Saturday, 30 August 2025

टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालेंगे एशियाई देश


कूटनीति में सही समय का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है। उस दृष्टि से शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में चीन जाने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ रूपी आतंकवाद के विरुद्ध एक बड़े दांव के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि बीते 11 वर्ष में उन्होंने जापान की अनेक यात्राएं कीं किंतु यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब पूरी दुनिया में ट्रम्प के पागलपन के कारण उथलपुथल मची हुई है। उल्लेखनीय है राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद का मुद्दा जोर - शोर से उठाया था। दरअसल बीते कुछ सालों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ने के अलावा बेरोजगारी की वजह से युवाओं में नाराजगी  है। अप्रवासियों की बढ़ती संख्या के कारण संसाधनों पर भी उनका कब्जा होते जाने से भी अमेरिकी समाज में चिंता व्याप्त थी। बड़ी - बड़ी कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय मूल के लोग आसीन हो गए। वित्तीय संस्थानों में चीनी पूंजी हावी होने लगी। ट्रम्प ने अमेरिकी जनमानस के मन में व्याप्त असंतोष को भांपकर भावनात्मक माहौल बनाया जिसने उनको दोबारा राष्ट्रपति तो बना दिया किंतु उनके पास अमेरिका के सामने मंडराती समस्याओं का कोई प्रभावी उपाय नहीं था और इसीलिये उन्होंने टैरिफ को अपनी कूटनीति का जरिया बनाते हुए जनता को फुसलाने का दांव चला किंतु अमेरिका के तमाम दिग्गज अर्थशास्त्रियों के अलावा विश्व  स्तरीय रेटिंग एजेंसीज ने भी ट्रम्प द्वारा मनमर्जी से थोपे जा रहे टैरिफ को देश के लिए आत्मघाती बताकर उसकी आलोचना की। यहाँ तक कि अमेरिकी अदालतों तक ने टैरिफ लगाने के उनके कृत्य को संविधान के विरुद्ध माना। लेकिन ट्रम्प के दिमाग में ये बात बैठ चुकी है कि अपने इस दाँव से वे पूरी दुनिया को घुटनाटेक करवा लेंगे। दरअसल सोवियत संघ के विखंडन के बाद दुनिया एक ध्रुवीय हो गई थी। विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से अमेरिका ही विश्व की आर्थिक दिशा तय करने लगा था किंतु बीते एक दशक में वैश्विक परिदृश्य में बड़ा बदलाव हुआ। चीन के साथ ही भारत और ब्राज़ील जैसे देश आर्थिक प्रगति के रास्ते पर  तेज गति से आगे बढ़े। उधर दक्षिण अफ्रीका ने भी उपनिवेशवाद की यादों से निकलकर अपनी ताकत दिखाई। अमेरिका के लिए ये चुनौती से कम नहीं था। लेकिन बजाय सामंजस्य बिठाने के ट्रम्प रिंग मास्टर की तरह हंटर फटकारने पर आमादा हो गए। इस बदहवासी में उन्होंने न दोस्त देखा न दुश्मन। जिस यूरोप के साथ अमेरिका के रिश्ते बेहद मधुर रहे उनसे भी ट्रम्प ने पंगा ले लिया। लेकिन जापान जैसे देश से सम्बन्ध बिगाड़ने की उनकी नीति समझ से परे है क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका के हाथों बर्बाद हुए इस देश की विदेश नीति बीते 80 सालों से तो अमेरिका परस्त ही रही। टैरिफ रूपी आतंकवाद ने जब जापान पर भी वार किया तब उसने भी अमेरिकी प्रभुत्व से बाहर निकलने का साहस दिखाया। गत दिवस श्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री की मुलाकात के बाद ये घोषणा हुई कि जापान आगे से भारत में किये जाने वाला निवेश अमेरिकी डॉलर की बजाय अपनी मुद्रा येन में करेगा। श्री मोदी ने जापान की तकनीक और भारतीय कौशल के समन्वय का जो उल्लेख किया वह ट्रम्प को एशिया का जवाब है। वहीं से उन्होंने चीन और भारत को मिलकर इस वैश्विक संकट से निपटने का जो आह्वान किया वह भी कूटनीतिक कुशलता ही कही जायेगी। दक्षिण एशिया के जिन छोटे देशों ने बीते कुछ दशकों में आर्थिक प्रगति की वे भी  टैरिफ के विरुद्ध किसी मंच की तलाश में हैं, ऐसे में यदि जापान भी भारत और चीन के साथ खड़ा हो जाए तब एशिया अकेला  ही  ट्रम्प की दादागिरी का मुकाबला करने में सक्षम हो जाएगा। अमेरिका के समक्ष सबसे बड़ा संकट आने वाला है अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर को आधार मुद्रा मानने के प्रति बढ़ता विरोध। रूस, चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका के साथ जापान भी डॉलर की चौधराहट से इंकार करने लगा तब ट्रम्प का टैरिफ रूपी तीर लौटकर उन्हीं को आहत करेगा। चीन के बाद भारत और अब जापान ने भी अमेरिका के विरुद्ध आगे आने की जो हिम्मत दिखाई वह ट्रम्प के टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालने में सफल  साबित होगी ये सोचना गलत नहीं है। जापान की देखासीखी अमेरिका के पिछलग्गू अन्य देश भी ट्रम्प के विरुद्ध मुखर होंगे ये उम्मीद की जा सकती है। श्री मोदी की जापान यात्रा उस दृष्टि से बहुत ही सामयिक और सार्थक है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 August 2025

