग लाने जैसी बात केरल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों के दिमाग में नहीं आई जबकि वे भी चुनाव आयोग के प्रति अपना विरोध व्यक्त करते रहे हैं । एस. आई.आर के अंतर्गत उक्त राज्यों में भी लाखों नाम मतदाता सूचियों में जोड़े और काटे गए उस पर आपत्तियां भी लगाई गईं किंतु मुख्यमंत्री या कोई मंत्री न तो धरने पर बैठा और न ही सुश्री बैनर्जी की तरह उत्तेजित दिखा। इससे तो यही लगता है प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को अपनी सत्ता खतरे में पड़ती प्रतीत हो रही है। लेकिन ममता ये भूल गईं कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर बिहार विधानसभा चुनाव के पहले राहुल गांधी ने तेजस्वी यादव के साथ पूरे राज्य में यात्रा निकाली और चुनाव आयोग के विरुद्ध खूब प्रचार भी किया लेकिन जनता ने  उस मुद्दे को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। उल्लेखनीय है बिहार में तो कांग्रेस और राजद द्वारा बनाए गए महागठबंधन में ज्यादातर विपक्षी दल शामिल थे, लेकिन प.बंगाल में ममता बैनर्जी एकला चलो की नीति पर चलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ सीटों का बंटवारा करने तैयार नहीं होतीं। दिल्ली के  पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने बजाय कांग्रेस के आम आदमी पार्टी का समर्थन कर इंडिया गठबंधन की एकता को पलीता लगा दिया था। प. बंगाल विधानसभा के आगामी चुनाव में इस बार कांग्रेस भी वाम मोर्चे का साथ छोड़ अकेले लड़ने का निर्णय कर चुकी है। ये सब देखते हुए संसद में लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव  और मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग पर विपक्ष की एकता भी मजबूरी का सौदा बन गई है । हालांकि संसद के दोनों सदनों में एनडीए के पास पर्याप्त बहुमत होने से न तो अविश्वास प्रस्ताव पारित होगा और न ही महाभियोग को मंजूरी मिलेगी। विपक्ष भी ये बात जानता है । दरअसल तृणमूल कांग्रेस द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का सशर्त समर्थन करने का दाँव चलने से विपक्षी एकता की पोल खुल गई है। प. बंगाल में तृणमूल, कांग्रेस और वामपंथी जहां अलग - अलग ताल ठोकेंगे वहीं केरल में भी कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध तलवार भांजते नजर आएंगे। इन्हीं सब कारणों से विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध वैसी मोर्चेबंदी नहीं कर पा रहा जैसी अपेक्षित है। 2024 में लोकसभा चुनाव के पहले बना इंडिया गठबंधन भी लगभग मृतप्राय है। ऐसा नहीं हैं कि भाजपा और केंद्र सरकार के विरुद्ध मुद्दों का अभाव है किंतु संकुचित सोच के चलते विपक्ष में लगातार बिखराव आता जा रहा है जिसका लाभ भाजपा को मिल रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 9 March 2026

इस जीत ने पूरे देश का हौसला बढ़ाया


कल रात भारत ने लगातार  दूसरी बार टी - 20 क्रिकेट का विश्व कप जीतकर इतिहास रच दिया। तीन बार टी -20 विश्व कप जीतने का कीर्तिमान स्थापित करने वाला भी भारत पहला देश है। विराट कोहली और रोहित शर्मा द्वारा टी - 20 से संन्यास लिए जाने के बाद जब कुछ मैचों में टीम का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा तब आलोचकों ने  चयनकर्ताओं पर निशाने साधते हुए उन दोनों की वापसी का दबाव बनाया। इस विश्व कप में भी भारतीय टीम ने अनेक उतार चढ़ाव देखे। सेमी फाइनल में इंग्लैंड के साथ हुआ मुकाबला श्वास रोधक रहा।  254 रनों का पहाड़ खड़ा करने के बाद लगा भारत आसानी फाइनल में पहुंच जाएगा। लेकिन इंग्लैंड जीत के बिलकुल करीब पहुंचकर महज 7 रन से ही हारा। इसीलिए जब भारत ने 255 रन बनाकर न्यूजीलैंड को 256 रन बनाकर विश्व कप जीतने की चुनौती दी तब  सेमी फाइनल की यादें ताजा हो उठीं। वैसे भी न्यूजीलैंड ने फाइनल का सफ़र अत्यंत कुशलता से पूरा किया था।  इसीलिये मुकाबला रोचक होने की उम्मीद थी। लेकिन सूर्यकुमार यादव की कप्तानी में युवा खिलाड़ियों से भरी  टीम ने पहले बल्लेबाजी और फिर गेंदबाजी में धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए अपने घर में टी - 20 विश्व कप जीतने का कीर्तिमान भी बना दिया । भारत की महिला क्रिकेट टीम भी कुछ माह पहले ही विश्व कप जीत चुकी है।  इस प्रकार अब भारत क्रिकेट की दुनिया में उस  बुलंदी पर  है जहां कभी वेस्ट इंडीज और ऑस्ट्रेलिया हुआ करते थे। 1983 में पहला एक दिवसीय क्रिकेट  विश्व कप जीतने के बाद भारतीय क्रिकेट का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ। बीच - बीच में उतार चढ़ाव आते रहे किंतु नए खिलाड़ियों का आगमन , बेहतर प्रशिक्षण, अच्छा भुगतान और सुविधाएं मिलने से भी खेल का स्तर ऊंचा होता गया। और जबसे आईपीएल शुरू हुआ तबसे भारत  क्रिकेट की नर्सरी बन गया।न्यूजीलैंड के कप्तान ने ठीक ही कहा कि भारत के पास इतनी युवा प्रतिभाएं हैं कि वह चाहे तो तीन ऐसी ही टीमें बना सकता है। आईपीएल के साथ तमाम विसंगतियां जुड़ी होने के बाद भी  मानना  पड़ेगा कि इसकी वजह से देश में सैकड़ों युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका मिलने लगा वरना वे बिना तराशे हीरे की तरह रह जाते।  इस जीत के बाद भारत  विश्व क्रिकेट का सिरमौर बन गया है। हमारी टीम अब खेलने के लिए ही नहीं बल्कि जीतने के लिए खेलती है। भारत के बिना क्रिकेट के किसी भी बड़े आयोजन का सफल होना असम्भव है। भारत का क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड विश्व का सबसे सम्पन्न खेल संगठन है। आईपीएल ने उसकी संपन्नता और बढ़ा दी। आईसीसी में भी भारत का दबदबा बढ़ा जिसकी अध्यक्षता भी  हमारे पास है।  भारतीय जनता में क्रिकेट के प्रति रुचि जुनून की हद तक  है।  सुखद बात ये भी है कि अन्य खेलों में भी हम धीरे - धीरे आगे आ रहे हैं । ओलंपिक में भले ही पदक तालिका में भारत का स्थान काफी नीचे रहता है लेकिन विभिन्न खेलों में हमारे खिलाड़ी मुकाबले में नजर आने लगे हैं। भारत द्वारा भविष्य में ओलंपिक की मेजबानी करने का दावा प्रस्तुत करने से ये लगता है कि विश्व स्तरीय खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करने का आत्मविश्वास हमारे यहां उत्पन्न हो चुका है। वैसे अब ये अपेक्षा की जा सकती है कि क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अपनी तिजोरी से अन्य खेलों के विकास में भी योगदान दे क्योंकि आज की दुनिया में विकास का पैमाना केवल आर्थिक संपन्नता ही नहीं बल्कि खेल भी हो गए हैं। इसका उदाहरण चीन है जिसने बीते दो दशकों में अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करने के साथ ही खेलों में भी अपना दबदबा बढ़ाया और ओलंपिक पदक तालिका में दूसरा स्थान हासिल कर दिखाया। उस लिहाज से भारत काफी पीछे है किंतु संतोष की बात है कि ओलंपिक दर ओलंपिक हमारा प्रदर्शन सुधर रहा है । इसका कारण मोदी सरकार का खेलो इंडिया कार्यक्रम भी है। अन्य खेलों के खिलाड़ियों को विश्व स्तरीय प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएं दिए जाने से नई पीढ़ी भी खेलों में अपना भविष्य तलाशने लगी है। मध्यम श्रेणी शहरों में भी पेशेवर प्रशिक्षकों के कारण खेलों के प्रति रुचि बढ़ी है। सबसे बड़ी बात ये है कि खेल समाज में स्वस्थ और सकारात्मक वातावरण निर्मित करने का सबसे अच्छा माध्यम है। इससे व्यक्ति में अनुशासन की भावना और संघर्ष की क्षमता  विकसित होती है।  गत दिवस अहमदाबाद में मिली जीत भविष्य में और बड़ी सफलताओं के प्रति खिलाड़ियों में उत्साह का संचार करेगी ये विश्वास और मजबूत हुआ है। 140 करोड़ देशवासियों को गौरव की अनुभूति कराने वाली क्रिकेट टीम का हार्दिक अभिनन्दन।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 March 2026

