Friday, 14 February 2025

आयकर के विकल्प की तलाश समय की मांग


वित्त मंत्री निर्मला  सीतारमण द्वारा  नया आयकर विधेयक संसद में प्रस्तुत किये जाने के बाद प्रवर समिति को भेज दिया गया जो मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट देगी। बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख किये जाने के समय ही उन्होंने इसके संकेत दे दिये थे। तभी से इसको लेकर अनुमान लगाए जाने लगे थे। प्रस्तुत विधेयक में बहुत सारे अनुपयोगी प्रावधान हटा दिये गए हैं। कुछ नियमों को जोड़कर उनकी संख्या कम कर दी गई वहीं  कुछ प्रावधानों को सरलीकृत किया गया है। 1961 के अधिनियम के आकार को आधा कर दिया गया है। जो जानकारी आई उसके अनुसार नये विधेयक में मौजूदा कानून की अनेक जटिलताओं को दूर किया गया है जिससे कर दाताओं  के साथ ही कर सलाहकारों को भी सुविधा होगी। इस विधेयक को इस तरह तैयार किया गया है जिससे ये अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो। मोदी सरकार  इसके पूर्व भी अनेक कानूनों का सरलीकरण करने के साथ ही अनुपयोगी कानूनों को विलोपित कर चुकी है जो दरअसल प्रशासनिक सुधारों की प्रक्रिया का हिस्सा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आयकर कानून में जो पेचीदगियां थीं उनकी वजह से करदाता को बहुत परेशानी होती थी। उसका परिणाम भ्रष्टाचार और कर चोरी के रूप में देखने मिलता रहा। बीते दो - तीन दशकों में आयकर के ढांचे में काफी सुधार हुए जिससे विवरणी भरना आसान हुआ। सबसे बड़ी राहत रिफंड के बारे में हुई जो काफी देर से आता था और उसका भुगतान हासिल करने के लिए घूस भी देनी पड़ती थी। इसी तरह कर निर्धारण की प्रक्रिया को  व्यक्तिगत संपर्क की बजाय ऑन लाइन  किये जाने से भी क्रांतिकारी सुधार हुआ। पहले छोटे - छोटे करदाता को भी  पेशी का सिर दर्द झेलना पड़ता था। लेकिन अब सब काम ऑन लाइन होने से उससे मुक्ति मिल गई। 90 फीसदी से अधिक विवरणी महीने भर से भी कम समय में स्वीकार हो जाती हैं। जिनमें पूछताछ होती है उनमें भी अधिकारी और विवरणी भरने वाले का आमना - सामना नहीं होता। इस प्रकार  मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम हो गया जो भ्रष्टाचार की जड़ था। यही वजह है कि लघु और मध्यमवर्गीय करदाताओं के अलावा भी जो बड़े कारोबारी हैं उनके मन में आयकर को लेकर पहले जैसा खौफ नहीं रहा। बीते कुछ वर्षों में आयकर दाता जिस तेजी से बढ़े उसके कारण सरकार को उससे होने वाली कमाई भी   आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। इससे प्रमाणित होता है कि कानून और प्रक्रिया सरल होने से व्यवस्था में नागरिकों  का विश्वास बढ़ता है और  वे उत्साहित होकर  उसमें सहयोग  करते हैं। लेकिन इसके साथ ही अब ये विचार भी सामने आ रहा है कि आयकर की मौजूदा व्यवस्था में सुधार से एक कदम आगे बढ़कर उसके विकल्प के बारे में सोचा जाए। कहा जाता है मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी इसी दिशा में बढ़ाया कदम था किंतु उसे लागू  किये जाने में जो गड़बड़ियां हुईं उनकी वजह से अगला कदम उठाने से सरकार पीछे हट गई। ये आरोप भी लगे कि नोटबंदी  की गोपनीयता बनाये रखने के फेर में सरकार समुचित तैयारी नहीं कर सकी । उसके कारण जनता को जो परेशानी हुई उसने एक अच्छे निर्णय को आलोचना का पात्र बना दिया। यद्यपि प्रधानमंत्री नोटबंदी के अगले चरण के प्रति गंभीर बताये जाते हैं किंतु इस बार जो भी होगा वह सोच - समझकर किया जाएगा। अनेक अर्थशास्त्रियों का मानना है कि प्रत्यक्ष कर की ऐसी प्रणाली लागू की जाए जिससे लोगों में आय छिपाकर कर चोरी करने की प्रवृत्ति समाप्त हो। वह खर्च पर कर ( एकस्पेंडीचर टैक्स ) हो या बैंक में जमा होने वाली नगद राशि कर ( ट्रांजेक्शन टैक्स) ये विश्लेषण का विषय है किंतु जिस तरह जीएसटी में व्याप्त जटिलताएं खत्म होने से उसका संग्रह लगातार नई ऊंचाइयां छू रहा है उसी तरह यदि काले धन की समानांतर अर्थ व्यवस्था पर लगाम कसनी है तब लोगों को अपनी आय उजागर करने में लगने वाले डर को पूरी तरह दूर करने की जरूरत है। नया आयकर विधेयक तो अपनी जगह ठीक है क्योंकि उसका मकसद प्रचलित कानून को सरल और संक्षिप्त बनाना है । लेकिन आयकर को समाप्त कर किसी ऐसी व्यवस्था  की जरूरत है जिससे लोग  अपनी पूरी आय उजागर करें। यदि काले धन से चलने वाली समानांतर अर्थ व्यवस्था  बन्द की जा सके तो भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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