ऐसी ही सर्वसम्मति क्रीमी लेयर मामले में भी दिखाई जाए



सत्ता और विपक्ष जनता से जुड़े किसी मुद्दे पर एकमत होकर विवादों को दूर करने साथ आयें  , इससे अच्छा और क्या हो सकता है? गत दिवस म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर एक सर्वदलीय बैठक भोपाल स्थित मुख्यमंत्री निवास में हुई जिसमें  ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने पर  पर सभी दलों के नेताओं ने सहमति जताई। इसके बाद तय हुआ कि इसमें आ रहीं कानूनी अड़चनों को दूर करने के लिए विचाराधीन याचिकाओं से जुड़े अधिवक्ताओं को भी एक साथ बिठाकर इस बात के लिए राजी किया जाए कि अदालत में सभी एक स्वर में बोलें जिससे कि फैसला जल्द हो सके। निश्चित रूप से ये स्वागतयोग्य पहल है जिसके लिए मुख्यमंत्री सहित सभी विपक्षी नेता प्रशंसा के पात्र हैं। उल्लेखनीय है कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते हुए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने संबंधी अध्यादेश जारी किया गया था किंतु उसको अदालत में चुनौतियाँ दी गईं और बात उच्च न्यायालय के बाद बात सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंची। और फिर वह सरकार भी अल्पजीवी रही जिससे  शिवराज सिंह चौहान की सत्ता में वापसी हो गई। अदालतों की कारवाई अपनी शैली में चलती आ रही है। पक्ष - विपक्ष में दलीलें दी गईं। श्रेय लूटने की राजनीति  भी ऐसे मामलों में होना स्वाभाविक है। छोटी पार्टियों का तो दायरा म.प्र में बेहद सीमित है इसलिए मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होता है। 27 फीसदी ओबीसी  आरक्षण भी इन्हीं दोनों के बीच फुटबाल बना रहा। आरोप - प्रत्यारोप भी खूब हुए। नेताओं द्वारा एक - दूसरे को ओबीसी विरोधी कहे जाने पर मानहानि के दावे भी उच्च न्यायालय से होते  हुए सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचे। शीर्ष अदालत द्वारा न जाने कितनी बार सरकार को आड़े हाथों लिया गया। हलफनामे दिये भी गए और वापस लेने की नौबत भी आई। प्रदेश सरकार के सामने दिक्कत ये रही कि आरक्षण के अलावा अन्य जो मुद्दे उछलते गए उनसे भी उसे निपटना पड़ा। इस विवाद के न सुलझने से हजारों शासकीय कर्मचारियों और अधिकारियों पर प्रभाव पड़ा। भर्ती और पदोन्नति दोनों में रुकावट आई। बहरहाल, मुख्यमंत्री द्वारा उठाये गए सार्थक कदम के बाद अब ये उम्मीद बढ़ गई है कि 27 प्रतिशत  ओबीसी आरक्षण में जो कानूनी रुकावट आ रही थी वह जल्द दूर हो सकेगी। डाॅ. यादव स्वयं भी ओबीसी वर्ग से ही आते हैं इसलिए उनका इस विवाद को सुलझाने आगे आना स्वाभाविक ही है किंतु उन्होंने विपक्ष को साथ बिठाकर जिस तरह से सर्वसम्मति बनाई वह उनके राजनीतिक कौशल और व्यवहारिक कार्यशैली का परिचायक है। लेकिन इसी से जुड़ा एक और मुद्दा है जिस पर सभी पार्टियों के नेताओं को एक साथ आकर विमर्श करते हुए रचनात्मक हल निकालना चाहिए ।  वरना आने वाले समय में यह आरक्षण से लाभान्वित जातियों में अंतर्कलह उत्पन्न करने का कारण बने बिना नहीं रहेगा। और वह है क्रीमी लेयर में आ चुके आरक्षित लोगों की संतानों को आरक्षण के दायरे से बाहर करना। क्रीमी लेयर के बारे में सर्वोच्च न्यायालय तक टिप्पणी कर चुका है किंतु जिन राजनीतिक नेताओं और नौकरशाहों की दो पीढ़ियां आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक दृष्टि से सुदृढ़ स्थिति में आ चुकी हैं वे भी अपने बेटे - बेटियों को आरक्षण रूपी रक्षा कवच से वंचित करने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं होते। हालाँकि अब इन्हीं की जातियों के भीतर से ये आवाज उठने लगी है कि जिन परिवारों ने आरक्षण का लाभ लेकर उच्च वर्गीय हैसियत अर्जित कर ली उन्हें खुद होकर अपनी संतानों द्वारा उसके लाभ लेने से मना करना चाहिए। लेकिन आरक्षित वर्ग के किसी भी राजनीतिक नेता अथवा नौकरशाह ने क्रीमी लेयर के लिए  आरक्षण खत्म करने में रुचि नहीं दिखाई। उल्टे अब  ओबीसी के लिए 27 की बजाय 52 प्रतिशत आरक्षण की माँग  छेड़कर नये विवाद को जन्म देने का खेल शुरू किया जा रहा है। कल भी ये मांग मुख्यमंत्री के सामने उठाई गई। जिन नेताओं ने ओबीसी आरक्षण के लिए संघर्ष किया उनमें से ज्यादातर संपन्नता के शिखर पर हैं। कुछ के बेटे - बेटी विदेश जाकर पढ़ाई कर रहे हैं जिसमें कुछ भी गलत नहीं है किंतु उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना उस सामाजिक न्याय की अवधारणा के विरुद्ध है जिसके लिए वह शुरु किया गया। राजनीति की अपनी सीमाएं हैं। इसीलिए नेतागण वोट बैंक के मजड़जाल से बाहर नहीं निकल पाते। लेकिन आरक्षित वर्ग में जो लोग  विकास की सीढ़ियों पर चढ़ चुके उन्हें अपने ही समाज के उस तबके को ऊपर लाने के लिए त्याग करना चाहिए जो अभी भी अपने उत्थान से वंचित है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 August 2025

ट्रम्प के घमंड का जवाब है भारत की स्वतंत्र विदेश नीति



बात सिर्फ रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने तक सीमित होती तब सोचा भी जा सकता था क्योंकि हर देश को अपने व्यापारिक हितों के मद्देनजर अपनी नीति बनाने का अधिकार है । लेकिन उसके लिए राजी नहीं होने पर डोनाल्ड ट्रम्प ने  50 फीसदी का जो टैरिफ भारत पर थोपा उसके पीछे केवल रूस से तेल खरीदी नहीं है। अन्यथा यूरोप के अन्य देश भी तो आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ  व्यापार कर रहे हैं। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तो इसकी जानकारी खुले आम देते हुए ट्रम्प के फैसले को औचित्यहीन बताया। साथ ही ये खुलासा भी किया कि भारत से ज्यादा तो रूसी तेल की खरीददारी चीन  करता है। अमेरिका के भीतर भी ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए अनाप - शनाप टैरिफ की सार्थकता पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कूटनीतिक माध्यमों से बातचीत जारी है किंतु 27 अगस्त से 50 फीसदी टैरिफ लागू करने का आदेश निकालकर ट्रम्प  अमेरिका का हाथ ऊपर रखने की रणनीति अपना रहे हैं। चूंकि अब तक भारत ने उनकी बेहूदी टिप्पणियों का जवाब देने की जरूरत नहीं समझी इसलिए वे और भन्नाए हुए हैं। जर्मनी के एक अखबार की मानें तो उन्होंने  चार बार फोन किये गए किंतु नरेंद्र मोदी ने बात नहीं की। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत पर दबाव डालकर युद्धविराम करवाने के उनके दावे का भी श्री जयशंकर ने स्पष्ट रूप से खंडन किया किंतु वे अभी भी झूठे बयान दे रहे हैं। इन सबसे लगता है ट्रम्प झूठ का पुलिंदा हैं  और अहंकार में पूरी तरह डूब चुके हैं। उनका टैरिफ दांव अमेरिका के सरकारी खजाने को भरने में तो फिलहाल सफल दिखाई दे रहा है किंतु  अमेरिका द्वारा आयात किये जाने वाले भारतीय सामान की कीमतों में आई उछाल से वहाँ मंहगाई भी बढ़ गई जिससे आम उपभोक्ता नाराज हैं। भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं का उपयोग भारतीय मूल के अप्रवासियों के अलावा अमेरिका में बसे  एशियाई देशों के लोगों द्वारा भी किया जाता है। कुछ चीजें तो अमेरिकी जनता को भी बेहद पसंद हैं। ऐसे में ट्रम्प  जिस भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बता चुके हैं उसमें तो जीएसटी की दरों में कमी के अलावा आम जनता के उपयोग की वस्तुओं पर टैक्स कम कर सरकार महंगाई घटाने जैसे कदम उठा रही है वहीं अपनी अमीरी पर ऐंठने वाले अमेरिका में  जनता पर मूल्य वृद्धि का बोझ महज इसलिए लादा जा रहा है क्यों कि भारत ने ट्रम्प के दबाव के समक्ष झुकने से इंकार कर दिया। प्रधानमंत्री श्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच दोस्ताना रिश्ते कूटनीतिक औपचरिकताओं से ऊपर उठ चुके थे। लेकिन दोबारा चुने जाने के बाद  ट्रम्प जिस तरह से  पाकिस्तान के करीब आने लगे वह निश्चित रूप से रहस्यमय है। भारत पर रूस से सम्बन्ध खत्म करने के लिए दबाव बना रहे ट्रम्प उस पाकिस्तान को गोद में बिठाने पर आमादा हैं जो चीन के चरणों में लोटपोट है। रूस के साथ भारत से ज्यादा मजबूत व्यापारिक रिश्ते चीन के हैं। लेकिन उसके बाद भी ट्रम्प चीन को छूने में घबराते हैं। ये  सब देखने के बाद ही लगता है कि ट्रम्प के मन में कुछ और पक रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सैन्य बलों के शानदार प्रदर्शन और सामरिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता अमेरिका के लिए चिंता का कारण बन गई है। ब्रिक्स जैसे संगठन में भारत की वजनदार उपस्थिति से भी अमेरिका डरा हुआ है। इसीलिए वह टैरिफ रूपी अस्त्र छोड़कर भारत को ब्लैकमेल कर अपनी कुछ शर्तें मनवाना चाहता है। मोदी सरकार ने विदेश नीति को  विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित कर बजाय किसी का पिछलग्गू बनने के  स्वतंत्र बना दिया। इसका लाभ ये हुआ कि फ्रांस, इजराइल, ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष श्री मोदी से फोन पर बात करने में नहीं डरते। चीन के विदेश मंत्री की हालिया नई दिल्ली यात्रा और प्रधानमंत्री की इसी सप्ताह होने वाली चीन यात्रा काफी कुछ कह रही है। अलास्का से लौटकर रूसी राष्ट्रपति पुतिन का श्री मोदी द्वारा फोन पर लंबी बातचीत भारत के कूटनीतिक महत्व का प्रमाण है। इससे भी बड़ी बात ये हुई कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने श्री मोदी से बात कर भारत आने की मंशा  जताई। जाहिर है ट्रम्प ये सब पचा नहीं पा रहे। टैरिफ  बढ़े हुए दो दिन होने के बाद भी भारत द्वारा दिखाई जा रही बेफिक्री अमेरिका के घमण्ड का जवाब है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 August 2025

