Friday, 28 February 2025

महाकुंभ में दिखा सनातन का ऐतिहासिक पुनर्जागरण


महाशिवरात्रि पर 45 दिनों से चले आ रहे महाकुंभ का विधिवत समापन हो गया। इस विराट आयोजन में 66 करोड़ श्रद्धालुओं द्वारा  पवित्र संगम में स्नान कर आत्मिक शांति का अनुभव किया। इस अकल्पनीय मानवीय समागम में देश के सभी हिस्सों से हर वर्ग के लोगों ने अपनी भागीदारी दी। आर्थिक और सामाजिक ऊँच - नीच की विभाजन रेखा  मिट गई और भारत की भौगोलिक के साथ ही सांस्कृतिक एकता के परिदृश्य ने  दुनिया को चमत्कृत कर दिया। विदेशों में बसे लाखों भारतवंशियों के अलावा अन्य धर्मावलंबी विदेशी भी महाकुंभ में आकर भारतीय संस्कृति एवं सनातन के प्रति जन आस्था से प्रभावित हुए। अनेक विदेशियों ने विधिवत हिन्दू धर्म स्वीकार भी किया। समूचा आयोजन एक तरफ जहाँ अपनी विशालता के कारण प्रसिद्ध हुआ वहीं लोगों को आने - जाने में हुई तकलीफ की भी बहुत चर्चा हुई। मौनी  अमावस्या पर हुई भगदड़ में दर्जनों लोगों के कुचलकर मारे जाने की घटना ने रंग में भंग जरूर किया जिसे लेकर  उ.प्र सरकार को जबरदस्त आलोचना झेलनी पड़ी। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को प्रयागराज से कई किलोमीटर दूर रोके जाने पर भी  नाराजगी देखी  गई। सड़क मार्ग से महाकुंभ आने वाले वाहनों के जाम में फंसने के कारण नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली कहावत चरितार्थ हो गई। प्रयागराज में क्षमता से अधिक लोगों के जमा रहने से स्थानीय निवासियों को भी अभूतपूर्व परेशानियों का सामना करना पड़ा।    स्नान हेतु श्रृद्धालुओं को 10 से 12 कि.मी  की पदयात्रा करनी पड़ी जो बेहद कष्टदेह रही। अन्य राज्यों से आने वाले हजारों श्रृद्धालुओं को रास्तों के जाम अथवा रेलगाड़ी रद्द होने से बीच रास्ते लौटना पड़ा। कुछ को वैकल्पिक मार्ग से प्रयागराज आने के लिए दोगुनी दूरी भी तय करनी पड़ी। ठहरने के लिए कुंभ क्षेत्र में बनाई गई टेंट सिटी में पाँच सितारा होटल से लेकर अति साधारण व्यवस्था थी।  शहर के तमाम होटल, गेस्ट हाउस, आश्रम, धर्मशालाएं तो ठसाठस भरे ही, लोगों ने अपने घरों में अस्थायी आवास बनाकर कमाई भी की। सबसे ज्यादा चर्चा में रहे मेला क्षेत्र में लोगों को लाने - ले जाने के लिए चलाई गईं मोटर साइकिलें और संगम स्नान करवाने के लिए चली नावों की , जिन्होंने शासन द्वारा निर्धारित दरों से कई गुना वसूली  की। लेकिन इस सबसे आने वालों की संख्या पर कोई असर नहीं हुआ। वैसे जहाँ इतनी  भीड़ एकत्र हो वहाँ मांग और पूर्ति का सिद्धांत लागू होता ही है जिससे  जरूरी सेवाएं और चीजें महंगी हो जाती हैं। लेकिन निष्पक्ष मूल्यांकन करें तो यह महाकुंभ अपनी विराटता के साथ ही सफलता के लिए भी याद किया जाएगा। उ.प्र के मुख्यमंत्री ने कुल 40 करोड़ लोगों के आने का अनुमान लगाया था किंतु इससे लगभग 65 प्रतिशत ज्यादा लोगों ने  आकर अनेक विश्व कीर्तिमान स्थापित कर दिये। उ.प्र और केंद्र सरकार ने इतने बड़े आयोजन को जिस कुशलता से संपन्न करवाया उसकी जितनी प्रशंसा करें कम है। यह महाकुंभ भविष्य के लिए बहुत सारे सबक भी छोड़ गया। सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक तौर पर तो इसकी सफलता का विश्लेषण होगा ही किंतु आर्थिक दृष्टि से भी महाकुंभ ने अकल्पनीय परिणाम दिये। लाखों लोगों को रोज़गार मिलने के साथ ही कारोबारियों को भी अनुमान से अधिक आय हुई। प्रयागराज के निवासियों को जो कष्ट हुआ वह अपनी जगह है किंतु महाकुंभ के कारण इस नगर की अर्थव्यवस्था में जो उछाल आया उसका असर आने वाले कई वर्षों तक देखने मिलता रहेगा। अयोध्या और वाराणसी में भी महाकुंभ के कारण जो अपार धनवर्षा हुई  उसने राम मंदिर के निर्माण और काशी विश्वनाथ  परिसर के उन्नयन को सार्थक साबित कर दिया। इस दिव्य और भव्य आयोजन की आलोचना करने वाले विघ्नसंतोषी भी कम नहीं थे। छोटी - छोटी सी बातों पर तिल का ताड़ बनाकर महाकुंभ को अव्यवस्थित और  असफल बताकर श्रद्धालुओं को आने से रोकने का सुनियोजित प्रयास भी हुआ। ममता बैनर्जी ने तो इसे मौत का महाकुंभ तक कह दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने पिता  स्व.मुलायम सिंह यादव की मूर्ति तो कुंभ में लगाई और  संगम स्नान भी किया किंतु उन्हें इसकी सफलता हजम नहीं हुई। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के आने की तारीखें तो बताई जाती रहीं किंतु राम मंदिर के दर्शन नहीं करने की गलती उन्होंने महाकुंभ में न आकर भी दोहराई। सही बात ये है कि तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों को सनातन का यह ऐतिहासिक पुनर्जागरण बर्दाश्त नहीं हुआ । सही मायनों में महाकुंभ  धार्मिक समागम से बढ़कर राष्ट्रीय एकता का उद्घोष बन गया। इसके माध्यम से करोड़ों सनातन धर्मियों ने पूरे विश्व को संदेश दे दिया कि भारत अपने गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए कमर कस चुका है। जिन लोगों को हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे शब्दों से चिढ़ है इस महाकुंभ ने उनके गाल पर जोरदार तमाचा मारा है। यदि इसके बाद भी वे सच्चाई को स्वीकार नहीं करते तो वह समय दूर नहीं जब सनातन का विरोध करने वाले जनता द्वारा पूर्णरूपेण तिरस्कृत कर दिये जाएंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 February 2025

तीन राज्यों में हार के बाद कांग्रेस सौदेबाजी की हैसियत खो बैठी


लोकसभा चुनाव में भाजपा का 400 पार वाला नारा  कारगर नहीं रहा वहीं कांग्रेस 99 के तक पहुंचकर मुख्य विपक्षी दल की बन गई । हालांकि नरेंद्र मोदी के तीसरी बार  प्रधानमंत्री बनने में कोई अड़चन नहीं आई किंतु चर्चा का केंद्र  राहुल गाँधी बने जो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में विपक्ष का चेहरा बनकर उभरे। कांग्रेस की सीटें  दो गुनी होने से इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी को पसंद नहीं करने वाले भी उनके प्रभाव को स्वीकार करने लगे। लोकसभा और उसके बाहर श्री गाँधी के तेवर देखने से ये लगने लगा कि वे इस बार  एक परिपक्व नेता के रूप में सामने आयेंगे। लेकिन ये आशावाद ज्यादा दिन नहीं टिक सका। जम्मू कश्मीर  के चुनावों में कांग्रेस के सहयोगी  उमर अब्दुल्ला ने तो श्री गाँधी पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए सलाह दी कि वे बजाय घाटी में घूमने के जम्मू अंचल की उन सीटों पर ध्यान दें जो कांग्रेस को आवंटित थीं। उमर की चिंता सही निकली क्योंकि कांग्रेस समझौते में मिली अधिकांश सीटों पर हार गई। उसी के साथ हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भाजपा से सत्ता छीन लेने के प्रति आश्वस्त थी। लेकिन  भाजपा तीसरी मर्तबा भी सरकार बनाने में कामयाब रही। इसी के साथ राहुल के विरुद्ध इंडिया गठबंधन में आवाजें उठने लगीं और सहयोगी दल ये कहते हुए सुने गए कि कांग्रेस अकेले दम पर भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकती।  महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उद्धव ठाकरे और शरद पवार को भरपूर सीटें देकर संतुष्ट करना चाहा किन्तु यहाँ भी भाजपा ने विपक्ष का सफाया कर दिया। कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया। महाराष्ट्र जीतने के बाद भाजपा तो लोकसभा चुनाव के झटके से उबर कर नये आत्मविश्वास से भर उठी किंतु राहुल और कांग्रेस 4 जून से पहले वाली स्थिति में जा पहुँचे।  ममता बैनर्जी ने इंडिया गठबंधन के नेतृत्व में बदलाव की माँग कर खुद नेता बनने की पहल की  जिसे अखिलेश यादव , उद्धव ठाकरे और दबी जुबान तेजस्वी यादव का भी समर्थन मिला। उमर अब्दुल्ला ने तो  गठबंधन को ही खत्म कर देने की बात कह डाली। लोकसभा चुनाव के बाद उसकी बैठक नहीं होने पर ये भी कहा गया कि वह केवल लोकसभा चुनाव तक था। इसी बीच दिल्ली विधानसभा के चुनाव आ गए जिसमें आम आदमी पार्टी और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतर गए जबकि लोकसभा चुनाव में दोनों ने सीटों का बंटवारा किया था। इंडिया गठबंधन में बिखराव खुलकर उस समय सामने आ गया जब तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने आम आदमी पार्टी के समर्थन  की घोषणा कर दी।  दरअसल ये राहुल के प्रति इंडिया गठबंधन में विद्रोह का खुला ऐलान था। चुनाव परिणाम आम आदमी पार्टी के लिए तो निराशाजनक रहे ही किंतु कांग्रेस के लिए तो शर्मिंदगी लेकर आये जो लगातार तीसरी बार शून्य पर ही अटकी रह गई।  इसी साल बिहार में भी चुनाव होने वाले हैं जिसमें कांग्रेस और तेजस्वी के बीच गठबंधन  की संभावना तो है किंतु तीन राज्यों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद कांग्रेस  सौदेबाजी की हैसियत गँवा बैठी है ।  दिल्ली में भले ही भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करवाकर कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी की पराजय में सहभागी बनकर हरियाणा का बदला ले लिया हो किंतु उसकी खुद शर्मनाक स्थिति से नहीं उबर सकी। इसके कारण राहुल गाँधी के प्रति पार्टी के भीतर भी असंतोष है। जिसका पहला संकेत मिला पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री शशि थरूर की नाराजगी से जिन्होंने श्री गाँधी से मिलकर ये शिकायत की कि उनका समुचित उपयोग नहीं किया जा रहा। उनको इस बात से खुन्नस है कि लोकसभा में पार्टी का पक्ष रखने के लिए उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया जाता। लेकिन राहुल ने उन्हें कोई आश्वासन नहीं दिया जिसके बाद श्री थरूर  के पार्टी छोड़ने की अटकलें तेज हो गईं। स्मरणीय है श्री गाँधी का रूखा व्यवहार अनेक नेताओं को पार्टी छोड़ने बाध्य कर चुका है । शशि थरूर भले ही बड़ा जनाधार न रखते हों किंतु पार्टी के सबसे शिक्षित नेताओं में उनका स्थान है जो देश और दुनिया के मुद्दों पर अच्छी जानकारी रखते हैं। लगता है श्री गाँधी को इस तरह के लोगों से इस बात का भय लगता है कि कहीं ये लोग उनके लिए चुनौती न बन जाएं। पता नहीं पार्टी में ऐसे विषयों पर विचार करने की चिंता किसी को है या नहीं ? सोनिया गाँधी बीमारी के कारण सक्रिय नहीं हैं और प्रियंका वाड्रा के लिए राजनीति शौक पूरा करने जैसा है। रही बात राहुल की तो वे अपनी खुद की दिशा आज तक तय नहीं कर पाए । लोकसभा चुनाव में मिली सफलता से वे जिस आत्ममुग्धता का शिकार हो गए वह कांग्रेस के लिए  घातक साबित हो रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 February 2025

म.प्र के लिए विकसित राज्य बनने का स्वर्णिम अवसर


म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रयासों से भोपाल में आयोजित ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट के  पहले दिन निवेशकों ने जो उत्साह प्रदर्शित किया वह प्रदेश के प्रति बढ़ते विश्वास का जीवंत प्रमाण है। कुछ लोग तंज कस रहे हैं कि  अतीत में हुए निवेशक सम्मेलनों में की गई  घोषणाएं जमीन पर नहीं उतर सकीं। ऐसे में इस आयोजन से भी आसमानी उम्मीदें करना बेमानी है। विपक्षी नेताओं ने भी जो प्रतिक्रियाएं दीं वे निराशाजनक ही हैं। उनका ऐसा सोचना स्वाभाविक भी है क्योंकि कांग्रेस राज में म.प्र के आर्थिक विकास के प्रति जो लापरवाही बरती गई उसने इस संभावना भरे राज्य को विकास की दौड़ में बहुत पीछे धकेल दिया। हालांकि गैर कांग्रेसी पार्टियां भी सत्ता में आईं किंतु  उनका कार्यकाल राजनीतिक अनिश्चितता के कारण संक्षिप्त रहा। म.प्र के विभाजन  के पश्चात छत्तीसगढ़ के अलग होने से काफी संसाधन वहाँ चले गए। ऐसे में शेष बचे हुए हिस्से में विकास की जो कार्य योजना बनाई जानी थी वह नहीं बनी। उसके पीछे जो भी कारण रहे हों किंतु उसका दुष्परिणाम प्रदेश को पिछड़ेपन के रूप में भुगतना पड़ा। 1993 से 2003 तक दिग्विजय सिंह के शासनकाल में म.प्र जिस दुर्दशा का शिकार हुआ वह  याद करने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बिजली, सड़क और पानी जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए लोग तरस गए। कभी दूसरे राज्यों को बिजली की आपूर्ति करने  वाला प्रदेश अंधेरे में डूबने मजबूर हो गया। सड़कों की जर्जर हालत ने प्रदेश की छवि पूरे देश में खराब कर रखी थी। दिग्विजय सिंह के सत्ता से हटने के बाद से 15 माह के कमलनाथ के शासन को छोड़ दें तो भाजपा ही सत्ता में है। लेकिन 2004 से  केंद्र में 10 साल तक मनमोहन सरकार रही जिसके साथ राजनीतिक तालमेल नहीं बैठने के कारण विकास अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका । बावजूद उसके बिजली और सड़क की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार होने के साथ ही सामाजिक कल्याण की अनेक योजनाओं के कारण म.प्र की चर्चा देश भर में होने लगी। अन्य राज्य सरकारों ने भी उनको अपनाया। लेकिन औद्योगिक विकास के लिये आवश्यक निवेश के मामले में तेजी आई 2014 में नरेंद्र मोदी की  सरकार बनने के बाद। बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने आर्थिक विकास को राजनीति से ऊपर प्राथमिकता दी जिसके अनुकूल परिणाम अब जाकर दिखने लगे। 2018 में सवा साल के लिए कांग्रेस सरकार रहने के बाद भाजपा सत्ता में लौट तो आई परंतु उसके साथ ही कोरोना महामारी ने विकास प्रक्रिया पर  विराम लगा दिया । कोरोना का दूसरा दौर खत्म होते तक विधानसभा चुनाव की सरगर्मी शुरू हो गई । यद्यपि उसमें भाजपा को प्रचण्ड बहुमत मिला किंतु छह माह बाद लोकसभा चुनाव के कारण आर्थिक विकास की रूपरेखा बनाने में विलम्ब हुआ। गत वर्ष मई में मोदी सरकार की तीसरी पारी शुरू होते ही मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रदेश में औद्योगिक विकास हेतु निवेश आमंत्रित करने  जो प्रयास प्रारंभ किये उन्हें केंद्र सरकार ने प्रोत्साहित किया । प्रधानमंत्री का इस ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट में आना उसका प्रमाण है। पहले दिन निवेशकों ने जो घोषणाएं कीं  वे इस राज्य की तस्वीर और तकदीर बदलने में सक्षम हैं। अब यह सरकार में बैठे राजनेताओं और उनके मातहत कार्यरत नौकरशाही का दायित्व है कि वे निवेश प्रस्तावों को कार्य रूप में बदलने का रास्ता तैयार करें। वैसे प्रधानमंत्री की मौजूदगी में दिये गए आश्वसानों से मुकरने का साहस शायद ही कोई उद्योगपति कर सकेगा। लेकिन मुख्यमंत्री ने इस समिट के आयोजन के लिए जितना परिश्रम किया उसे  जारी रखना होगा। म.प्र बीमारू राज्य की अपमानजनक स्थिति से तो बीते 20 साल में बाहर आ चुका है किंतु अब उसे विकसित राज्य का गौरव हासिल करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। इस दो दिवसीय निवेशक सम्मेलन ने युवाओं के मन में भी ये उम्मीद जगाई है कि उनको रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना होगा। औद्योगिक विकास की गतिविधियों में तेजी आते ही व्यापारिक जगत में भी उत्साह का संचार होगा। राजनीतिक स्थिरता के साथ ही केंद्र में सहयोगी सरकार के होने से सोने में सुहागा वाली स्थिति उत्पन्न हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. सुंदरलाल पटवा म.प्र को सोया हुआ देवता कहते थे। ऐसा लगता है वह नींद से जाग उठा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 February 2025