भारत विरोधी होने पर बालेन शाह का हश्र भी माओवादियों जैसा होगा


गत वर्ष नेपाल में युवाओं के अराजक आंदोलन के कारण  चीन समर्थक के. पी. शर्मा ओली सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी। यद्यपि उनको शेख हसीना की तरह देश छोड़कर नहीं जाना पड़ा किंतु अनेक मंत्रियों सहित  पर हुए हमलों से  साबित हो गया कि  सत्ता के प्रति जनता का गुस्सा बेकाबू हो चला था। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ हुए उस आंदोलन का नेतृत्व किसी राजनीतिक दल या नेता के हाथ में न होकर राजधानी काठमांडू के युवा महापौर बालेन शाह के हाथ में था जो निर्दलीय जीतकर आए थे। पेशे से रैपर ( गायक ) इस युवा ने नेपाल के युवाओं को सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। इस काम में सोशल मीडिया उसका प्रमुख अस्त्र था जिस पर प्रतिबंध के बाद वैसे ही हालात बन गए जब 2006 में महाराजा ज्ञानेंद्र को राजगद्दी माओवादियों को सौंपना पड़ गई। उसके बाद से देश राजनीतिक अस्थिरता के भँवर में फंस कर रह गया। माओवादियों में बिखराव से प्रधानमंत्री बदलते रहे लेकिन जनता ने जिन  उम्मीदों के चलते राजतंत्र को हटाया वे पूरी नहीं हुईं । चीन के दबाव  में माओवादी सरकारों ने भारत से रिश्ते बिगाड़ने का क्रम जारी रखा जिसका चरमोत्कर्ष नेपाल द्वारा प्रारंभ सीमा विवाद के  बाद भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी के रूप में देखने मिला। दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र को माओवादियों ने भले ही धर्मनिरपेक्ष बना दिया किंतु नेपाल में हिंदू धर्म और संस्कृति की जड़ें काफी गहरी हैं। लाखों नेपाली भारत में रोजगार से जुड़े हैं। आर्थिक दृष्टि से भी वह काफी कुछ भारत पर निर्भर है। इसलिये माओवादी चाहकर भी हिंदू धर्म  और संस्कृति को खत्म नहीं कर सके। गत वर्ष हुए युवाओं के आंदोलन के  बाद बालेन शाह महानायक के तौर पर उभरे किंतु  अंतरिम सरकार में  उन्हें महत्व नहीं मिला। दो दिन पहले हुए आम चुनाव में बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर दशकों पुराने दलों के आधिपत्य को खत्म कर दिया। चीन समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली  तक बालेन शाह से चुनाव  हार गए। गगन थापा और माओवादी क्रांति के चेहरे रहे पुष्पदहल कमल को भी  कम सीटें मिलने से सत्ता  बालेन शाह के हाथ जाना तय है। नेपाल में यह एक नए युग की शुरुआत है जहां युवा अपनी राजनीतिक भागीदारी के जरिए शासन में बदलाव लाने में कामयाब हो गए। हाल ही में बांग्लादेश में भी सत्ता तारिक रहमान नामक युवा के हाथ आ गई। लेकिन  फर्क ये है कि तारिक के पिता राष्ट्रपति और माँ प्रधानमंत्री रहीं जबकि बालेन की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। वे भारत में इंजीनियरिंग पढने के बाद गायक के रूप में युवाओं में लोकप्रिय हुए। लेकिन चर्चा में तब आए जब काठमांडू के महापौर चुनाव  निर्दलीय लड़कर जीते। उसी के बाद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा परवान चढ़ीं और देखते ही देखते उन्होंने पहले सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले आंदोलन को हवा दी और अब सत्ता के शीर्ष पर विराजमान होने जा रहे हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता भारत में है। उल्लेखनीय है बांग्लादेश के बाद जब नेपाल में युवाओं ने सत्ता को उखाड़ फेंका तब भारत में भी वैसी ही उथल - पुथल की आशंका व्यक्त की जाने लगी किन्तु वह निर्मूल सिद्ध हुई । दरअसल उक्त दोनों सत्ता परिवर्तनों के पीछे अमेरिका की भूमिका मानी जाती है। बांग्लादेश के कार्यकारी शासक बने मो. यूनुस तो  अमेरिका के घोषित पिट्ठू थे। ऐसा ही संदेह बालेन शाह को लेकर भी है।  उन्होंने महापौर बनते ही भारत विरोधी बयान देने शुरू कर दिए और हिन्दी फिल्मों पर भी रोक लगाई ।  साथ ही चीन विरोधी बयान भी दिए। वैसे भी उनका आंदोलन ही चीन समर्थित सरकार के विरुद्ध था। इस सबसे लगता है बालेन की अपनी कोई सोच नहीं है।  अब सवाल ये है कि क्या वे नेपाल को गरीबी , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से राहत दिलवा सकेंगे या फिर माओवादियों की तरह से ही सत्ता की चकाचौंध में अपना उद्देश्य और वायदे भूल जाएंगे। बालेन नेपाल को यदि विकास के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं तो वह भारत के संरक्षण और सहयोग से ही संभव होगा क्योंकि चीन की रूचि नेपाल की बेहतरी से ज्यादा तिब्बत की तरह उसे हड़पने में है। ऐसे  में उन्होंने भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया तब वे भी जल्द ही जनता की नजरों से उतर जाएंगे और उन माओवादी नेताओं की कतार में खड़े दिखेंगे जो भारत का विरोध करते - करते हाशिए पर चले गए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 March 2026