पहाड़ों से छेड़छाड़ नहीं रुकी तो तबाही सुनिश्चित



पहाड़ों की चोटी तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक धार्मिक स्थल पहाड़ों में स्थित होने से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। गर्मियों में  पहाड़ों पर बसे हिल स्टेशनों में मैदानी इलाकों के  सैलानियों की भीड़ उमड़ती है। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में भी पहाड़ों का आकर्षण है। कोलाहल रहित पहाड़ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होते हैं। एक समय था जब  ऋषि - मुनि वहाँ तपस्या करते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी उनमें भरे थे। हिमालय से सदा नीरा बड़ी - बड़ी नदियां निकलती  हैं। श्रीनगर में मुगल बादशाहों द्वारा विकसित उद्यान पर्यटकों से भरे रहते हैं। लद्दाख और अरुणाचल  के भव्य बौद्ध मठ भी पर्वतों के धार्मिक महत्व को साबित करते हैं। ब्रिटिश राज में  हिल स्टेशन के रूप में पर्वतीय क्षेत्रों का विकास होने पर  सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला तो अंग्रेजों की  ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। हालांकि आजादी के बाद भी  तीर्थस्थलों के अलावा अन्य पर्वतीय स्थानों का विकास हुआ।  बीते कुछ दशकों में मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से इनमें बेतहाशा भीड़ होने लगी है।  सड़कों और पुलों आदि के निर्माण हेतु वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के बहाव को मोड़न सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देना जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास और आमोद - प्रमोद हेतु  किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों को उपेक्षित किया । यही कारण है कि  उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती  है वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों  को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को हुए नुकसान की वजह से  प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं।  समूचे हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन, बादल फटने और ग्लेशियरों के टूटने  से आये सैलाब की ताजा घटनाओं के लिए पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक संरचना से  छेड़छाड़ ही जिम्मेदार  है । जहां कुछ दिनों के भीतर ही सैकड़ों लोग जान गंवा बैठे और अनेक मानवीय बस्तियाँ क्षण भर में जल प्रलय का शिकार होकर अस्तित्वहीन हो गईं। यद्यपि  अति वृष्टि को भी इसका कारण माना जा रहा है। लेकिन सही बात ये है कि पहाड़ों को भीतर से कमजोर कर दिए जाने के कारण ही  वे अति वृष्टि अथवा भूकंप के मामूली झटके झेलने में असमर्थ होते जा रहे हैं। ये देखते हुए हिमालय पर्वत श्रंखला  के विभिन्न क्षेत्रों में आये संकट को तात्कालिक कारणों से जोड़ना सच्चाई से मुँह चुराने जैसा होगा   उत्तराखंड में चार धाम यात्रा मार्ग में  जिस तरह रुकावट आ रही हैं वे इस बात को इंगित करती हैं कि पहाड़ पर मानवीय गतिविधियों को कम किया जाना चाहिए। वाहनों की आवाजाही  के लिए बनाई गई  बारहमासी सड़कें भी भूस्खलन के कारण बार - बार अवरुद्ध हो जाती हैं। इन्हें बनाने में भले ही कितनी  भी तकनीकी कुशलता दिखाई गई किंतु ये भूल जाना निरी मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है। कुछ वर्ष पहले अमरनाथ में अचानक  जल सैलाब आया था। केदारनाथ की त्रासदी के घाव तो अब तक  ताजा हैं। दुख इस बात का है कि हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण  सुरक्षा की बातें तो  होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। हम अपने आनंद के लिए  गैर जिम्मेदाराना आचरण से उन्हें दुखी कर आते हैं। इसी कारण उनकी सहनशक्ति जवाब देने लगी है। कभी - कभी तो लगता है कोरोना काल के दौरान देश भर में लगाए गए लॉक डाउन की तरह साल में कुछ समय तक वहां  आवाजाही पर नियंत्रण लगाया जावे। उत्तराखंड में स्थित तीर्थस्थलों के साथ हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के पर्यटन स्थलों में भी  तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या सीमित करना जरूरी  है।  लद्दाख में बीते कुछ दशकों के भीतर जिस तरह से  पर्यटकों की भीड़ उमड़ने लगी है। लेह से आगे नुब्रा घाटी जैसे इलाकों तक सैलानी जाने लगे हैं उसकी वजह से वहां के जिम्मेदार लोग चिंतित हैं। उत्तराखंड की स्थिति तो ये है कि पहाड़ों के बदलते मौसम और बिगड़ते मिजाज  के चलते बड़ी संख्या में गांव खाली होते जा रहे हैं। स्थिति और न बिगड़े इस हेतु गंभीर चिंतन आवश्यक है। बेहतर हो बिना समय गंवाए  पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना भविष्य में होने वाली तबाही की कल्पना ही भयभीत कर देती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 26 August 2025

