Sunday, 9 February 2025

दिल्ली के नतीजों के बाद इंडिया गठबंधन का भविष्य अधर में

      दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार विजय के बाद राष्ट्रीय राजनीति में नये समीकरण बनने के आसार हैं। आम आदमी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले ये रोना रो रहे हैं कि कांग्रेस ने उसे 14 सीटें हरवा दीं जिनमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे दिग्गज भी हैं। वहीं कांग्रेस ये प्रचार करवा रही है कि आम आदमी पार्टी अपने गिरेबान में झांके जिसने गोवा, गुजरात और हरियाणा में अपने  उम्मीदवार उतारकर उसको जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। ये बात भी कही जा रही है कि आम आदमी पार्टी के हारने से दिल्ली में कांग्रेस के दोबारा खड़े होने की संभावना बढ़ गई है। यद्यपि किरकिरी कांग्रेस की भी जमकर हुई क्योंकि राहुल गाँधी के खुलकर मैदान में उतरने के बाद भी 2015 और 2020 की तरह इस बार भी वह शून्य पर ही अटकी रही।

        रोचक बात ये रही कि दिल्ली के चुनाव ने इंडिया गठबंधन की अंतर्कलह को भी सार्वजनिक कर दिया। तृणमूल कांग्रेस, सपा और शिवसेना ( उद्धव) ने ऐलनिया आम आदमी पार्टी का समर्थन किया जबकि लालू यादव की राजग कांग्रेस के साथ खड़ी नजर आई। हालांकि लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ी आम आदमी ने नतीजे आते ही विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की इकतरफा घोषणा कर दी। इसके बाद हरियाणा में उसने प्रत्याशी अड़ाकर कांग्रेस की उम्मीदों पर झाड़ू फेर दी और जम्मू कश्मीर में भी   एकला चलो की नीति अपनाई। महाराष्ट्र चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन में नेतृत्व का विवाद खड़ा हो गया। उमर अब्दुल्ला ने उसे भंग करने जैसा तंज तक कसा। तेजस्वी यादव भी बोल उठे वह तो लोकसभा चुनाव तक ही था।

     इधर दिल्ली चुनाव में राहुल और अरविंद ने एक दूसरे पर  जो जहर बुझे तीर छोड़े उनकी वजह से कटुता चरम पर जा पहुंची । अब सत्ता हाथ से खिसक जाने के बाद श्री केजरीवाल दोबारा कांग्रेस के साथ बैठेंगे या नहीं ये बड़ा सवाल है। इसके अलावा  इंडिया गठबंधन में अन्य घटक दलों के सामने भी ये  दुविधा है कि वे आम आदमी पार्टी को साथ रखें या कांग्रेस को? हरियाणा और महाराष्ट्र की पराजय के बाद जहाँ राहुल गाँधी की लोकप्रियता और चुनाव जिताऊ क्षमता पर उंगलियाँ उठीं वहीं दिल्ली में सूपड़ा साफ होने के बाद वही स्थिति अरविंद केजरीवाल की हो गई। ये दोनों इंडिया गठबंधन में एक साथ रहेंगे ये बेहद मुश्किल होगा क्योंकि कांग्रेस के मन  में ये बात घर कर चुकी है कि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने ही उसे सत्ता से बेदखल किया था । साथ ही कुछ दूसरे राज्यों में वह कांग्रेस की पराजय का कारण बनी।

दिल्ली के बाद अब बिहार विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। वहाँ मुख्य रूप से तो लालू की राजग और कांग्रेस का गठबंधन है किंतु सपा तथा वामपंथियों सहित अन्य विपक्षी पार्टियां भी अपनी हिस्सेदारी मांगेगी। कांग्रेस वहाँ लालू के सहारे है। चूंकि हरियाणा , महाराष्ट्र और दिल्ली में उसका प्रदर्शन बेहद दयनीय रहा इसलिए तेजस्वी भी राहुल को कितना भाव देंगे ये कहना मुश्किल है। प. बंगाल में तो ममता बैनर्जी किसी को पाँव तक रखने नहीं देतीं।

      उ.प्र के मिल्कीपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल कर अखिलेश यादव की भी फजीहत कर दी। कुछ समय पूर्व हुए 9 विधानसभा उपचुनावों में 7 जीतकर योगी आदित्यनाथ अपना जलवा बिखेर चुके हैं। मिल्कीपुर की विजय ने राज्य में उनकी पकड़ और मजबूत कर दी जिससे अखिलेश का कद बौना हुआ है।

      ये देखते हुए इंडिया गठबंधन का भविष्य भी अधर में है क्योंकि शरद पवार और उद्धव ठाकरे की चिंता अपनी बची हुई पार्टी को बिखरने से बचाना है। वहीं दिल्ली के परिणाम ने  श्री केजरीवाल के पर कतर दिये जिसके बाद वे अपने घर को संभालने में जुटेंगे क्योंकि कल दोपहर से ही पंजाब में आदमी पार्टी में टूटन की आशंका व्यक्त होने लगी है।

  सबसे बड़ी बात लोकसभा चुनाव के बाद हुए राज्यों के चुनावों में  कांग्रेस के घटिया प्रदर्शन के बाद गठबंधन में  राहुल का दबदबा कम हो जाना है जिसके कारण कांग्रेस मुखिया की हैसियत खो बैठी है।

    आने वाले कुछ महीने विपक्ष की राजनीति में बड़े बदलाव के साक्षी बनेंगे क्योंकि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व लोकसभा में बहुमत से चूक जाने के बाद बेहद सवधानी से आगे बढ़ रहा है। तीन राज्यों में बड़ी जीत हासिल करने के बाद अब एनडीए में मोदी - शाह की वजनदारी और बढ़ गई है। बिहार में नीतीश कुमार भी अब ज्यादा सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं हैं। लालू कुनबे को भी भय है उसे   भी श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे जेल न जाना पड़े। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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