नीतीश का दिल्ली आना किसी बड़े घटनाक्रम की शुरुआत



बिहार में साधारण व्यक्ति भी राजनीति पर पैनी नजर रखता है। सामाजिक न्याय की जिस राजनीति ने बीते लगभग चार दशक से देश को प्रभावित किया उसकी जड़ें यहां गहराई तक  हैं। समाजवादी चिंतकों ने यहां जाति व्यवस्था को मिटाने के लिए जो काम किया उसका ये लाभ तो हुआ कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से दबे वर्ग को राजनीतिक नेतृत्व में हिस्सेदारी ही नहीं मिली बल्कि पूरा नेतृत्व ही उसके हाथ चला गया। इसका सिलसिला कर्पूरी ठाकुर से होते हुए नीतीश कुमार निर्बाध चला आ रहा है। ऐसा नहीं है कि  उच्च जातियों का वर्चस्व समाप्त हो गया किंतु धीरे - धीरे उनकी पकड़ कमजोर हो चली है।  यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव  से पीड़ित जनता ने उच्च जाति की बजाय पिछड़ी जाति के नीतीश कुमार को ही अपना भाग्य विधाता बनाया। 2005 से जीतन राम मांझी के के 10 माह छोड़कर नीतीश मुख्यमंत्री बने  रहे। जीतन राम को भी उन्हीं ने गद्दी पर बिठाया था। लगभग 20 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश ने गत दिवस राज्यसभा के लिए नामांकन भरकर एक बार फिर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया ।  गत  विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी भाजपा ने उन्हीं को मुख्यमंत्री बनाया जैसा वह उसके पहले वाले चुनाव में भी कर चुकी थी। चुनाव के दौरान विरोधियों ने उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति का खूब मजाक बनाया किंतु जनता ने सुशासन बाबू की उनकी  छवि पर  विश्वास जताते हुए रिकॉर्ड दसवीं बार उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर पसंद किया। हालांकि निजी ईमानदारी और विकास के मुद्दे पर उनका रिकॉर्ड अपने पूर्ववर्ती सभी मुख्यमंत्रियों से काफी बेहतर रहा किंतु राजनीतिक प्रतिबद्धता के मामले में नीतीश ने अनेक अवसरों पर  अपनी साख भी गिराई। नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत का खुला प्रदर्शन करने के बाद वे उनके नेतृत्व को स्वीकार करते हुए भाजपा के साथ आये और फ़िर बिना कोई कारण बताए उन्हीं लालू प्रसाद की गोद में  बैठ गए जिनको भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवाने में उनकी भूमिका रही।  उल्लेखनीय है नीतीश की सौम्य और सुलझे हुए राजनेता की छवि बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में बतौर मंत्री उनका कार्य सहायक बना । उस समय वे लालू और शरद यादव से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडीज के साथ समता पार्टी बना चुके थे।  बाद में वे जनता दल (यू) के सर्वेसर्वा बनकर बिहार की राजनीति की सबसे ताकतवर शख्सियत बन गए। पिछड़ी जाति का होने के बावजूद वे कभी भी किसी जाति विशेष का चेहरा नहीं बने और यही गुण उनकी सफलता का आधार बना। अचानक बिहार छोड़कर दिल्ली का रुख करने के पीछे राजनीतिक मजबूरी है या कोई रणनीति इसका खुलासा फिलहाल नहीं हुआ। और हो सकता है कभी न हो। स्मरणीय है 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन के सूत्रधार वही थे किंतु अचानक एनडीए में लौटकर नरेंद्र मोदी के झंडे तले खड़े हो गए। उनके उस कदम से उनके साथ पलटू राम जैसा विशेषण जुड़  गया किंतु मोदी सरकार की वापसी से उनकी ताकत बढ़ गई। बाद में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश और भाजपा ने लालू परिवार की राजनीति को लगभग समाप्त कर दिया।  बढ़ती आयु से नीतीश की क्षमता भी कम होती जा रही थी। साथ ही मुख्यमंत्री बने रहकर रिटायर होने के बजाय राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाकर  और ऊंचाई हासिल करने की महत्वाकांक्षा भी पटना की बजाय नई दिल्ली में रहकर ही पूरी हो सकती है। फिलहाल वे क्या बनेंगे इसका पता आने वाले कुछ दिनों में पता चल जाएगा। रही बात उनके उत्तराधिकारी की तो उन्होंने कोई बड़ा दांव नहीं चला तो भाजपा बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनवाने में सफल हो जाएगी।   दरअसल नीतीश की पार्टी में ऐसा कोई नहीं है जो उनकी जगह ले सके। दूसरी तरफ भाजपा का संगठन पूरे बिहार में होने से वह सरकार ज्यादा बेहतर तरीके से चला सकेगी। हालांकि नीतीश के बेटे निशांत का नाम पार्टी के नेता के साथ ही उपमुख्यमंत्री पद के लिये उछला है। लेकिन ऐसा होने पर नीतीश और भाजपा दोनों को सवालों के घेरे में खड़ा करेगा। हालांकि भाजपा के तो अनेक नेता परिवार के नाम पर आगे आए जिनमें उसके नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी हैं किंतु नीतीश ने अपने परिवार को अभी तक  दूर रखा। ऐसे में बेटे की ताजपोशी  उनके आलोचकों खास तौर पर तेजस्वी यादव को अवसर प्रदान करेगी किंतु लालू और उनकी संतानों के विपरीत नीतीश और उनके परिवार की छवि कहीं बेहतर है। नीतीश का बिहार छोड़ दिल्ली का रुख करना राष्ट्रीय राजनीति में किसी नए धमाके की शुरुआत हो सकती है। वैसे भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में चौंकाने वाले फैसले नई बात नहीं हैं। प. बंगाल के चुनाव के पहले नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना और नीतीश को दिल्ली बुलाना किसी बड़े घटनाक्रम की शुरुआत है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 3 March 2026

ईरान भी हिटलर जैसी भूल कर बैठा


इजराइली और अमेरिकी हमले के बाद जो पलटवार ईरान की ओर से हुआ उसने लड़ाई को प. एशिया के बड़े हिस्से में फैला दिया। वैसे ईरान की दुश्मनी इजराइल और अमेरिका से है किंतु उसने उन मुस्लिम देशों पर भी मिसाइलें छोड़ दीं जिनमें या तो अमेरिका के सैनिक अड्डे हैं या फिर वे उसके समर्थक हैं। दुबई जैसे व्यावसायिक केंद्र पर ड्रोन और मिसाइल से किए हमले का औचित्य किसी को समझ नहीं आया।  संभवतः ईरान के रणनीतिकारों को ये लगा कि दुबई में अमेरिकी कंपनियों और धनकुबेरों ने काफी निवेश कर रखा है। ऐसे में वहां धमाके करने से पश्चिमी देशों के निवेशक  इस जगह से दूर भागने लगेंगे। इस हमले के जरिए ईरान ने कतर और ओमान जैसे देशों को ये संदेश दिया कि वे अमेरिकी अड्डे रखने से परहेज करें। गत दिवस ईरान ने सऊदी अरब में स्थित दुनिया के सबसे प्रमुख तेल शोधक कारखाने को भी निशाना बनाया। ये कहना गलत नहीं होगा कि ईरान  ने हमलों का पूरी ताकत से जवाब दिया है। अमेरिका से बात करने से इंकार कर वह जताना  चाह रहा  है कि भारी नुकसान के बावजूद वह लड़ाई जारी रखने में सक्षम है ।संभवतः इसीलिए डोनाल्ड ट्रम्प को कहना पड़ा कि युद्ध लंबा खिंच सकता है। इसी के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में हड़कम्प मच गया। सोना ,चांदी और कच्चा तेल  महंगा होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। दरअसल ईरान जोश में होश खो बैठा वरना वह लड़ाई को इजराइल और अमेरिका के विरुद्ध ही सीमित रखता। इसमें दो मत नहीं है कि प. एशियाई देशों में ईरान ही इजराइल से टकराने की सामर्थ्य रखता है। उसके पास मिसाइलों का विशाल भंडार है। चीन और रूस से प्राप्त सैन्य उपकरणों के बल पर ही वह अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार करता रहा। हमास और हिजबुल्ला जैसे आतंकवादी संगठन उसी के संरक्षण में इजराइल पर हमले करते रहे। लेकिन उसके शासक भूल गये कि इजराइल की पीठ पर अमेरिका का  हाथ है। उसने भले ही अत्याधुनिक युद्ध तकनीक विकसित कर ली हो किंतु बिना अमेरिका के वह अपना अस्तित्व कायम नहीं रख पाता। अमेरिका के कारण ही ब्रिटेन , जर्मनी और फ्रांस से भी इजराइल को समर्थन और सहायता मिलती रही है। हालांकि बीते एक - दो दशकों में परिदृश्य काफी बदला है। अनेक मुस्लिम देशों ने इजराइल से दुश्मनी त्यागकर तटस्थता अपना ली है। हालांकि वे फिलीस्तीन को सैद्धांतिक समर्थन देते रहते हैं। हमास के साथ जंग में भी ईरान और लेबनान ही इजराइल के विरुद्ध खड़े हुए। मौजूदा युद्ध के पहले ओमान , कतर और सऊदी अरब कोशिश करते रहे कि अमेरिका ईरान पर हमला न करे किंतु ईरान ने उनको ही निशाना बनाकर अपने प्रति सुहानुभूति रखने वाले समाप्त कर दिये।  चार दिन बाद भी भले ही वह डटे  रहने की दृढ़ता दिखा रहा है और तेहरान  में तत्काल सत्ता परिवर्तन की संभावना भी नजर नहीं आ रही । लेकिन  इजराइली और  अमेरिकी हमलों से ईरान धीरे - धीरे गाजा वाली स्थिति की ओर बढ़ रहा है जिसमें समूचा देश  मलबे में बदल जाएगा। हालांकि ईरान भौगोलिक दृष्टि से बड़ा देश है जिसके आबादी 9 करोड़ है किंतु इस संकट में उसे जिस बाहरी सहायता की जरूरत है उससे वह वंचित है। अमेरिका तो खुलकर मैदान में है और ट्रम्प लड़ाई को और भयावह बनाने की धमकी दे रहे हैं किंतु न तो रूस के राष्ट्रपति पुतिन और न ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुलकर ईरान के पक्ष में नजर आ रहे हैं। ये देखते हुए लगता है इजराइल  और अमेरिका ने ईरान को अलग - थलग करने में सफलता अर्जित कर आधी जंग जीत ली है जिसके लिए ईरान खुद जिम्मेदार है। इतनी बड़ी लड़ाई के अंतिम परिणाम का अंदाज मात्र चार दिनों में लगा पाना संभव नहीं है किन्तु ये कहना गलत नहीं होगा कि एक साथ दर्जन भर मोर्चे खोलकर ईरान के हुक्मरानों ने वैसी ही भयंकर भूल कर दी जो हिटलर ने दूसरे महायुद्ध में की थी। आज ईरान किसी प्रमुख मुस्लिम देश से सहायता मांगने की स्थिति में नहीं रहा। हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे आतंकवादी संगठनों के बल पर इजराइल को झुका लेने की सोच ने उसको बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया। हिटलर भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित रखता तब वह वह शर्मनाक मौत से बच सकता था। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के रणनीतिकारों को ये एहसास हो  जाना चाहिए था कि आजकल का युद्ध तलवारों से नहीं बल्कि तकनीक से लड़ा जाता है जिसमें बहादुरी से ज्यादा होशियारी की जरूरत होती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 March 2026