कांग्रेस की बची - खुची जड़ें खोदने में जुटे दिग्विजय और कमलनाथ


म.प्र में कांग्रेस लंबे समय बाद 2018 में सत्ता में लौटी थी। 2003 में दिग्विजय सिंह के 10 वर्षीय शासन को भाजपा ने उखाड़ फेंका। बिजली, सड़क और पानी जैसे मूलभूत मुद्दों के साथ ही उमाश्री भारती के तेजस्वी व्यक्तित्व को आगे कर भाजपा ने ऐतिहासिक विजय अर्जित की। यद्यपि कानूनी पेच के कारण उमाश्री को जल्द ही गद्दी छोड़नी पड़ी । उनकी जगह आये बाबूलाल गौर भी मुख्यमंत्री  ज्यादा समय नहीं रह सके और  भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान को सरकार की बागडोर सौंप दी। जल्दी - जल्दी मुख्यमंत्री बदलने के कारण  सरकार के स्थायित्व पर भी शंका व्यक्त की जाने लगी किंतु श्री चौहान 2008 और 13 के चुनावों में भाजपा को बहुमत दिलवाने में सफल रहे। 2018 का चुनाव भी उनके नेतृत्व में ही लड़ा गया जिसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गए। कांग्रेस के पास 8 विधायक अधिक होने से  उसे सरकार  बनाने का अवसर मिला। सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों ने अपना समर्थन देकर उसे स्पष्ट बहुमत की देहलीज पार करवा दी। इस चुनाव में  प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कमलनाथ और चुनाव संयोजक की भूमिका में ज्योतिरदित्य सिंधिया ने शिवराज सिंह  को कड़ी चुनौती दी। वहीं दिग्विजय सिंह चुनाव के पहले सपत्नीक पैदल नर्मदा यात्रा कर कांग्रेस के लिए जमीन तैयार कर चुके थे। इन तीनों के बीच सामंजस्य  काम कर गया। वरना दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को एक साथ माना जाता था जो मिलकर श्री सिंधिया को प्रदेश की राजनीति में जमने ही नहीं देते थे। लेकिन राहुल गाँधी  की निकटता के कारण जब उन्हें चुनाव का संयोजक बनाया गया तो ये माना जाने लगा कि उनके स्वर्गीय पिता माधवराव सिंधिया की मुख्यमंत्री बनने की अधूरी रही इच्छा शायद बेटा पूरी कर देगा। लेकिन दिग्विजय और कमलनाथ के चक्रव्यूह ने  घेराबंदी करते हुए उन्हें सत्ता से वंचित कर दिया। इसके बाद ये संभावना थी  कि  ज्योतिरदित्य को  प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संगठन की बागडोर सौंप दी जायेगी किंतु श्री नाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद भी  प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने राजी नहीं हुए। चूंकि कुछ महीनों बाद 2019 का लोकसभा चुनाव होना था इसलिए  पार्टी आलाकमान ने भी यथास्थिति बनाये रखना उचित समझा। लेकिन लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य गुना सीट पर हार गए। कांग्रेस को एकमात्र सीट मिली छिंदवाड़ा की जहाँ कमलनाथ ने अपने पुत्र नकुल नाथ को जितवा लिया। इस हार से श्री सिंधिया को जबरदस्त धक्का लगा। उससे उबरने के लिए वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की कोशिश में जुटे किंतु कमलनाथ ने उनकी राह में बाधा बनते रहे। 2020 में राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव होने वाले थे । उम्मीद थी कि कांग्रेस उन्हें उच्च सदन में भेजकर सांसद बने रहने का मौका देगी किंतु दिग्विजय सिंह  और कमलनाथ की जुगलबंदी से वे आशंकित हो उठे और अपने 22 समर्थक विधायकों  से इस्तीफा दिलवाकर सरकार गिरवा दी। जिससे नाटकीय परिस्थितियों में शिवराज सिंह फिर मुख्यमंत्री बन बैठे। भाजपा ने श्री सिंधिया को न सिर्फ राज्यसभा में भेजा अपितु मोदी सरकार में मंत्री भी बना दिया। उनके समर्थक विधायकों को भी मंत्री बनाकर उपकृत किया गया। कोरोना काल में राजनीति वैसे भी ठंडी रही। लेकिन 2023 के विधानसभा और 24 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। छिंदवाड़ा  में श्री नाथ के बेटे तक हार गए। अंततः कमलनाथ से प्रदेश अध्यक्ष पद छीनकर युवा हाथों में सौंप दिया गया। हाल ही में  नये जिलाध्यक्षों की नियुक्ति भी हो गई। इसी दौरान अचानक कमलनाथ सरकार गिरने को लेकर दिग्विजय सिंह द्वारा की गई टिप्पणी पर कांग्रेस की आंतरिक राजनीति गर्माने लगी। दिग्विजय सिंह ने संकेतों में ये कह दिया कि कमलनाथ द्वारा श्री सिंधिया की उपेक्षा से वे क्षुब्ध होकर पार्टी छोड़ गए । उन्होंने किसी उद्योगपति के यहाँ उन दोनों के बीच सुलह की कोशिश होने का भी खुलासा किया। साथ ही ज्योतिरादित्य  के साथ हुए वायदे से मुकरने की बात भी उजागर कर डाली। इस पर कमलनाथ ने जवाबी तीर छोड़ते हुए कह दिया कि श्री सिंधिया की नाराजगी का कारण वह अवधारणा थी कि सरकार दिग्विजय चला रहे हैं। दो वरिष्ट नेताओं द्वारा दिये विरोधाभासी बयानों से पार्टी की गुटबाजी और अंतर्कलह एक बार फिर सामने आ गई है। दरअसल दिग्विजय और कमलनाथ दोनों की राजनीति अस्ताचल की ओर है किंतु वे अपने बेटे को स्थापित करने के लिए हाथ - पाँव मार रहे हैं । लेकिन ऐसे समय जब प्रदेश में कांग्रेस बेहद बुरे दौर से गुजर रही हो तब दोनों बुजुर्ग नेताओं द्वारा गड़े मुर्दे उखाड़े जाने से पार्टी के युवा तबके में भारी नाराजगी है। बड़ी मुश्किल से तो म.प्र में कांग्रेस को इन दोनों के शिकंजे से मुक्ति मिली किंतु  ये पार्टी की बची - खुची जड़ें खोदने में जुटे हैं। लेकिन उनके झगड़े में जिस उद्योगपति का जिक्र दिग्विजय सिंह ने किया  उसका नाम भी उन्हें सामने लाना चाहिए। वरना ये आशंका और मजबूत होगी कि वह उद्योगपति कहीं उनमें से तो नहीं जिन्हें श्री गाँधी सुबह - शाम गरियाया करते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 August 2025