म.प्र के विकास में मील का पत्थर साबित होगा यह निवेशक सम्मेलन


म.प्र की राजधानी भोपाल में आज से  शुरू हुए ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट के पूर्व बीते कुछ महीनों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जो परिश्रम किया उसका प्रतिफल इस निवेशक सम्मेलन में परिलक्षित हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसके उद्घाटन सत्र  में उपस्थिति का जबरदस्त  सांकेतिक महत्व है क्योंकि गुजरात के मुख्यमन्त्री रहते हुए उन्होंने वायब्रेंट गुजरात नामक जो निवेशक सम्मेलन आयोजित किये उनके चमत्कारिक सुपरिणाम देखने मिले। श्री मोदी की विकासमूलक सोच का ही परिणाम था जो उनके कार्यकाल में गुजरात ने औद्योगिक क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की। उनकी व्यापक सोच का ही प्रमाण है कि मुख्यमंत्री रहते हुए ही उन्होंने गुजरात में विदेशी निवेश आमंत्रित करने के लिए जापान और चीन जैसे देशों का भ्रमण तो किया ही अमेरिका, कैनेडा  द. अफ्रीका और ब्रिटेन में बसे गुजराती मूल के प्रवासी भारतवंशियों को भी अपने पूर्वजों की धरती के विकास हेतु आमंत्रित किया। मोदी जी की उस दूरगामी सोच ने ही उन्हें विकास का पर्यायवाची बना दिया। यही वजह है कि 2014 में जब वे प्रधानमंत्री बने तो पूरी दुनिया के निवेशक भारत में पूंजी लगाने उत्साहित हुए। वार्षिक विकास दर वृद्धि के मामले में चीन को पीछे छोड़कर भारत ने दुनिया के विकसित देशों के साथ बैठने की जो हैसियत अर्जित की उसका श्रेय प्रधानमंत्री की विकास केंद्रित नीतियां और उन्हें लागू करने की प्रतिबद्धता ही है। ये संतोष का विषय है कि म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भी श्री मोदी की कार्यशैली को अपनाते हुए प्रदेश को आर्थिक दृष्टि से विकसित करने का संकल्प लेकर  प्रयासों की पराकाष्ठा को मूर्तरूप प्रदान किया। मुख्यमंत्री का पदभार संभालते ही डॉ. यादव ने प्रदेश के सभी अंचलों में निवेश आमन्त्रित करने हेतु ठोस कार्ययोजना तैयार की और छोटे - छोटे निवेशक सम्मेलन आयोजित करते हुए प्रदेश में विकास की संभावनाओं और अनुकूल परिस्थितियों को देश और दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। आज से जो ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट प्रारंभ हुई ये उन्हीं प्रारंभिक तैयारियों का प्रतिफल है। जो लोग इसे धन का अपव्यय बताकर आलोचना कर रहे हैं वे दरअसल कुंठित मानसिकता के शिकार हैं। उन्हें ये ध्यान रखना चाहिए कि मौजूदा दौर मार्केटिंग का है। कहने का आशय ये है कि म.प्र में विकास के लिए जरूरी तमाम मूलभूत चीजें उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए पर्याप्त बिजली, जल स्रोत, उपजाऊ कृषि भूमि, अपार वन और खनिज संपदा, सन्तुलित मौसम, शानदार सड़क नेटवर्क, देश के सभी हिस्सों से बेहतर  रेल और हवाई संपर्क, सस्ता और पर्याप्त मानव संसाधन, संतोषजनक कानून व्यवस्था, बाहरी लोगों को समाहित करने की विलक्षण प्रवृत्ति आदि के कारण देश का यह हृदय प्रदेश औद्योगिक विकास के साथ ही व्यवसाय के लिए हर दृष्टि से आदर्श और अनुकूल है। पर्यटन उद्योग में भी यहाँ असीम अवसर हैं। आधा दर्जन से अधिक  राष्ट्रीय उद्यान प्रतिवर्ष लाखों घरेलू और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। धर्म और आध्यात्म में रुचि रखने वालों के लिए उज्जैन, ओंकारेश्वर और  अमरकंटक जैसे पवित्र स्थल हैं। पचमढ़ी जैसा हिल स्टेशन भी पूरे देश में प्रसिद्ध है। नर्मदा रूपी सदानीरा पवित्र नदी अपने आप में एक आकर्षण है। लाखों आस्थावान व्यक्ति इसकी  परिक्रमा  करते हैं। कुल मिलाकर यह प्रदेश आर्थिक विकास की ऊँची छलांग लगाने में पूर्णरूपेण सक्षम है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के प्रयासों से आयोजित यह ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट म.प्र में निवेश के फायदों को तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होगा ये विश्वास किया जा सकता है। 2003 में दिग्विजय सिंह को जब जनता ने सत्ता से हटाया था तब इस प्रदेश के माथे पर बीमारू राज्य का कलंक लगा हुआ था। लेकिन अब यह प्रदेश विकास की दौड़ में आगे निकलने के लिए प्रतिबद्ध है। यह निवेशक सम्मेलन उस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा इसमें कोई संदेह नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी
     

Saturday, 22 February 2025

सत्ता बदलने आये डॉलर किसे मिले इसका खुलासा होना चाहिये


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ताबड़तोड़  फैसलों से पूरी दुनिया में खलबली है। विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में लिए गए निर्णयों से वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही है। आयात शुल्क में वृद्धि संबंधी उनके फैसलों से वे सभी देश परेशान  हैं जिनका सामान वहाँ निर्यात होता है। सैन्य मोर्चे पर भी ट्रम्प यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक सहायता देने से पीछे हट रहे हैं। यूक्रेन  के राष्ट्रपति जेलेन्स्की का उन्होंने जिस तरह मजाक उड़ाया वह काफी कुछ कह गया । अमेरिका में अवैध रूप से  रह रहे प्रवासियों को वापस भेजने की उनकी नीति भी चर्चा में है।  उनके फैसलों का भारत पर भी असर पड़ रहा है। आयात शुल्क बढ़ाये जाने के अलावा गैर कानूनी ढंग से अमेरिका में घुसे प्रवासियों को भारत भेजने को लेकर रिश्तों में खटास पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।  इस सबके बीच ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत में मतदान बढ़ाने दिये गए फंड को रोकने के निर्णय ने  हलचल मचा दी। खुद  ट्रम्प ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि बाइडेन के कार्यकाल में  भारत के  लोकसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन हेतु बड़ी राशि भेजी गई। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि बांग्ला देश में शेख हसीना को सत्ता से हटाने हुए छात्र आंदोलन के पीछे अमेरिका का ही हाथ था। वहाँ बनी अंतरिम सरकार के संयोजक यूनुस अमेरिका में ही निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे जो हसीना का तख्ता पलट होते ही ढाका लौट आये। बाइडेन द्वारा भारत विरोधी इस सरकार को भारी - भरकम आर्थिक सहायता देने का निर्णय किया था जिसे ट्रम्प ने रद्द कर दिया। लेकिन भारत में मतदान बढ़ाने हेतु करोड़ों रुपये भेजे जाने और तत्कालीन सत्ता को बदलने जैसे खुलासे के बाद  ये बात भी सामने आई है कि अमेरिका से विभिन्न सामाजिक कार्यों के लिए अनेक भारतीय एन .जी.ओ को धन मिलता रहा। सर्वविदित है कि अमेरिका दुनिया के अनेक देशों में अपने आर्थिक और सामरिक हितों के अनुकूल सत्ता बनवाने प्रयासरत रहता है। भारत में भी  विभिन्न संगठन अमेरिकी डॉलर रूपी मलाई खाते रहे हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित संस्थानों के संचालन में भी विदेशी धन का इस्तेमाल किसी से छिपा नहीं है।  लेकिन मतदान बढ़ाकर सत्ता बदलने जैसी बात पहली बार सामने आई। ट्रम्प ने इसका ब्यौरा देने की बात भी कही। इधर भारत में इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस में आरोप - प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। केंद्र सरकार ने इस बात की जाँच करने की बात कही है कि सत्ता परिवर्तन के लिए आया धन किसकी जेब में गया? ये भी समझा जा सकता है कि सत्ता में नरेंद्र मोदी ही थे इसलिए अमेरिका द्वारा भेजे गए डॉलर उन्हें बेदखल करने ही आये होंगे और वैसा होने पर कौन लाभान्वित होता ये अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।   लेकिन बाइडेन वैसा क्यों चाह रहे थे इसका कारण तलाशने पर यही समझ में आता है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में भारत ने अमेरिका के दबाव में आकर रूस की आर्थिक नाकेबंदी से इंकार कर दिया। रूस कच्चे तेल का प्रमुख उत्पादक है। ऐसे में भारत ने उससे जमकर तेल की खरीदी की । चीन ने भी वही नीति अपनाई। सं. रा. संघ में  रूस विरोधी जितने भी प्रस्ताव आये उन पर भी भारत तटस्थ रहा। उसी से नाराज होकर बाइडेन ने अपने  करीबी जॉर्ज सोरेस के जरिये लोकसभा चुनाव में मोदी विरोधी अभियान को जमकर हवा दी। विदेशों में बैठे कुछ यू ट्यूबर और सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों पर भाजपा विरोधी वातावरण बनाने का सुनियोजित प्रयास जिस तरह चला वह सर्वविदित है। प्रधानमंत्री अपनी सभाओं में खुलकर इस बात की आशंका जताते रहे  ।  उस समय तो उनकी विरोधी लॉबी उसे चुनावी पैंतरा बताकर हवा में उड़ाती रही किंतु ट्रम्प द्वारा  खुलासे के बाद शक की गुंजाइश नहीं बची। इस बात की सघन जाँच होनी चाहिए कि बाइडेन प्रशासन ने भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए यदि धन भेजा तो वह किसे मिला तथा उसका उपयोग कहाँ और कैसे हुआ ? चुनाव के पहले के एक दो सालों में केंद्र सरकार के विरोध में विभिन्न प्रकार के जो लंबे आंदोलन हुए उनके पीछे विदेशी हाथ होने की आशंका व्यक्त की जाती रही। उन आंदोलनों को ब्रिटेन, कैनेडा और अमेरिका में जिस प्रकार से समर्थन मिला वह भी चौंकाने वाला था। अब चूंकि अमेरिका के राष्ट्रपति ने ही विदेशी सहायता की बात स्वीकार कर ली तब भारत की जाँच एजेंसियों को उन तत्वों का पता लगाना चाहिए जो विदेशी ताकतों के पालतू बनकर देश में राजनीतिक अस्थिरता के जरिये अराजकता फैलाने पर आमादा हैं। ये मुद्दा अंततः  देश की सुरक्षा और सर्वभौमिकता से जुड़ा है जिसे खतरे में डालने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 21 February 2025

लोकपाल प्रधानमंत्री की जांच कर सकता है किंतु न्यायाधीश की नहीं


भ्रष्टाचार के विरुद्ध लोकपाल की नियुक्ति के लिए लंबे समय तक आंदोलन हुए। 2013 में इसका अधिनियम पारित हुआ किंतु पहले लोकपाल की नियुक्ति 2019 में की गई। लोकायुक्त की तरह ही लोकपाल के पास भ्रष्टाचार, कुशासन, और अनुचित लाभ पहुंचाने से जुड़े मामलों की जांच करने का अधिकार है जिसके अंतर्गत वह केंद्र सरकार के अधिकारियों के अलावा, प्रधानमंत्री और सांसदों के ख़िलाफ़ भी जांच कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश को लोकपाल बनाया जाता है। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने लोकपाल द्वारा उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश और अति. न्यायाधीश की जांच पर रोक लगाते हुए इसे हैरानी भरा बताया। 27 जनवरी को लोकपाल ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को लोकसेवक मानते हुए  लोकपाल और लोकायुक्त अघि. 2013 के अंतर्गत उनकी जाँच को अपने क्षेत्राधिकार में माना जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर  रोक लगाते हुए इसे न्याय पालिका की स्वतंत्रता पर खतरा बताकर केंद्र सरकार और लोकपाल के पंजीयक को नोटिस जारी कर दिया। उधर लोकपाल ने भी जाँच स्थगित कर मुख्य न्यायाधीश से मार्गदर्शन मांग लिया।  रोचक बात ये है कि  जिनकी जाँच होनी है वे  उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं, जिन्होंने जाँच का आदेश दिया वे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं और जिन्होंने लोकपाल के निर्णय पर स्थगन जारी किया वे सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश हैं। इससे आगे बढ़ें तो लोकपाल ने इस बारे में जिनसे मार्गदर्शन मांगा वे देश के मुख्य न्यायाधीश हैं। इस प्रकार प्रकरण न्यायाधीश विरुद्ध न्यायाधीश बन गया। मुख्य न्यायाधीश इस संबंध में क्या व्यवस्था देंगे ये कह पाना कठिन है किंतु इस विवाद से ये प्रश्न खड़ा हुआ है  कि न्यायाधीश पद पर विराजमान व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उसकी जांच लोकपाल क्यों नहीं कर  सकता ? सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ने की जो चिंता व्यक्त की वह अपनी जगह वाजिब है। कोई भी समझदार व्यक्ति ये नहीं चाहेगा कि न्याय प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार की बन्दिश लगाई  जाए। स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की मौलिक आवश्यकता है। आजादी के बाद से उसने अनेक ऐसे फैसले दिये जिसने सत्ता को हिला दिया। 12 जून 1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का लोकसभा के लिए निर्वाचन अवैध घोषित करने जैसा निर्णय सुनाकर भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता को विश्वव्यापी ख्याति दिलाई थी। अनेक राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसलों को भी अदालतों ने रद्द किया। यहाँ तक कि संसद और विभिन्न विधानसभाओं द्वारा पारित अनेक कानून भी न्यायालयों द्वारा रद्द हुए। सत्ता में बैठे अनेक लोगों को अदालती फैसले के कारण गद्दी छोड़ना पड़ी। कुछ तो जेल भी गए। कई उद्योगपतियों को भी न्यायपालिका ने जेल की हवा खाने मजबूर किया। वहीं संसद द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए  एकमतेन पारित न्यायिक नियुक्ति आयोग को भी सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द करते हुए कालेजियम व्यवस्था को जारी रखा। इलेक्टोरल बॉण्ड संबंधी उसके फैसले ने राजनीतिक हलचल मचा दी थी। वहीं तीन तलाक़ और राम जन्मभूमि संबंधी निर्णयों ने नया इतिहास रच दिया। लेकिन देखने में आया है कि न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता के नाम पर अक्सर हदें पार कर जाती है ।  न्यायपालिका के पास प्रधानमंत्री के विरुद्ध शिकायतें सुनने का अधिकार है किंतु उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध गंभीर आरोपों के बावजूद उन्हें हटाना कितना कठिन है ये अनेक मामलों में जाहिर हो चुका है। महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के दौरान पीठासीन न्यायाधीश जो व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हैं उस पर कई बार वरिष्ट अधिवक्ताओं द्वारा ऐतराज जताया जा चुका है। कभी - कभी न्यायाधीश जो बातें कहते हैं उसका उल्लेख निर्णय में नहीं किया जाता। न्यायाधीशों की नियुक्ति में परिवारवाद का बोलबाला और पारदर्शिता का अभाव भी आलोचना के घेरे में रहा है किंतु न्यायापालिका इस बारे में कुछ भी सुनने तैयार नहीं होती। ऐसे में लोकपाल द्वारा न्यायाधीशों को लोकसेवक मानकर उनकी जाँच  पर रोक लगाए जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। संसद से पारित कानून द्वारा बनाया गया लोकपाल प्रधानमंत्री की जाँच कर सकता है किंतु उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नहीं, ये विचित्र स्थिति है। सर्वोच्च न्यायालय को इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता का खतरा नजर आया तो वह उसका दृष्टिकोण है किंतु न्यायपालिका की स्वतंत्रता कहीं स्वछंदता में न बदल जाए इसकी चिंता भी की जानी चाहिए। हाल ही में सेवा निवृत हुए मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ ने न्याय की देवी की जो नई प्रतिमा बनवाई  उसकी आँख से पट्टी हटा ली गई और हाथ में तलवार के स्थान पर संविधान है। काश, उनकी बिरादरी में बैठे मान्यवर इस संकेत को समझ सकें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 February 2025