ईरान की मूर्खता से मुस्लिम देश भी उसके दुश्मन बन बैठे



ईरान पर इजराइल और अमेरिका द्वारा किए गए हमले से प. एशिया में एक बार फिर युद्ध की आग भड़क उठी है। ईरान के सर्वोच्च शासक अली खामेनेई के साथ ही सेनाध्यक्ष और रक्षा मंत्री इजराइली मिसाइल की मार से मौत के शिकार हो गए। उनके अलावा भी उच्च पदों पर बैठी अनेक हस्तियां भी जान गंवा बैठीं। ईरान के सैन्य ठिकानों विशेष रूप से मिसाइलों के भंडार और परमाणु संस्थान इजराइल और अमेरिका के निशाने पर हैं। जैसी कि ईरान धमकी दे चुका था उसने भी पलटवार करते हुए इजराइल पर एक साथ सैकड़ों मिसाइलें दाग दीं। लेकिन इस जंग में सबसे बड़ा मोड़ ये आ गया कि इस्लामिक देशों की कथित एकता के परखच्चे उड़ गए। इस्लामिक देशों के संगठन के अलावा इस्लामिक नाटो नामक नई सैन्य संधि जैसी बातें  अप्रासंगिक होकर रह गईं। इसका कारण ईरान के नेताओं की मूर्खता ही है जिन्होंने इजरायल पर हमले के साथ-साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान को भी निशाना बना दिया। इस कदम से मुस्लिम जगत दो फाड़ हो गया । उक्त देश अमेरिका के सहयोगी देश हैं। जिनके बारे में ईरान को आशंका है कि उनमें स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल उस पर हमले के लिए हो सकता है। यद्यपि शुरुआत में मुस्लिम देशों ने ईरान पर इजराइली हमले की आलोचना की थी।  लेकिन ईरान द्वारा उन पर ही मिसाइलें छोड़ दीं तब मजबूरन वे उसके विरुद्ध खड़े दिखने लगे।   उक्त  देशों में से कुछ ने  इस युद्ध को रोकने हेतु अमेरिका से संपर्क भी किया था किंतु उसी दौरान ईरान ने उन्हीं के यहाँ धमाके कर दिए । ईरान के पक्ष में केवल लेबनान में जमे हिजबुल्ला नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन ने ही इजराइल पर हमले किए हैं। गाजा युद्ध में पिटने के बाद हमास की कमर पहले ही टूटी है जबकि ईरान की तरफदारी करने वाले तीसरे आतंकवादी संगठन हूती में भी इतना दम नहीं है जो इज़राइल को झुका सके। ऐसे में अच्छी छवि वाला एक भी इस्लामिक देश या संगठन ईरान के बचाव में नजर नहीं आ रहा। परमाणु शक्ति संपन्न एकमात्र मुस्लिम देश पाकिस्तान ईरान का निकटस्थ पड़ोसी होने के बावजूद अमेरिका के गुलाम जैसा है। यही वजह है कि ईरान को न तो बाहरी सैन्य सहायता मिल रही है और न ही कूटनीतिक संरक्षण। रूस जहां यूक्रेन युद्ध रूपी समस्या में फंसा है वहीं जिन चीनी मिसाइलों और रक्षा प्रणाली के बल पर ईरान अमेरिका से भिड़ने का दुस्साहस कर बैठा वे एक बार फिर धोखा दे गईं। स्मरणीय है ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान की चीन निर्मित रक्षा प्रणाली बुरी तरह विफल रही । दूसरी तरफ पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को भारत ने हवा में ही नष्ट कर दिया था। लगातार दो युद्धों में चीन निर्मित युद्ध सामग्री के घटिया साबित होने से विश्व शक्ति के रूप में उसके रुतबे में जबरदस्त गिरावट आई है। कुल मिलाकर ये स्पष्ट हो गया है कि ईरान गीदड़ भभकी कितनी भी देता रहे लेकिन उसके पास उस स्तर की आक्रमण या रक्षा क्षमता नहीं है जो इजराइल जैसे छोटे देश ने विकसित कर ली। इसके विपरीत ईरानी हुक्मरान अमेरिका को धमकाकर ही खुश रहे। उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प की रणनीति को समझकर समय रहते कूटनीतिक मोर्चा खोलना चाहिए था। सऊदी अरब , कतर और सं. अरब अमीरात को भरोसे में लेकर अमेरिका को हमलावर होने से रोका जा सकता था किंतु ख़ामेनेई अपने बनाए संसार में ही सिमटे रहे। युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होगा ये कहना मुश्किल है लेकिन अमेरिका ने खामेनेई को मारकर एक लक्ष्य तो हासिल कर ही लिया। अब वह इजराइल के साथ मिलकर उसकी बची - खुची सैन्य क्षमता को नष्ट कर उसे झुकने मजबूर करेगा। ईरान की असली ताकत उसके तेल भंडार हैं लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते वह उनका समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा। इस लड़ाई के बाद उसकी परमाणु बम बनाने की योजना भी अधर में फंसकर रह जाएगी। ईरान के नए शासकों के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि अभी तक तो प. एशिया में इजराइल ही  घोषित तौर पर उसका शत्रु था लेकिन अब वे  मुस्लिम देश भी उसके दुश्मन बन गए जिन पर उसने मिसाइलों और ड्रोन से हमला करने की बेवकूफी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 28 February 2026

न्यायपालिका में रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस होना चाहिए


बीते दो दिनों में न्यायपालिका से जुड़ी दो खबरों से एक बार फिर न्याय प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं चल पड़ी हैं। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा कक्षा आठवीं की एक पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय शामिल किए जाने पर देश के मुख्य न्यायाधीश भड़क उठे और तत्काल उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा माफी के बावजूद कड़ा रुख दिखाते हुए उन्होंने मामले को जारी रखने की बात कही।  पुस्तक  से विवादित अध्याय भले हटा दिया गया किंतु इससे न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं  हट सकेगा जिसे अनेक पूर्व न्यायाधीश भी खुले आम स्वीकार कर चुके हैं। एन.सी.ई.आर.टी सरकारी विभाग है लिहाजा उस पर तो धौंस काम कर गई  लेकिन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर न जाने कितने लेख प्रकाशित होने के अलावा गोष्ठियां होती हैं। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश कहां - कहां रोक लगाएंगे ये बड़ा सवाल है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के सरकारी निवास में रुपयों के बंडल मिलने के बाद भी अब तक उन्हें पद से नहीं हटाया जा सका। यदि उनकी जगह कोई अन्य सरकारी अधिकारी होता तब कम से कम उसका निलंबन तो हो ही जाता। दरअसल  न्यायाधीश कानून के रखवाले होते हुए भी कुछ मामलों में उससे ऊपर हैं जिन्हें कदाचरण के बावजूद हटाने के लिए संसद में महाभियोग पारित होना जरूरी है। सामान्य तौर पर देखें तो ये कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है। न्यायाधीशों को विशेष अधिकार और संरक्षण पूर्णरूपेण उचित है किंतु नैतिकता भी कोई चीज होती है। गत दिवस दिल्ली की एक निचली अदालत ने बहुचर्चित शराब घोटाले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित 27 आरोपियों को पूरी तरह निर्दोष मानकर सीबीआई के आरोप पत्र को खारिज करते हुए जांचकर्ता सीबीआई अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश दे दिया। अब श्री केजरीवाल  आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें झूठा फंसाकर जेल में डाल दिया गया। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के  इतर देखें तो जिस तरह अदालत ने  जांच अधिकारी की जांच  का आदेश दिया क्या उसी तरह उन न्यायाधीशों की जांच नहीं होनी चाहिए जिन्होंने आरोप पत्र को प्रथम दृष्टया विचार योग्य मानते हुए मुकदमे की अनुमति तो दी ही, साथ ही गिरफ्तार होने वालों की जमानत याचिका लम्बे समय तक निरस्त की जाती रही। निचली अदालत ने अपने फैसले में संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के विरुद्ध  प्रकरण दर्ज़ करने में सावधानी बरतने की नसीहत भी जांच एजेंसी को दे डाली । लेकिन जिस आरोपपत्र की एक भी बात अदालत ने सही नहीं मानी उसे प्राथमिक तौर विचार योग्य मानने वाले न्यायाधीश भी तो सवालों के घेरे में हैं । जिस तरह श्री केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य नेता सीबीआई  और सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, कल को वैसी ही बातें उन्हें बरी करने वाले न्यायाधीश के बारे में भी कही जाएंगी। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इस तरह के फैसलों की समीक्षा भी विभागीय स्तर पर हो जिसमें एक तरफ अदालत  आरोपियों की  जमानत अर्जी  टालती रही वहीं दूसरी तरफ पूरा आरोपपत्र रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक समझा गया। अब यदि सीबीआई की अपील पर उच्च न्यायालय निचली अदालत के फैसले को उलट दे तब क्या निचली अदालत के न्यायाधीश शक के दायरे में नहीं आएंगे? ऐसे ही सवाल और भी हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश ने एन.सी.ई.आर.टी की किताब से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाला पाठ हटवाकर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कितनी बचाई ये तो विश्लेषण का विषय है। लेकिन उनके रवैए से ये जरूर साफ हो गया कि न्यायपालिका में भी असहिष्णुता बढ़ रही है। संसद द्वारा न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का जो प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित किया गया उसे सर्वोच्च न्यायालय ने इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि उसके लागू होने से न्यायाधीशों की नियुक्ति में उसकी दखलंदाजी खत्म हो जाती। सही बात ये है कि विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करने वाली न्यायपालिका को अपने कार्यक्षेत्र में किसी की प्रकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं होने से लोकतंत्र के उक्त तीन स्तंभों के बीच संतुलन और परस्पर सम्मान का भाव गड़बड़ा रहा है। इस स्थिति में सुधार तभी संभव है जब न्यायपालिका में अपनी रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस हो।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 February 2026