ट्रम्प जो गड्ढा खोद रहे हैं उसी में उनका गिरना तय


 
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पूरी तरह से भारत विरोधी रुख अख्तियार कर लिया है। जिन सर्जिया गोर को भारत में अपना  राजदूत नियुक्त किया गया वे राजनयिक अनुभव शून्य हैं। भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में राजनयिक अनुभव शून्य राजदूत भेजना  दर्शाता है कि ट्रम्प का व्यवहार बेहद उपेक्षापूर्ण है। भारत  ने भी  जैसे को तैसा की नीति अपना ली है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्रम्प से बात नहीं की। और कैनेडा की यात्रा के बाद उनके आमंत्रण पर वॉशिंगटन जाने में भी असमर्थता व्यक्त कर दी।  ट्रम्प को ये तौहीन बर्दाश्त नहीं हुई और उसके बाद उनका रवैया शत्रुतापूर्ण होने लगा। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध रोक पाने में असफलता हाथ लगने से उनका हौसला पस्त है। रूस और चीन दोनों  जिस तरह खुलकर भारत के पक्ष में खड़े हो गए उससे भी वे भन्नाये हुए हैं। उनको  उम्मीद थी कि  50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की उनकी धमकी के बाद भारत  हाथ जोड़कर गिड़गिड़ायेगा और रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना  बंद कर  देगा। लेकिन मोदी सरकार ने ट्रम्प के दबाव को पूरी तरह नजरंदाज करते हुए रूस से तेल के साथ ही रक्षा सामग्री के नये सौदे कर डाले। अमेरिका का भारत के इस व्यवहार से परेशान होना स्वाभविक था। बीते कुछ दिनों में वैश्विक परिस्थितियाँ जिस तरह बदलीं उनसे ट्रम्प की वजनदारी में गिरावट आई। ये कहना गलत न होगा कि अमेरिका के कमजोर माने गए राष्ट्रपतियों की भी इतनी जगहंसाई नहीं हुई जितनी ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ही करवा ली। इसका सबसे बड़ा कारण उनका भारत जैसे भरोसेमंद देश के साथ किया गया घटिया व्यवहार है। पाकिस्तान सरीखे धोखेबाज को जिसने न्यूयॉर्क में 9/11 की आतँकवादी घटना के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को छिपाकर रखा, गोद में बिठाने की जो हिमाकत ट्रम्प ने की उसके बाद उनके प्रति भारत का कठोर होना स्वाभाविक ही है। प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने परिपक्व कूटनीति का परिचय देते हुए ट्रम्प की बेहूदी टिप्पणियों और धमकियों की उपेक्षा करते हुए ठोस रणनीति बनाते हुए विभिन्न देशों के साथ व्यापार के दरवाजे खोल दिये। सबसे बड़ी बात ये देखने मिली कि रूस और चीन ने भी भारत को अपने बाजार उपलब्ध करवाने की पेशकश कर दी। यही वजह है कि 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने के दो दिन पहले देश में कोई घबराहट नहीं है। इसका  प्रमाण आज सप्ताह के पहले दिन शेयर बाजार के उछाल मारने से मिला। भारत के तमाम उद्योगपतियों ने भी जिस हिम्मत के साथ  अमेरिकी दबाव में नहीं आने की नीति का समर्थन करते हुए निर्यात से होने वाले नुकसान की चिंता को हवा में उड़ा दिया वह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब प्रतिकूल हालातों में मजबूती से खड़े रहने की क्षमता अर्जित कर चुका है। ऐसी स्थितियों में जनता का समर्थन  सरकार के लिए बेहद जरूरी होता है। उस दृष्टि से भारत के आम नागरिक ने भी अपने  बुलंद हौसलों का परिचय देकर पूरी दुनिया को ये संदेश दे दिया कि केवल युद्ध ही नहीं वरन देश की प्रतिष्ठा पर आये किसी भी संकट का सामना करने पूरा देश एकजुट है। 50 फीसदी टैरिफ लागू होने में मात्र दो दिन शेष हैं। लेकिन न सरकार चिंतित है और न ही उद्योग - व्यापार जगत में लेश मात्र भी घबराहट दिख रही है। आपदा में अवसर उत्पन्न करने का जो आह्वान कोविड काल में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने किया वह इस संकट के दौरान भी पूरी तरह फलीभूत होता प्रतीत हो रहा है। ट्रम्प के मूर्खतापूर्ण फैसलों से  दुनिया भर में अस्थिरता फैल गई है।  विश्व व्यापार संगठन के तहत हुए समझौते रद्दी की टोकरी में फेंककर ट्रम्प ने जो दुस्साहस किया वह उन्हीं के गले की फांस बन गया है। यूरोप के बड़े - बड़े देशों को घुटनाटेक करवाने के बाद ट्रम्प का दिमाग सातवें आसमान पर था किंतु भारत ने उनकी ऐंठ की कोई परवाह नहीं की और अमेरिका के साथ रक्षा और उड्डयन के तमाम बड़े सौदे ठंडे बस्ते में डालकर दिखला दिया कि उसका काम अमेरिका के बिना भी चल सकता है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ट्रम्प अपनी हरकतों से बाज आ जाएंगे। सर्वशक्तिमान होने का जो दंभ उनमें भरा है उसके कारण बौखलाहट में वे और भी ऊलजलूल  हरकतें करते रहेंगे। लेकिन भारत ने जिस धैर्य और रणनीतिक चातुर्य का परिचय अब तक दिया वही आगे भी जारी रखना चाहिए क्योंकि ट्रम्प दूसरों के लिए जो गड्ढा खोद रहे हैं उसमें उनका गिरना तय है। अमेरिका में ही उनके विरुद्ध माहौल तैयार होने लगा है। बड़ी बात नहीं वे अपना कार्यकाल भी पूरा न कर पाएं।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 August 2025

भारत, रूस और चीन की मोर्चेबंदी ने ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी

रिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का जोश विगत कुछ दिनों से ठण्डा पड़ता जा रहा है। 15 अगस्त को  बातचीत हेतु  रूसी राष्ट्रपति पुतिन द्वारा अलास्का आने की सहमति प्रदान करने पर ट्रम्प यह मुगालता पाल बैठे कि वे रूस और यूक्रेन के बीचयुद्ध रुकवाकर नोबल शांति पुरस्कार हेतु अपना दावा और पुख्ता कर लेंगे। हालांकि इस युद्ध की शुरुआत तो 2014 में रूस द्वारा यूक्रेन के क्रीमिया बंदरग़ाह पर जबरन कब्जे से हो गई थी किंतु फरवरी 2022 में यूक्रेन के दो प्रमुख प्रांतों पर दावा ठोंकने के बाद रूस ने बड़े पैमाने पर सैन्य कारवाई करते हुए उसके लगभग 20 फीसदी भूभाग पर आधिपत्य कायम कर लिया। ट्रम्प का दावा था वे दोनों देशों को जमीन की अदला - बदली करने के लिए राजी कर युद्ध रोकने के लिए तैयार कर लेंगे। वार्ता के पहले उनके कुछ बयानों से लगा कि वे पुतिन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में कामयाब हो जाएंगे। उन्होंने कूटनीतिक शिष्टाचार की उपेक्षा करते हुए ये धमकी तक दे डाली कि  पुतिन नहीं माने तो वे भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ  के फैसले को लागू कर देंगे। स्मरणीय है ट्रम्प  ये दबाव बनाते आ रहे हैं कि भारत  रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दे । 2022 में रूस ने यूक्रेन पर जब हमला किया तब अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये ताकि उसका निर्यात रुक जाए किंतु पुतिन ने चीन और भारत को सस्ते दाम पर कच्चा तेल बेचना शुरू कर दिया। ट्रम्प का कहना है इससे मिलने वाले धन से ही रूस को  युद्ध लम्बा खींचने में मदद मिली। चीन पर तो अमेरिका का बस चलता नहीं इसलिये उसने भारत को कमजोर समझकर दबाने का प्रयास किया। अलास्का वार्ता के पूर्व आया उनका ये बयान काफी  चर्चित हुआ कि भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी के कारण ही पुतिन बातचीत के लिए राजी हुए। इन सब बातों से ऐसा लगने लगा कि पुतिन वाकई अमेरिका के दबाव में आकर युद्ध रोकने तैयार हो जाएंगे। लेकिन अलास्का  वार्ता के पहले  ही यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ये कहकर ट्रम्प को झटका दिया कि उनकी अनुपस्थिति में किया कोई फैसला उन्हें मंजूर नहीं। रूस के साथ जमीन की अदला - बदली के सुझाव को भी उन्होंने पूरे तौर पर खारिज कर दिया। लेकिन उनकी सबसे ज्यादा किरकिरी भारत ने कर दी। ट्रम्प ने अपने मन से ही ये कहना शुरू कर दिया कि अमेरिका के दबाव में भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया । लेकिन भारत ने  खरीदी और बढ़ाने के साथ ही खुलकर कह दिया कि उसे जहाँ से सस्ता तेल मिलेगा वह खरीदना जारी रखेगा। ट्रम्प को और बड़ा झटका तब लगा जब रूस और चीन ने  भारत के साथ व्यापार बढ़ाने के साथ ही अमेरिकी टैरिफ की आलोचना कर डाली। अलास्का वार्ता के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमले और तेज कर दिए । कुल मिलाकर इस युद्ध को रुकवाने का श्रेय लूटने के फेर में ट्रम्प अपनी भद्द पिटवा बैठे। न तो वे पुतिन को युद्ध रोकने मना सके और न ही जेलेंस्की पर ही उनका दबाव कारगर होता दिख रहा है।  टैरिफ रूपी दाँव भी बेअसर हो चुका है। चीन के मामले में तो अमेरिका पहले ही ठंडा पड़ने लगा था किंतु भारत  जिस दबंगी से  टैरिफ वृद्धि  के सामने अविचलित खड़ा रहा उसकी वजह से ट्रम्प की हेकड़ी निकल गई। रूस और चीन के अलावा दुनिया के अनेक देश भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते जोड़ने प्रयासरत हैं। चीन और रूस ने तो अपने बाजार भारतीय चीजों के लिए खोल दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  आगामी सप्ताह चीन यात्रा पर जा रहे हैं वहीं दिसंबर में पुतिन ने भारत आने की पुष्टि कर दी है। रक्षा उत्पादन का निर्यात तेजी से बढ़ने के साथ ही फ्रांस और रूस अपने सैन्य सामग्री के उत्पादन हेतु भारत में अपनी इकाइयाँ स्थापित करने तैयार हैं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि ट्रम्प के देश में ही अनेक आर्थिक विशेषज्ञ भारत पर लगाए जा रहे टैरिफ को अमेरिका के लिए आत्मघाती बता रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी पार्टी के कुछ नेता तक भारत के पक्ष में खड़े हो गए। शायद यही वजह है कि न तो आजकल ट्रम्प रूस - यूक्रेन युद्ध रुकवाने की डींग हाँक रहे हैं और न ही भारत को धमकाने की हिम्मत उनकी पड़ रही है। उल्टे उनकी बेवकूफियों के कारण  भारत, रूस और चीन ने एकजुट होकर अमेरिका के विरुद्ध तगड़ी मोर्चेबंदी खड़ी कर दी। बीते कई  दशकों बाद अमेरिका इस तरह अलग - थलग पड़ गया है। आर्थिक और सामरिक महाशक्ति होने का उसका घमंड इस बुरी तरह टूटेगा ये कोई सोच भी नहीं सकता था। ट्रम्प के दबाव का श्री मोदी ने जिस आत्मविश्वास के साथ प्रतिकार किया उससे चीन जैसा देश तक भारत के महत्व को स्वीकार करने बाध्य हो गया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 August 2025