भाजपा की दूरगामी रणनीति का हिस्सा हैं रेखा गुप्ता


दिल्ली में रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने एक साथ कई लक्ष्य साधे हैं। ये कहना गलत नहीं होगा कि छात्र राजनीति से होते हुए मुख्यमंत्री तक का उनका सफर उन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता के बल पर प्राप्त किया । मध्यमवर्गीय परिवार में पली - बढ़ी श्रीमती गुप्ता ने अभाविप पैनल से दिल्ली  वि.वि छात्र संघ  सचिव का चुनाव जीतकर अपनी छाप छोड़ी। उसी चुनाव में अलका लांबा अध्यक्ष निर्वाचित हुईं जो कांग्रेस के छात्र संगठन की थीं। वे बाद में आम आदमी पार्टी में शामिल हो गईं थीं किंतु फिर कांग्रेस में लौटकर पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी के विरुद्ध लड़कर जमानत गँवा बैठीं । वहीं दो विधानसभा चुनाव हार चुकीं रेखा ने  बड़े अंतर से जीत हासिल की। इसके पहले वे पार्षद और महापौर भी रह चुकी हैं। भाजपा के महिला मोर्चे में भी वे राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं। कहा जा रहा है उनके चयन में रास्वसंघ ने निर्णायक भूमिका निभाई वरना अरविंद केजरीवाल को हराने वाले प्रवेश वर्मा और दिल्ली भाजपा के दिग्गज बृजेन्द्र गुप्ता मुख्यमंत्री बनने के प्रबल दावेदार थे। एक नाम मनजिंदर सिंह सिरसा का भी उछला जिन्हें सिख होने के कारण पंजाब को ध्यान रखकर मुख्यमंत्री बनाये जाने की अटकल लगाई जा रही थी। पिछले कुछ समय से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मुख्यमंत्री पद को लेकर चौंकाने वाले फैसले करता रहा। इसलिए ये अनुमान था कि दिल्ली में भी वैसा ही देखने मिलेगा।  लेकिन इस चयन ने अचरज में नहीं डाला। भले ही बृजेन्द्र और प्रवेश संसदीय अनुभव  के लिहाज से उनसे वरिष्ट हैं किंतु भाजपा इन दिनों सत्ता की राजनीति से एक कदम आगे बढ़कर जिस तरह अपने सामाजिक  आधार को मजबूत करने में जुटी हुई है  रेखा का चयन उसी दृष्टि से किया गया। आम आदमी पार्टी  ने दिल्ली में दो चुनाव महिलाओं के दम पर जीते। मुफ्त  बिजली , पानी और बस यात्रा के कारण महिलाओं में श्री केजरीवाल के प्रति काफी झुकाव था। युवा मतदाता भी भ्रष्टाचार विरोधी छवि के कारण आम आदमी पार्टी के प्रति आकर्षित थे। भाजपा ने  इन दोनों वर्गों को साधने के अलावा व्यवसायी समुदाय को भी संतुष्ट किया क्योंकि रेखा के पति भी व्यवसायी हैं। दिल्ली बीते 27 वर्षों से भाजपा के आँख की किरकिरी बनी हुई थी। विधानसभा बनने के बाद उसे सत्ता तो मिल गई लेकिन आपसी लड़ाई में 1993 से 98 के बीच तीन मुख्यमंत्री बनाने की वजह से वह जनता की निगाहों से उतर गई। उसके बाद 15 सालों तक स्व. शीला दीक्षित और फिर अरविंद केजरीवाल का राज चला। भाजपा की चिंता  तब बढ़ गई जब 2014 में सभी सातों लोकसभा सीटें जीतने के बाद भी 2015 के विधानसभा चुनाव में वह महज 3 सीटें जीत पाई। 2019 में भी लोकसभा में तो उसने अपना प्रदर्शन दोहराया किंतु विधानसभा में  बमुश्किल 8 विधायकों तक ही बढ़ सकी। 2024 के संसदीय चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस मिलकर लड़े किंतु इस बार भी सभी सीटें भाजपा की झोली में आईं। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि विधानसभा चुनाव में इस बार भी केजरीवाल का करिश्मा चलेगा किंतु  भाजपा की कड़ी मोर्चेबंदी के कारण आम आदमी पार्टी का जादू खत्म हो गया। लेकिन भाजपा के सामने दिल्ली की समस्याओं को हल करने की जो चुनौती है उसके लिए उसे लोकप्रिय ही नहीं अपितु साफ -  सुथरी छवि का मुख्यमंत्री भी  चाहिए था। श्रीमती गुप्ता दिल्ली में तीन नगर नगर निगम वाली व्यवस्था में एक निगम की महापौर रह चुकी हैं इसलिए वे जमीनी हालात से वाक़िफ़ हैं। महिला मोर्चा की राष्ट्रीय पदाधिकारी होने से उन्हें संगठन का भी अनुभव है। लेकिन इस सबके अलावा उनको राष्ट्रीय राजधानी का मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला नेत्री को स्थापित करने का दांव चला है। सुषमा स्वराज के न रहने के बाद पार्टी ने स्मृति ईरानी को भाजपा नेत्री के तौर पर उभारा था। राहुल गाँधी को हराकर वे लोकप्रिय भी हुईं किंतु पिछला चुनाव हारने के बाद उनकी चमक फीकी पड़ गई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी जाना - पहिचाना नाम है किंतु वे जननेत्री नहीं बन पाईं। दिल्ली विधानसभा में  चूंकि आतिशी आम आदमी पार्टी की नेता के तौर पर होंगी इसलिए भाजपा ने भी महिला मुख्यमंत्री बनाकर अच्छी चाल चली है। वसुंधरा राजे को सत्ता से दूर रखने के कारण किसी महिला की ताजपोशी समय की मांग थी। कांग्रेस में प्रियंका वाड्रा के उभार के कारण भी भाजपा के लिए किसी महिला नेत्री को  आगे बढ़ाने की मजबूरी थी। इस प्रकार रेखा गुप्ता भाजपा की दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। चूंकि वे मैदानी राजनीति से निकली हैं इसलिए उन्हें जन अपेक्षाओं का एहसास है। दिल्ली में शीला जी के कार्यकाल की यादें अभी भी जनमानस में बनी हुई हैं। महिला मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने उस रिक्त स्थान को भरने का प्रयास किया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 19 February 2025

मेहनत करने वाला भूखा नहीं रह सकता

अवैध तरीकों से अमेरिका गए भारतीय प्रवासियों की दूसरी खेप वापिस आने के बाद उनके जो खौफनाक अनुभव सामने आ रहे हैं उन्हें जानकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो जायेंगे। ये उन लोगों की आँखें खोलने के लिए भी काफी है जो इन प्रवासियों के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि अपने देश में रोजगार उपलब्ध होता तब ये प्रवासी चोरी छिपे अमेरिका जाने का जोखिम क्यों उठाते ? लेकिन डंकी रूट कहे जाने वाले जिस रास्ते से दलालों के चंगुल में फंसकर ये लोग दक्षिण अमेरिकी देशों के घने जंगलों से होते हुए अमेरिका में घुसते हुए पकड़े गए उनमें सांप - बिच्छू और अन्य हिंसक पशुओं का खतरा हर समय मौजूद रहता है।  दलदलों और पहाड़ी नदी - नालों जैसी बाधाओं से जूझते हुए महीनों के सफर के बाद अमेरिका की धरती को छूने का अवसर मिलते ही वे पकड़ में आ गए। कैनेडा के रास्ते गए लोगों को तो शून्य से नीचे के तापमान में सफर करना पड़ा। जिसमें एक पति - पत्नी अपने दो बच्चों सहित मारे गए।  एक बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि जो लोग अवैध प्रवासी के रूप में गए वे अमेरिका की सुविधा भरी ज़िंदगी के लालच में दलालों के फेर में फंसकर मुसीबत मोल ले बैठे। इन लोगों को हथकड़ी लगाकर वापिस भेजे जाने को देश का अपमान बताने वालों को भी ये सुनकर अच्छा नहीं लगा होगा कि इन प्रवासियों ने जिन तरीकों से अमेरिका में घुसने का प्रयास किया उनसे भी भारत की प्रतिष्ठा को चोट पहुंची। ये तर्क भी बेमानी साबित हो रहा है  कि देश में काम न मिलने और व्यवसाय लायक पूंजी नहीं होने से उन्होंने अपना वतन छोड़ सात समंदर पार करने का दुस्साहस किया। अमेरिका से आई दूसरी खेप में दो व्यक्ति ऐसे भी थे जो हत्या के प्रकरण में फंसे हुए थे। इसीलिए उन्हें विमान से बाहर आते ही गिरफ्तार कर लिया गया।  अन्य अपराधियों के अभी भी अमेरिका में होने की आशंका सुरक्षा एजेंसियों को है। इसी के साथ ये बात ज्यादातर मामलों में सामने आई कि अवैध रूप से अमेरिका में घुसने के लिए ज्यादातर लोगों ने अपनी खेती - बाड़ी बेच डाली। एक व्यक्ति ने तो दलाल को 1 करोड़  से ज्यादा की रकम दी। बाकी लोगों ने भी लाखों रुपये का भुगतान किया। सवाल ये है कि इतने पैसे से ये लोग छोटा सा व्यवसाय शुरू कर देते तो पेट पालने लायक कमाई तो  हो ही जाती। जिस वर्ग के लोग अवैध तरीकों से अमेरिका या कैनेडा जाने का प्रयास करते हैं वे पेशेवर दृष्टि से योग्य होते तो उन्हें  चोर की तरह जाने की जरूरत नहीं पड़ती। उस दृष्टि से ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति रखना गलत है। अभी तो बहुत थोड़े लोग ही वापस आये हैं। जो जानकारी आई उसके अनुसार अमेरिका में लाखों भारतीय अवैध प्रवासी हैं जिन्हें किश्तों में वापिस भेजे जाने के संकेत मिले हैं। अमेरिका की हालिया यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अवैध प्रवासियों से किसी भी प्रकार की हमदर्दी जताने से इंकार कर सरकार की नीति घोषित कर दी। विपक्ष सहित अनेक लोगों ने इसकी आलोचना करते हुए कहा वह अमेरिका सरकार द्वारा अवैध प्रवासियों के साथ किये गए अमानवीय व्यवहार का विरोध नहीं करने का साहस नहीं दिखा सकी किंतु अवैध  प्रवासियों द्वारा उपयोग किये  गए तरीकों की जानकारी आने के बाद उनके प्रति हमदर्दी निरर्थक है। ये बात भी चिंताजनक है कि गंभीर अपराध करने के बाद विदेश भाग जाने वाले अवैध प्रवासियों में शामिल हैं। अमेरिका के नये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उनके विरुद्ध जो कड़ा रवैया अपनाया उसे भारत विरोधी मानने की बजाय लोगों को इस बात के लिए सतर्क करने की आवश्यकता है कि वे दलालों के फेर में अपना धन और ज़िंदगी दोनों दांव पर न लगाएं। अमेरिका जाने के लिए निकले कुछ प्रवासियों को तो हत्या की धमकी तक झेलनी पड़ी क्योंकि  पूरा  पैसा लेने के बाद भी  यहाँ के दलालों द्वारा दूसरे देशों में बैठे एजेंटों का हिस्सा नहीं दिया गया।  अमेरिका से लुटे - पिटे वापिस आये इन प्रवासियों द्वारा उठाई गई तकलीफों की जो जानकारियां  धीरे - धीरे आ रही हैं वे विचलित कर देने वाली हैं। ऐसे में बेहतर होगा कि विदेश जाने के लिए पागल होने वाली प्रवृत्ति को निरुत्साहित किया जाए। इस काम में सरकार के साथ ही समाज को भी आगे आना चाहिए। हमारे देश में श्रमिकों की मांग कम नहीं है। बिहार, उ.प्र , छत्तीसगढ़ , उड़ीसा के लाखों लोग अन्य राज्यों में  मेहनत करते हुए रोजी - रोटी कमा रहे हैं। ये बात आज भी उतनी ही प्रमाणित है कि परिश्रम करने वाला कभी भूखा नहीं रह सकता। गैर कानूनी तरीकों से परदेस जाकर चोरों की तरह रहने से लाख गुना अच्छा है अपने देश में चैन से रहकर पेट भरने के लिए उद्यम करना। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 February 2025

बयान ही नहीं पित्रौदा से भी पिंड छुड़ाए कांग्रेस


सैम पित्रोदा कांग्रेस की विदेश इकाई भारतीय ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख हैं। स्व. राजीव गाँधी के शासनकाल में वे अचानक सुर्खियों में आये जब अमेरिका में रहने वाले सैम उनकी सलाहकार मंडली में शामिल हुए। देश में संचार क्रांति का श्रेय काफी हद तक उन्हें दिया जाता है जिसमें गलत कुछ भी नहीं है। यू.पी.ए सरकार के समय भी वे उसके तकनीकी सलाहकार रहे। लेकिन कांग्रेस से उनका जुड़ाव केवल गाँधी परिवार से निकटता की वजह से है। इसीलिए 2014 में जब मनमोहन सरकार सत्ता से बाहर हुई तब श्री पित्रौदा फिर अमेरिका जा बसे और उनको भारतीय ओवरसीज कांग्रेस का मुखिया बना दिया। यह संगठन विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के मन में कांग्रेस के प्रति कितना समर्थन जुटा सका ये तो स्पष्ट नहीं है लेकिन राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं में उनके भाषण, साक्षात्कार और पत्रकार वार्ताओं का आयोजन करने में  सैम की  भूमिका छिपी नहीं है। एक तरह से वे  विदेशों में श्री गाँधी के जनसंपर्क अधिकारी का दायित्व निभाते हैं । लेकिन समय - समय पर वे ऐसे बयान देते रहे हैं जिससे कांग्रेस को फजीहत झेलनी पड़ी। लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने पूर्वी भारत के लोगों के चीनी और दक्षिण के लोगों को अफ्रीकियों जैसा बताकर विवाद उत्पन्न कर दिया। उस बयान से कांग्रेस ने बिना देर किये पल्ला झाड़ लिया और चुनाव में नुकसान न हो इस डर से उनसे इस्तीफा भी ले लिया किंतु  बाद में  वे फिर अपने पद पर लौट आये। भारत के मध्यम वर्ग , 1984 के  सिख विरोधी दंगे और अमेरिका के विरासत कानून को भारत में लागू करने संबंधी उनके बयान कांग्रेस को शर्मिंदगी झेलने पर बाध्य करते रहे हैं। यद्यपि हर बार पार्टी उक्त  टिप्पणियों को निजी विचार बताते हुए उनसे दूरी बनाती रही है किंतु गाँधी परिवार विशेष रूप से राहुल से करीबी की वजह से श्री पित्रौदा से नाता तोड़ने का साहस नहीं जुटा सकी। और यह भी कि उनके आपत्तिजनक बयानों से पिंड छुड़ाने की औपचारिकता का निर्वहन भी कांग्रेस का कोई पदाधिकारी ही कर लेता है किंतु अपने पारिवारिक मित्र की गलत बातों का विरोध करने गाँधी परिवार कभी सामने नहीं आया जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सैम के सिर पर  उसका वरद हस्त है। इसीलिए वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आते जिसका उदाहरण उनकी ताजा टिप्पणी है जिसमें उन्होंने चीन को लेकर कहा कि चीन से खतरे को अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है । उन्होंने आरोप लगाया कि भारत का दृष्टिकोण हमेशा टकरावपूर्ण रहा है। हमें इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है और यह मानना बंद करना होगा कि चीन पहले दिन से ही दुश्मन है।  ये बयान आते ही भाजपा लाव - लश्कर कांग्रेस पर चढ़ बैठी और गाँधी परिवार की चीन से निकटता को लेकर आरोप लगाए। उल्लेखनीय है राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से मिले अनुदान पर  भाजपा, गाँधी परिवार को पहले भी घेरती रही है। इसी तरह डोकलाम विवाद के समय श्री गाँधी का नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास जाना और मानसरोवर यात्रा से लौटते समय बीजिंग में चीन सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात पर भी वे आलोचना का पात्र बने। लेकिन बजाय सफाई देने के वे प्रधानमंत्री पर चीन से डरने का तंज कसते हुए आरोप लगाते रहे कि लद्दाख़ सेक्टर में  भारत की काफी जमीन चीन ने दबा ली जिसे खाली करवाने में   मोदी सरकार विफल रही है। लेकिन श्री पित्रौदा ने चीन को लेकर जो बयान दिया उसने श्री गाँधी द्वारा दिखाई जाने वाली आक्रामकता की हवा निकाल दी। यद्यपि उनके निकटस्थ कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सैम के बयान को  कांग्रेस के दृष्टिकोण से अलग बताते हुए कहा कि  चीन हमारी बाहरी सुरक्षा के लिए खतरा और साथ ही आर्थिक चुनौती बना हुआ है। श्री रमेश ने चीन के प्रति मोदी सरकार के दृष्टिकोण पर भी  सवाल उठाए । हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि श्री पित्रौदा की टिप्पणी कांग्रेस की नीति नहीं है किंतु चीन के प्रति नर्मी और उसे शत्रु मानने को गलती बताने वाले उनके बयान से पल्ला झाड़ने मात्र से पार्टी अपना दामन नहीं बचा सकेगी। संसद में  इस मामले को भाजपा निश्चित तौर पर उठायेगी और उस समय श्री गाँधी ही निशाने पर होंगे। ऐसे में उन्हें चाहिए वे श्री पित्रौदा को न सिर्फ उनके पद वरन कांग्रेस से भी स्थायी रूप से निकाल बाहर करें।  अन्यथा देश के सर्वमान्य  दुश्मन  की तरफदारी करने वाला यह व्यक्ति किसी दिन पार्टी को  किसी बड़े संकट में डाले बिना नहीं रहेगा। 