केजरीवाल - सिसौदिया दोषमुक्त लेकिन सीबीआई कठघरे में



दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया सहित दो दर्जन आरोपियों को बहुचर्चित शराब घोटाले में स्थानीय राउज एवेन्यू अदालत द्वारा दोषमुक्त मानकर सीबीआई के जांच  अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश दे दिया। अदालत ने सीबीआई द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र में खामियां पाते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह आरोपियों के विरुद्ध समुचित प्रमाण और साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। उल्लेखनीय है केजरीवाल सरकार द्वारा लागू की गई शराब नीति को लेकर काफी हल्ला मचा था। सीएजी रिपोर्ट में उक्त नीति से दिल्ली सरकार को दो हजार करोड़ रु. के नुकसान का खुलासा होने के बाद कांग्रेस ने उपराज्यपाल से शिकायत करते हुए जांच की मांग के साथ ही श्री केजरीवाल से त्यागपत्र भी मांगा। हालांकि बाद में जब उनकी गिरफ्तारी हुई तब कांग्रेस ही उनके बचाव में कूद पड़ी। यहां तक कि दिल्ली में विपक्ष की एक रैली में सोनिया गांधी ने मंच पर उनकी पत्नी को अपने बगल में बिठाकर सबको चौंकाया। इस मामले में केजरीवाल सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के  अलावा तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता भी गिरफ्तार हुई थीं, जिनका संबंध दक्षिण भारत की उस शराब लॉबी से बताया गया जिसकी उक्त शराब नीति में बड़ी भूमिका चर्चा में रही। बहरहाल निचली अदालत के  फैसले से श्री केजरीवाल और उनके दाहिने हाथ श्री सिसौदिया को राहत मिल गई। इसमें दो मत नहीं कि गत वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय के पीछे उक्त विवाद का भी योगदान रहा। आम आदमी पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी छवि को शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी ने बुरी तरह धूमिल कर दिया। हालांकि सीबीआई निचली अदालत के फैसले से संतुष्ट नहीं है । उसके वकीलों के अनुसार वे फैसले का अध्ययन करने के उपरांत उच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध अपील करेंगे। उच्च न्यायालय इस फैसले पर क्या रुख अपनाता है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है लेकिन निचली अदालत ने सभी आरोपियों को पूरी तरह दोषमुक्त मानने के जो कारण बताए उनसे सीबीआई की क्षमता पर एक बार फिर सवाल खड़े होंगे। सीएजी रिपोर्ट में शराब नीति से दिल्ली सरकार को हुए नुकसान पर कांग्रेस ने उपराज्यपाल को शिकायत देकर जांच की मांग की थी । उसी के बाद इस मामले ने जोर पकड़ा। बाद में सीबीआई के साथ ही ईडी भी जांच में शामिल हो गई । निचली अदालत ने शराब नीति में भ्रष्टाचार के आरोपों को रद्द  करने के जो कारण बताए  उनसे सीबीआई कठघरे में खड़ी हो गई । फैसले में साफ कहा गया है कि एक हजार पृष्ठ का आरोप पत्र अपर्याप्त प्रमाणों के अभाव में स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश देकर मामले को नया मोड़ दे दिया। इस फैसले से सीबीआई की साख एक बार फिर गिरी है। यही हाल ईडी का भी है। दोनों जांच एजेंसियों पर विपक्ष ये आरोप लगाता है कि वे सरकार के दबाव में काम करती हैं। ये बात भी सही है कि इन एजेंसियों द्वारा शुरुआत तो धमाकेदार अंदाज में की जाती है लेकिन ज्यादातर मामलों में वे आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहतीं। इसका एक कारण उन पर काम का जबरदस्त बोझ भी है। इस फैसले के बाद शराब घोटाले संबंधी सीएजी की रिपोर्ट पर भी उंगलियां उठेंगी क्योंकि उसी के आधार पर कांग्रेस ने पहली शिकायत दर्ज करवाई थी। हो सकता है सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील करते हुए इस फैसले पर स्थगन प्राप्त करने में कामयाब हो जाए लेकिन निचली अदालत द्वारा उसके आरोप पत्र को सिरे से खारिज किया जाना इस बात का प्रमाण है कि उसने ठीक से जांच नहीं की और इसीलिए वह समुचित प्रमाण और गवाह पेश करने में विफल रही। इस फैसले से केंद्र सरकार को भी आलोचना का शिकार होना पड़ेगा क्योंकि सीबीआई उसी के अधीन है। भले ही कांग्रेस ने शराब नीति के विरुद्ध मोर्चा खोलकर केजरीवाल सरकार के लिए मुसीबत खड़ी की हो किंतु आज के फैसले के बाद विपक्ष को ये कहने का अवसर मिल गया कि केंद्र सरकार सीबीआई का दुरुपयोग विपक्ष को घेरने के लिए करती है। आरोप मुक्त होने वाले नेताओं ने भाजपा पर आरोप लगाना शुरू भी कर दिया। अब उच्च न्यायालय में इस फैसले के  विरुद्ध की जाने वाली अपील का क्या हश्र होता है ये तो भविष्य बताएगा किंतु निचली अदालत के फैसले ने जहां सीबीआई और केंद्र सरकार को जबरदस्त झटका दिया है  वहीं आम आदमी पार्टी को खुलकर होली खेलने का अवसर प्रदान कर दिया।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 26 February 2026

हमास की मूर्खता से खून के आंसू पीने मजबूर हैं फिलीस्तीनी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे समय इजराइल  गए जब ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका से समूचा विश्व परेशान है। यदि डोनाल्ड ट्रम्प  ईरान के शासक खामेनेई को हटाने  के लिए सैन्य कार्रवाई करते हैं तो  वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल जाएगी। दरअसल इस्लामिक देशों में ईरान पर ही अमेरिका का बस नहीं चलता। ज्यादातर अरब देश  अमेरिकी प्रभाव में हैं । ईरान भी रूस और चीन के खुले समर्थन के कारण अमेरिका से ऐंठता है। हालांकि उसका अपना सैन्य सामर्थ्य भी बाकी अरब देशों की तुलना में अधिक है। इजराइल और हमास की जंग में जब इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए तब  उसने पलटवार करते हुए राजधानी सहित इजराइल के अनेक स्थानों पर मिसाइलों की बरसात कर दहशत फैला दी। उसी वजह से इजराइल भी युद्धविराम के लिए तैयार हुआ। हालांकि तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। ऐसे हालातों में श्री मोदी का तेल अवीव जाना बड़ी कूटनीतिक पहल है। हालांकि इसके पीछे  नए रक्षा सौदों को कारण माना जा रहा है किंतु इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ  करीबी रिश्ते होने से इस यात्रा में  भू - राजनीति की मौजूदा स्थिति और उसमें भारत की भूमिका पर भी चर्चा होगी। लेकिन भारत में कुछ लोगों को यह यात्रा नागवार गुजर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने तंज किया है कि इजराइल द्वारा फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे अत्याचार को नजरअंदाज कर श्री मोदी तेल अवीव जा रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने भी दौरे की आलोचना की। वहीं प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि वे इजराइली संसद को संबोधित करते समय फिलीस्तीन का मुद्दा उठाएं। उल्लेखनीय है कांग्रेस हमेशा से इजराइल के साथ प्रगाढ़ संबंध रखने के विरोध में रही है । ओवैसी का इजराइल विरोध भी स्वाभाविक है जिन्होंने लोकसभा की शपथ के बाद फिलीस्तीन के पक्ष में नारा लगाया था। इजराइल - हमास जंग के दौरान प्रियंका भी कंधे पर फिलीस्तीन लिखा झोला टांगकर संसद में नजर आई थीं। निःसंदेह मासूम बच्चों , महिलाओं और वृद्ध - लाचार लोगों पर हमले करना मानवीयता के विरुद्ध है। गाजा में  इजराइली हमलों के कारण  बिजली , पानी , दवाइयां, दूध - भोजन का अभाव होने से लाखों लोग अकल्पनीय यातनाएं झेलने बाध्य हुए। लेकिन संकट के उस दौर में इजिप्ट सहित पड़ोसी मुस्लिम देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं ताकि गाजा से शरणार्थी उनके यहां प्रवेश न कर पाएं। आज भारत में जो लोग मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए इजराइल की आलोचना करते हैं उनके मुंह से एक शब्द भी इजिप्ट के विरोध में नहीं सुनाई दिया। स्मरणीय है इजराइल के साथ जो समझौता यासर अराफात के समय हुआ उसमें गाजा और वेस्ट बैंक नामक फिलीस्तीन के दो हिस्से बने। इजराइल दोनों के बीच में हैं। गाजा को बिजली सहित अन्य जरूरी सुविधाएं वही प्रदान करता था। 2006 में हमास नामक इस्लामिक सैन्य संगठन ने गाजा की  सत्ता हथिया ली । ईरान सहित तमाम इजराइल विरोधी मुस्लिम देशों का समर्थन और संरक्षण मिलने से वह मजबूत होता गया। 7 अक्टूबर  2023 को अचानक हमास ने इजराइल पर ड्रोन के जरिए हमले किये और मिसाइलें भी बरसाईं जिससे सैकड़ों इजराइली मारे गए। हमास के लड़ाके इजराइल में घुसकर सैकड़ों लोगों को बंधक बनाकर ले गए। उसी के बाद नेतन्याहू ने आर - पार की जंग छेड़ने का ऐलान करते हुए हमास की कमर तोड़ने का अभियान शुरू किया। आज  फिलीस्तीनी जो भोग रहे हैं उसका कसूरवार  हमास तथा उसकी पीठ पर हाथ रखने वाला ईरान ही है।  सर्वविदित है कि ईरान ने हमास को इसके लिए उकसाया था क्योंकि कुछ  दिनों बाद  ही इजराइल और सऊदी अरब में ऐतिहासिक समझौता होने वाला था ।  ईरान  उसे रुकवाना चाहता था। इसलिए उसने हमास के कंधे का इस्तेमाल किया। इस प्रकार गाजा की बर्बादी और फिलीस्तीन के अस्तित्व पर नए खतरे का जिम्मेदार हमास है। इसलिए भारत में जो राजनीतिक दल फिलिस्तीनियों के लिए आंसू बहा रहे हैं उन्हें हमास की आलोचना करना चाहिए जिसने गाजावासियों को खून के आंसू पीने मजबूर कर दिया। अतीत को  किनारे कर दें तो गाजा में 7 अक्टूबर 2023 के बाद इजराइल ने जो किया वह हमास के पागलपन का दुष्परिणाम  था। ऐसे में इजराइल से पहले हमास को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन न तो ओवैसी ऐसा करेंगे और न ही कांग्रेस क्योंकि ऐसा करने से भारत के मुसलमान नाराज हो जाएंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 February 2026

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक


नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग ( NCERT)  की तरफ से कक्षा 8 के लिए सोशल साइंस की जो नई पुस्तक जारी की गई उसके एक अध्याय को लेकर खूब चर्चा हो रही है जिसमें भारतीय न्यायपालिका  की भूमिका के साथ ही इसमें भ्रष्टाचार की भी बात कही गई है। पुस्तक में लिखा गया है कि हमारी  न्यायिक व्यवस्था में अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। साथ ही यह भी बताया गया है कि  अदालतों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है उनमें भ्रष्टाचार भी एक है। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय से लेकर बाकी तमाम अदालतों में लंबित पड़े मामलों का भी जिक्र करते हुए इसे  बड़ी समस्या बताने  के अलावा लंबित  प्रकरणों के आंकड़े भी दिए  गए हैं। भ्रष्टाचार की बात को साबित करने के लिए पूर्व मुख्य  न्यायाधीश जस्टिस बी. आर गवई के एक बयान को  इस अध्याय में शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका के भीतर खामियों की बात कही थी। लेकिन आज इस अध्याय को लेकर नया विवाद उत्पन्न हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत से इसका का संज्ञान लेने का अनुरोध करते हुए कहा कि इससे न्यायपालिका की छवि खराब होगी। इस  पर प्रधान न्यायाधीश  ने कहा कि वह किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं देंगे। श्री सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें इस विषय पर कई फोन और संदेश मिले हैं और  पूरी तरह से मामले से अवगत हैं । उन्हें पता है कि इससे कैसे निपटना है। उन्होंने संकेत दिया कि यह एक सुनियोजित और सोची-समझी कोशिश लगती है वे इस पर अभी ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहते, लेकिन उचित कदम उठाए जाएंगे। अब चूंकि खुद मुख्य न्यायाधीश ने संज्ञान ले लिया है इसलिए माना जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय उक्त अध्याय को हटाने के लिए दबाव बनाया जाएगा और सरकार भी न्यायपालिका की नाराजगी से बचने के लिए उसके आदेश को शिरोधार्य कर लेगी। ये भी संभव है कि जिस विभाग ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे संवदेनशील विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने का दुस्साहस किया उसके दो - चार अधिकारियों पर गाज गिर जाए। न्यायपालिका से जुड़े संगठन भी वैसा ही बवाल मचा सकते हैं जैसा कि हाल ही में यूजीसी द्वारा जारी नियमावली के विरोध में देखने मिला था। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो न्यायापालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है। उसे विद्यालयीन छात्रों को पढ़ाए जाने के औचित्य पर सवाल उठ सकते हैं किंतु समय आ गया है जब इस बारे में राष्ट्रीय विमर्श हो। जो न्यायपालिका भ्रष्टाचार के दोषियों को दंड देती है यदि उसके दामन पर भी दाग लगने लगें तो समूची व्यवस्था के प्रति अविश्वास और नाराजगी उत्पन्न होगी ही। कुछ हद तक इसका एहसास होने भी लगा है। पुस्तक में जो सामग्री समाहित है उसकी समीक्षा कर आपत्ति जताने का न्यायपालिका को पूरा अधिकार है किंतु जितनी तत्परता इस मामले में दिग्गज अधिवक्ता और माननीय न्यायाधीश दिखा रहे हैं वैसी ही अन्य जरूरी मामलों में नजर क्यों नहीं आती उसका उत्तर कौन देगा? सही बात ये है कि भ्रष्टाचार गाजर घास की तरह राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है और न्यायपालिका भी  अछूती नहीं है। हालांकि आज भी न्यायाधीशों का बड़ा वर्ग अपनी कर्तव्यनिष्ठा के लिए विख्यात है किंतु सभी के बारे में ऐसी गारंटी नहीं ली जा सकती। भले ही ये बात अच्छी न लगे किंतु अधिवक्ता समुदाय भी इस पवित्र संस्था की छवि खराब करने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। त्वरित और सस्ते न्याय के आश्वासन केवल उपदेशों तक सीमित रह गए हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति के उपरांत उन्हें दिए जाने वाले पदों को लेकर तरह - तरह की चर्चाएं सुनाई देती हैं। बेहतर हो न्यायपालिका इन विषयों का संज्ञान लेकर जनमानस में अपनी छवि को सुधारने आगे आए क्योंकि विश्वास के बढ़ते संकट के बीच वही है जिससे कोई उम्मीद है वरना तो पूरे कुएं में भांग घुलने वाली स्थिति है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 February 2026

