दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय दुनिया भर में चर्चित हुई। मुफ्त बिजली - पानी, मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी विद्यालयों के उन्नयन जैसे कार्यक्रमों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल देखते - देखते नई राजनीतिक संस्कृति के प्रतीक बन गए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की प्रतिबद्धता की वजह से उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन गई जो व्यवस्था बदलने सुविधा भरी ज़िंदगी छोड़ राजनीति की पथरीली राहों पर चल पड़ा। अन्ना हजारे जैसे समर्पित व्यक्तित्व से जनसेवा की दीक्षा लेने वाले श्री केजरीवाल ने उनकी इच्छा के विरुद्ध सत्ता की दौड़ में शामिल होकर राजगद्दी भी हासिल कर ली। लगातार दो चुनावों में दिल्ली के मतदाताओं ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया और वह भी प्रचंड बहुमत के साथ। लेकिन लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं दी जो इस बात का संकेत थी कि दिल्ली की जनता को राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रवेश पसन्द नहीं था।लेकिन अरविंद के साथ परेशानी ये है कि वे अपने अलावा बाकी सभी को मूर्ख समझते हैं। और इसी सोच ने उन्हें उस स्थिति में ला दिया जिसमें उनके राजनीतिक भविष्य पर ही आशंका व्यक्त की जाने लगी है। महत्वाकांक्षी होना बुरा नहीं किंतु अति हर चीज की बुरी होती है और वे अति महत्वाकांक्षा का शिकार हो गए। जनता से किये आसमानी वायदों को पूरा करने के प्रति ईमानदार रहने के बजाय उन्होंने राष्ट्रीय नेता बनने की इच्छा पाल ली । शराब नीति, मुख्यमंत्री के शासकीय निवास में करोड़ों रु. खर्च करना, यमुना की सफाई की अनदेखी जैसे तमाम मुद्दे उनके विरुद्ध होते गए किंतु उन्हें लगता रहा कि मुफ्त बिजली - पानी और महिलाओं को निःशुल्क बस यात्रा जैसी सुविधाएं उनका बड़ा पार लगा देंगी। बीते दो चुनावों से वे इन्हीं के नाम पर जीत दर्ज करते रहे । इसलिए जब भाजपा और कांग्रेस ने भी वही सब बांटने का ऐलान किया तो जनता ने आम आदमी पार्टी से किनारा कर लिया। चुनाव में उसकी करारी हार का विश्लेषण करते हुए वे तमाम यू ट्यूबर पत्रकार भी उक्त कारण ही गिना रहे हैं, जो मतगणना के एक दिन पहले तक कड़ी टक्कर के बावजूद आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी बताते नहीं थक रहे थे। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल की राजनीति को चमकाने में उक्त यू ट्यूबरों की ही भूमिका रही। अब वही तबका उनकी गलतियों को प्रचारित कर निष्पक्ष होने का ढोंग कर रहा है। दिल्ली के चुनाव परिणाम को लेकर ये भी कहा जा रहा है कि केजरीवाल सरकार को सत्ता से हटवाकर कांग्रेस ने गोवा, गुजरात और हरियाणा की हार का बदला ले लिया। लेकिन ये प्रचार राहुल गाँधी को किरकिरी से बचाने के लिए किया जा रहा है। यदि निष्पक्ष विश्लेषण करें तो ये बात सामने आती है कि आम आदमी पार्टी सरकार तो अपनी विफलताओं और श्री केजरीवाल सहित कुछ अन्य नेताओं के दामन पर लगे भ्रष्टाचार के कारण जनता का विश्वास खो बैठी किंतु श्री गाँधी के खुलकर मैदान में आने के बाद भी दिल्ली की जनता ने कांग्रेस को एक सीट लायक भी नहीं समझा । उसे उम्मीद थी कि वह अपने परंपरागत दलित और मुस्लिम वोट बैंक को दोबारा हासिल कर दिल्ली विधानसभा में अपना खाता खोल सकेगी। इस चुनाव का ये रोचक पहलू था कि तीन बार कांग्रेस सरकार की मुख्यमंत्री रहीं स्व. शीला दीक्षित के कार्यकाल को हर किसी ने दिल्ली के विकास का स्वर्णिम काल बताया। ऐसे में ये उम्मीद जागी कि उनके बेटे संदीप दीक्षित नई दिल्ली सीट पर श्री केजरीवाल को पराजित कर कांग्रेस को संजीवनी प्रदान करेंगे । उन्होंने लगभग 4500 मत प्राप्त कर उनको हरवा तो दिया किंतु जीत का सेहरा भाजपा प्रत्याशी प्रवेश वर्मा के सिर बंधा। कहा जा रहा है कांग्रेस द्वारा काटे गए मतों के कारण आम आदमी पार्टी 14 सीटें हार गई परंतु इससे कांग्रेस को तो कुछ हासिल नहीं हुआ। इस प्रकार इस चुनाव में केवल श्री केजरीवाल की पराजय ही नहीं हुई कांग्रेस भी चारों खाने चित्त हुई है। जम्मू कश्मीर में श्री गाँधी के ढीले - ढाले रवैये पर उमर अब्दुल्ला की नाराजगी चुनाव के दौरान ही सुनाई दी थी। उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भी वे मतदाताओं को कांग्रेस की तरफ आकर्षित नहीं कर सके। महाराष्ट्र में तो पार्टी का प्रदर्शन अब तक का सबसे दयनीय रहा। लेकिन दिल्ली में श्री गाँधी ने जिन तीखे तेवरों के साथ प्रचार शुरू किया उससे ऐसा लगा कि कांग्रेस शून्य की शर्मनाक स्थिति से उबरेगी । उन्होंने मुस्लिम बहुल सीटों में बड़ी सभाएँ भी कीं लेकिन वहाँ भी कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं हुआ। कहने का आशय ये है कि लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के दम पर नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद भी वे जनता के मन पर छाप छोड़ने में विफल रहे हैं। दिल्ली की सत्ता आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से छीनी थी किंतु बीते 12 साल में उसने कभी इस बात की इच्छा शक्ति नहीं दिखाई कि वह उसे दोबारा हासिल करना चाहती है। इस बार वोट काटकर आम आदमी पार्टी को हरवाने पर वह जिस तरह खुश हो रही है उससे तो यही लगता है उसमें जीतने का आत्मविश्वास ही खत्म हो चुका है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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