-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 17 February 2025

आस्था के साथ अनुशासन भी जरूरी


नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बीते शनिवार की रात में हुई भगदड़ में दर्जनों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे जबकि सैकड़ों गंभीर रूप से घायल हैं। उस समय स्टेशन पर क्षमता से कई गुना ज्यादा भीड़ प्रयागराज महाकुंभ में जाने के लिए चलाई जा रहीं विशेष रेल गाड़ियों की प्रतीक्षा कर रही थी। अचानक प्लेटफार्म बदले जाने की उद्घोषणा के बाद जो भगदड़ मची उसके कारण धक्का - मुक्की की चपेट में आकर अनेक बेशकीमती जानें चली गईं। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार रेलवे ने कमाई की लालच में अनाप शनाप टिकिटें बेच डालीं। सप्ताहांत का उपयोग करने के लिए महाकुंभ जाने वालों की भीड़ रेल और सड़क मार्ग पर ही नहीं अपितु हवाई अड्डों तक पर देखी जा रही है। पहले अनुमान था कि बसंत पंचमी के अंतिम स्नान के पश्चात प्रयागराज आने वालों की संख्या में गिरावट आ जायेगी किंतु  हुआ इसके विपरीत। विशेष रूप से शनिवार और रविवार पर तो श्रुद्धालुओं की भीड़ अमृत स्नान वाले दिनों के बराबर होने लगी। नई दिल्ली स्टेशन पर भी इसी कारण प्रयागराज जाने वालों का हुजूम जमा हो गया जिसे व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त पुलिस बल नहीं था। वैसे ये बात भी उतनी ही सही है कि इतने बड़े जनसैलाब को नियंत्रित करना पुलिस बल के लिए बेहद कठिन या यूँ कहें कि असंभव होता है। प्रयागराज में इसका अनुभव प्रतिदिन हो रहा है। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि रेलवे स्थिति का सही समय पर अनुमान लगाने में असफल रहा। भीड़ तो शाम से ही एकत्र होने लगी थी। यदि उसी समय रेलवे के वरिष्ट अधिकारी स्थानीय प्रशासन से सामंजस्य बनाकर भीड़ को स्टेशन में आने से रोकने की व्यवस्था कर लेते तो उक्त हादसा रोका जा सकता था। अब जो सरकारी कर्मकांड हो रहा है उसमें कुछ भी नया नहीं है। कुछ विभागीय लोग निलम्बित कर दिये जाएंगे, हताहतों को मुआवजा दे दिया जाएगा। उच्चस्तरीय जाँच की घोषणा कर लोगों का गुस्सा शांत करने का खेल चलेगा जिसकी रिपोर्ट आते तक लोग हादसे को भुला चुके होंगे। लेकिन इसका दूसरा  पक्ष भी है जो अनुशासनहीन आस्था के तौर पर हमारे देश की पहिचान बन गई है। महाकुंभ में  जाने की उत्कंठा प्रत्येक सनातन धर्मी में काफी समय से रही है। ये अवसर लम्बे समय बाद आने से हर किसी  की कोशिश रहती है कि वह महाकुंभ में शामिल होकर पुण्य लाभ अर्जित करे। लेकिन इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए केवल उत्साह एवं संसाधन ही नहीं अपितु अनुशासन एवं व्यवस्था के पालन के प्रति गंभीरता भी बेहद आवश्यक है। यदि इसका पालन हुआ होता तो मौनी अमावस्या पर प्रयागराज और गत शनिवार को नई दिल्ली स्टेशन पर हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना टाली जा सकती थी। शासन और प्रशासन की लापरवाही निश्चित रूप से ऐसे हादसों के मूल में होती है । लेकिन इतने बड़े आयोजनों में अव्यवस्था होने के पीछे बेतहाशा भीड़ के दबाव को नजरंदाज करना भी सही नहीं होगा। दुर्भाग्य ये है कि ऐसेे हादसों से न तो सरकारी तंत्र सबक लेता है और न ही जनता। यदि ऐसा होता तो शायद उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो दुखद घटनाएं महाकुंभ के अवसर पर हुईं उनका संज्ञान लेते हुए सनातन धर्म का नेतृत्व करने वाले सभी सम्माननीय महानुभावों का यह दायित्व है कि वे भविष्य के लिए आस्था और अनुशासन के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए प्रभावशाली पहल करें। बसंत पंचमी के बाद भी  प्रयागराज में श्रृद्धालुओं का सैलाब उमड़ने के बाद उ.प्र सरकार और मेला प्रशासन लोगों से नहीं आने की अपील करते रहे किंतु यदि धर्माचार्य इस तरह का अनुरोध करते तब हो सकता है लोग उनकी बात को मान लेते। 2027 में नासिक में अर्ध कुंभ और  2028 में उज्जैन में पूर्ण कुंभ आयोजित होगा। ऐसे में प्रयागराज महाकुंभ के दौरान जो समस्याएं सामने आईं उनके कारणों का सूक्ष्म अध्ययन करते हुए भीड़ के नियंत्रण का पुख्ता प्रबंध किया जावे। उल्लेखनीय है प्रयागराज में मेले के आयोजन के लिए काफी बड़ा स्थान है। वहाँ प्रतिवर्ष जो  माघ  मेला भरता है वह किसी लघु कुंभ जैसा ही होता है। इसमें भी विशेष स्नान के दिन एक करोड़ तक श्रृद्धालु आते हैं। नासिक और उज्जैन में उतना स्थान नहीं होने से भीड़ का नियंत्रण अपेक्षाकृत कठिन होता है। प्रयागराज और नई दिल्ली के हादसों से सीख लेकर भावी आयोजनों की व्यवस्था अभी से की जानी चाहिए। श्रृद्धालुओं से भी अपेक्षा है कि पुण्य की लालसा में अपने प्राण गँवाना बुद्धिमत्ता नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 15 February 2025

बांग्ला देश पर ट्रम्प की टिप्पणी भारत के लिए अच्छा संकेत


अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर दोबारा आसीन होते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से काम शुरू किया उससे पूरी दुनिया में खलबली है। मुख्य रूप से  किसी देश से होने वाले आयात पर लगने वाले टैरिफ ( शुल्क ) में वे जिस तरह से वृद्धि करते जा रहे हैं उससे विश्व व्यापार गड़बड़ा गया है। अपने पड़ोसी मेक्सिको और ब्राज़ील के अलावा ट्रम्प ने चीनी वस्तुओं पर भी आयात शुल्क बढ़ाकर अपने इरादे जता दिये हैं। भारत के साथ भी उनका यही रवैया देखने मिल रहा है। यूरोप के तमाम देश उनकी इस आक्रामक नीति से नाराज हैं। जिन देशों पर ट्रम्प प्रशासन ने बढ़े हुए आयात शुल्क का बोझ बढ़ाया उनसे आयात अधिक हो रहा था किंतु उसकी तुलना में अमेरिका निर्यात कम कर रहा था। इसे व्यापार घाटा कहते हैं। चीन के साथ होने वाले व्यापार में भारत इसे झेल भी रहा है। वैसे हर देश ये कोशिश करता है कि आयात की तुलना में उसका निर्यात अधिक हो क्योंकि इसी से उसकी मुद्रा का मूल्य तय होता है। अमेरिका की चिंता यह है कि  आयात की अधिकता की वजह से  डॉलर की मजबूती पर असर पड़ सकता है। यूक्रेन संकट के बाद जब अमेरिका ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध थोपे तब चीन और भारत जिस मुस्तैदी से उसके साथ खड़े हुए तथा उससे कच्चा तेल और गैस इत्यादि की खरीदी जारी रखी उसकी वजह से अमेरिका काफी नाराज हुआ। लेकिन उसकी मजबूरी है कि वह इन दोनों देशों से पूरी तरह नाराजगी भी  मोल नहीं ले सकता। चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पूंजी फंसी है और  चीन के दबाव को कम करने के लिए  अमेरिका को भारत की जरूरत है। इसीलिए ट्रम्प ने आयात शुल्क बढ़ाने के मामले में सख्ती के बावजूद काफी सतर्कता बरती।  इस सबके बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की ताजा अमेरिका यात्रा कूटनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रही। ट्रम्प के शपथ ग्रहण में उनको आमंत्रित नहीं किये जाने पर देश में विपक्षी दलों ने काफी टीका - टिप्पणी की और दोनों नेताओं के बीच दोस्ती के दावे पर कटाक्ष भी किया किंतु  ट्रम्प के आमंत्रण पर प्रधानमंत्री की वाॅशिंगटन यात्रा के दौरान उनका जिस तरह से स्वागत हुआ उसके बाद उन आलोचकों के मुँह बंद हो गए। यद्यपि  श्री मोदी से भेंट के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत  पर आयात शुल्क बढ़ाते हुए इसे जैसे को तैसा बताया। उल्लेखनीय है भारत ने अमेरिकी वस्तुओं पर काफी अधिक आयात शुल्क लगा रखा है। ट्रम्प ने उस असंतुलन को दूर करने का फैसला किया जो उनके राष्ट्रीय हित के लिहाज से गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन श्री मोदी के साथ बातचीत के बाद ट्रम्प ने उन्हें बेहतर मोलभाव करने वाला बताकर कुछ संकेत जरूर दिये।  इससे अलग हटकर इस मुलाकात से जो बातें निकलकर सामने आईं वे भारत के प्रति ट्रम्प  के झुकाव का परिचायक हैं। मसलन अमेरिका द्वारा भारत को अत्याधुनिक एफ. 35 लड़ाकू जेट देने पर सहमति जो वह अपने अति विश्वस्त और करीबी देशों को ही देता है। इसके साथ ही भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में सहभागिता बढ़ाने का जो फैसला हुआ वह चीन पर दबाव बनाने में मददगार होगा। उल्लेखनीय है क्वाड नामक संगठन में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत भी शामिल है। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में  चीन के विस्तारवादी रवैये पर नियंत्रण स्थापित करने में क्वाड काफी कारगर साबित हुआ है। यद्यपि ट्रम्प  ब्रिक्स नामक संगठन के विरुद्ध भी काफी हमलावर हैं जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और  द.अफ्रीका शामिल हैं। हाल ही में इस संगठन ने डॉलर के वर्चस्व को तोड़ने एक साझा मुद्रा बनाने की पहल भी की थी जिसने अमेरिका को नाराज कर दिया । बावजूद उसके ट्रम्प का भारत पर ब्रिक्स से अलग होने का दबाव न बनाकर क्वाड में उसे साथ रखना ये दर्शाता है कि  व्यापारिक मामलों में  सख्ती के बाद भी कूटनीतिक दृष्टि से भारत के प्रति नर्म रवैया रखना अमेरिका की मजबूरी है क्योंकि द. एशिया में चीन के बढ़ते आधिपत्य को रोकने में  वही सक्षम है। श्री मोदी के अमेरिका दौरे की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि रही ट्रम्प की ये टिप्पणी कि बांग्ला देश को  मैं प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ता हूँ। ये निश्चित रूप से बड़ी बात है क्योंकि ये माना जाता है कि इस पड़ोसी देश में सत्ता पलट अमेरिका द्वारा करवाया गया था। लेकिन ट्रम्प ने आते ही उसकी आर्थिक मदद रोक दी। हालांकि श्री मोदी की यह यात्रा संक्षिप्त रही किंतु ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही दोनों  के बीच व्यक्तिगत गर्मजोशी अच्छा संकेत है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनको जिस प्रकार से सम्मान दिया  वह आश्वस्त करता है। इस बारे में एक बात और महत्वपूर्ण है कि श्री मोदी विश्व के संभवतः अकेले नेता हैं जिनके अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति पुतिन दोनों से बेहद नजदीकी संबंध हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 14 February 2025

आयकर के विकल्प की तलाश समय की मांग


वित्त मंत्री निर्मला  सीतारमण द्वारा  नया आयकर विधेयक संसद में प्रस्तुत किये जाने के बाद प्रवर समिति को भेज दिया गया जो मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट देगी। बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख किये जाने के समय ही उन्होंने इसके संकेत दे दिये थे। तभी से इसको लेकर अनुमान लगाए जाने लगे थे। प्रस्तुत विधेयक में बहुत सारे अनुपयोगी प्रावधान हटा दिये गए हैं। कुछ नियमों को जोड़कर उनकी संख्या कम कर दी गई वहीं  कुछ प्रावधानों को सरलीकृत किया गया है। 1961 के अधिनियम के आकार को आधा कर दिया गया है। जो जानकारी आई उसके अनुसार नये विधेयक में मौजूदा कानून की अनेक जटिलताओं को दूर किया गया है जिससे कर दाताओं  के साथ ही कर सलाहकारों को भी सुविधा होगी। इस विधेयक को इस तरह तैयार किया गया है जिससे ये अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो। मोदी सरकार  इसके पूर्व भी अनेक कानूनों का सरलीकरण करने के साथ ही अनुपयोगी कानूनों को विलोपित कर चुकी है जो दरअसल प्रशासनिक सुधारों की प्रक्रिया का हिस्सा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आयकर कानून में जो पेचीदगियां थीं उनकी वजह से करदाता को बहुत परेशानी होती थी। उसका परिणाम भ्रष्टाचार और कर चोरी के रूप में देखने मिलता रहा। बीते दो - तीन दशकों में आयकर के ढांचे में काफी सुधार हुए जिससे विवरणी भरना आसान हुआ। सबसे बड़ी राहत रिफंड के बारे में हुई जो काफी देर से आता था और उसका भुगतान हासिल करने के लिए घूस भी देनी पड़ती थी। इसी तरह कर निर्धारण की प्रक्रिया को  व्यक्तिगत संपर्क की बजाय ऑन लाइन  किये जाने से भी क्रांतिकारी सुधार हुआ। पहले छोटे - छोटे करदाता को भी  पेशी का सिर दर्द झेलना पड़ता था। लेकिन अब सब काम ऑन लाइन होने से उससे मुक्ति मिल गई। 90 फीसदी से अधिक विवरणी महीने भर से भी कम समय में स्वीकार हो जाती हैं। जिनमें पूछताछ होती है उनमें भी अधिकारी और विवरणी भरने वाले का आमना - सामना नहीं होता। इस प्रकार  मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम हो गया जो भ्रष्टाचार की जड़ था। यही वजह है कि लघु और मध्यमवर्गीय करदाताओं के अलावा भी जो बड़े कारोबारी हैं उनके मन में आयकर को लेकर पहले जैसा खौफ नहीं रहा। बीते कुछ वर्षों में आयकर दाता जिस तेजी से बढ़े उसके कारण सरकार को उससे होने वाली कमाई भी   आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। इससे प्रमाणित होता है कि कानून और प्रक्रिया सरल होने से व्यवस्था में नागरिकों  का विश्वास बढ़ता है और  वे उत्साहित होकर  उसमें सहयोग  करते हैं। लेकिन इसके साथ ही अब ये विचार भी सामने आ रहा है कि आयकर की मौजूदा व्यवस्था में सुधार से एक कदम आगे बढ़कर उसके विकल्प के बारे में सोचा जाए। कहा जाता है मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी इसी दिशा में बढ़ाया कदम था किंतु उसे लागू  किये जाने में जो गड़बड़ियां हुईं उनकी वजह से अगला कदम उठाने से सरकार पीछे हट गई। ये आरोप भी लगे कि नोटबंदी  की गोपनीयता बनाये रखने के फेर में सरकार समुचित तैयारी नहीं कर सकी । उसके कारण जनता को जो परेशानी हुई उसने एक अच्छे निर्णय को आलोचना का पात्र बना दिया। यद्यपि प्रधानमंत्री नोटबंदी के अगले चरण के प्रति गंभीर बताये जाते हैं किंतु इस बार जो भी होगा वह सोच - समझकर किया जाएगा। अनेक अर्थशास्त्रियों का मानना है कि प्रत्यक्ष कर की ऐसी प्रणाली लागू की जाए जिससे लोगों में आय छिपाकर कर चोरी करने की प्रवृत्ति समाप्त हो। वह खर्च पर कर ( एकस्पेंडीचर टैक्स ) हो या बैंक में जमा होने वाली नगद राशि कर ( ट्रांजेक्शन टैक्स) ये विश्लेषण का विषय है किंतु जिस तरह जीएसटी में व्याप्त जटिलताएं खत्म होने से उसका संग्रह लगातार नई ऊंचाइयां छू रहा है उसी तरह यदि काले धन की समानांतर अर्थ व्यवस्था पर लगाम कसनी है तब लोगों को अपनी आय उजागर करने में लगने वाले डर को पूरी तरह दूर करने की जरूरत है। नया आयकर विधेयक तो अपनी जगह ठीक है क्योंकि उसका मकसद प्रचलित कानून को सरल और संक्षिप्त बनाना है । लेकिन आयकर को समाप्त कर किसी ऐसी व्यवस्था  की जरूरत है जिससे लोग  अपनी पूरी आय उजागर करें। यदि काले धन से चलने वाली समानांतर अर्थ व्यवस्था  बन्द की जा सके तो भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 13 February 2025

