दिल्ली में रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने एक साथ कई लक्ष्य साधे हैं। ये कहना गलत नहीं होगा कि छात्र राजनीति से होते हुए मुख्यमंत्री तक का उनका सफर उन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता के बल पर प्राप्त किया । मध्यमवर्गीय परिवार में पली - बढ़ी श्रीमती गुप्ता ने अभाविप पैनल से दिल्ली वि.वि छात्र संघ सचिव का चुनाव जीतकर अपनी छाप छोड़ी। उसी चुनाव में अलका लांबा अध्यक्ष निर्वाचित हुईं जो कांग्रेस के छात्र संगठन की थीं। वे बाद में आम आदमी पार्टी में शामिल हो गईं थीं किंतु फिर कांग्रेस में लौटकर पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी के विरुद्ध लड़कर जमानत गँवा बैठीं । वहीं दो विधानसभा चुनाव हार चुकीं रेखा ने बड़े अंतर से जीत हासिल की। इसके पहले वे पार्षद और महापौर भी रह चुकी हैं। भाजपा के महिला मोर्चे में भी वे राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं। कहा जा रहा है उनके चयन में रास्वसंघ ने निर्णायक भूमिका निभाई वरना अरविंद केजरीवाल को हराने वाले प्रवेश वर्मा और दिल्ली भाजपा के दिग्गज बृजेन्द्र गुप्ता मुख्यमंत्री बनने के प्रबल दावेदार थे। एक नाम मनजिंदर सिंह सिरसा का भी उछला जिन्हें सिख होने के कारण पंजाब को ध्यान रखकर मुख्यमंत्री बनाये जाने की अटकल लगाई जा रही थी। पिछले कुछ समय से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मुख्यमंत्री पद को लेकर चौंकाने वाले फैसले करता रहा। इसलिए ये अनुमान था कि दिल्ली में भी वैसा ही देखने मिलेगा। लेकिन इस चयन ने अचरज में नहीं डाला। भले ही बृजेन्द्र और प्रवेश संसदीय अनुभव के लिहाज से उनसे वरिष्ट हैं किंतु भाजपा इन दिनों सत्ता की राजनीति से एक कदम आगे बढ़कर जिस तरह अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटी हुई है रेखा का चयन उसी दृष्टि से किया गया। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में दो चुनाव महिलाओं के दम पर जीते। मुफ्त बिजली , पानी और बस यात्रा के कारण महिलाओं में श्री केजरीवाल के प्रति काफी झुकाव था। युवा मतदाता भी भ्रष्टाचार विरोधी छवि के कारण आम आदमी पार्टी के प्रति आकर्षित थे। भाजपा ने इन दोनों वर्गों को साधने के अलावा व्यवसायी समुदाय को भी संतुष्ट किया क्योंकि रेखा के पति भी व्यवसायी हैं। दिल्ली बीते 27 वर्षों से भाजपा के आँख की किरकिरी बनी हुई थी। विधानसभा बनने के बाद उसे सत्ता तो मिल गई लेकिन आपसी लड़ाई में 1993 से 98 के बीच तीन मुख्यमंत्री बनाने की वजह से वह जनता की निगाहों से उतर गई। उसके बाद 15 सालों तक स्व. शीला दीक्षित और फिर अरविंद केजरीवाल का राज चला। भाजपा की चिंता तब बढ़ गई जब 2014 में सभी सातों लोकसभा सीटें जीतने के बाद भी 2015 के विधानसभा चुनाव में वह महज 3 सीटें जीत पाई। 2019 में भी लोकसभा में तो उसने अपना प्रदर्शन दोहराया किंतु विधानसभा में बमुश्किल 8 विधायकों तक ही बढ़ सकी। 2024 के संसदीय चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस मिलकर लड़े किंतु इस बार भी सभी सीटें भाजपा की झोली में आईं। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि विधानसभा चुनाव में इस बार भी केजरीवाल का करिश्मा चलेगा किंतु भाजपा की कड़ी मोर्चेबंदी के कारण आम आदमी पार्टी का जादू खत्म हो गया। लेकिन भाजपा के सामने दिल्ली की समस्याओं को हल करने की जो चुनौती है उसके लिए उसे लोकप्रिय ही नहीं अपितु साफ - सुथरी छवि का मुख्यमंत्री भी चाहिए था। श्रीमती गुप्ता दिल्ली में तीन नगर नगर निगम वाली व्यवस्था में एक निगम की महापौर रह चुकी हैं इसलिए वे जमीनी हालात से वाक़िफ़ हैं। महिला मोर्चा की राष्ट्रीय पदाधिकारी होने से उन्हें संगठन का भी अनुभव है। लेकिन इस सबके अलावा उनको राष्ट्रीय राजधानी का मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला नेत्री को स्थापित करने का दांव चला है। सुषमा स्वराज के न रहने के बाद पार्टी ने स्मृति ईरानी को भाजपा नेत्री के तौर पर उभारा था। राहुल गाँधी को हराकर वे लोकप्रिय भी हुईं किंतु पिछला चुनाव हारने के बाद उनकी चमक फीकी पड़ गई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी जाना - पहिचाना नाम है किंतु वे जननेत्री नहीं बन पाईं। दिल्ली विधानसभा में चूंकि आतिशी आम आदमी पार्टी की नेता के तौर पर होंगी इसलिए भाजपा ने भी महिला मुख्यमंत्री बनाकर अच्छी चाल चली है। वसुंधरा राजे को सत्ता से दूर रखने के कारण किसी महिला की ताजपोशी समय की मांग थी। कांग्रेस में प्रियंका वाड्रा के उभार के कारण भी भाजपा के लिए किसी महिला नेत्री को आगे बढ़ाने की मजबूरी थी। इस प्रकार रेखा गुप्ता भाजपा की दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। चूंकि वे मैदानी राजनीति से निकली हैं इसलिए उन्हें जन अपेक्षाओं का एहसास है। दिल्ली में शीला जी के कार्यकाल की यादें अभी भी जनमानस में बनी हुई हैं। महिला मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने उस रिक्त स्थान को भरने का प्रयास किया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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