नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बीते शनिवार की रात में हुई भगदड़ में दर्जनों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे जबकि सैकड़ों गंभीर रूप से घायल हैं। उस समय स्टेशन पर क्षमता से कई गुना ज्यादा भीड़ प्रयागराज महाकुंभ में जाने के लिए चलाई जा रहीं विशेष रेल गाड़ियों की प्रतीक्षा कर रही थी। अचानक प्लेटफार्म बदले जाने की उद्घोषणा के बाद जो भगदड़ मची उसके कारण धक्का - मुक्की की चपेट में आकर अनेक बेशकीमती जानें चली गईं। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार रेलवे ने कमाई की लालच में अनाप शनाप टिकिटें बेच डालीं। सप्ताहांत का उपयोग करने के लिए महाकुंभ जाने वालों की भीड़ रेल और सड़क मार्ग पर ही नहीं अपितु हवाई अड्डों तक पर देखी जा रही है। पहले अनुमान था कि बसंत पंचमी के अंतिम स्नान के पश्चात प्रयागराज आने वालों की संख्या में गिरावट आ जायेगी किंतु हुआ इसके विपरीत। विशेष रूप से शनिवार और रविवार पर तो श्रुद्धालुओं की भीड़ अमृत स्नान वाले दिनों के बराबर होने लगी। नई दिल्ली स्टेशन पर भी इसी कारण प्रयागराज जाने वालों का हुजूम जमा हो गया जिसे व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त पुलिस बल नहीं था। वैसे ये बात भी उतनी ही सही है कि इतने बड़े जनसैलाब को नियंत्रित करना पुलिस बल के लिए बेहद कठिन या यूँ कहें कि असंभव होता है। प्रयागराज में इसका अनुभव प्रतिदिन हो रहा है। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि रेलवे स्थिति का सही समय पर अनुमान लगाने में असफल रहा। भीड़ तो शाम से ही एकत्र होने लगी थी। यदि उसी समय रेलवे के वरिष्ट अधिकारी स्थानीय प्रशासन से सामंजस्य बनाकर भीड़ को स्टेशन में आने से रोकने की व्यवस्था कर लेते तो उक्त हादसा रोका जा सकता था। अब जो सरकारी कर्मकांड हो रहा है उसमें कुछ भी नया नहीं है। कुछ विभागीय लोग निलम्बित कर दिये जाएंगे, हताहतों को मुआवजा दे दिया जाएगा। उच्चस्तरीय जाँच की घोषणा कर लोगों का गुस्सा शांत करने का खेल चलेगा जिसकी रिपोर्ट आते तक लोग हादसे को भुला चुके होंगे। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है जो अनुशासनहीन आस्था के तौर पर हमारे देश की पहिचान बन गई है। महाकुंभ में जाने की उत्कंठा प्रत्येक सनातन धर्मी में काफी समय से रही है। ये अवसर लम्बे समय बाद आने से हर किसी की कोशिश रहती है कि वह महाकुंभ में शामिल होकर पुण्य लाभ अर्जित करे। लेकिन इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए केवल उत्साह एवं संसाधन ही नहीं अपितु अनुशासन एवं व्यवस्था के पालन के प्रति गंभीरता भी बेहद आवश्यक है। यदि इसका पालन हुआ होता तो मौनी अमावस्या पर प्रयागराज और गत शनिवार को नई दिल्ली स्टेशन पर हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना टाली जा सकती थी। शासन और प्रशासन की लापरवाही निश्चित रूप से ऐसे हादसों के मूल में होती है । लेकिन इतने बड़े आयोजनों में अव्यवस्था होने के पीछे बेतहाशा भीड़ के दबाव को नजरंदाज करना भी सही नहीं होगा। दुर्भाग्य ये है कि ऐसेे हादसों से न तो सरकारी तंत्र सबक लेता है और न ही जनता। यदि ऐसा होता तो शायद उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो दुखद घटनाएं महाकुंभ के अवसर पर हुईं उनका संज्ञान लेते हुए सनातन धर्म का नेतृत्व करने वाले सभी सम्माननीय महानुभावों का यह दायित्व है कि वे भविष्य के लिए आस्था और अनुशासन के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए प्रभावशाली पहल करें। बसंत पंचमी के बाद भी प्रयागराज में श्रृद्धालुओं का सैलाब उमड़ने के बाद उ.प्र सरकार और मेला प्रशासन लोगों से नहीं आने की अपील करते रहे किंतु यदि धर्माचार्य इस तरह का अनुरोध करते तब हो सकता है लोग उनकी बात को मान लेते। 2027 में नासिक में अर्ध कुंभ और 2028 में उज्जैन में पूर्ण कुंभ आयोजित होगा। ऐसे में प्रयागराज महाकुंभ के दौरान जो समस्याएं सामने आईं उनके कारणों का सूक्ष्म अध्ययन करते हुए भीड़ के नियंत्रण का पुख्ता प्रबंध किया जावे। उल्लेखनीय है प्रयागराज में मेले के आयोजन के लिए काफी बड़ा स्थान है। वहाँ प्रतिवर्ष जो माघ मेला भरता है वह किसी लघु कुंभ जैसा ही होता है। इसमें भी विशेष स्नान के दिन एक करोड़ तक श्रृद्धालु आते हैं। नासिक और उज्जैन में उतना स्थान नहीं होने से भीड़ का नियंत्रण अपेक्षाकृत कठिन होता है। प्रयागराज और नई दिल्ली के हादसों से सीख लेकर भावी आयोजनों की व्यवस्था अभी से की जानी चाहिए। श्रृद्धालुओं से भी अपेक्षा है कि पुण्य की लालसा में अपने प्राण गँवाना बुद्धिमत्ता नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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