म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रयासों से भोपाल में आयोजित ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट के पहले दिन निवेशकों ने जो उत्साह प्रदर्शित किया वह प्रदेश के प्रति बढ़ते विश्वास का जीवंत प्रमाण है। कुछ लोग तंज कस रहे हैं कि अतीत में हुए निवेशक सम्मेलनों में की गई घोषणाएं जमीन पर नहीं उतर सकीं। ऐसे में इस आयोजन से भी आसमानी उम्मीदें करना बेमानी है। विपक्षी नेताओं ने भी जो प्रतिक्रियाएं दीं वे निराशाजनक ही हैं। उनका ऐसा सोचना स्वाभाविक भी है क्योंकि कांग्रेस राज में म.प्र के आर्थिक विकास के प्रति जो लापरवाही बरती गई उसने इस संभावना भरे राज्य को विकास की दौड़ में बहुत पीछे धकेल दिया। हालांकि गैर कांग्रेसी पार्टियां भी सत्ता में आईं किंतु उनका कार्यकाल राजनीतिक अनिश्चितता के कारण संक्षिप्त रहा। म.प्र के विभाजन के पश्चात छत्तीसगढ़ के अलग होने से काफी संसाधन वहाँ चले गए। ऐसे में शेष बचे हुए हिस्से में विकास की जो कार्य योजना बनाई जानी थी वह नहीं बनी। उसके पीछे जो भी कारण रहे हों किंतु उसका दुष्परिणाम प्रदेश को पिछड़ेपन के रूप में भुगतना पड़ा। 1993 से 2003 तक दिग्विजय सिंह के शासनकाल में म.प्र जिस दुर्दशा का शिकार हुआ वह याद करने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बिजली, सड़क और पानी जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए लोग तरस गए। कभी दूसरे राज्यों को बिजली की आपूर्ति करने वाला प्रदेश अंधेरे में डूबने मजबूर हो गया। सड़कों की जर्जर हालत ने प्रदेश की छवि पूरे देश में खराब कर रखी थी। दिग्विजय सिंह के सत्ता से हटने के बाद से 15 माह के कमलनाथ के शासन को छोड़ दें तो भाजपा ही सत्ता में है। लेकिन 2004 से केंद्र में 10 साल तक मनमोहन सरकार रही जिसके साथ राजनीतिक तालमेल नहीं बैठने के कारण विकास अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका । बावजूद उसके बिजली और सड़क की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार होने के साथ ही सामाजिक कल्याण की अनेक योजनाओं के कारण म.प्र की चर्चा देश भर में होने लगी। अन्य राज्य सरकारों ने भी उनको अपनाया। लेकिन औद्योगिक विकास के लिये आवश्यक निवेश के मामले में तेजी आई 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद। बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने आर्थिक विकास को राजनीति से ऊपर प्राथमिकता दी जिसके अनुकूल परिणाम अब जाकर दिखने लगे। 2018 में सवा साल के लिए कांग्रेस सरकार रहने के बाद भाजपा सत्ता में लौट तो आई परंतु उसके साथ ही कोरोना महामारी ने विकास प्रक्रिया पर विराम लगा दिया । कोरोना का दूसरा दौर खत्म होते तक विधानसभा चुनाव की सरगर्मी शुरू हो गई । यद्यपि उसमें भाजपा को प्रचण्ड बहुमत मिला किंतु छह माह बाद लोकसभा चुनाव के कारण आर्थिक विकास की रूपरेखा बनाने में विलम्ब हुआ। गत वर्ष मई में मोदी सरकार की तीसरी पारी शुरू होते ही मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रदेश में औद्योगिक विकास हेतु निवेश आमंत्रित करने जो प्रयास प्रारंभ किये उन्हें केंद्र सरकार ने प्रोत्साहित किया । प्रधानमंत्री का इस ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट में आना उसका प्रमाण है। पहले दिन निवेशकों ने जो घोषणाएं कीं वे इस राज्य की तस्वीर और तकदीर बदलने में सक्षम हैं। अब यह सरकार में बैठे राजनेताओं और उनके मातहत कार्यरत नौकरशाही का दायित्व है कि वे निवेश प्रस्तावों को कार्य रूप में बदलने का रास्ता तैयार करें। वैसे प्रधानमंत्री की मौजूदगी में दिये गए आश्वसानों से मुकरने का साहस शायद ही कोई उद्योगपति कर सकेगा। लेकिन मुख्यमंत्री ने इस समिट के आयोजन के लिए जितना परिश्रम किया उसे जारी रखना होगा। म.प्र बीमारू राज्य की अपमानजनक स्थिति से तो बीते 20 साल में बाहर आ चुका है किंतु अब उसे विकसित राज्य का गौरव हासिल करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। इस दो दिवसीय निवेशक सम्मेलन ने युवाओं के मन में भी ये उम्मीद जगाई है कि उनको रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना होगा। औद्योगिक विकास की गतिविधियों में तेजी आते ही व्यापारिक जगत में भी उत्साह का संचार होगा। राजनीतिक स्थिरता के साथ ही केंद्र में सहयोगी सरकार के होने से सोने में सुहागा वाली स्थिति उत्पन्न हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. सुंदरलाल पटवा म.प्र को सोया हुआ देवता कहते थे। ऐसा लगता है वह नींद से जाग उठा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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