सर्वोच्च न्यायालय ही लगा सकता है रेवड़ियों पर रोक


सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव के समय  राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली मुफ्त योजनाओं की घोषणा पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोग काम नहीं करना चाहते क्योंकि आप उन्हें मुफ्त अनाज दे रहे हैं। उसने पूछा कि लोगों को मुख्य धारा में शामिल करने की बजाय मुफ्त की योजनाएं लागू कर क्या परजीवियों की जमात खड़ी नहीं की जा रही है? और ये भी कि क्या उनको मुख्यधारा में शामिल कर देश के विकास का हिस्सा बनाना अच्छा नहीं होगा? इसके पहले भी  न्यायालय मुफ्त योजनाओं पर दायर  याचिकाओं पर सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर चुका है। लेकिन चुनाव आयोग गेंद न्यायालय के पाले में खिसका कर अपना पल्ला झाड़ लेता है और सर्वोच्च न्यायालय  टिप्पणी और सवाल पूछकर बात आगे बढ़ा देता है। जहाँ तक बात सरकार की है तो वह किसी भी पार्टी की हो मुफ्त योजनाओं को बंद करने का साहस नहीं जुटा सकती । दिल्ली के हालिया चुनाव में प्रधानमंत्री  ने आदमी पार्टी सरकार  की मुफ्त योजनाओं को रेवड़ी कहकर  उनकी आलोचना की। जवाब में अरविंद केजरीवाल ने  ये प्रचार शुरू कर दिया कि भाजपा सत्ता में आई तो वह मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं को बस यात्रा पर रोक लगा देगी और झुग्गियों को तोड़ दिया जाएगा। इस प्रचार से घबराई भाजपा ने  आश्वासन दिया कि सभी मुफ्त सुविधाएं जारी रहेंगी और झुग्गी वासियों को पक्के मकान दिये जाएंगे। भाजपा ने आम आदमी पार्टी द्वारा महिलाओं को प्रति माह 2100 रु. के वायदे से आगे बढ़कर 2500 रु. देने का वायदा कर दिया।  विडंबना ये है कि सभी दल एक  - दूसरे पर खैरात बाँटकर चुनाव जीत लेने का आरोप लगाते हैं किंतु  खुद  उससे परहेज नहीं करते। आशय ये है कि खेल सब एक जैसे  रहे हैं किंतु हारने वाला विजेता पर बेईमानी  का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ये पूछ चुका है कि सरकार मुफ्त अनाज कब तक बांटेगी? कांग्रेस भी मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावे का मजाक उड़ाते हुए कहती है कि ऐसा है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है ? लेकिन  मुफ्त अनाज वितरण जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किया जा रहा है वह सोनिया गाँधी की पहल पर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा ही  पारित करवाया गया था। कुछ साल पहले  सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी गोदामों में अनाज के सड़ने की शिकायतों पर कहा था कि इससे बेहतर है वह गरीबों में बाँट दिया जाए। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जब निःशुल्क अनाज वितरण शुरू किया तब वह समय की मांग थी किंतु अब वह चाहकर भी उसे बंद नहीं कर पायेगी क्योंकि  मुफ्त योजनाओं को बंद करना  किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा। चुनाव आयोग कह चुका है कि ऐसा करना उसके लिए तभी संभव होगा यदि संसद उसके लिए कोई कानून बनाए जिसके कोई आसार नजर नहीं आते। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं के वायदे किये जाने पर रोक क्यों नहीं लगाता? अनेक मामलों में वह ऐसा कर भी चुका है। ये मुद्दा भी विचारणीय है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के बाद भी इस तरह के वायदे करने का क्या औचित्य है जिनके कारण विकास सहित अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की ये टिप्पणी  बहुत ही सटीक है कि राज्यों न के पास न्यायाधीशों के वेतन और पेंशन के लिए पैसों की कमी है किंतु उन लोगों को रेवड़ियां बाँटने के लिए धन की कमी नहीं जो कुछ नहीं करते।  चुनाव आयोग ने गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय से ही कह दिया कि वह मुफ्त योजनाओं को परिभाषित करे जिसके बिना वह कोई कदम नहीं उठा सकता। लोक कल्याणकारी राज्य में  वंचित वर्ग का आर्थिक संरक्षण सरकार का दायित्व है। भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहाँ सब्सिडी के जरिये लोगों की मदद की जाती है। लेकिन संपन्न देशों के पास इतनी हैसियत होती है कि अपनी जनता को इस तरह की सहायता करें किंतु भारत जैसे  विशाल आबादी वाले देश में  मुफ्त योजनाओं को  हमेशा जारी रखना न तो व्यवहारिक है और न ही आर्थिक दृष्टि से संभव।  चूंकि संसद में बैठे देश के भाग्य विधाताओं को मुफ्त योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतना आसान लगता है इसलिए उनसे कोई उम्मीद  करना व्यर्थ है। चुनाव आयोग में बैठे नौकरशाहों में  भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आकर कुछ करना चाहिए वरना ये सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 12 February 2025

महाकुंभ बना सनातन की संगठित महाशक्ति का जीवंत प्रमाण


प्रयागराज महाकुंभ में माघ पूर्णिमा पर दोपहर तक ही डेढ़ करोड़ श्रद्धालु डुबकी लगा चुके थे। रात तक यह संख्या ढाई से तीन करोड़ जा सकती है। वैसे  माघ माह की समाप्ति को कुंभ का भी समापन माना जाता है। लेकिन  ऐसा लगता है इस बार  महाशिवरात्रि तक श्रृद्धालुओं का आना लगा रहेगा। 40 करोड़ की अनुमानित संख्या तो पहले ही पार हो चुकी है और अब यह आंकड़ा 50 करोड़ को पार करता नजर आ रहा है। पूरा विश्व इस अद्भुत मानव समागम से अचंभित है। मौनी अमावस्या को हुए हादसे के अलावा पूरा आयोजन अपनी विशालता और भव्यता के कारण ऐतिहासिक स्वरूप ग्रह करचुका है। अतीत में  मुख्य अमृत स्नान संपन्न हो जाने के बाद श्रृद्धालुओं की आवक कम होने लगती थी । लेकिन इस बार महाकुंभ का  देश ही नहीं दुनिया भर में जो आकर्षण देखने मिला वह अकल्पनीय है। इसके चलते  आने वालों की संख्या अनुमान से कहीं ज्यादा हो गई। ऐसे में यातायात की समस्या पैदा होना स्वाभाविक था। बीते कुछ दिनों में लाखों श्रृद्धालुओं को प्रयागराज पहुँचने में भारी परेशानियाँ हुईं। हजारों लोग तो बीच रास्ते से ही लौट गये जो निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। महाकुंभ में की गई व्यवस्थाओं की प्रशंसा और निंदा दोनों हो रही हैं जो इतने विराट आयोजन में नितांत स्वाभाविक है।  साधु - सन्तों  से जुड़े विवाद भी सुनाई दिये। थोक के भाव जगद्गुरु और महामंडलेश्वर बनाये जाने की भी चर्चा हुई। धर्माचार्यों द्वारा भक्तों के आवास और भोजन की जो व्यवस्था की गई वह सनातन धर्म की ताकत का परिचायक है। महाकुंभ में आने वाले लाखों श्रृद्धालुओं को देश के कुछ बड़े उद्योगपतियों द्वारा निःशुल्क भोजन की व्यवस्था भी इस आयोजन की विशेषता बनी। हजारों लोगों ने इस महाकुंभ में  संन्यास लिया जिनमें विदेशी भी रहे। बड़ी संख्या में महिलाएं भी  सांसारिक जीवन छोड़कर साध्वी बनीं। सनातन धर्म की विराटता और समरसता का जो दिव्य अनुभव इस महाकुंभ में हुआ वह अविस्मरणीय बन गया। इसकी वजह से भारत के प्रति समूचे विश्व में रुचि उत्पन्न हुई। इसीलिए अनेक नामी - गिरामी हस्तियां प्रयागराज पहुंचीं। लेकिन देश में कुछ लोग हैं जो  इस अभूतपूर्व आयोजन के बारे में नकारात्मक अवधारणा फैलाने में जुटे हुए हैं। ये कहना सच्चाई से मुँह मोड़ लेना होगा कि महाकुंभ में सब कुछ चाक - चौबंद था। बहुत सी ऐसी कमियां हैं जिनकी आलोचना की जा सकती है। भीड़ का अनुमान  लगाने में भी चूक हुई जिसके कारण प्रयागराज पहुँचने वाले रास्तों पर घंटों जाम लगा रहा। संगम स्नान हेतु लोगों को लंबी दूरी तक पैदल चलने का कष्ट उठाना पड़ा। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे उस वजह से काफी परेशान हुए। मौनी अमावस्या पर हुए हादसे में मारे गए लोगों की सही संख्या उजागर नहीं करने का आरोप भी शासन - प्रशासन पर लगा। महाकुंभ संपन्न होने के बाद और भी ऐसी बातें सामने आयेंगीं जिन्हें लेकर व्यवस्था से जुड़े अमले की आलोचना होगी किंतु  इस विराट आयोजन की खूबियों की सूची बहुत लम्बी है। सबसे बड़ी बात ये है कि यह  हिन्दू नव जागरण का शुभारंभ बन गया। हालांकि प्रयागराज के अलावा भी जहां - जहां कुंभ आयोजित होता है सनातन धर्मावलंबी बड़ी संख्या में  वहाँ पहुँचते हैं ।  ये भी सच है कि हर आयोजन पहले से बड़ा और बेहतर होता है। लेकिन इस बार का महाकुंभ जिन राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक वातावरण के बीच हो रहा है वे काफी अलग हैं। लोकसभा चुनाव के पहले से ही सनातन धर्म के विरुद्ध जहर उगला जाने लगा था। कुछ ताकतें जातियों के नाम पर हिन्दू समाज को खंड - खंड करने का खतरनाक षडयंत्र  विदेशी ताकतों के इशारे पर रच रही हैं। वोटों की लालच में अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण में राष्ट्रीय हितों को उपेक्षित करने में भी संकोच नहीं किया जा रहा। लोकसभा चुनाव में आये जनादेश को राष्ट्रवादी शक्तियों के विरुद्ध आक्रोश का नाम देकर ये प्रचार किया जाने लगा कि जनता ने  हिंदुत्व की अवधारणा को ठुकरा दिया। अयोध्या  सहित हिंदुओं के अनेक पवित्र केंद्रों में भाजपा की हार का जिस हल्केपन से मजाक उड़ाया गया उसकी देश भर में जो प्रतिक्रिया हुई वह इस महाकुंभ के प्रति  सनातन धर्मावलंबियों द्वारा व्यक्त आस्था के रूप में सामने आई है। सनातन विरोधी ताकतें इस आयोजन के  विराट स्वरूप से विचलित हो उठी हैं। कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के जो परिणाम आये उनसे ये स्पष्ट हो गया कि लोकसभा चुनाव में लगे झटके से हिन्दू समाज ने सीख ली है। इसीलिए प्रयागराज महाकुंभ में उमड़ा जनसैलाब महज भीड़ नहीं अपितु  सनातन की संगठित महाशक्ति का जीवंत प्रमाण है। इस आयोजन ने बता दिया कि सनातन इस देश की आत्मा है और इसीलिए वह अमर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 February 2025

शर्मिंदगी छिपाने केजरीवाल की हार पर खुश हो रही कांग्रेस


दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय  दुनिया भर में चर्चित हुई। मुफ्त बिजली - पानी, मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी विद्यालयों के उन्नयन जैसे कार्यक्रमों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल देखते - देखते नई राजनीतिक संस्कृति के प्रतीक बन गए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की  प्रतिबद्धता की वजह से उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन गई जो व्यवस्था बदलने सुविधा भरी ज़िंदगी छोड़ राजनीति की पथरीली राहों पर चल पड़ा। अन्ना हजारे जैसे  समर्पित व्यक्तित्व से जनसेवा की दीक्षा लेने वाले श्री केजरीवाल ने उनकी इच्छा के विरुद्ध सत्ता की दौड़ में शामिल होकर राजगद्दी भी हासिल कर ली। लगातार दो चुनावों में दिल्ली के मतदाताओं ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया और वह भी प्रचंड बहुमत के साथ। लेकिन लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं दी जो इस बात का संकेत थी कि दिल्ली की जनता को  राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रवेश  पसन्द नहीं था।लेकिन अरविंद के साथ परेशानी ये है कि वे अपने अलावा बाकी सभी को मूर्ख समझते हैं। और इसी सोच ने उन्हें  उस स्थिति में ला दिया जिसमें उनके राजनीतिक भविष्य पर ही आशंका व्यक्त की जाने लगी है। महत्वाकांक्षी होना बुरा नहीं किंतु अति हर चीज की बुरी होती है और वे अति महत्वाकांक्षा का शिकार हो गए। जनता से किये आसमानी वायदों को पूरा करने के प्रति ईमानदार रहने के बजाय उन्होंने राष्ट्रीय नेता बनने की इच्छा पाल ली । शराब नीति, मुख्यमंत्री के शासकीय निवास में करोड़ों रु. खर्च करना, यमुना की सफाई की अनदेखी जैसे तमाम मुद्दे उनके विरुद्ध होते गए किंतु उन्हें लगता रहा कि मुफ्त  बिजली - पानी और महिलाओं को निःशुल्क बस यात्रा जैसी सुविधाएं उनका बड़ा पार लगा देंगी। बीते दो चुनावों से वे इन्हीं के नाम पर जीत दर्ज करते रहे । इसलिए जब भाजपा और कांग्रेस ने भी वही सब बांटने का ऐलान किया तो जनता ने आम आदमी पार्टी से किनारा कर लिया। चुनाव में उसकी करारी हार का विश्लेषण करते हुए वे तमाम यू ट्यूबर पत्रकार भी उक्त कारण ही गिना रहे हैं, जो मतगणना  के एक दिन पहले तक कड़ी टक्कर के बावजूद आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी बताते नहीं थक रहे थे। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल की राजनीति को चमकाने में उक्त यू ट्यूबरों की ही भूमिका रही। अब वही तबका उनकी गलतियों को प्रचारित कर निष्पक्ष होने का ढोंग कर रहा है। दिल्ली के चुनाव परिणाम को लेकर ये भी कहा जा रहा है कि केजरीवाल सरकार को सत्ता से हटवाकर कांग्रेस ने गोवा, गुजरात और हरियाणा की हार का बदला ले लिया। लेकिन ये प्रचार राहुल गाँधी को किरकिरी से बचाने के लिए किया जा रहा है। यदि निष्पक्ष विश्लेषण करें तो ये बात सामने आती है कि आम आदमी पार्टी सरकार तो अपनी विफलताओं और श्री केजरीवाल सहित कुछ अन्य  नेताओं के दामन पर लगे भ्रष्टाचार के कारण जनता का विश्वास खो बैठी किंतु श्री गाँधी के खुलकर मैदान में आने के बाद भी दिल्ली की जनता ने कांग्रेस को एक सीट लायक भी नहीं समझा । उसे उम्मीद थी कि वह अपने परंपरागत दलित और मुस्लिम वोट बैंक को दोबारा हासिल कर दिल्ली विधानसभा में अपना खाता खोल सकेगी। इस चुनाव का ये रोचक पहलू था कि तीन बार कांग्रेस सरकार की  मुख्यमंत्री रहीं स्व. शीला दीक्षित के कार्यकाल को हर किसी ने दिल्ली के विकास का  स्वर्णिम काल बताया। ऐसे में ये उम्मीद जागी कि उनके बेटे संदीप दीक्षित नई दिल्ली सीट पर श्री केजरीवाल को पराजित कर कांग्रेस को संजीवनी प्रदान करेंगे । उन्होंने  लगभग 4500 मत प्राप्त कर उनको हरवा तो दिया किंतु जीत का सेहरा भाजपा प्रत्याशी प्रवेश वर्मा के सिर बंधा। कहा जा रहा है कांग्रेस द्वारा काटे गए मतों के कारण आम आदमी पार्टी 14 सीटें हार गई परंतु इससे कांग्रेस को  तो कुछ हासिल नहीं हुआ। इस प्रकार इस चुनाव में केवल श्री केजरीवाल की पराजय ही नहीं हुई कांग्रेस भी चारों खाने चित्त हुई है। जम्मू कश्मीर  में श्री गाँधी के ढीले - ढाले रवैये पर उमर अब्दुल्ला की नाराजगी चुनाव के दौरान ही सुनाई दी थी। उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भी वे मतदाताओं को कांग्रेस की तरफ आकर्षित नहीं कर सके। महाराष्ट्र में तो पार्टी का प्रदर्शन अब तक का सबसे दयनीय रहा। लेकिन दिल्ली में श्री गाँधी ने जिन तीखे तेवरों के साथ प्रचार शुरू किया उससे ऐसा लगा कि कांग्रेस शून्य की शर्मनाक स्थिति से उबरेगी । उन्होंने मुस्लिम बहुल सीटों में बड़ी सभाएँ भी कीं लेकिन वहाँ भी कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं हुआ। कहने का आशय ये है कि लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के दम पर  नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद भी वे जनता के मन पर छाप छोड़ने में विफल रहे हैं। दिल्ली की सत्ता आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से छीनी थी किंतु बीते 12 साल में उसने कभी इस बात की इच्छा शक्ति नहीं दिखाई कि वह उसे दोबारा हासिल करना चाहती है। इस बार वोट काटकर आम आदमी पार्टी को हरवाने पर वह जिस तरह खुश हो रही है उससे तो यही लगता है उसमें जीतने का आत्मविश्वास ही खत्म हो चुका है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 February 2025

बीरेन का त्यागपत्र किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा


मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे ही दिया। पार्टी  नेतृत्व  पर बीरेन सिंह को हटाने का दबाव लंबे समय से  था किंतु  वह निर्णय को टालता रहा । भले ही बीरेन सिंह मैतेयी और कूकी समुदाय के बीच भड़की हिंसा को रोक पाने में विफल रहे हों किंतु जो हालात उच्च न्यायालय के एक  फैसले से उत्पन्न हुए उनमें अचानक मुख्यमंत्री को हटाये जाने से नई समस्याएं उत्पन्न हो सकती थीं। स्मरणीय है मार्च 2023 में  उच्च न्यायालय द्वारा मैतेई समुदाय को अनु. जनजाति का दर्जा देने की मांग पर जल्द विचार करने की अनुशंसा की गई। मैतेई  राज्य का बहुसंख्यक समुदाय है जो इंफाल घाटी सहित मैदानी इलाकों में बसा हुआ है। उसकी 90 फीसदी आबादी हिन्दू धर्मावलंबी है जिसे अनु.जनजाति में नहीं होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों रहने की अनुमति नहीं है जहाँ कुकी और नगा समुदाय का बाहुल्य है जो अनु. जनजाति में हैं। इनकी ज्यादातर आबादी बीते अनेक दशकों में ईसाई बन चुकी है। पड़ोसी म्यांमार से भी यहाँ आकर काफी लोग बसते गए। कुकी और नगा लोगों की ये शिकायत रही है कि मणिपुर में राजनीतिक दृष्टि से चूंकि मैतेई ताकतवर हैं इसलिए नौकरियों आदि में भी उन्हीं को प्राथमिकता मिलती है। उधर मैतेई समुदाय ये दबाव बनाता रहा है कि मणिपुर का अधिकांश क्षेत्र पहाड़ी है जहाँ उनके बसने पर रोक है जबकि कुकी और नगा आबादी कम है। मैदानी इलाकों में आबादी बढ़ने से मैतेई समुदाय जगह की कमी से जूझ रहा था । अनु. जनजाति में शामिल होने की मांग के पीछे पहाड़ी इलाकों में रहने की अनुमति मिलना ही मुख्य था। लेकिन कुकी और नगा इसका विरोध इसलिए करते आये थे क्योंकि हिन्दू धर्मावलंबी मैतेई यदि पहाड़ी क्षेत्रों में बसने लगे तो वहाँ ईसाई  मिशनरियों की गतिविधियों पर रोक लग जायेगी।  इसके अलावा ये इलाका ड्रग्स की तस्करी का बड़ा अड्डा है। उत्तर पूर्व के जिन  राज्यों में अलगावादी ताकतें सक्रिय हैं उन्हें म्यांमार से  हथियार और धन की आपूर्ति भी इसी रास्ते से होना बताया जाता है। यही वजह है कि उच्च न्यायालय का फैसला आते ही कुकी और नगा समुदाय उग्र विरोध पर आमादा हो गए । जिसकी प्रतिक्रिया मैतेई समुदाय द्वारा जवाबी कारवाई से हुई और देखते - देखते मणिपुर जातीय संघर्ष में इस हद तक विभाजित हो गया कि मैतेई और कुकी ने अपने - अपने प्रभावक्षेत्र बना लिए और  दूसरे समुदाय के व्यक्ति के अपने क्षेत्र में आते ही उसकी नृशंस हत्या करने तथा महिलाओं पर अमानुषिक अत्याचार करने में भी संकोच नहीं किया गया। इसमें  कौन सा पक्ष कितना दोषी था ये तय कर पाना बेहद कठिन है। यद्यपि लगभग एक वर्ष बाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले के उस हिस्से को अलग कर दिया जिसमें मैतेई समुदाय को अनु. जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा थी। लेकिन तब तक मणिपुर पूरी तरह जातीय  हिंसा की चपेट में आ चुका था। मुख्यमंत्री पर ये आरोप लगता रहा कि उन्होंने मैतेई समुदाय को संरक्षण प्रदान किया ।सरकार के सामने सेना के जरिये हालात काबू करने का विकल्प था किंतु जिस  कारण से छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के विरुद्ध सैन्य ऑपरेशन से परहेज किया गया उसी नीति के तहत कुकी और नगा बाहुल्य वाले पहाड़ी क्षेत्र में सैन्य कारवाई करने से बचा गया। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार भारत में अस्थिरता फैलाने की इच्छुक विदेशी ताकतें मणिपुर के घने जंगलों से घिरे पहाड़ी इलाके को ड्रग कारोबार का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बनाने की कोशिश में जुटी हुई हैं। अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता आने के बाद  ड्रग कारोबारियों को नये अड्डे की जरूरत थी। ऐसे में कुकी और नगा भी अपने प्रभाव वाले इलाकों में मैतेई आबादी के बसने का वैसे ही विरोध करने लगे जैसे कश्मीर घाटी में भारत के अन्य हिस्सों के लोगों का किया जाता रहा । ये देखते हुए मणिपुर की समस्या केवल मुख्यमंत्री बदलने से हल होने वाली नहीं थी। इसीलिए केंद्र सरकार ने  अब तक धैर्य रखा क्योंकि लोकसभा चुनाव के पहले कोई बड़ा कदम उठाने से वह बचना चाह रही थी। तीसरी पारी में  बहुमत से वंचित रह जाने के कारण  नरेंद्र मोदी ने कुछ राज्यों के चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के बाद मणिपुर की समस्या हल करने की तैयारी की जिसके पहले चरण के तौर पर दिसंबर 2024 में राज्यपाल पद पर किसी राजनेता की नियुक्ति की बजाय पूर्व गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को तैनात किया जो इस राज्य में जातीय हिंसा भड़कने के समय भी केंद्र में गृह सचिव थे और गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। उस नियुक्ति के चंद महीनों के भीतर ही मुख्यमंत्री का त्यागपत्र किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री इस समय राजनीतिक तौर पर पुरानी स्थिति में लौट आये हैं और आगामी अनेक महीनों तक किसी राज्य में चुनाव भी नहीं है। इसलिए मणिपुर के बारे में  किसी बड़े फैसले की उम्मीद की जा सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 9 February 2025

दिल्ली के नतीजों के बाद इंडिया गठबंधन का भविष्य अधर में

      दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार विजय के बाद राष्ट्रीय राजनीति में नये समीकरण बनने के आसार हैं। आम आदमी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले ये रोना रो रहे हैं कि कांग्रेस ने उसे 14 सीटें हरवा दीं जिनमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे दिग्गज भी हैं। वहीं कांग्रेस ये प्रचार करवा रही है कि आम आदमी पार्टी अपने गिरेबान में झांके जिसने गोवा, गुजरात और हरियाणा में अपने  उम्मीदवार उतारकर उसको जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। ये बात भी कही जा रही है कि आम आदमी पार्टी के हारने से दिल्ली में कांग्रेस के दोबारा खड़े होने की संभावना बढ़ गई है। यद्यपि किरकिरी कांग्रेस की भी जमकर हुई क्योंकि राहुल गाँधी के खुलकर मैदान में उतरने के बाद भी 2015 और 2020 की तरह इस बार भी वह शून्य पर ही अटकी रही।

        रोचक बात ये रही कि दिल्ली के चुनाव ने इंडिया गठबंधन की अंतर्कलह को भी सार्वजनिक कर दिया। तृणमूल कांग्रेस, सपा और शिवसेना ( उद्धव) ने ऐलनिया आम आदमी पार्टी का समर्थन किया जबकि लालू यादव की राजग कांग्रेस के साथ खड़ी नजर आई। हालांकि लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ी आम आदमी ने नतीजे आते ही विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की इकतरफा घोषणा कर दी। इसके बाद हरियाणा में उसने प्रत्याशी अड़ाकर कांग्रेस की उम्मीदों पर झाड़ू फेर दी और जम्मू कश्मीर में भी   एकला चलो की नीति अपनाई। महाराष्ट्र चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन में नेतृत्व का विवाद खड़ा हो गया। उमर अब्दुल्ला ने उसे भंग करने जैसा तंज तक कसा। तेजस्वी यादव भी बोल उठे वह तो लोकसभा चुनाव तक ही था।

     इधर दिल्ली चुनाव में राहुल और अरविंद ने एक दूसरे पर  जो जहर बुझे तीर छोड़े उनकी वजह से कटुता चरम पर जा पहुंची । अब सत्ता हाथ से खिसक जाने के बाद श्री केजरीवाल दोबारा कांग्रेस के साथ बैठेंगे या नहीं ये बड़ा सवाल है। इसके अलावा  इंडिया गठबंधन में अन्य घटक दलों के सामने भी ये  दुविधा है कि वे आम आदमी पार्टी को साथ रखें या कांग्रेस को? हरियाणा और महाराष्ट्र की पराजय के बाद जहाँ राहुल गाँधी की लोकप्रियता और चुनाव जिताऊ क्षमता पर उंगलियाँ उठीं वहीं दिल्ली में सूपड़ा साफ होने के बाद वही स्थिति अरविंद केजरीवाल की हो गई। ये दोनों इंडिया गठबंधन में एक साथ रहेंगे ये बेहद मुश्किल होगा क्योंकि कांग्रेस के मन  में ये बात घर कर चुकी है कि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने ही उसे सत्ता से बेदखल किया था । साथ ही कुछ दूसरे राज्यों में वह कांग्रेस की पराजय का कारण बनी।

दिल्ली के बाद अब बिहार विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। वहाँ मुख्य रूप से तो लालू की राजग और कांग्रेस का गठबंधन है किंतु सपा तथा वामपंथियों सहित अन्य विपक्षी पार्टियां भी अपनी हिस्सेदारी मांगेगी। कांग्रेस वहाँ लालू के सहारे है। चूंकि हरियाणा , महाराष्ट्र और दिल्ली में उसका प्रदर्शन बेहद दयनीय रहा इसलिए तेजस्वी भी राहुल को कितना भाव देंगे ये कहना मुश्किल है। प. बंगाल में तो ममता बैनर्जी किसी को पाँव तक रखने नहीं देतीं।

      उ.प्र के मिल्कीपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल कर अखिलेश यादव की भी फजीहत कर दी। कुछ समय पूर्व हुए 9 विधानसभा उपचुनावों में 7 जीतकर योगी आदित्यनाथ अपना जलवा बिखेर चुके हैं। मिल्कीपुर की विजय ने राज्य में उनकी पकड़ और मजबूत कर दी जिससे अखिलेश का कद बौना हुआ है।

      ये देखते हुए इंडिया गठबंधन का भविष्य भी अधर में है क्योंकि शरद पवार और उद्धव ठाकरे की चिंता अपनी बची हुई पार्टी को बिखरने से बचाना है। वहीं दिल्ली के परिणाम ने  श्री केजरीवाल के पर कतर दिये जिसके बाद वे अपने घर को संभालने में जुटेंगे क्योंकि कल दोपहर से ही पंजाब में आदमी पार्टी में टूटन की आशंका व्यक्त होने लगी है।

  सबसे बड़ी बात लोकसभा चुनाव के बाद हुए राज्यों के चुनावों में  कांग्रेस के घटिया प्रदर्शन के बाद गठबंधन में  राहुल का दबदबा कम हो जाना है जिसके कारण कांग्रेस मुखिया की हैसियत खो बैठी है।

    आने वाले कुछ महीने विपक्ष की राजनीति में बड़े बदलाव के साक्षी बनेंगे क्योंकि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व लोकसभा में बहुमत से चूक जाने के बाद बेहद सवधानी से आगे बढ़ रहा है। तीन राज्यों में बड़ी जीत हासिल करने के बाद अब एनडीए में मोदी - शाह की वजनदारी और बढ़ गई है। बिहार में नीतीश कुमार भी अब ज्यादा सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं हैं। लालू कुनबे को भी भय है उसे   भी श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे जेल न जाना पड़े। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 February 2025

केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं पर दिल्ली की जनता ने झाड़ू फेर दी


दिल्ली विधानसभा चुनाव की मतगणना में अब तक आये रुझानों के अनुसार भाजपा 47 सीटों पर बढ़त के साथ स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने की स्थिति में आ गई है। अंतिम क्षणों में उलटफेर की उम्मीदें लगाए बैठी आम आदमी पार्टी के हाथ निराशा आई  है । अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया  जैसे बड़े चेहरे हार चुके हैं। मुख्यमंत्री आतिशी बमुश्किल 989 मतों से जीतीं । अनेक मंत्री हारने के कगार पर हैं। 2020 में 62 सीटें जीतने वाली पार्टी 23 पर सिमट गई। वहीं  कांग्रेस द्वारा शून्य का अपना रिकार्ड बरकरार रखा गया। इस पराजय ने  श्री केजरीवाल की आसमान छूती महत्वाकांक्षाओं पर झाड़ू फेर दी। राष्ट्रीय पार्टी बनने के बाद उनकी पार्टी  खुद को भाजपा का विकल्प मानने लगी थी और अरविंद अपने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कद का समझने लगे थे। बात यहीं तक सीमित नहीं रही। विपक्ष के साथ गठबंधन में रहकर भी केजरीवाल एंड कंपनी श्रेष्ठता के अहंकार में डूबकर ईमानदारी का  स्व प्रदत्त प्रमाणपत्र छाती पर चिपकाए पूरे जमाने को बेईमान बताने का षडयंत्र रचती रही। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन का सहारा लेकर सत्ता की राजनीति में आने पर अरविंद केजरीवाल अंधेरी कोठरी में रोशनदान के तौर पर उभरे। भ्रष्टाचार विहीन राजनीति के ध्वजावाहक के रूप में दिल्ली की जनता ने उनको ऐतिहासिक समर्थन दिया। लेकिन इसका श्रेय ईमानदार राजनीति के दावे को दिया जाए या आम आदमी पार्टी द्वारा किये गए मुफ्त  बिजली - पानी के वायदे को, ये गहन विश्लेषण का विषय बन गया है। सबसे बड़ी विडंबना ये हुई कि देश के तमाम भ्रष्ट  नेताओं की सूची जारी करने वाले श्री केजरीवाल भी भ्रष्टाचार के उसी गंदे नाले में डुबकी लगाने में पीछे नहीं रहे। सादगी के उनके आश्वासन विलासिता के भौंडे प्रदर्शन में बदल गए। जनता को मुफ्त के दाने फेंककर शराब घोटाले के जरिये करोड़ों की उगाही करने के खुलासे ने इस पार्टी के उजले चेहरे पर जो कालिख पोती उसी की परिणिती है आज के चुनाव परिणाम। पार्टी के संस्थापक सदस्यों को धकियाकर  बाहर करने वाले अरविंद को आज दिल्ली की जनता ने जिस तरह धकियाया वे उसी के लायक हैं। जमानत पर जेल से बाहर आने पर मुख्यमंत्री पद छोड़ते समय उन्होंने कहा था कि जनता की अदालत से बरी होने पर ही पद ग्रहण करेंगे। जनता ने अपना फैसला सुना दिया किंतु उनमें इतनी नैतिकता नहीं कि उसको स्वीकार कर अपने पापों का प्रायश्चियत करें। उल्टे वे चुनाव आयोग को बलि का बकरा बनाने की घिनौनी हरकत हार के पहले से ही करने लगे। ये चुनाव प्रधानमंत्री श्री मोदी के प्रति जनास्था का एक और प्रमाण है। लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटों के घटने पर उनका आभामण्डल धूमिल होने की उम्मीदें लगाए बैठे विघ्नसंतोषी तत्वों के चेहरे आज उतरे हुए हैं। अयोध्या की मिल्कीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद अखिलेश यादव जैसे बड़बोले नेता की भी फजीहत हो गई है। इंडिया गठबन्धन के भविष्य पर भी गहरे काले बादल मंडरा रहे हैं। 2 013 में भाजपा को रोकने के लिए  आम आदमी पार्टी की सरकार बनवाने की गलती कांग्रेस को कितनी महंगी पड़ी ये एक बार फिर सामने आ गया। राहुल गाँधी की आत्ममुग्धता ने पार्टी को इस चुनाव में भी शर्मिंदगी झेलने मजबूर कर दिया है। इस  परिणाम का राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी असर पड़ेगा क्योंकि महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे का वर्चस्व ध्वस्त करने के बाद भाजपा ने श्री केजरीवाल के अरमानों पर झाड़ू फेर दी है जिन्हें समर्थन देकर ममता बेनर्जी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे ने राहुल गाँधी की उपेक्षा करने में संकोच नहीं किया। हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद दिल्ली की शानदार जीत ने भाजपा और श्री मोदी को और मजबूती प्रदान कर दी जिसका असर बिहार और प. बंगाल के आगामी चुनाव पर पड़ना तय है। इंडिया गठबंधन में बिखराव के साथ ही कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के अलावा अन्य विपक्षी पार्टियों में टूटन की आशंका  बढ़ गई है। उद्धव ठाकरे के 6 सांसद टूटने की खबर इसका संकेत है। मुफ्त बिजली - पानी के बावजूद केजरीवाल कुनबे का सफाया कर दिल्ली की जनता ने ये संदेश भी दे दिया कि केवल रेवड़ियां बाँटकर उसे बहलाया नहीं जा सकता।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 February 2025

टोल टैक्स और जीएसटी में राहत भाजपा को आगे भी जीत दिला सकती हैं


केन्द्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख किये जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ। वेतन भोगियों के लिए यह सीमा 12.75 लाख है। असल में दिल्ली विधानसभा चुनाव में  मध्यमवर्गीय मतदाताओं को आकर्षित करने  के लिए भाजपा ने यह दांव चला । ज्यादातर एग्जिट पोल में दिखाई भाजपा सरकार बनने की संभावना सही निकली तो उक्त निर्णय ट्रम्प कार्ड साबित होगा। चर्चा है ऐसे और भी निर्णय लिए जाएंगे  क्योंकि दिल्ली का दंगल निपटते ही बिहार विधानसभा  चुनाव की रणनीति पर भाजपा काम करने लगेगी। लोकसभा चुनाव के पहले तक भाजपा इस आत्मविश्वास में थी कि राम मंदिर बनने के बाद वह 400 पार के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगी किंतु उ.प्र  के अलावा राजस्थान, हरियाणा , प. बंगाल और महाराष्ट्र में लगे झटकों से  वह 240 पर सिमट गई। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन से भले ही नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए किंतु भाजपा  समझ गई कि केवल भावनात्मक बातों से लम्बे समय तक जनता का समर्थन प्राप्त करते रहना संभव नहीं रहा। दिल्ली की चुनौती उसके लिए लोकसभा से कम नहीं थी जहाँ 1998 से वह सत्ता से बाहर थी। 2013 में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद  स्पष्ट बहुमत के अभाव में उसे विपक्ष में बैठना पड़ा तथा कांग्रेस की बैसाखी पर आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई और अरविंद केजरीवाल नई राजनीति के महानायक बनकर उभरे। लेकिन वह सरकार अल्पजीवी रही और 2015 में दोबारा चुनाव हुए। तब तक केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन चुकी थी। ऐसे में भाजपा को विश्वास था कि वह दिल्ली  में अपनी वापसी कर लेगी किंतु आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली और पानी के वायदों ने जादुई असर दिखाया और वह 70 में से 67 सीटें जीत गई। भाजपा को 3 पर संतोष करना पड़ा जबकि कांग्रेस शून्य पर आ गई। भाजपा के लिए ये बड़ा झटका था क्योंकि आम आदमी पार्टी की महत्वाकांक्षा  राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित होने की थी और देखते ही देखते वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने में कामयाब भी हो गई । 2020 में भी उसने दिल्ली में शानदार कामयाबी हासिल करते हुए 62 सीटें जीतीं । 2019 के लोकसभा चुनाव में जबरदस्त मोदी लहर के बाद आम आदमी पार्टी का दिल्ली  विधानसभा में जीतना बड़ी घटना थी। लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन से जन्मी पार्टी भी  प्रचलित ढर्रे पर चल पड़ी जिसकी वजह से   केजरीवाल एंड कंपनी का दामन जिस प्रकार दाग़दार होता चला गया। लेकिन मुफ्त की सुविधाओं के आकर्षण से दिल्लीवासी आम आदमी पार्टी के मोहपाश में फंसे हुए थे। भाजपा इसका तोड़ नहीं ढूँढ़ पा रही थी क्योंकि उसके पास श्री केजरीवाल की टक्कर का कोई चेहरा नहीं था।। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली की सातों सीटें जीतने के बाद उसको ये समझ में आ गया कि लोकसभा चुनाव में  समर्थन देने वाले अपने मतदाताओं को यदि विधानसभा में आम आदमी पार्टी के पक्ष में जाने से रोका जा सके तो वह दिल्ली की सत्ता प्राप्त कर सकती है। और यहीं से आयकर छूट की सीमा बढ़ाने का विचार जन्मा। देर से ही सही किंतु भाजपा नेतृत्व के दिमाग़ में ये बात आ ही गई कि मध्यमवर्गीय नौकरपेशा और व्यापारी को खुश करने से पूरा माहौल बदला जा सकता है। दिल्ली में भाजपा की प्रचंड जीत होने पर उसका श्रेय  काफी कुछ 12 लाख तक आय को कर मुक्त करने को ही मिलेगा। इसी क्रम में आज रिजर्व बैंक ने भी ब्याज दर घटा दी। अब जो खबर आ रही है वह भी जनता को खुश कर सकती है। इसका इशारा परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने टोल टैक्स में राहत देने पर विचार  के रूप में किया। उनके अनुसार कानूनी सलाह के बाद जल्द ही  टोल टैक्स संबंधी उन विसंगतियों को दूर किया जाएगा जिनसे जनता नाराज होती है। यदि ऐसा होता है तो पूरे देश को राहत मिलेगी। इसी के साथ केंद्र सरकार को चाहिए वह पेट्रोल और डीजल को भी जीएसटी के अंतर्गत लाये जिससे कि उनके दाम कम हों। महंगाई घटाने में ये फैसला क्रांतिकारी साबित होगा और  केंद्र सरकार के बारे में गैर भाजपा शासित राज्यों में भी सकारात्मक संदेश जाएगा। दिल्ली में केजरीवाल के करिश्मे को  केंद्र सरकार का महज एक फैसला यदि फुस्स करने में कामयाब हो जाता है तो ऐसे ही कुछ और फैसलों से  बिहार, प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल के आगामी मुकाबलों में भी भाजपा बड़ी सफलता हासिल कर सकती है। छोटी - छोटी सौगातें बांटने की बजाय समाज के हर  हर वर्ग को  राहत देने वाले निर्णय लिए जाएं  तो उनका दूरगामी प्रभाव  होता है। और फिर सबका साथ, सबका विकास केंद्र सरकार का ध्येय वाक्य भी तो है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 6 February 2025

दिल्ली में झाड़ू चले या कमल खिले किंतु कांग्रेस का हाथ खाली ही रहेगा


दिल्ली विधानसभा के बहुप्रतीक्षित चुनाव हेतु  मतदान हो गया। इस बार कांग्रेस द्वारा काफी जोर लगाए जाने से  मुकाबला त्रिकोणीय प्रतीत हुआ किंतु एक बात सभी मान रहे हैं कि सत्ता आम आदमी पार्टी या भाजपा में से ही किसी एक को  मिलेगी। कांग्रेस का उद्देश्य  2015 और 2020 के चुनाव में एक भी सीट नहीं मिलने का दाग धोना मात्र रह गया। यद्यपि लगता नहीं है  कि वह उसमें सफल होगी और  इसका कारण  आम आदमी पार्टी को लेकर उसकी नीतिगत अस्पष्टता है। यदि अरविंद केजरीवाल कांग्रेस को गठबंधन का प्रस्ताव देते तब राहुल गाँधी बिना संकोच उसे स्वीकार कर लेते किंतु हरियाणा चुनाव में उत्पन्न तल्खी के कारण वह नहीं हो सका , जिसके बाद कांग्रेस ने  पूरी ताकत से उतरने का मन बनाया। हालांकि श्री गाँधी  प्रचार में देर से उतरे । यही नहीं उन्होंने अजय माकन द्वारा केजरीवाल सरकार के  विरुद्ध की जाने वाली पत्रकार वार्ता तक रद्द करवा दी। यही वजह है कि कांग्रेस को लेकर  यही सवाल उठता रहा कि  कि वह अपना मत प्रतिशत कितना बढ़ा सकेगी ? स्मरणीय है उसके परंपरागत दलित और मुस्लिम मतदाताओं ने पिछले दो चुनावों में आम आदमी पार्टी का साथ दिया था। चुनाव विश्लेषक भी इसी बहस में उलझे रहे कि क्या कांग्रेस आम आदमी पार्टी की पराजय का कारण बनेगी ? ये बात पूरी तरह सही है कि इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को चिंता में डालने का काम कांग्रेस ने बखूबी किया। नई दिल्ली सीट पर संदीप दीक्षित को उतारकर अरविंद केजरीवाल पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में भी  वह कामयाब रही । इससे अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्साह में वृद्धि हुई किंतु राष्ट्रीय नेतृत्व की प्रारंभिक उदासीनता के कारण  आम जनता को ये एहसास करवाने में नाकामयाब रही कि वह भी सत्ता की दौड़ में है। ऐसे में उसकी छवि वोट कटवा की होकर रह गई। यदि इस चुनाव में उसका मत प्रतिशत दहाई का आंकड़ा भी छू सके तो बड़ी बात होगी। यही वजह है कि मतदान के बाद  गत दिवस जितने भी एग्जिट पोल जारी हुए उनमें से 80 फीसदी भाजपा की हवा बता रहे हैं जबकि  20 प्रतिशत अभी भी आम आदमी पार्टी की सरकार बने रहने का दावा कर रहे हैं। हालांकि जिन  एजेंसियों के निष्कर्ष कल शाम प्रसारित हुए उनमें एक - दो ही जानी - पहिचानी और अनुभवी होने से भ्रम की स्थिति बनी हुई है। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा में भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल की जिस तरह भद्द पिटी उसके बाद इन्हें संचालित करने वाली एजेंसियां बेहद सावधानी बरत रही हैं। कुछ ने तो सीटों का अनुमान लगाने और एग्जिट पोल से खुद को दूर ही कर लिया। सी - वोटर नामक संस्था के संचालक यशवंत देशमुख भी हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव में गलत साबित होने के बाद दिल्ली  को लेकर कोई ठोस भविष्यवाणी करने से बचते रहे।  लोकसभा चुनाव में अपना एग्जिट पोल गलत साबित होने पर विपक्षी दलों की तीखी आलोचना के कारण टीवी शो में रो पड़ने वाले एक्सिस माय इंडिया के प्रमुख प्रदीप गुप्ता ने हरियाणा में कांग्रेस की जीत का अनुमान लगाया किंतु वहाँ भाजपा की सरकार लौट आई। उसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में मतदान के एक दिन बाद एग्जिट पोल जारी किया जिसके पूरी तरह सच निकलने पर  उनकी  साख दोबारा कायम हो गई। दिल्ली चुनाव पर श्री गुप्ता गहन विश्लेषण के बाद आज शाम अपना एग्जिट पोल जारी करेंगे । वैसे भी मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल के निष्कर्ष जारी करना जल्दबाजी लगती है। तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए किंतु मतदान के क्षेत्रवार आंकड़ों को एकत्र कर उनसे किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए कुछ घंटे अपर्याप्त होते हैं। इसीलिए कई लोग  गत दिवस जारी हुए एग्जिट पोल पर संदेह जता रहे है। चूंकि दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनावों में सर्वेक्षण बुरी तरह गलत साबित हुए थे इसलिए आम आदमी पार्टी का मानना है इस बार भी बाजी वही मारेगी। ज्यादातर विश्लेषक भी मान रहे हैं कि भाजपा और उसके बीच कड़ा मुकाबला है  किंतु एग्जिट पोल के इस निष्कर्ष पर आम सहमति है कि कांग्रेस का प्रदर्शन  इस बार भी शर्मनाक रहेगा । केजरीवाल सरकार के विरुद्ध शराब घोटाले को उजागर करने वाली पार्टी यदि जनता का भरोसा जीतने में एक बार फिर असफल होती है तो यह उसके लिए बड़ा झटका होगा क्योंकि  इंडिया गठबंधन के घटक दलों में  सपा, तृणमूल और शिवसेना (उद्धव) ने उसके बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन किया। इससे लगता है दिल्ली में चाहे आम आदमी पार्टी सत्ता में लौटे या भाजपा की ताजपोशी हो किंतु कांग्रेस का हाथ खाली ही रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 February 2025

भारत भी अवैध विदेशी नागरिकों को बाहर करे


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनावी वायदे के अनुसार अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों का निष्कासन शुरू कर दिया है। उसी क्रम में गैरकानूनी तरीके से रह रहे भारतीय नागरिकों के एक दस्ते को वायुयान से भारत भेज दिया गया जो संभवतः आज यहाँ पहुँच जायेगा। इसके पहले  ग्वाटेमाला, पेरू और होंडूरास जैसे देशों के नागरिकों को पकड़कर उनके देश भेजा जा चुका है। भारत आ रहे 200 से अधिक प्रवासियों में से लगभग 104 के बारे में जानकारी हासिल हो चुकी है ।  जो चित्र प्रसारित हुए उनमें विमान में बिठाये जा रहे उक्त प्रवासियों को हथकड़ी लगाई गई है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह - तरह की टिप्पणियां देखने मिल रही हैं जिनमें प्रधानमंत्री पर तंज कसे जाने के साथ देश की प्रतिष्ठा धूमिल होने की बात है। हमारे देश के किसी नागरिक पर विदेश में मुसीबत आने पर उसकी मदद करना सरकार का कर्तव्य है। और ऐसा किया भी गया है। पश्चिम एशिया के अनेक देशों में युद्ध की स्थिति में वहाँ कार्यरत भारतीयों को सुरक्षित निकालने में केंद्र सरकार के अभियानों की सफलता की सर्वत्र प्रशंसा हुई। सबसे बड़ा अभियान तो रूस - यूक्रेन के बीच जंग शुरू होने के बाद यूक्रेन में अध्ययनरत भारतीय छात्रों को वहाँ से सुरक्षित निकालने का था।  भारत के बचाव दल ने पाकिस्तान सहित कुछ अन्य देशों के छात्रों को भी सुरक्षित निकालने में सहायता की। ऐसे में ये सवाल  बेमानी कि  अवैध रूप से रह रहे भारतीय  प्रवासियों को हथकड़ी लगाने से देश की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। किसी भी देश की यात्रा  के अलावा अध्ययन, नौकरी या कारोबार करने के लिए विधिवत अनुमति लेनी पड़ती है जो वीजा की शक्ल में होती है।अमेरिका में पढाई और नौकरी करने का आकर्षण नया नहीं है। वैसे भी उस देश को  दुनिया भर से आये प्रवासियों द्वारा ही बनाया गया।  लेकिन अब वह एक  संप्रभुता संपन्न राष्ट्र है जिसके अपने नागरिकता नियम हैं। चूंकि वहाँ संपन्नता है और जीवन यापन की गुणवत्ता बहुत ही अच्छी है इसलिए दुनिया भर के लोग इस देश में बसने को लालायित रहते हैं। वहाँ अध्ययन करने जाने वाले छात्र भी शिक्षा पूरी करने के बाद वहीं काम - धंधा तलाशकर बस जाते हैं और फिर नागरिकता हासिल करने में जुट जाते हैं। भारत में अमेरिका और कैनेडा का आकर्षण बेहिसाब है। जिन्हें वैध तरीके से वीजा मिल जाता है वे तो आसानी से वहाँ जाकर रहते हैं किंतु बिना वैध दस्तावेजों के पहुंचकर रहने वाले दलालों का सहारा लेकर पड़ोसी देशों की सीमा पार कर घुस आते हैं। ट्रम्प ने ऐसे ही लोगों को  निकाल बाहर करने की मुहिम छेड़ दी और उसी के तहत अवैध रूप से वहाँ बसे भारतीय प्रवासियों को वापिस भेजा गया है। अभी तो ये शुरुआत है। ऐसे हजारों भारतीय अवैध प्रवासी  वहाँ से वापिस भेजे जाएंगे। यदि ट्रम्प सरकार चाहे तो वह इन्हें सजा देकर जेल में डाल सकती है किंतु उस स्थिति में उस पर आर्थिक भार पड़ता। इसलिए अवैध प्रवासियों को उनके देश भेजने का निर्णय लिया गया। भारत में जिन लोगों ने इन प्रवासियों को भेजे जाने के तरीके को देश की प्रतिष्ठा से जोड़ा वे भावनात्मक दृष्टि से तो सही हैं किंतु हमारे देश का कोई व्यक्ति यदि किसी अन्य देश में अवैध तरीके से घुसे तो उसके प्रति सहानुभूति उचित नहीं लगती। जो प्रवासी भारतीय विदेशों में बसे हैं उन्होंने अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का सम्मान बढ़ाया है। ऐसे में बिना वैध दस्तावेजों के वहाँ घुसने वाले देश की प्रतिष्ठा को धूमिल करते हैं। भारत में भी बांग्लादेशी  और रोहिंग्या घुसपैठियों की समस्या लाइलाज होती जा रही है। अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर जो फैसला किया हमें उससे प्रेरणा लेकर अपने देश में घुस आये  घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के बारे में कदम उठाना चाहिए। सबसे पहले उनके नाम मतदाता सूची से हटाकर उन्हें मिल रही सरकारी सुविधाएं रोकी जाएं। जो दल इसका विरोध करें उनका पर्दाफाश जनता के सामने हो जाएगा। अमेरिका यदि किसी ऐसे भारतीय प्रवासी के साथ अपमानजनक व्यवहार करे जिसके पास वैध दस्तावेज हों तब उसका विरोध करने में कोई संकोच करने की जरूरत नहीं होना चाहिए किंतु जो लोग गलत तरीके से किसी देश में घुसें उनसे हमदर्दी रखना गलत बातों को प्रोत्साहन देना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 February 2025

