अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर दोबारा आसीन होते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से काम शुरू किया उससे पूरी दुनिया में खलबली है। मुख्य रूप से किसी देश से होने वाले आयात पर लगने वाले टैरिफ ( शुल्क ) में वे जिस तरह से वृद्धि करते जा रहे हैं उससे विश्व व्यापार गड़बड़ा गया है। अपने पड़ोसी मेक्सिको और ब्राज़ील के अलावा ट्रम्प ने चीनी वस्तुओं पर भी आयात शुल्क बढ़ाकर अपने इरादे जता दिये हैं। भारत के साथ भी उनका यही रवैया देखने मिल रहा है। यूरोप के तमाम देश उनकी इस आक्रामक नीति से नाराज हैं। जिन देशों पर ट्रम्प प्रशासन ने बढ़े हुए आयात शुल्क का बोझ बढ़ाया उनसे आयात अधिक हो रहा था किंतु उसकी तुलना में अमेरिका निर्यात कम कर रहा था। इसे व्यापार घाटा कहते हैं। चीन के साथ होने वाले व्यापार में भारत इसे झेल भी रहा है। वैसे हर देश ये कोशिश करता है कि आयात की तुलना में उसका निर्यात अधिक हो क्योंकि इसी से उसकी मुद्रा का मूल्य तय होता है। अमेरिका की चिंता यह है कि आयात की अधिकता की वजह से डॉलर की मजबूती पर असर पड़ सकता है। यूक्रेन संकट के बाद जब अमेरिका ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध थोपे तब चीन और भारत जिस मुस्तैदी से उसके साथ खड़े हुए तथा उससे कच्चा तेल और गैस इत्यादि की खरीदी जारी रखी उसकी वजह से अमेरिका काफी नाराज हुआ। लेकिन उसकी मजबूरी है कि वह इन दोनों देशों से पूरी तरह नाराजगी भी मोल नहीं ले सकता। चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पूंजी फंसी है और चीन के दबाव को कम करने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत है। इसीलिए ट्रम्प ने आयात शुल्क बढ़ाने के मामले में सख्ती के बावजूद काफी सतर्कता बरती। इस सबके बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजा अमेरिका यात्रा कूटनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रही। ट्रम्प के शपथ ग्रहण में उनको आमंत्रित नहीं किये जाने पर देश में विपक्षी दलों ने काफी टीका - टिप्पणी की और दोनों नेताओं के बीच दोस्ती के दावे पर कटाक्ष भी किया किंतु ट्रम्प के आमंत्रण पर प्रधानमंत्री की वाॅशिंगटन यात्रा के दौरान उनका जिस तरह से स्वागत हुआ उसके बाद उन आलोचकों के मुँह बंद हो गए। यद्यपि श्री मोदी से भेंट के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर आयात शुल्क बढ़ाते हुए इसे जैसे को तैसा बताया। उल्लेखनीय है भारत ने अमेरिकी वस्तुओं पर काफी अधिक आयात शुल्क लगा रखा है। ट्रम्प ने उस असंतुलन को दूर करने का फैसला किया जो उनके राष्ट्रीय हित के लिहाज से गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन श्री मोदी के साथ बातचीत के बाद ट्रम्प ने उन्हें बेहतर मोलभाव करने वाला बताकर कुछ संकेत जरूर दिये। इससे अलग हटकर इस मुलाकात से जो बातें निकलकर सामने आईं वे भारत के प्रति ट्रम्प के झुकाव का परिचायक हैं। मसलन अमेरिका द्वारा भारत को अत्याधुनिक एफ. 35 लड़ाकू जेट देने पर सहमति जो वह अपने अति विश्वस्त और करीबी देशों को ही देता है। इसके साथ ही भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में सहभागिता बढ़ाने का जो फैसला हुआ वह चीन पर दबाव बनाने में मददगार होगा। उल्लेखनीय है क्वाड नामक संगठन में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत भी शामिल है। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में चीन के विस्तारवादी रवैये पर नियंत्रण स्थापित करने में क्वाड काफी कारगर साबित हुआ है। यद्यपि ट्रम्प ब्रिक्स नामक संगठन के विरुद्ध भी काफी हमलावर हैं जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और द.अफ्रीका शामिल हैं। हाल ही में इस संगठन ने डॉलर के वर्चस्व को तोड़ने एक साझा मुद्रा बनाने की पहल भी की थी जिसने अमेरिका को नाराज कर दिया । बावजूद उसके ट्रम्प का भारत पर ब्रिक्स से अलग होने का दबाव न बनाकर क्वाड में उसे साथ रखना ये दर्शाता है कि व्यापारिक मामलों में सख्ती के बाद भी कूटनीतिक दृष्टि से भारत के प्रति नर्म रवैया रखना अमेरिका की मजबूरी है क्योंकि द. एशिया में चीन के बढ़ते आधिपत्य को रोकने में वही सक्षम है। श्री मोदी के अमेरिका दौरे की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि रही ट्रम्प की ये टिप्पणी कि बांग्ला देश को मैं प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ता हूँ। ये निश्चित रूप से बड़ी बात है क्योंकि ये माना जाता है कि इस पड़ोसी देश में सत्ता पलट अमेरिका द्वारा करवाया गया था। लेकिन ट्रम्प ने आते ही उसकी आर्थिक मदद रोक दी। हालांकि श्री मोदी की यह यात्रा संक्षिप्त रही किंतु ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही दोनों के बीच व्यक्तिगत गर्मजोशी अच्छा संकेत है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनको जिस प्रकार से सम्मान दिया वह आश्वस्त करता है। इस बारे में एक बात और महत्वपूर्ण है कि श्री मोदी विश्व के संभवतः अकेले नेता हैं जिनके अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति पुतिन दोनों से बेहद नजदीकी संबंध हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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