मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे ही दिया। पार्टी नेतृत्व पर बीरेन सिंह को हटाने का दबाव लंबे समय से था किंतु वह निर्णय को टालता रहा । भले ही बीरेन सिंह मैतेयी और कूकी समुदाय के बीच भड़की हिंसा को रोक पाने में विफल रहे हों किंतु जो हालात उच्च न्यायालय के एक फैसले से उत्पन्न हुए उनमें अचानक मुख्यमंत्री को हटाये जाने से नई समस्याएं उत्पन्न हो सकती थीं। स्मरणीय है मार्च 2023 में उच्च न्यायालय द्वारा मैतेई समुदाय को अनु. जनजाति का दर्जा देने की मांग पर जल्द विचार करने की अनुशंसा की गई। मैतेई राज्य का बहुसंख्यक समुदाय है जो इंफाल घाटी सहित मैदानी इलाकों में बसा हुआ है। उसकी 90 फीसदी आबादी हिन्दू धर्मावलंबी है जिसे अनु.जनजाति में नहीं होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों रहने की अनुमति नहीं है जहाँ कुकी और नगा समुदाय का बाहुल्य है जो अनु. जनजाति में हैं। इनकी ज्यादातर आबादी बीते अनेक दशकों में ईसाई बन चुकी है। पड़ोसी म्यांमार से भी यहाँ आकर काफी लोग बसते गए। कुकी और नगा लोगों की ये शिकायत रही है कि मणिपुर में राजनीतिक दृष्टि से चूंकि मैतेई ताकतवर हैं इसलिए नौकरियों आदि में भी उन्हीं को प्राथमिकता मिलती है। उधर मैतेई समुदाय ये दबाव बनाता रहा है कि मणिपुर का अधिकांश क्षेत्र पहाड़ी है जहाँ उनके बसने पर रोक है जबकि कुकी और नगा आबादी कम है। मैदानी इलाकों में आबादी बढ़ने से मैतेई समुदाय जगह की कमी से जूझ रहा था । अनु. जनजाति में शामिल होने की मांग के पीछे पहाड़ी इलाकों में रहने की अनुमति मिलना ही मुख्य था। लेकिन कुकी और नगा इसका विरोध इसलिए करते आये थे क्योंकि हिन्दू धर्मावलंबी मैतेई यदि पहाड़ी क्षेत्रों में बसने लगे तो वहाँ ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों पर रोक लग जायेगी। इसके अलावा ये इलाका ड्रग्स की तस्करी का बड़ा अड्डा है। उत्तर पूर्व के जिन राज्यों में अलगावादी ताकतें सक्रिय हैं उन्हें म्यांमार से हथियार और धन की आपूर्ति भी इसी रास्ते से होना बताया जाता है। यही वजह है कि उच्च न्यायालय का फैसला आते ही कुकी और नगा समुदाय उग्र विरोध पर आमादा हो गए । जिसकी प्रतिक्रिया मैतेई समुदाय द्वारा जवाबी कारवाई से हुई और देखते - देखते मणिपुर जातीय संघर्ष में इस हद तक विभाजित हो गया कि मैतेई और कुकी ने अपने - अपने प्रभावक्षेत्र बना लिए और दूसरे समुदाय के व्यक्ति के अपने क्षेत्र में आते ही उसकी नृशंस हत्या करने तथा महिलाओं पर अमानुषिक अत्याचार करने में भी संकोच नहीं किया गया। इसमें कौन सा पक्ष कितना दोषी था ये तय कर पाना बेहद कठिन है। यद्यपि लगभग एक वर्ष बाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले के उस हिस्से को अलग कर दिया जिसमें मैतेई समुदाय को अनु. जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा थी। लेकिन तब तक मणिपुर पूरी तरह जातीय हिंसा की चपेट में आ चुका था। मुख्यमंत्री पर ये आरोप लगता रहा कि उन्होंने मैतेई समुदाय को संरक्षण प्रदान किया ।सरकार के सामने सेना के जरिये हालात काबू करने का विकल्प था किंतु जिस कारण से छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के विरुद्ध सैन्य ऑपरेशन से परहेज किया गया उसी नीति के तहत कुकी और नगा बाहुल्य वाले पहाड़ी क्षेत्र में सैन्य कारवाई करने से बचा गया। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार भारत में अस्थिरता फैलाने की इच्छुक विदेशी ताकतें मणिपुर के घने जंगलों से घिरे पहाड़ी इलाके को ड्रग कारोबार का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बनाने की कोशिश में जुटी हुई हैं। अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता आने के बाद ड्रग कारोबारियों को नये अड्डे की जरूरत थी। ऐसे में कुकी और नगा भी अपने प्रभाव वाले इलाकों में मैतेई आबादी के बसने का वैसे ही विरोध करने लगे जैसे कश्मीर घाटी में भारत के अन्य हिस्सों के लोगों का किया जाता रहा । ये देखते हुए मणिपुर की समस्या केवल मुख्यमंत्री बदलने से हल होने वाली नहीं थी। इसीलिए केंद्र सरकार ने अब तक धैर्य रखा क्योंकि लोकसभा चुनाव के पहले कोई बड़ा कदम उठाने से वह बचना चाह रही थी। तीसरी पारी में बहुमत से वंचित रह जाने के कारण नरेंद्र मोदी ने कुछ राज्यों के चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के बाद मणिपुर की समस्या हल करने की तैयारी की जिसके पहले चरण के तौर पर दिसंबर 2024 में राज्यपाल पद पर किसी राजनेता की नियुक्ति की बजाय पूर्व गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को तैनात किया जो इस राज्य में जातीय हिंसा भड़कने के समय भी केंद्र में गृह सचिव थे और गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। उस नियुक्ति के चंद महीनों के भीतर ही मुख्यमंत्री का त्यागपत्र किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री इस समय राजनीतिक तौर पर पुरानी स्थिति में लौट आये हैं और आगामी अनेक महीनों तक किसी राज्य में चुनाव भी नहीं है। इसलिए मणिपुर के बारे में किसी बड़े फैसले की उम्मीद की जा सकती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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