भ्रष्टाचार के विरुद्ध लोकपाल की नियुक्ति के लिए लंबे समय तक आंदोलन हुए। 2013 में इसका अधिनियम पारित हुआ किंतु पहले लोकपाल की नियुक्ति 2019 में की गई। लोकायुक्त की तरह ही लोकपाल के पास भ्रष्टाचार, कुशासन, और अनुचित लाभ पहुंचाने से जुड़े मामलों की जांच करने का अधिकार है जिसके अंतर्गत वह केंद्र सरकार के अधिकारियों के अलावा, प्रधानमंत्री और सांसदों के ख़िलाफ़ भी जांच कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश को लोकपाल बनाया जाता है। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने लोकपाल द्वारा उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश और अति. न्यायाधीश की जांच पर रोक लगाते हुए इसे हैरानी भरा बताया। 27 जनवरी को लोकपाल ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को लोकसेवक मानते हुए लोकपाल और लोकायुक्त अघि. 2013 के अंतर्गत उनकी जाँच को अपने क्षेत्राधिकार में माना जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर रोक लगाते हुए इसे न्याय पालिका की स्वतंत्रता पर खतरा बताकर केंद्र सरकार और लोकपाल के पंजीयक को नोटिस जारी कर दिया। उधर लोकपाल ने भी जाँच स्थगित कर मुख्य न्यायाधीश से मार्गदर्शन मांग लिया। रोचक बात ये है कि जिनकी जाँच होनी है वे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं, जिन्होंने जाँच का आदेश दिया वे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं और जिन्होंने लोकपाल के निर्णय पर स्थगन जारी किया वे सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश हैं। इससे आगे बढ़ें तो लोकपाल ने इस बारे में जिनसे मार्गदर्शन मांगा वे देश के मुख्य न्यायाधीश हैं। इस प्रकार प्रकरण न्यायाधीश विरुद्ध न्यायाधीश बन गया। मुख्य न्यायाधीश इस संबंध में क्या व्यवस्था देंगे ये कह पाना कठिन है किंतु इस विवाद से ये प्रश्न खड़ा हुआ है कि न्यायाधीश पद पर विराजमान व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उसकी जांच लोकपाल क्यों नहीं कर सकता ? सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ने की जो चिंता व्यक्त की वह अपनी जगह वाजिब है। कोई भी समझदार व्यक्ति ये नहीं चाहेगा कि न्याय प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार की बन्दिश लगाई जाए। स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की मौलिक आवश्यकता है। आजादी के बाद से उसने अनेक ऐसे फैसले दिये जिसने सत्ता को हिला दिया। 12 जून 1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का लोकसभा के लिए निर्वाचन अवैध घोषित करने जैसा निर्णय सुनाकर भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता को विश्वव्यापी ख्याति दिलाई थी। अनेक राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसलों को भी अदालतों ने रद्द किया। यहाँ तक कि संसद और विभिन्न विधानसभाओं द्वारा पारित अनेक कानून भी न्यायालयों द्वारा रद्द हुए। सत्ता में बैठे अनेक लोगों को अदालती फैसले के कारण गद्दी छोड़ना पड़ी। कुछ तो जेल भी गए। कई उद्योगपतियों को भी न्यायपालिका ने जेल की हवा खाने मजबूर किया। वहीं संसद द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एकमतेन पारित न्यायिक नियुक्ति आयोग को भी सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द करते हुए कालेजियम व्यवस्था को जारी रखा। इलेक्टोरल बॉण्ड संबंधी उसके फैसले ने राजनीतिक हलचल मचा दी थी। वहीं तीन तलाक़ और राम जन्मभूमि संबंधी निर्णयों ने नया इतिहास रच दिया। लेकिन देखने में आया है कि न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता के नाम पर अक्सर हदें पार कर जाती है । न्यायपालिका के पास प्रधानमंत्री के विरुद्ध शिकायतें सुनने का अधिकार है किंतु उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध गंभीर आरोपों के बावजूद उन्हें हटाना कितना कठिन है ये अनेक मामलों में जाहिर हो चुका है। महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के दौरान पीठासीन न्यायाधीश जो व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हैं उस पर कई बार वरिष्ट अधिवक्ताओं द्वारा ऐतराज जताया जा चुका है। कभी - कभी न्यायाधीश जो बातें कहते हैं उसका उल्लेख निर्णय में नहीं किया जाता। न्यायाधीशों की नियुक्ति में परिवारवाद का बोलबाला और पारदर्शिता का अभाव भी आलोचना के घेरे में रहा है किंतु न्यायापालिका इस बारे में कुछ भी सुनने तैयार नहीं होती। ऐसे में लोकपाल द्वारा न्यायाधीशों को लोकसेवक मानकर उनकी जाँच पर रोक लगाए जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। संसद से पारित कानून द्वारा बनाया गया लोकपाल प्रधानमंत्री की जाँच कर सकता है किंतु उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नहीं, ये विचित्र स्थिति है। सर्वोच्च न्यायालय को इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता का खतरा नजर आया तो वह उसका दृष्टिकोण है किंतु न्यायपालिका की स्वतंत्रता कहीं स्वछंदता में न बदल जाए इसकी चिंता भी की जानी चाहिए। हाल ही में सेवा निवृत हुए मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ ने न्याय की देवी की जो नई प्रतिमा बनवाई उसकी आँख से पट्टी हटा ली गई और हाथ में तलवार के स्थान पर संविधान है। काश, उनकी बिरादरी में बैठे मान्यवर इस संकेत को समझ सकें।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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