अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ताबड़तोड़ फैसलों से पूरी दुनिया में खलबली है। विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में लिए गए निर्णयों से वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही है। आयात शुल्क में वृद्धि संबंधी उनके फैसलों से वे सभी देश परेशान हैं जिनका सामान वहाँ निर्यात होता है। सैन्य मोर्चे पर भी ट्रम्प यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक सहायता देने से पीछे हट रहे हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेन्स्की का उन्होंने जिस तरह मजाक उड़ाया वह काफी कुछ कह गया । अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों को वापस भेजने की उनकी नीति भी चर्चा में है। उनके फैसलों का भारत पर भी असर पड़ रहा है। आयात शुल्क बढ़ाये जाने के अलावा गैर कानूनी ढंग से अमेरिका में घुसे प्रवासियों को भारत भेजने को लेकर रिश्तों में खटास पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। इस सबके बीच ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत में मतदान बढ़ाने दिये गए फंड को रोकने के निर्णय ने हलचल मचा दी। खुद ट्रम्प ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि बाइडेन के कार्यकाल में भारत के लोकसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन हेतु बड़ी राशि भेजी गई। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि बांग्ला देश में शेख हसीना को सत्ता से हटाने हुए छात्र आंदोलन के पीछे अमेरिका का ही हाथ था। वहाँ बनी अंतरिम सरकार के संयोजक यूनुस अमेरिका में ही निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे जो हसीना का तख्ता पलट होते ही ढाका लौट आये। बाइडेन द्वारा भारत विरोधी इस सरकार को भारी - भरकम आर्थिक सहायता देने का निर्णय किया था जिसे ट्रम्प ने रद्द कर दिया। लेकिन भारत में मतदान बढ़ाने हेतु करोड़ों रुपये भेजे जाने और तत्कालीन सत्ता को बदलने जैसे खुलासे के बाद ये बात भी सामने आई है कि अमेरिका से विभिन्न सामाजिक कार्यों के लिए अनेक भारतीय एन .जी.ओ को धन मिलता रहा। सर्वविदित है कि अमेरिका दुनिया के अनेक देशों में अपने आर्थिक और सामरिक हितों के अनुकूल सत्ता बनवाने प्रयासरत रहता है। भारत में भी विभिन्न संगठन अमेरिकी डॉलर रूपी मलाई खाते रहे हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित संस्थानों के संचालन में भी विदेशी धन का इस्तेमाल किसी से छिपा नहीं है। लेकिन मतदान बढ़ाकर सत्ता बदलने जैसी बात पहली बार सामने आई। ट्रम्प ने इसका ब्यौरा देने की बात भी कही। इधर भारत में इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस में आरोप - प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। केंद्र सरकार ने इस बात की जाँच करने की बात कही है कि सत्ता परिवर्तन के लिए आया धन किसकी जेब में गया? ये भी समझा जा सकता है कि सत्ता में नरेंद्र मोदी ही थे इसलिए अमेरिका द्वारा भेजे गए डॉलर उन्हें बेदखल करने ही आये होंगे और वैसा होने पर कौन लाभान्वित होता ये अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। लेकिन बाइडेन वैसा क्यों चाह रहे थे इसका कारण तलाशने पर यही समझ में आता है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में भारत ने अमेरिका के दबाव में आकर रूस की आर्थिक नाकेबंदी से इंकार कर दिया। रूस कच्चे तेल का प्रमुख उत्पादक है। ऐसे में भारत ने उससे जमकर तेल की खरीदी की । चीन ने भी वही नीति अपनाई। सं. रा. संघ में रूस विरोधी जितने भी प्रस्ताव आये उन पर भी भारत तटस्थ रहा। उसी से नाराज होकर बाइडेन ने अपने करीबी जॉर्ज सोरेस के जरिये लोकसभा चुनाव में मोदी विरोधी अभियान को जमकर हवा दी। विदेशों में बैठे कुछ यू ट्यूबर और सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों पर भाजपा विरोधी वातावरण बनाने का सुनियोजित प्रयास जिस तरह चला वह सर्वविदित है। प्रधानमंत्री अपनी सभाओं में खुलकर इस बात की आशंका जताते रहे । उस समय तो उनकी विरोधी लॉबी उसे चुनावी पैंतरा बताकर हवा में उड़ाती रही किंतु ट्रम्प द्वारा खुलासे के बाद शक की गुंजाइश नहीं बची। इस बात की सघन जाँच होनी चाहिए कि बाइडेन प्रशासन ने भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए यदि धन भेजा तो वह किसे मिला तथा उसका उपयोग कहाँ और कैसे हुआ ? चुनाव के पहले के एक दो सालों में केंद्र सरकार के विरोध में विभिन्न प्रकार के जो लंबे आंदोलन हुए उनके पीछे विदेशी हाथ होने की आशंका व्यक्त की जाती रही। उन आंदोलनों को ब्रिटेन, कैनेडा और अमेरिका में जिस प्रकार से समर्थन मिला वह भी चौंकाने वाला था। अब चूंकि अमेरिका के राष्ट्रपति ने ही विदेशी सहायता की बात स्वीकार कर ली तब भारत की जाँच एजेंसियों को उन तत्वों का पता लगाना चाहिए जो विदेशी ताकतों के पालतू बनकर देश में राजनीतिक अस्थिरता के जरिये अराजकता फैलाने पर आमादा हैं। ये मुद्दा अंततः देश की सुरक्षा और सर्वभौमिकता से जुड़ा है जिसे खतरे में डालने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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