Saturday, 1 February 2025

महामंडलेश्वर और जगद्गुरु की पदवी मज़ाक बन गई


महाकुंभ से यूँ तो रोज नई - नई खबरें आ रही हैं किंतु उन सबके बीच नये महामंडलेश्वर बनाये जाने को लेकर विवाद भी सामने आये हैं। किन्नर अखाड़े द्वारा एक पूर्व अभिनेत्री ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उसमें  मतभेद पैदा हो गए तथा अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास  ने अभिनेत्री को नियुक्त करने वाले आचार्य डाॅ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को भी अखाड़े से बाहर कर दिया। ममता का फिल्मी कैरियर बहुत ही संक्षिप्त रहा। उसके बाद वे अंडरवर्ल्ड के साथ जुड़ने के आरोप में घिर गईं। अपने अश्लील फोटो शूट के लिए भी वे काफी बदनाम हुईं थीं। एक सप्ताह पहले ही उन्होंने  संन्यास लेकर महामंडलेश्वर की पदवी हासिल की थी जिसे गत दिवस छीन लिया गया। ये पहला अवसर नहीं है जब महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद किसी को हटाया जाए। कुछ वर्ष पूर्व एक साध्वी कहलाने वाली महिला को भी महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उनसे जुड़े विवादों की वजह से हटाया गया था। जब भी कुंभ का आयोजन होता है तब महामंडलेश्वर की पदवी कुछ लोगों को अखाड़ों द्वारा प्रदान की जाती है। वे लोग संन्यास लेकर सांसारिक मोह  - माया से स्वयं को मुक्त करते हैं। इन पदवियों को धारण करने वाले सनातन धर्म की संत परंपरा के ध्वजावाहक होने के कारण समाज में सम्मान के पात्र होते हैं। त्याग और तपस्या इनकी पहिचान होती है। उनके आचरण के कारण लोग इन्हें अपना आदर्श मानते हैं। समाज में धर्ममय वातावरण बनाकर लोगों को सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करना  इनका कर्तव्य होता है। एक तरह से उन्हें अपना जीवन समाज और धर्म की सेवा के लिए अर्पित करना होता है। सनातन धर्म में जो व्यवस्था आद्य शंकराचार्य बनाकर गए उसमें ऐसी ही अनेक पदवियां हैं। इन पर नियुक्तियाँ आसानी से नहीं होती थीं। पदवी दिये जाने के पूर्व संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक ज्ञान और क्षमता का सूक्ष्म परीक्षण किया जाता था। वरिष्ट धर्माचार्य गहन विचार - विमर्श के उपरांत इस बारे में फैसले किया करते थे। इसी तरह आद्य शंकराचार्य द्वारा गठित चार प्रमुख पीठों के शंकराचार्य जो जगद्गुरु कहलाते हैं , की  चयन प्रक्रिया भी थी। लेकिन धीरे - धीरे उनके प्रति लापरवाही देखने मिलने लगी और महामंडलेश्वर तो क्या शंकराचार्य की नियुक्ति को लेकर भी विवाद बढ़ने लगे। जिन चार पीठाधीश्वरों पर सनातन धर्म के संरक्षण और संवर्धन का दायित्व है उन्हीं में आपसी मतभेद हैं। अदालतों में असली और नकली कै मामले चल रहे हैं। चार मुख्य पीठों के अलावा न जाने कितनी छोटी - छोटी पीठ सामने आने लगी हैं जिनके महंत जगद्गुरु की पदवी हासिल करते जा रहे हैं। इस कारण सनातन धर्म के इन बेहद सम्मानित पदों की प्रतिष्ठा धूमिल होती जा रही है। महामंडलेश्वर और जगद्गुरु जैसी पदवियां राजनीतिक नियुक्तियों जैसी होने लगी हैं। यही कारण है उनके प्रति आदरभाव घटता जा रहा है। जो अखाड़े या अन्य धार्मिक संस्थाएं ये पदवियां बांटती हैं उनके विवेक और ईमानदारी पर संदेह बढ़ता जा रहा है जो सनातन धर्म की प्रतिष्ठा और पवित्रता के लिए खतरा है। संन्यास कोई मजाक नहीं है कि कोई भी आकर रातों -  रात सब कुछ त्यागने का दावा करते हुए महामंडलेश्वर या जगद्गुरु जैसी पदवी हासिल कर महिमामंडित हो जाए। ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने और महज सात दिनों बाद  हटाये जाने का निर्णय ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि संबंधित अखाड़े का संचालन कर रहे लोगों में आपसी सामंजस्य का नितांत अभाव है। इसी तरह जिस प्रकार थोक के भाव नये जगद्गुरु नियुक्त होते जा तरह हैं उसकी वजह से चार प्रमुख शंकराचार्यों का प्रभाव घट  रहा है क्योंकि नव नियुक्त जगद्गुरु खुद को किसी से कम नहीं समझते। जनसंख्या में वृद्धि के कारण अतीत में कुछ उप पीठें बनाई गई थीं। उनके प्रमुख को भी जगद्गुरु की पदवी दी गई किंतु जिस तेजी से  नये जगद्गुरु बन रहे हैं उससे इनके बीच भी खींचातानी शुरू होने की आशंका बढ़ रही है।  देश में अनेक ऐसे संत हैं जिन्हें उनकी विद्वता, सरलता और धर्मनिष्ठा के कारण महामंडलेश्वर अथवा जगद्गुरु की पदवी हासिल किये बिना भी सम्मान प्राप्त है। दूसरी ओर कुछ कथावाचक पांच सितारा जीवनशैली और फिल्मी सितारों जैसी चमक - दमक के कारण आम लोगों की पहुँच से बाहर हो गए हैं क्योंकि उनके आयोजन में करोड़ों का खर्च होता है। महाकुंभ के अवसर पर आयोजित होने वाली धर्म संसद में सनातन धर्म के साथ जुड़ती जा रहीं इन विसंगतियों को दूर करने पर गंभीरता से विचार - विमर्श होकर ठोस निर्णय होना चाहिए अन्यथा धर्म के नाम पर पाखंडियों का वर्चस्व बढ़ता जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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