लोकसभा चुनाव में भाजपा का 400 पार वाला नारा कारगर नहीं रहा वहीं कांग्रेस 99 के तक पहुंचकर मुख्य विपक्षी दल की बन गई । हालांकि नरेंद्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में कोई अड़चन नहीं आई किंतु चर्चा का केंद्र राहुल गाँधी बने जो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में विपक्ष का चेहरा बनकर उभरे। कांग्रेस की सीटें दो गुनी होने से इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी को पसंद नहीं करने वाले भी उनके प्रभाव को स्वीकार करने लगे। लोकसभा और उसके बाहर श्री गाँधी के तेवर देखने से ये लगने लगा कि वे इस बार एक परिपक्व नेता के रूप में सामने आयेंगे। लेकिन ये आशावाद ज्यादा दिन नहीं टिक सका। जम्मू कश्मीर के चुनावों में कांग्रेस के सहयोगी उमर अब्दुल्ला ने तो श्री गाँधी पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए सलाह दी कि वे बजाय घाटी में घूमने के जम्मू अंचल की उन सीटों पर ध्यान दें जो कांग्रेस को आवंटित थीं। उमर की चिंता सही निकली क्योंकि कांग्रेस समझौते में मिली अधिकांश सीटों पर हार गई। उसी के साथ हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भाजपा से सत्ता छीन लेने के प्रति आश्वस्त थी। लेकिन भाजपा तीसरी मर्तबा भी सरकार बनाने में कामयाब रही। इसी के साथ राहुल के विरुद्ध इंडिया गठबंधन में आवाजें उठने लगीं और सहयोगी दल ये कहते हुए सुने गए कि कांग्रेस अकेले दम पर भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकती। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उद्धव ठाकरे और शरद पवार को भरपूर सीटें देकर संतुष्ट करना चाहा किन्तु यहाँ भी भाजपा ने विपक्ष का सफाया कर दिया। कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया। महाराष्ट्र जीतने के बाद भाजपा तो लोकसभा चुनाव के झटके से उबर कर नये आत्मविश्वास से भर उठी किंतु राहुल और कांग्रेस 4 जून से पहले वाली स्थिति में जा पहुँचे। ममता बैनर्जी ने इंडिया गठबंधन के नेतृत्व में बदलाव की माँग कर खुद नेता बनने की पहल की जिसे अखिलेश यादव , उद्धव ठाकरे और दबी जुबान तेजस्वी यादव का भी समर्थन मिला। उमर अब्दुल्ला ने तो गठबंधन को ही खत्म कर देने की बात कह डाली। लोकसभा चुनाव के बाद उसकी बैठक नहीं होने पर ये भी कहा गया कि वह केवल लोकसभा चुनाव तक था। इसी बीच दिल्ली विधानसभा के चुनाव आ गए जिसमें आम आदमी पार्टी और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतर गए जबकि लोकसभा चुनाव में दोनों ने सीटों का बंटवारा किया था। इंडिया गठबंधन में बिखराव खुलकर उस समय सामने आ गया जब तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने आम आदमी पार्टी के समर्थन की घोषणा कर दी। दरअसल ये राहुल के प्रति इंडिया गठबंधन में विद्रोह का खुला ऐलान था। चुनाव परिणाम आम आदमी पार्टी के लिए तो निराशाजनक रहे ही किंतु कांग्रेस के लिए तो शर्मिंदगी लेकर आये जो लगातार तीसरी बार शून्य पर ही अटकी रह गई। इसी साल बिहार में भी चुनाव होने वाले हैं जिसमें कांग्रेस और तेजस्वी के बीच गठबंधन की संभावना तो है किंतु तीन राज्यों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद कांग्रेस सौदेबाजी की हैसियत गँवा बैठी है । दिल्ली में भले ही भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करवाकर कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी की पराजय में सहभागी बनकर हरियाणा का बदला ले लिया हो किंतु उसकी खुद शर्मनाक स्थिति से नहीं उबर सकी। इसके कारण राहुल गाँधी के प्रति पार्टी के भीतर भी असंतोष है। जिसका पहला संकेत मिला पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री शशि थरूर की नाराजगी से जिन्होंने श्री गाँधी से मिलकर ये शिकायत की कि उनका समुचित उपयोग नहीं किया जा रहा। उनको इस बात से खुन्नस है कि लोकसभा में पार्टी का पक्ष रखने के लिए उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया जाता। लेकिन राहुल ने उन्हें कोई आश्वासन नहीं दिया जिसके बाद श्री थरूर के पार्टी छोड़ने की अटकलें तेज हो गईं। स्मरणीय है श्री गाँधी का रूखा व्यवहार अनेक नेताओं को पार्टी छोड़ने बाध्य कर चुका है । शशि थरूर भले ही बड़ा जनाधार न रखते हों किंतु पार्टी के सबसे शिक्षित नेताओं में उनका स्थान है जो देश और दुनिया के मुद्दों पर अच्छी जानकारी रखते हैं। लगता है श्री गाँधी को इस तरह के लोगों से इस बात का भय लगता है कि कहीं ये लोग उनके लिए चुनौती न बन जाएं। पता नहीं पार्टी में ऐसे विषयों पर विचार करने की चिंता किसी को है या नहीं ? सोनिया गाँधी बीमारी के कारण सक्रिय नहीं हैं और प्रियंका वाड्रा के लिए राजनीति शौक पूरा करने जैसा है। रही बात राहुल की तो वे अपनी खुद की दिशा आज तक तय नहीं कर पाए । लोकसभा चुनाव में मिली सफलता से वे जिस आत्ममुग्धता का शिकार हो गए वह कांग्रेस के लिए घातक साबित हो रही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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