राहुल के मुँह से सच्चाई निकल ही गई


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने गत दिवस राष्ट्रपति के अभिभाषण में ज्यादातर तो पुरानी बातों को ही दोहराया किंतु बेरोजगारी के मुद्दे पर वे ऐसी टिप्पणी कर गए जिसने  यूपीए सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उल्लेखनीय है  हाल ही में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का दावा कांग्रेस हमेशा करती आई है। विशेष रूप से बेरोजगारी को लेकर वह वर्तमान मोदी सरकार पर तीखे हमले करती रही। राहुल भी अपनी सभाओं में उनकी सत्ता बनने पर नौजवानों को रोजगार की गारंटी बांटते  हैं।   विगत लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी को इंडिया गठबंधन ने बड़ा मुद्दा बनाया था जिसका कुछ - कुछ असर भी देखने मिला। लेकिन गत दिवस लोकसभा में दिये भाषण में श्री गाँधी ने युवाओं को देश का भविष्य बताते हुए कहा  उनके लिए काम करना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने मोदी सरकार द्वारा प्रारंभ किये गए मेक इन इंडिया अभियान की तो प्रशंसा की किंतु साथ ही ये भी जोड़ दिया कि वह अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। सबसे बड़ी बात उन्होंने ये कही कि बेरोजगारी का  हल करने में यूपीए वन  और टू  के अलावा वर्तमान   सरकार भी  असफल रहीं। इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि 1991 में बनी  कांग्रेस के नेतृत्व वाली पी.वी  नरसिम्हा राव सरकार द्वारा किये गए आर्थिक सुधारों में उपभोग पर तो जोर दिया गया किंतु उत्पादन बढ़ाने के प्रति उदासीनता बरती गई। और वही गलती आने वाली सरकारों के दौर में दोहराई जाती रही। उनका आशय ये था कि उत्पादन बढ़ाने से रोजगार में वृद्धि के साथ  ही विदेशों पर हमारी निर्भरता कम होगी जिससे कि देश आर्थिक और कूटनीतिक दबावों से मुक्त रहेगा। यद्यपि श्री गाँधी ने अभिभाषण के बहाने मोदी सरकार पर जमकर अपनी भड़ास निकाली। महाराष्ट्र में हुई करारी हार की कसक  भी उनके उद्बोधन में चुनाव आयोग पर निशाना साधने के रूप दिखाई दी किंतु पूरे भाषण में उन्होंने एक बात ईमानदारी से स्वीकार कर ली कि यूपीए सरकार ने भी बेरोजगारी घटाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया। उनके भाषण के इन अंशों की प्रशंसा भी हुई क्योंकि उनमें विपक्ष के नेता के साथ ही एक राष्ट्रीय सोच नजर आई।  तथ्यात्मक स्थिति का विश्लेषण करने पर ये बात सामने आयेगी कि  राव सरकार द्वारा जिस उदारीकरण और मुक्त व अर्थव्यवस्था की नीति लागू की गई उसे कमोबेश उसके बाद आई सभी केंद्र सरकारों ने जारी रखा। उस सरकार में वित्तमंत्री डाॅ. मनमोहन  सिंह ही थे जिन्हें कांग्रेस आर्थिक सुधारों का जनक मानती है। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस ने कभी भी राव साहब को इस बात का श्रेय नहीं दिया कि उन्होंने डाॅ. सिंह की प्रतिभा को पहिचानकर उन्हें अपनी सरकार में शामिल किया। बाद में उनको  गाँधी परिवार ने प्रधानमंत्री भी बनवाया। जिन आर्थिक सुधारों को डाॅ. सिंह ने प्रारंभ किया उनके लिए वैश्विक परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार थीं। विश्व व्यापार संगठन के गठन के बाद नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों को जारी रखने से देश अलग - थलग पड़ जाता। उदारवाद ने विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे तो खोले किंतु उसके कारण विदेशी उत्पादों की आवाजाही भी बढ़ने लगी जिसका दुष्प्रभाव भारतीय उद्योगों के बन्द होने के रूप में आने लगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में कारोबार जमाकर एक बड़े बाजार पर कब्जा तो जमाया ही किंतु  सबसे बड़ा बदलाव हुआ उपभोक्तावाद रूपी पाश्चात्य जीवनशैली के प्रादुर्भाव के रूप में। उदारवाद ने उधारवाद की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया जिससे विदेशी कंपनियों को भरपूर मुनाफा हुआ। राहुल ने उपभोग और उत्पादन के बीच संतुलन बिगड़ने की जो बात कही तो उसके लिए डाॅ. सिंह ही जिम्मेदार माने जाएंगे क्योंकि आर्थिक सुधारों ने  रोजगार विहीन विकास को जन्म दिया। उत्पादन नहीं बढ़ा ये कहना पूर्ण सत्य नहीं है। लेकिन वैश्विक बाजारों में जिस तरह चीन छाया हुआ  है उसकी तुलना में भारत बहुत पीछे रह गया। श्री गाँधी ने रोजगार और उत्पादन बढ़ाने में यूपीए सरकारों की असफलता को स्वीकार कर निश्चित रूप से ईमानदारी दिखाई किंतु इसके बाद उन्हें और उनकी पार्टी को वर्तमान केंद्र  सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं रह जाता जिसने 10 वर्षों में भारत को दुनिया की सबसे तेज दौड़ती व्यवस्था के तौर पर प्रतिष्ठित कर दिया। यही वजह है कि भारत  विदेशी निवेशकों का मनपसंद  बन गया। हालांकि श्री गाँधी ने उपभोग और उत्पादन के बीच असंतुलन की बात छेड़कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विकास दर कितनी भी ऊपर चली जाए किंतु  वह रोजगार बढ़ाने में सहायक न हो तो उसका लाभ ही क्या? आजकल चुनाव घोषणापत्र में सत्ता संभालते ही लाखों नियुक्तियों का वायदा किया जाता है किंतु ये नौकरियां आएंगी कहाँ से ये कोई नहीं बताता। श्री गाँधी के पास भी इस समस्या का कोई हल नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 February 2025

संत समाज की एकता के बिना सनातन समुदाय की एकजुटता असंभव

प्रयागराज महाकुंभ में बसंत पंचमी के तीसरे और अंतिम अमृत स्नान पर 3 से 4 करोड़ लोगों के पवित्र संगम में डुबकी लगाने की संभावना है। रविवार  से ही श्रृद्धालुओं का आना शुरू हो चुका था। 13 जनवरी से अब तक 37 करोड़ लोग महाकुंभ में आ चुके हैं। महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस विराट आयोजन में 40 करोड़ लोगों के आगमन का अनुमान था जो बढ़कर 50 करोड़ हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। मौनी अमावस्या के  हादसे के बाद मेला प्रबंधन में जुटा अमला पूरी तरह मुस्तैद है। प्रयागराज में वाहनों का प्रवेश 5 तारीख तक रोक दिया गया। आवागमन अलग - अलग रास्तों से होने की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ स्थित नियंत्रण कक्ष में प्रातः 3 बजे ही आकर बैठ गए। अमावस्या पर हुई दुर्घटना के बाद  व्यवस्था के लिए तैनात अधिकारियों पर आरोप लगना तो स्वाभाविक था किंतु जिस तरह की राजनीति हो रही है वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगती। सबसे दुखद ये रहा कि अविमुक्तेश्वरानंद जी  नामक शंकराचार्य द्वारा अत्यंत क्रोधित अंदाज में योगी जी को अक्षम बताते हुए उनसे त्यागपत्र मांग लिया गया। उसके बाद सोशल मीडिया पर दोनों तरफ से  समर्थन और विरोध का सिलसिला शुरू हो गया। उधर चारों पीठों के शंकराचार्यों में सबसे वरिष्ट पुरी के निश्चलानंद सरस्वती जी ने अविमुक्तेश्वरानंद जी की नियुक्ति को ही फर्जी बता दिया। इसके साथ ही ये जानकारी भी प्रसारित होने लगी कि ब्रह्मलीन द्वीपीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद जी द्वारा अविमुक्तेश्वरानंद जी को ज्योतिष (बद्रीनाथ) पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किये जाने के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है जिसका फैसला लंबित है। स्मरणीय है दो पीठों के शंकराचार्य रहे स्वरूपानंद जी की नियुक्ति पर उठा विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय तक गया था। उनके विरोधी रहे  स्वामी वासुदेवानंद जी खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य घोषित करते आये हैं। उनके भी हजारों भक्त हैं। स्वामी स्वरूपानंद जी के निधन के बाद जब उनकी कथित वसीयत के आधार पर शारदा पीठ में स्वामी सदानंद जी और ज्योतिष पीठ में अविमुक्तेश्वरानंद जी को शंकराचार्य बनाये जाने की घोषणा हुई तब दशनामी संन्यासी  अखाड़ा सहित काशी विद्वत परिषद ने दोनों नियुक्तियों को परंपरा विरुद्ध बताते हुए कहा कि स्वरूपानंद जी की नियुक्ति का विवाद ही नहीं सुलझा तब वे अपना उत्तराधिकारी कैसे नियुक्त कर गए? उल्लेखनीय है सदानंद जी तो ज्यादा बोलते नहीं लिहाजा उन्हें लेकर उतना बवाल नहीं होता किंतु अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने बयानों के कारण शुरुआत से ही विवादों में  फंसते चले गए? निश्चलानंद जी ने तो उनके ब्राह्मण न होने की बात तक कह डाली। उनकी नियुक्ति वैध है या अवैध ये निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय से होगा किंतु सनातन धर्म के सबसे सम्मानित पद  का निर्णय यदि अदालत करे तो यह उस पद के साथ जुड़े जगद्गुरु जैसे अति सम्मानित संबोधन का अपमान है। आद्य शंकराचार्य द्वारा चार प्रमुख पीठाधीश्वरों की नियुक्ति की जो व्यवस्था तय की गई थी उसमें दशनामी अखाड़ा और काशी विद्वत परिषद की भूमिका यदि निर्णायक है तब प्रत्येक संत - महात्मा का यह धर्म है कि उसका पालन करे। ये बात अटपटी लगती है कि शंकराचार्य पर नियुक्त व्यक्ति को दूसरे शंकराचार्य ही स्वीकार न करें। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि चारों पीठों के अधीश्वरों में मतैक्य और आपसी विश्वास  नहीं हैं तब वे सनातन धर्म के अनुयायियों को एकजुट रहने का उपदेश वे किस अधिकार से देंगे? इसका दुष्परिणाम ये है कि एक शंकराचार्य का भक्त दूसरे के प्रति असम्मानजनक टिप्पणी करने से बाज नहीं आता। महाकुंभ में अपने बयानों के कारण अविमुक्तेश्वरानंद जी संत समाज में अकेले पड़ गए जिसे अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता । सनातन धर्म से जुड़े असंख्य संतों में प्रमुख स्वामी अवधेशानंद जी ने महाकुंभ के प्रबंध को लेकर आलोचना करने वालों को जिस तरह आड़े हाथ लिया वह अप्रत्यक्ष तौर पर अविमुक्तेश्वरानंद जी पर ही निशाना है जो अपने स्वभाव विशेष की वजह से आये दिन विवादों में घिर जाते हैं। कुंभ में आयोजित होने वाली धर्म संसद  सनातन धर्म को व्यवस्थित करने हेतु निर्देश जारी करती है। अतीत में उसके द्वारा लिए गए अनेक निर्णयों का राष्ट्रीय जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वर्तमान समय में सनातन धर्म  पर जिस प्रकार देश के भीतर और बाहर दोनों से हमले हो रहे हैं उन्हें देखते हुए संत समाज को भी अपने मतभेद दूर कर  एकजुट होना चाहिए। अन्यथा हिन्दू समाज को टुकड़ों में बांटकर देश को कमजोर करने का षडयंत्र सफल होते देर नहीं लगेगी। याद रहे संत समाज की एकता के बिना सनातनी समुदाय को एक सूत्र में बांधना असंभव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 February 2025

महामंडलेश्वर और जगद्गुरु की पदवी मज़ाक बन गई


महाकुंभ से यूँ तो रोज नई - नई खबरें आ रही हैं किंतु उन सबके बीच नये महामंडलेश्वर बनाये जाने को लेकर विवाद भी सामने आये हैं। किन्नर अखाड़े द्वारा एक पूर्व अभिनेत्री ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उसमें  मतभेद पैदा हो गए तथा अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास  ने अभिनेत्री को नियुक्त करने वाले आचार्य डाॅ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को भी अखाड़े से बाहर कर दिया। ममता का फिल्मी कैरियर बहुत ही संक्षिप्त रहा। उसके बाद वे अंडरवर्ल्ड के साथ जुड़ने के आरोप में घिर गईं। अपने अश्लील फोटो शूट के लिए भी वे काफी बदनाम हुईं थीं। एक सप्ताह पहले ही उन्होंने  संन्यास लेकर महामंडलेश्वर की पदवी हासिल की थी जिसे गत दिवस छीन लिया गया। ये पहला अवसर नहीं है जब महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद किसी को हटाया जाए। कुछ वर्ष पूर्व एक साध्वी कहलाने वाली महिला को भी महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उनसे जुड़े विवादों की वजह से हटाया गया था। जब भी कुंभ का आयोजन होता है तब महामंडलेश्वर की पदवी कुछ लोगों को अखाड़ों द्वारा प्रदान की जाती है। वे लोग संन्यास लेकर सांसारिक मोह  - माया से स्वयं को मुक्त करते हैं। इन पदवियों को धारण करने वाले सनातन धर्म की संत परंपरा के ध्वजावाहक होने के कारण समाज में सम्मान के पात्र होते हैं। त्याग और तपस्या इनकी पहिचान होती है। उनके आचरण के कारण लोग इन्हें अपना आदर्श मानते हैं। समाज में धर्ममय वातावरण बनाकर लोगों को सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करना  इनका कर्तव्य होता है। एक तरह से उन्हें अपना जीवन समाज और धर्म की सेवा के लिए अर्पित करना होता है। सनातन धर्म में जो व्यवस्था आद्य शंकराचार्य बनाकर गए उसमें ऐसी ही अनेक पदवियां हैं। इन पर नियुक्तियाँ आसानी से नहीं होती थीं। पदवी दिये जाने के पूर्व संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक ज्ञान और क्षमता का सूक्ष्म परीक्षण किया जाता था। वरिष्ट धर्माचार्य गहन विचार - विमर्श के उपरांत इस बारे में फैसले किया करते थे। इसी तरह आद्य शंकराचार्य द्वारा गठित चार प्रमुख पीठों के शंकराचार्य जो जगद्गुरु कहलाते हैं , की  चयन प्रक्रिया भी थी। लेकिन धीरे - धीरे उनके प्रति लापरवाही देखने मिलने लगी और महामंडलेश्वर तो क्या शंकराचार्य की नियुक्ति को लेकर भी विवाद बढ़ने लगे। जिन चार पीठाधीश्वरों पर सनातन धर्म के संरक्षण और संवर्धन का दायित्व है उन्हीं में आपसी मतभेद हैं। अदालतों में असली और नकली कै मामले चल रहे हैं। चार मुख्य पीठों के अलावा न जाने कितनी छोटी - छोटी पीठ सामने आने लगी हैं जिनके महंत जगद्गुरु की पदवी हासिल करते जा रहे हैं। इस कारण सनातन धर्म के इन बेहद सम्मानित पदों की प्रतिष्ठा धूमिल होती जा रही है। महामंडलेश्वर और जगद्गुरु जैसी पदवियां राजनीतिक नियुक्तियों जैसी होने लगी हैं। यही कारण है उनके प्रति आदरभाव घटता जा रहा है। जो अखाड़े या अन्य धार्मिक संस्थाएं ये पदवियां बांटती हैं उनके विवेक और ईमानदारी पर संदेह बढ़ता जा रहा है जो सनातन धर्म की प्रतिष्ठा और पवित्रता के लिए खतरा है। संन्यास कोई मजाक नहीं है कि कोई भी आकर रातों -  रात सब कुछ त्यागने का दावा करते हुए महामंडलेश्वर या जगद्गुरु जैसी पदवी हासिल कर महिमामंडित हो जाए। ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने और महज सात दिनों बाद  हटाये जाने का निर्णय ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि संबंधित अखाड़े का संचालन कर रहे लोगों में आपसी सामंजस्य का नितांत अभाव है। इसी तरह जिस प्रकार थोक के भाव नये जगद्गुरु नियुक्त होते जा तरह हैं उसकी वजह से चार प्रमुख शंकराचार्यों का प्रभाव घट  रहा है क्योंकि नव नियुक्त जगद्गुरु खुद को किसी से कम नहीं समझते। जनसंख्या में वृद्धि के कारण अतीत में कुछ उप पीठें बनाई गई थीं। उनके प्रमुख को भी जगद्गुरु की पदवी दी गई किंतु जिस तेजी से  नये जगद्गुरु बन रहे हैं उससे इनके बीच भी खींचातानी शुरू होने की आशंका बढ़ रही है।  देश में अनेक ऐसे संत हैं जिन्हें उनकी विद्वता, सरलता और धर्मनिष्ठा के कारण महामंडलेश्वर अथवा जगद्गुरु की पदवी हासिल किये बिना भी सम्मान प्राप्त है। दूसरी ओर कुछ कथावाचक पांच सितारा जीवनशैली और फिल्मी सितारों जैसी चमक - दमक के कारण आम लोगों की पहुँच से बाहर हो गए हैं क्योंकि उनके आयोजन में करोड़ों का खर्च होता है। महाकुंभ के अवसर पर आयोजित होने वाली धर्म संसद में सनातन धर्म के साथ जुड़ती जा रहीं इन विसंगतियों को दूर करने पर गंभीरता से विचार - विमर्श होकर ठोस निर्णय होना चाहिए अन्यथा धर्म के नाम पर पाखंडियों का वर्चस्व बढ़ता जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी