लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने गत दिवस राष्ट्रपति के अभिभाषण में ज्यादातर तो पुरानी बातों को ही दोहराया किंतु बेरोजगारी के मुद्दे पर वे ऐसी टिप्पणी कर गए जिसने यूपीए सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उल्लेखनीय है हाल ही में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का दावा कांग्रेस हमेशा करती आई है। विशेष रूप से बेरोजगारी को लेकर वह वर्तमान मोदी सरकार पर तीखे हमले करती रही। राहुल भी अपनी सभाओं में उनकी सत्ता बनने पर नौजवानों को रोजगार की गारंटी बांटते हैं। विगत लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी को इंडिया गठबंधन ने बड़ा मुद्दा बनाया था जिसका कुछ - कुछ असर भी देखने मिला। लेकिन गत दिवस लोकसभा में दिये भाषण में श्री गाँधी ने युवाओं को देश का भविष्य बताते हुए कहा उनके लिए काम करना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने मोदी सरकार द्वारा प्रारंभ किये गए मेक इन इंडिया अभियान की तो प्रशंसा की किंतु साथ ही ये भी जोड़ दिया कि वह अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। सबसे बड़ी बात उन्होंने ये कही कि बेरोजगारी का हल करने में यूपीए वन और टू के अलावा वर्तमान सरकार भी असफल रहीं। इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि 1991 में बनी कांग्रेस के नेतृत्व वाली पी.वी नरसिम्हा राव सरकार द्वारा किये गए आर्थिक सुधारों में उपभोग पर तो जोर दिया गया किंतु उत्पादन बढ़ाने के प्रति उदासीनता बरती गई। और वही गलती आने वाली सरकारों के दौर में दोहराई जाती रही। उनका आशय ये था कि उत्पादन बढ़ाने से रोजगार में वृद्धि के साथ ही विदेशों पर हमारी निर्भरता कम होगी जिससे कि देश आर्थिक और कूटनीतिक दबावों से मुक्त रहेगा। यद्यपि श्री गाँधी ने अभिभाषण के बहाने मोदी सरकार पर जमकर अपनी भड़ास निकाली। महाराष्ट्र में हुई करारी हार की कसक भी उनके उद्बोधन में चुनाव आयोग पर निशाना साधने के रूप दिखाई दी किंतु पूरे भाषण में उन्होंने एक बात ईमानदारी से स्वीकार कर ली कि यूपीए सरकार ने भी बेरोजगारी घटाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया। उनके भाषण के इन अंशों की प्रशंसा भी हुई क्योंकि उनमें विपक्ष के नेता के साथ ही एक राष्ट्रीय सोच नजर आई। तथ्यात्मक स्थिति का विश्लेषण करने पर ये बात सामने आयेगी कि राव सरकार द्वारा जिस उदारीकरण और मुक्त व अर्थव्यवस्था की नीति लागू की गई उसे कमोबेश उसके बाद आई सभी केंद्र सरकारों ने जारी रखा। उस सरकार में वित्तमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ही थे जिन्हें कांग्रेस आर्थिक सुधारों का जनक मानती है। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस ने कभी भी राव साहब को इस बात का श्रेय नहीं दिया कि उन्होंने डाॅ. सिंह की प्रतिभा को पहिचानकर उन्हें अपनी सरकार में शामिल किया। बाद में उनको गाँधी परिवार ने प्रधानमंत्री भी बनवाया। जिन आर्थिक सुधारों को डाॅ. सिंह ने प्रारंभ किया उनके लिए वैश्विक परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार थीं। विश्व व्यापार संगठन के गठन के बाद नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों को जारी रखने से देश अलग - थलग पड़ जाता। उदारवाद ने विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे तो खोले किंतु उसके कारण विदेशी उत्पादों की आवाजाही भी बढ़ने लगी जिसका दुष्प्रभाव भारतीय उद्योगों के बन्द होने के रूप में आने लगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में कारोबार जमाकर एक बड़े बाजार पर कब्जा तो जमाया ही किंतु सबसे बड़ा बदलाव हुआ उपभोक्तावाद रूपी पाश्चात्य जीवनशैली के प्रादुर्भाव के रूप में। उदारवाद ने उधारवाद की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया जिससे विदेशी कंपनियों को भरपूर मुनाफा हुआ। राहुल ने उपभोग और उत्पादन के बीच संतुलन बिगड़ने की जो बात कही तो उसके लिए डाॅ. सिंह ही जिम्मेदार माने जाएंगे क्योंकि आर्थिक सुधारों ने रोजगार विहीन विकास को जन्म दिया। उत्पादन नहीं बढ़ा ये कहना पूर्ण सत्य नहीं है। लेकिन वैश्विक बाजारों में जिस तरह चीन छाया हुआ है उसकी तुलना में भारत बहुत पीछे रह गया। श्री गाँधी ने रोजगार और उत्पादन बढ़ाने में यूपीए सरकारों की असफलता को स्वीकार कर निश्चित रूप से ईमानदारी दिखाई किंतु इसके बाद उन्हें और उनकी पार्टी को वर्तमान केंद्र सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं रह जाता जिसने 10 वर्षों में भारत को दुनिया की सबसे तेज दौड़ती व्यवस्था के तौर पर प्रतिष्ठित कर दिया। यही वजह है कि भारत विदेशी निवेशकों का मनपसंद बन गया। हालांकि श्री गाँधी ने उपभोग और उत्पादन के बीच असंतुलन की बात छेड़कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विकास दर कितनी भी ऊपर चली जाए किंतु वह रोजगार बढ़ाने में सहायक न हो तो उसका लाभ ही क्या? आजकल चुनाव घोषणापत्र में सत्ता संभालते ही लाखों नियुक्तियों का वायदा किया जाता है किंतु ये नौकरियां आएंगी कहाँ से ये कोई नहीं बताता। श्री गाँधी के पास भी इस समस्या का कोई हल नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment