महाशिवरात्रि पर 45 दिनों से चले आ रहे महाकुंभ का विधिवत समापन हो गया। इस विराट आयोजन में 66 करोड़ श्रद्धालुओं द्वारा पवित्र संगम में स्नान कर आत्मिक शांति का अनुभव किया। इस अकल्पनीय मानवीय समागम में देश के सभी हिस्सों से हर वर्ग के लोगों ने अपनी भागीदारी दी। आर्थिक और सामाजिक ऊँच - नीच की विभाजन रेखा मिट गई और भारत की भौगोलिक के साथ ही सांस्कृतिक एकता के परिदृश्य ने दुनिया को चमत्कृत कर दिया। विदेशों में बसे लाखों भारतवंशियों के अलावा अन्य धर्मावलंबी विदेशी भी महाकुंभ में आकर भारतीय संस्कृति एवं सनातन के प्रति जन आस्था से प्रभावित हुए। अनेक विदेशियों ने विधिवत हिन्दू धर्म स्वीकार भी किया। समूचा आयोजन एक तरफ जहाँ अपनी विशालता के कारण प्रसिद्ध हुआ वहीं लोगों को आने - जाने में हुई तकलीफ की भी बहुत चर्चा हुई। मौनी अमावस्या पर हुई भगदड़ में दर्जनों लोगों के कुचलकर मारे जाने की घटना ने रंग में भंग जरूर किया जिसे लेकर उ.प्र सरकार को जबरदस्त आलोचना झेलनी पड़ी। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को प्रयागराज से कई किलोमीटर दूर रोके जाने पर भी नाराजगी देखी गई। सड़क मार्ग से महाकुंभ आने वाले वाहनों के जाम में फंसने के कारण नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली कहावत चरितार्थ हो गई। प्रयागराज में क्षमता से अधिक लोगों के जमा रहने से स्थानीय निवासियों को भी अभूतपूर्व परेशानियों का सामना करना पड़ा। स्नान हेतु श्रृद्धालुओं को 10 से 12 कि.मी की पदयात्रा करनी पड़ी जो बेहद कष्टदेह रही। अन्य राज्यों से आने वाले हजारों श्रृद्धालुओं को रास्तों के जाम अथवा रेलगाड़ी रद्द होने से बीच रास्ते लौटना पड़ा। कुछ को वैकल्पिक मार्ग से प्रयागराज आने के लिए दोगुनी दूरी भी तय करनी पड़ी। ठहरने के लिए कुंभ क्षेत्र में बनाई गई टेंट सिटी में पाँच सितारा होटल से लेकर अति साधारण व्यवस्था थी। शहर के तमाम होटल, गेस्ट हाउस, आश्रम, धर्मशालाएं तो ठसाठस भरे ही, लोगों ने अपने घरों में अस्थायी आवास बनाकर कमाई भी की। सबसे ज्यादा चर्चा में रहे मेला क्षेत्र में लोगों को लाने - ले जाने के लिए चलाई गईं मोटर साइकिलें और संगम स्नान करवाने के लिए चली नावों की , जिन्होंने शासन द्वारा निर्धारित दरों से कई गुना वसूली की। लेकिन इस सबसे आने वालों की संख्या पर कोई असर नहीं हुआ। वैसे जहाँ इतनी भीड़ एकत्र हो वहाँ मांग और पूर्ति का सिद्धांत लागू होता ही है जिससे जरूरी सेवाएं और चीजें महंगी हो जाती हैं। लेकिन निष्पक्ष मूल्यांकन करें तो यह महाकुंभ अपनी विराटता के साथ ही सफलता के लिए भी याद किया जाएगा। उ.प्र के मुख्यमंत्री ने कुल 40 करोड़ लोगों के आने का अनुमान लगाया था किंतु इससे लगभग 65 प्रतिशत ज्यादा लोगों ने आकर अनेक विश्व कीर्तिमान स्थापित कर दिये। उ.प्र और केंद्र सरकार ने इतने बड़े आयोजन को जिस कुशलता से संपन्न करवाया उसकी जितनी प्रशंसा करें कम है। यह महाकुंभ भविष्य के लिए बहुत सारे सबक भी छोड़ गया। सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक तौर पर तो इसकी सफलता का विश्लेषण होगा ही किंतु आर्थिक दृष्टि से भी महाकुंभ ने अकल्पनीय परिणाम दिये। लाखों लोगों को रोज़गार मिलने के साथ ही कारोबारियों को भी अनुमान से अधिक आय हुई। प्रयागराज के निवासियों को जो कष्ट हुआ वह अपनी जगह है किंतु महाकुंभ के कारण इस नगर की अर्थव्यवस्था में जो उछाल आया उसका असर आने वाले कई वर्षों तक देखने मिलता रहेगा। अयोध्या और वाराणसी में भी महाकुंभ के कारण जो अपार धनवर्षा हुई उसने राम मंदिर के निर्माण और काशी विश्वनाथ परिसर के उन्नयन को सार्थक साबित कर दिया। इस दिव्य और भव्य आयोजन की आलोचना करने वाले विघ्नसंतोषी भी कम नहीं थे। छोटी - छोटी सी बातों पर तिल का ताड़ बनाकर महाकुंभ को अव्यवस्थित और असफल बताकर श्रद्धालुओं को आने से रोकने का सुनियोजित प्रयास भी हुआ। ममता बैनर्जी ने तो इसे मौत का महाकुंभ तक कह दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने पिता स्व.मुलायम सिंह यादव की मूर्ति तो कुंभ में लगाई और संगम स्नान भी किया किंतु उन्हें इसकी सफलता हजम नहीं हुई। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के आने की तारीखें तो बताई जाती रहीं किंतु राम मंदिर के दर्शन नहीं करने की गलती उन्होंने महाकुंभ में न आकर भी दोहराई। सही बात ये है कि तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों को सनातन का यह ऐतिहासिक पुनर्जागरण बर्दाश्त नहीं हुआ । सही मायनों में महाकुंभ धार्मिक समागम से बढ़कर राष्ट्रीय एकता का उद्घोष बन गया। इसके माध्यम से करोड़ों सनातन धर्मियों ने पूरे विश्व को संदेश दे दिया कि भारत अपने गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए कमर कस चुका है। जिन लोगों को हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे शब्दों से चिढ़ है इस महाकुंभ ने उनके गाल पर जोरदार तमाचा मारा है। यदि इसके बाद भी वे सच्चाई को स्वीकार नहीं करते तो वह समय दूर नहीं जब सनातन का विरोध करने वाले जनता द्वारा पूर्णरूपेण तिरस्कृत कर दिये जाएंगे।
- रवीन्द्र वाजपेयी