भ्रष्टाचार के बोझ से ढह रहे विकास रूपी पुल


म.प्र में जबलपुर - भोपाल हाइवे पर शहपुरा के निकट बना पुल गत दिवस ढह गया। इसका एक हिस्सा कुछ माह पहले क्षतिग्रस्त होने के कारण उसकी मरम्मत चल रही थी । लेकिन दो दिन पहले दूसरे हिस्से का भी वही हश्र हुआ। उस पुल के नीचे से रेल की पटरी गुजरती है। जिस समय पुल टूटा तब कोई रेलगाड़ी वहां से नहीं गुजरी अन्यथा बड़ी अनहोनी घट जाती। पुल ढहने की खबर फैलते ही शासन - प्रशासन हरकत में आया और ठेकेदार सहित निर्माण कार्य की देखरेख करने वाली  कंपनी को ब्लैक लिस्ट करने के अलावा अपराधिक प्रकरण दर्ज करवा दिया गया। लोक निर्माण मंत्री ने पुल निर्माण की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की पेंशन रोकने जैसी घोषणा भी कर डाली। इस मार्ग के यातायात को वैकल्पिक रास्तों पर मोड़ दिया गया। पुल को दोबारा उपयोग लायक बनाने में कितना समय लगेगा ये कहना कठिन है और तब तक जबलपुर से सड़क मार्ग जाने वाले वाहनों को अपेक्षाकृत कम बेहतर रास्तों से आवागमन करना होगा जिससे ज्यादा समय लगने के अलावा जाम की स्थिति भी बनना तय है जो पहले दिन से ही दिखाई देने लगी। जनता की मांग है कि इस हिस्से का टोल टैक्स तब तक न वसूला जाए जब तक पुल पर दोबारा यातायात शुरू न हो।  जाहिर है विपक्ष  प्रदेश सरकार को घेरेगा जो उसका अधिकार भी है और दायित्व भी। लोकनिर्माण मंत्री ने इसीलिए बिना देर लगाए हादसे के जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की पहल कर दी। सवाल ये है कि ऐसे  निर्माणों में इस तरह की लापरवाही और भ्रष्टाचार कब तक होता रहेगा? देश भर में आए दिन सड़क , पुल - पुलिया में घटिया निर्माण की बात सामने आती है। और फिर वैसा ही कर्मकांड होता है जैसा संदर्भित घटना के बाद देखने मिल रहा है। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है। हाइवे और एक्सप्रेस हाइवे के कारण सड़क मार्ग की यात्रा आरामदेह हो गई। परिणामस्वरूप देश के ऑटोमोबाइल उद्योग को भी पंख लग गए। फ्लाय ओवर और एलीवेटेड सड़कें बदलते भारत की तस्वीर पेश करते हैं। दो दिन पूर्व ही दिल्ली से मेरठ के बीच वंदे भारत प्रारंभ होने से ढाई - तीन घंटे की यात्रा एक घंटे में संभव हो गई। बुलेट ट्रेन शुरू होने का समय भी नजदीक आ रहा है। आधारभूत संरचना ( इंफ्रास्ट्रक्चर) पर विशेष ध्यान दिए जाने से देश का आत्मविश्वास बढ़ा है। लेकिन जिस एक बात की कमी खलती है वह है गुणवत्ता का अभाव। इसके पीछे केवल लापरवाही हो तो समझ में आता है किन्तु असली समस्या है भ्रष्टाचार । बिहार में तो एक पुल ऐसा भी है जो निर्माण के दौरान जितनी बार ढहा वह एक रिकॉर्ड है। गुजरात में भी एक नदी पर बने पुल का नवीनीकरण होने के बाद वह ढह गया जिससे दर्जनों लोग डूबकर मर गए। ऐसे जाने कितने हादसे यदा - कदा सुनने में आते हैं जिनमें जनहानि होने के बाद सरकार मुआवजा बांटकर दाएं - बाएं हो जाती है। जांच के दिखावे के बाद कुछ बलि के बकरे हलाल किए जाते हैं और फिर भ्रष्ट व्यवस्था अपनी गति से चल पड़ती है। यही वजह है कि विकास के ज्यादातर काम गुणवत्ता की कसौटी पर फिसड्डी साबित हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ठेकेदार , इंजीनियर , अधिकारी और नेताओं के इस अपवित्र गठबंधन से देश को आज़ादी कब मिलेगी ? जब हम विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का हौसला दिखा रहे हैं तब हमें ये भी देखना होगा कि वहां भ्रष्टाचार करने वाले को किस प्रकार का दंड दिया जाता है ? सबसे ज्यादा जीडीपी पर  अपनी पीठ ठोकने के साथ ही ये सोचने की भी जरूरत है कि कहीं वह भ्रष्टाचार  के बोझ तले दबकर न रह जाए। देश में सैकड़ों वर्ष पुराने  मंदिरों , किलों और महलों के अलावा पुल भी हैं । आजादी के पहले बने अनेक छोटे - छोटे बांध आज भी खड़े हैं। चूंकि निर्माण में ईमानदारी बरती गई थी इसलिए इनकी मजबूती आज  भी यथावत है। लेकिन स्वाधीन भारत में जो सरकारी निर्माण हुए उनमें कुछ अपवाद छोड़कर बाकी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है।  ये कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है कि  देश में भ्रष्टाचार और बेईमानी में वृद्धि की दर जीडीपी से कहीं ज्यादा है। जबलपुर के निकट ढहा पुल कहने को तो छोटा सा हादसा है क्योंकि उसमें कोई हताहत नहीं हुआ। लेकिन देखने वाली बात ये है कि वह पुल बहुत पुराना नहीं है। इस घटना के बाद पूरे प्रदेश से अनेक ऐसे पुलों की जानकारी आ रही है जो घटिया निर्माण के कारण कभी भी गिर सकते हैं। राज्य सरकार और संबंधित विभागों का ये दायित्व है कि उन सबकी फौरन जांच करवाकर जो भी उचित हो किया जावे जिससे आने वाले खतरे को समय रहते टाला जा सके। और ये भी कि इन सबके लिए जो भी दोषी हों उन्हें इतना कड़ा दंड मिले जिससे भ्रष्टाचार करने वालों का कलेजा कांपे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी