सैम पित्रोदा कांग्रेस की विदेश इकाई भारतीय ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख हैं। स्व. राजीव गाँधी के शासनकाल में वे अचानक सुर्खियों में आये जब अमेरिका में रहने वाले सैम उनकी सलाहकार मंडली में शामिल हुए। देश में संचार क्रांति का श्रेय काफी हद तक उन्हें दिया जाता है जिसमें गलत कुछ भी नहीं है। यू.पी.ए सरकार के समय भी वे उसके तकनीकी सलाहकार रहे। लेकिन कांग्रेस से उनका जुड़ाव केवल गाँधी परिवार से निकटता की वजह से है। इसीलिए 2014 में जब मनमोहन सरकार सत्ता से बाहर हुई तब श्री पित्रौदा फिर अमेरिका जा बसे और उनको भारतीय ओवरसीज कांग्रेस का मुखिया बना दिया। यह संगठन विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के मन में कांग्रेस के प्रति कितना समर्थन जुटा सका ये तो स्पष्ट नहीं है लेकिन राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं में उनके भाषण, साक्षात्कार और पत्रकार वार्ताओं का आयोजन करने में सैम की भूमिका छिपी नहीं है। एक तरह से वे विदेशों में श्री गाँधी के जनसंपर्क अधिकारी का दायित्व निभाते हैं । लेकिन समय - समय पर वे ऐसे बयान देते रहे हैं जिससे कांग्रेस को फजीहत झेलनी पड़ी। लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने पूर्वी भारत के लोगों के चीनी और दक्षिण के लोगों को अफ्रीकियों जैसा बताकर विवाद उत्पन्न कर दिया। उस बयान से कांग्रेस ने बिना देर किये पल्ला झाड़ लिया और चुनाव में नुकसान न हो इस डर से उनसे इस्तीफा भी ले लिया किंतु बाद में वे फिर अपने पद पर लौट आये। भारत के मध्यम वर्ग , 1984 के सिख विरोधी दंगे और अमेरिका के विरासत कानून को भारत में लागू करने संबंधी उनके बयान कांग्रेस को शर्मिंदगी झेलने पर बाध्य करते रहे हैं। यद्यपि हर बार पार्टी उक्त टिप्पणियों को निजी विचार बताते हुए उनसे दूरी बनाती रही है किंतु गाँधी परिवार विशेष रूप से राहुल से करीबी की वजह से श्री पित्रौदा से नाता तोड़ने का साहस नहीं जुटा सकी। और यह भी कि उनके आपत्तिजनक बयानों से पिंड छुड़ाने की औपचारिकता का निर्वहन भी कांग्रेस का कोई पदाधिकारी ही कर लेता है किंतु अपने पारिवारिक मित्र की गलत बातों का विरोध करने गाँधी परिवार कभी सामने नहीं आया जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सैम के सिर पर उसका वरद हस्त है। इसीलिए वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आते जिसका उदाहरण उनकी ताजा टिप्पणी है जिसमें उन्होंने चीन को लेकर कहा कि चीन से खतरे को अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है । उन्होंने आरोप लगाया कि भारत का दृष्टिकोण हमेशा टकरावपूर्ण रहा है। हमें इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है और यह मानना बंद करना होगा कि चीन पहले दिन से ही दुश्मन है। ये बयान आते ही भाजपा लाव - लश्कर कांग्रेस पर चढ़ बैठी और गाँधी परिवार की चीन से निकटता को लेकर आरोप लगाए। उल्लेखनीय है राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से मिले अनुदान पर भाजपा, गाँधी परिवार को पहले भी घेरती रही है। इसी तरह डोकलाम विवाद के समय श्री गाँधी का नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास जाना और मानसरोवर यात्रा से लौटते समय बीजिंग में चीन सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात पर भी वे आलोचना का पात्र बने। लेकिन बजाय सफाई देने के वे प्रधानमंत्री पर चीन से डरने का तंज कसते हुए आरोप लगाते रहे कि लद्दाख़ सेक्टर में भारत की काफी जमीन चीन ने दबा ली जिसे खाली करवाने में मोदी सरकार विफल रही है। लेकिन श्री पित्रौदा ने चीन को लेकर जो बयान दिया उसने श्री गाँधी द्वारा दिखाई जाने वाली आक्रामकता की हवा निकाल दी। यद्यपि उनके निकटस्थ कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सैम के बयान को कांग्रेस के दृष्टिकोण से अलग बताते हुए कहा कि चीन हमारी बाहरी सुरक्षा के लिए खतरा और साथ ही आर्थिक चुनौती बना हुआ है। श्री रमेश ने चीन के प्रति मोदी सरकार के दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाए । हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि श्री पित्रौदा की टिप्पणी कांग्रेस की नीति नहीं है किंतु चीन के प्रति नर्मी और उसे शत्रु मानने को गलती बताने वाले उनके बयान से पल्ला झाड़ने मात्र से पार्टी अपना दामन नहीं बचा सकेगी। संसद में इस मामले को भाजपा निश्चित तौर पर उठायेगी और उस समय श्री गाँधी ही निशाने पर होंगे। ऐसे में उन्हें चाहिए वे श्री पित्रौदा को न सिर्फ उनके पद वरन कांग्रेस से भी स्थायी रूप से निकाल बाहर करें। अन्यथा देश के सर्वमान्य दुश्मन की तरफदारी करने वाला यह व्यक्ति किसी दिन पार्टी को किसी बड़े संकट में डाले बिना नहीं रहेगा।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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