सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली मुफ्त योजनाओं की घोषणा पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोग काम नहीं करना चाहते क्योंकि आप उन्हें मुफ्त अनाज दे रहे हैं। उसने पूछा कि लोगों को मुख्य धारा में शामिल करने की बजाय मुफ्त की योजनाएं लागू कर क्या परजीवियों की जमात खड़ी नहीं की जा रही है? और ये भी कि क्या उनको मुख्यधारा में शामिल कर देश के विकास का हिस्सा बनाना अच्छा नहीं होगा? इसके पहले भी न्यायालय मुफ्त योजनाओं पर दायर याचिकाओं पर सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर चुका है। लेकिन चुनाव आयोग गेंद न्यायालय के पाले में खिसका कर अपना पल्ला झाड़ लेता है और सर्वोच्च न्यायालय टिप्पणी और सवाल पूछकर बात आगे बढ़ा देता है। जहाँ तक बात सरकार की है तो वह किसी भी पार्टी की हो मुफ्त योजनाओं को बंद करने का साहस नहीं जुटा सकती । दिल्ली के हालिया चुनाव में प्रधानमंत्री ने आदमी पार्टी सरकार की मुफ्त योजनाओं को रेवड़ी कहकर उनकी आलोचना की। जवाब में अरविंद केजरीवाल ने ये प्रचार शुरू कर दिया कि भाजपा सत्ता में आई तो वह मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं को बस यात्रा पर रोक लगा देगी और झुग्गियों को तोड़ दिया जाएगा। इस प्रचार से घबराई भाजपा ने आश्वासन दिया कि सभी मुफ्त सुविधाएं जारी रहेंगी और झुग्गी वासियों को पक्के मकान दिये जाएंगे। भाजपा ने आम आदमी पार्टी द्वारा महिलाओं को प्रति माह 2100 रु. के वायदे से आगे बढ़कर 2500 रु. देने का वायदा कर दिया। विडंबना ये है कि सभी दल एक - दूसरे पर खैरात बाँटकर चुनाव जीत लेने का आरोप लगाते हैं किंतु खुद उससे परहेज नहीं करते। आशय ये है कि खेल सब एक जैसे रहे हैं किंतु हारने वाला विजेता पर बेईमानी का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ये पूछ चुका है कि सरकार मुफ्त अनाज कब तक बांटेगी? कांग्रेस भी मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावे का मजाक उड़ाते हुए कहती है कि ऐसा है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है ? लेकिन मुफ्त अनाज वितरण जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किया जा रहा है वह सोनिया गाँधी की पहल पर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा ही पारित करवाया गया था। कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी गोदामों में अनाज के सड़ने की शिकायतों पर कहा था कि इससे बेहतर है वह गरीबों में बाँट दिया जाए। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जब निःशुल्क अनाज वितरण शुरू किया तब वह समय की मांग थी किंतु अब वह चाहकर भी उसे बंद नहीं कर पायेगी क्योंकि मुफ्त योजनाओं को बंद करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा। चुनाव आयोग कह चुका है कि ऐसा करना उसके लिए तभी संभव होगा यदि संसद उसके लिए कोई कानून बनाए जिसके कोई आसार नजर नहीं आते। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं के वायदे किये जाने पर रोक क्यों नहीं लगाता? अनेक मामलों में वह ऐसा कर भी चुका है। ये मुद्दा भी विचारणीय है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के बाद भी इस तरह के वायदे करने का क्या औचित्य है जिनके कारण विकास सहित अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की ये टिप्पणी बहुत ही सटीक है कि राज्यों न के पास न्यायाधीशों के वेतन और पेंशन के लिए पैसों की कमी है किंतु उन लोगों को रेवड़ियां बाँटने के लिए धन की कमी नहीं जो कुछ नहीं करते। चुनाव आयोग ने गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय से ही कह दिया कि वह मुफ्त योजनाओं को परिभाषित करे जिसके बिना वह कोई कदम नहीं उठा सकता। लोक कल्याणकारी राज्य में वंचित वर्ग का आर्थिक संरक्षण सरकार का दायित्व है। भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहाँ सब्सिडी के जरिये लोगों की मदद की जाती है। लेकिन संपन्न देशों के पास इतनी हैसियत होती है कि अपनी जनता को इस तरह की सहायता करें किंतु भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में मुफ्त योजनाओं को हमेशा जारी रखना न तो व्यवहारिक है और न ही आर्थिक दृष्टि से संभव। चूंकि संसद में बैठे देश के भाग्य विधाताओं को मुफ्त योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतना आसान लगता है इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना व्यर्थ है। चुनाव आयोग में बैठे नौकरशाहों में भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आकर कुछ करना चाहिए वरना ये सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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