ऑन लाइन गेमिंग पर रोक : देर से उठाया गया सही कदम


लाखों लोगों को कंगाल करने, सैकड़ों की जान लेने और अनगिनत परिवारों की शान्ति छीन लेने वाली ऑन लाइन गेमिंग पर रोक लगाने वाले विधेयक का संसद में पारित होना स्वागतयोग्य है। इसके  बाद पैसे से जुड़ी सभी ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लग जाएगा। जिससे गूगल प्ले स्टोर पर ऑनलाइन गेमिंग एप  डाउनलोड नहीं हो सकेगा। मोटे अनुमान के अनुसार  ऑनलाइन गेमिंग के चक्कर में पड़े  45 करोड़ लोग सालाना 20 हजार करोड़ का नुकसान उठाते हैं, जिस वजह से उनका घर तबाह हो गया। बड़ी संख्या में लोगों ने आत्महत्या की क्योंकि उनका बैंक खाता खाली हो गया। हालांकि बिना पैसे के खेले जाने वाले ई-स्पो‌र्ट्स और सोशल गेमिंग को सरकार प्रोत्साहित करेगी। डिजिटल क्रांति के बाद से इस तरह के काम - धंधे बढ़ते जा रहे हैं। इसमें दो मत नहीं कि संचार क्रांति के बेशुमार फायदे हैं । सूचना, शिक्षा, संपर्क, व्यापार, शोध और मनोरंजन के क्षेत्र में इसके  योगदान को स्वीकार करना ही होगा। लेकिन इसी के साथ  अनेक विकृतियाँ भी आईं। अश्लीलता और अपसंस्कृति को बढ़ावा देते हुए मनोरंजन की आड़ में भारतीय सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को कमजोर करने का सुनियोजित षडयंत्र रचा गया। जाहिर है इसके लिए वे विदेशी एजेंसियां सक्रिय हैं जिनका काम ही किसी भी देश में सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाकर वहाँ स्थापित मान्यताओं और परंपराओं से लोगों को दूर करना है। अनेक देशों में इस तरीके से सामाजिक उथलपुथल उत्पन्न कर अराजकता का माहौल बनाया गया जिसकी परिणिति सत्ता परिवर्तन के तौर पर भी देखने मिली। भारत के विशाल मध्यम वर्ग की बचत संस्कृति को उपभोक्तावाद के जरिये नष्ट करने के अलावा अनेक ऐसे दिखावटी आकर्षण पैदा किये गए जिनकी चमक - दमक में लोग अपनी मेहनत की कमाई से हाथ धो बैठे। ऑन लाइन गेमिंग भी उसी षडयंत्र का हिस्सा है। विकसित देशों में भी इसका चलन है किंतु भारत की आम जनता का इसके मोहपाश में फंसना बड़ी समस्या बन गई। करोड़ों लोगों का ऑन लाइन गेमिंग में लिप्त होना उनके परिवार के लिए आर्थिक बदहाली लेकर आया। आये दिन नौजवानों की आत्महत्या की खबरें विचलित करने लगीं। कुछ लोगों ने तो परिवार सहित मौत को गले लगा लिया। संचित धन खत्म होने के बाद कर्ज लेकर इस मकड़जाल में उलझने वालों की संख्या भी अनुमान से अधिक ही होगी क्योंकि बदनामी और शर्मिंदगी से बचने के लिए बहुत से लोग अपने नुकसान की बात छिपा गए होंगे। देर से ही सही केन्द्र सरकार ने इस लूटमार को रोकने के लिए कानून बनाकर अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन किया। हालांकि ऐसा करने में  विलंब क्यों हुआ ये भी बड़ा सवाल है। इस विधेयक के पारित होने के बाद ये मुद्दा भी उठ रहा है कि जिन सुप्रसिद्ध हस्तियों ने  ऑन लाइन गेमिंग का प्रचार कर लोगों को अपना पैसा फंसाने के लिए प्रोत्साहित किया उनके विरुद्ध भी कुछ न कुछ कारवाई होनी चाहिए। अपने देश में आई. पी. एल नामक क्रिकेट प्रातियोगिता के बारे में  तो आम अवधारणा है कि यह सट्टेबाजी के लिए ही होती है। देश भर में ऑन लाइन क्रिकेट सट्टा संगठित अपराध बन चुका है। जब भी मैच होते हैं सटोरियों के यहाँ छापे पड़ने की खबरें आती हैं। हालांकि इस कारोबार में पुलिस की संगामित्ति भी बताई जाती है।  ऑन लाइन गेमिंग में खेलों के आभासी स्वरूप के अलावा तीन पत्ती और लूडो जैसे खेल भी हैं जिनके प्रति आम लोग आसानी से आकर्षित हो जाते हैं। डिजिटल प्लेटफ़ार्म पर गेमिंग की आड़ में जुआ और सट्टा समाज के बहुत बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। चिंता की बात ये है कि इसके चक्रव्यूह में फंसकर  युवा और किशोर बड़ी संख्या में  मोटी  रकम गँवा चुके हैं। इसी वर्ग में आत्महत्या जैसी  घटनाएं हुईं। मध्यमवर्गीय घरेलू महिलाओं को भी इसका चस्का लगने की जानकारी आई है। जैसे ही संसद ने उक्त विधेयक पारित किया ऑन लाइन गेमिंग का कारोबार करने वाली बड़ी कंपनियां बोरिया - बिस्तर समेटने में लग गईं। जो जानकारियां मिल रही हैं उनके मुताबिक इन कंपनियों में अनेक अभिनेताओं और खिलाड़ियों ने भी अपना धन लगाया था। शायद इसीलिए वे बतौर ब्रांड एम्बेसेडर उनके विज्ञापनों में नजर आते रहे। नये कानून के अस्तित्व में आते ही ऑन लाइन गेमिंग का  व्यवसाय गैर कानूनी हो  गया, लेकिन जिन लोगों ने इसमें पैसा और परिवार गंवाया उनके पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 21 August 2025

संसद का न चलना जनता का अपमान



संसद के मानसून सत्र का आज अंतिम दिन है। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने भोजनावकाश के पूर्व ही सत्रावसान की घोषणा कर दी। राज्यसभा की कारवाई भी विपक्ष द्वारा हंगामे के बाद दोपहर तक स्थगित कर दी गई । जैसा सदन का माहौल है उसे देखते हुए उसका पूरे दिन चलना मुश्किल है। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र समाप्ति की घोषणा करने से पहले बताया कि एक माह चले इस सत्र में महज 37 घंटे सदन का कामकाज हुआ जबकि अधिकांश समय  होहल्ले में बर्बाद हो गया। हालांकि इस दौरान सरकार ने कई विधेयक पारित करवा लिए। वहीं कुछ संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिये जिसकी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र में आने के बाद आगे की कार्रवाई होगी।  इस सत्र के  प्रारंभ में ही  जगदीप धनखड़  द्वारा उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दिये जाने से  राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण हो गया। साथ ही  दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग  से शुरु विवाद चुनाव आय़ोग के विरुद्ध विपक्ष के अभियान पर केंद्रित हो गया । गत दिवस गृह मंत्री अमित शाह द्वारा प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की गिरफ्तारी के एक माह बाद उन्हें पद से हटाये जाने संबंधी विधेयक पेश किये जाते समय भी अप्रिय स्थिति बनी। कुल मिलाकर इस सत्र में भी जनता के धन की बर्बादी उसी के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों  द्वारा बेरहमी से की गई। विपक्ष इसके लिए सरकार को दोषी बताएगा वहीं सत्ता पक्ष पूरा ठीकरा विपक्ष पर फोड़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन जनता के पास ऐसी कोई ताकत नहीं है जिसके जरिये वह सदन को बाधित करने वाले अपने सांसद को दंडित और प्रताड़ित कर सके। यही कारण है कि मुफ्त के टिकिट  पर हवाई और रेल यात्रा करते हुए दिल्ली जाकर संसद की बैठक में हंगामा करने वाले सांसद सीना तान कर घूमते हैं। वैसे भी यदि कोई सांसद एक मिनिट के लिए भी सदन में प्रवेश करता है तो उसको पूरे दिन का बैठक भत्ता मिल जाता है। यही कारण है कि सदन में सामान्य तौर पर बहुत कम उपस्थिति रहती है। कुछ विशेष अवसरों को छोड़ दें तो ऐसा लगता है कि सांसद गण सदन में चेहरा दिखाने आते हैं। इस सत्र में विपक्ष ने ज्यादातर मुद्दे ऐसे उठाये जिनके बारे में उसे एहसास था कि उन पर चर्चा होना संभव ही नहीं है। जब  मंजूरी नहीं मिली तब होहल्ला कर सदन को चलने से रोका जाता रहा। ऐसा करने से उसे कोई लाभ होता हो ऐसा भी नहीं है। विपक्ष को ये समझना चाहिए कि सरकार के पास तो अपनी बात रखने के अनेक साधन हैं । कुछ बड़े नेताओं को भी समाचार माध्यमों में महत्व मिल जाता है लेकिन साधारण सदस्य के लिए संसद ही वह मंच है जिससे वह अपनी बात पूरे देश के सामने रख सकता है। उस दृष्टि से विपक्ष के जिन नेताओं ने  हंगामा करते हुए सदन को चलने से रोकने की रणनीति बनाई उन्होंने अपने ही दल के अन्य सांसदों के बोलने के हक पर डाका डालने का कार्य किया। विपक्ष के इसी आचरण के कारण सत्ता पक्ष की रुचि भी सदन चलाने में कम होती जा रही है। सदन मेें यदि बहस हो तो विपक्ष को सरकार की घेराबंदी करने के अनेक मौके मिलते हैं। इसका एक लाभ ये भी है कि वह जनता के बीच अपनी जागरूकता और सक्रियता प्रमाणित करने में सफल हो जाता है। आजकल टीवी पर कारवाई का सीधा प्रसारण होने से देश ही नहीं दुनिया भर में बैठे लोग संसद की कारवाई देखते हैं। जो सांसद सदन में होने वाली चर्चा में प्रभावशाली ढंग से  अपनी  बात प्रस्तुत करते हैं उनकी प्रसिद्धि उनके निर्वाचन क्षेत्र से बाहर सब दूर फैलती है। ये देखते हुए विपक्ष को चाहिए था वह सदन को ज्यादा से ज्यादा चलाने में सहायक बनता किंतु उसने गलतियों से सीखने के बजाय  दोहराए जाने की नासमझी दिखाई। जहाँ तक सवाल सत्ता पक्ष का है तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बहस में उसे भी खास रुचि नहीं है। प्रतिपक्ष के तीखे आरोपों का और भी तीखे अंदाज में उत्तर देकर वह सदन के वातावरण में और उत्तेजना भर देता है। होना यह चाहिये कि दोनों पक्षों के वरिष्ट सांसद आपस में बैठकर सदन चलाने का रास्ता निकालें। वरना संसद की उपयोगिता को लेकर भी सवाल खड़े होने लगेंगे। बेहतर तो यही होगा कि हंगामा करने विशेष रूप से गर्भ गृह में घुसने वाले सांसदों को बतौर दंड पूरे माह के वेतन से वंचित किया जाए। जब तक इस तरह के प्रावधान नहीं होंगे सदन के सुचारु रूप से चलने की उम्मीद करना बेकार है। सांसद अपने सम्मान के प्रति बेहद सतर्क रहते हैं किंतु सदन को बाधित कर जनता का अपमान करने में उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 August 2025

विवादास्पद फैसलों से जुड़े रहे विपक्ष के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार

श में आज जो माहौल है उसमें उपराष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध होने की उम्मीद करना अर्थहीन था। इसलिये भाजपा द्वारा महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. पी . राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर विपक्ष से उनका समर्थन करने का अनुरोध महज रस्म अदायगी ही थी। जगदीप धनखड़ और सत्यपाल मलिक से मिले कड़वे अनुभव के बाद भाजपा ने बाहर से आये नेताओं को जरूरत से ज्यादा महत्व न दिये जाने की नीति बनाई । इसीलिए  श्री राधाकृष्णन के परिचय में रास्वसंघ से उनके जुड़ाव को प्रचारित किया गया। उसके बाद तो विपक्ष से समर्थन मिलने की गुंजाइश ही नहीं थी। लेकिन तमिलनाडु में जहाँ भाजपा अभी तक अपने पाँव जमाने में लगी है वहाँ का प्रत्याशी उतारने को आगामी वर्ष  होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा गया। ऐसे में दक्षिण भारत के ही किसी चेहरे को सामने लाना  विपक्ष की मजबूरी थी । इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को श्री राधाकृष्णन के मुकाबले उतारा गया जो मूलतः तेलंगाना के हैं।  हालांकि उनका नाम सामने आने के बाद ये अटकलें भी लगने लगीं कि चंद्राबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी तेलुगु भाषी होने के नाते उनका समर्थन करने बाध्य होंगे। लेकिन वे दोनों पहले ही श्री राधाकृष्णन के समर्थन का ऐलान कर चुके थे। ऐसे में विपक्ष द्वारा भाजपा के दक्षिण कार्ड को बेअसर करने का दाँव चल तो दिया गया किंतु उसी के साथ उठ खड़े हुए विवादों से श्री रेड्डी सहित इंडिया गठबंधन भी कठघरे में खड़ा हो गया। सबसे पहले तो न्यायपालिका से जुड़ी हस्तियों के सेवा निवृत्ति के बाद भाजपा से जुड़ने पर विपक्ष हमेशा से हल्ला मचाता रहा है। हालाँकि श्री रेड्डी  2011 में सर्वोच्च न्यायालय से सेवा निवृत्ति के बाद किसी राजनीतिक दल में नहीं आए किंतु तेलंगाना की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने उन्हें जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले पैनल का अध्यक्ष बनाकर उनसे अपनी निकटता उजागर कर दी।  वैसे भी लोकतंत्र में चुनाव लड़ने वाले किसी भी व्यक्ति की कर्मपत्री खुलना अत्यन्त ही स्वाभाविक होता है। और इसीलिये श्री रेड्डी द्वारा  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में दिये गए कुछ विवादास्पद  फैसले सुर्खियों में आ गए। इनमें सबसे प्रमुख सलवा जुडूम को  असंवैधानिक घोषित करना था जो छत्तीसगढ़ सरकार  द्वारा माओवादी विद्रोहियों से लड़ने के लिए आदिवासी युवाओं को हथियारबंद करने की नीति थी। इसी तरह भोपाल गैस त्रासदी के मामले में दिये उनके फैसले पर आरोप लगे कि उससे मुख्य अभियुक्त वॉरेन एंडरसन को बचने में मदद मिली। इसके अलावा इजरायल को भारतीय हथियारों के निर्यात के खिलाफ दायर याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले 25 नागरिकों में  भी वे शामिल थे। इन सबसे इतना तो स्पष्ट है ही कि वे  वामपंथी रुझान वाले हैं , वरना सलवा जुडूम जैसी पहल को रद्द करने का और कोई कारण नहीं था। यूनियन कार्बाइड वाले मामले को दोबारा खोलने से इंकार करने वाला उनका निर्णय भी विवादग्रस्त हुआ। इजरायल को हथियार देने का विरोध करने वाले किस मानसिकता के होंगे ये बताने की जरूरत नहीं है। हालाँकि श्री रेड्डी के चुने जाने की  उम्मीद तो खुद उन्हें ही नहीं होगी किंतु बतौर न्यायाधीश  दिये गये उनके उक्त फैसलों से इतना तो स्पष्ट है कि वे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी हैं वरना माओवादियों से लड़ने के लिए छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को शस्त्रों से लैस करने की नीति को असंवैधानिक न बताते। इसी तरह भारत के भरोसेमंद मित्र  इजरायल को हथियार देने का विरोध करने वाले समूह में शामिल होकर श्री रेड्डी  ये जता चुके हैं कि वे तुष्टीकरण वाली मंडली से जुड़े हुए हैं। ऐसा लगता है विपक्ष के पास कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं था उपराष्ट्रपति पद हेतु लड़ाने के लिए । इसीलिये श्री रेड्डी को बलि का बकरा बनाया गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 19 August 2025

रूस, चीन और भारत की एकजुटता से ट्रम्प की नींद गायब


कुछ महीनों पहले जिस जेलेंस्की को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस से निकल जाने कहकर अपमानित किया था उसे ही वे ससम्मान बगल में बिठाने मजबूर हो गए। यूरोपीय यूनियन के तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की बैठक में रूस - यूक्रेन युद्ध रुकवाने की जो कवायद ट्रम्प ने की उसका तात्कालिक परिणाम  जैसा वे दावा कर रहे हैं रूस के राष्ट्रपति पुतिन का जेलेंस्की के साथ बातचीत के लिए तैयार होने के तौर पर निकला है। साथ ही यूक्रेन को नाटो  सदस्य न बनाने की रूसी ज़िद को अमेरिका ने मान लिया किंतु यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी भी दे दी जिसके बदले उसे 90 अरब डॉलर ( 8 लाख करोड़ रु.) के अमेरिकी हथियार खरीदने होंगे।  विगत 15 अगस्त को अलास्का में ट्रम्प और पुतिन की मुलाकात में युद्ध युद्धविराम का फैसला नहीं हो सका था। प्राप्त जानकारी  के अनुसार पुतिन ही ट्रम्प पर हावी रहे। यूक्रेन की जो भी शर्तें ट्रम्प ने उन्हें बताईं उन्हें रूसी राष्ट्रपति ने नामंजूर कर दिया। वहीं रूस द्वारा कब्जा किये गए इलाके खाली किये बिना युद्धविराम के लिए जेलेंस्की तैयार नहीं हुए। मार्च में भी जब ट्रम्प ने उन पर युद्धविराम का दबाव बनाया तब भी इसी बात पर दोनों के बीच गरमागरम बहस हो गई थी। उस बैठक में भी जेलेंस्की ने अपने देश की सुरक्षा की गारंटी मांगी जिस ट्रम्प ने उन्हें कमरे से बाहर जाने कहकर बेइज्जत किया। जेलेंस्की और यूरोपीय यूनियन के नेताओं के साथ  ताजा बातचीत का भी उद्देश्य भी  केवल ये है कि ट्रम्प अपनी उस फजीहत से उबरना चाह रहे हैं जो अलास्का में हुई। वैसे भी युद्धविराम की कोई भी पहल पुतिन द्वारा नहीं की गई। वरना वे भारत जैसे किसी देश को मध्यस्थ बनाकर यूक्रेन के साथ शांति वार्ता करने बैठ सकते थे। गौरतलब है पुतिन और जेलेंस्की दोनों ही समय - समय पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात करते रहते हैं जो भारत के कूटनीतिक महत्व का परिचायक है। दरअसल इस विवाद में भारत के संतुलित रवैये से रूस और यूक्रेन दोनों संतुष्ट हैं। भारत ने रूस द्वारा यूक्रेन पर  हमले का न तो समर्थन किया और न ही  रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का। इसीलिए ट्रम्प, भारत से खुन्नस खाए हुए हैं और अनाप - शनाप टैरिफ लगाकर रूस से व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ने का दबाव बना रहे हैं। लेकिन न रूस धौंस में आया और न ही भारत। चीन से तो वैसे भी वे टकराने से कतराते हैं। जब उनको लगा कि टैरिफ नामक हथियार बेअसर साबित होने लगा तब उन्होंने पुतिन की मिजाजपुर्सी शुरू कर दी। सही बात तो ये है कि ट्रम्प को खुद ही नहीं समझ आ रहा कि क्या करें ? यूक्रेन को रूस जैसी महाशक्ति से टकराने के लिए निश्चित रूप से पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उकसाया किंतु ट्रम्प की  दोगली नीतियों से भी अमेरिका की विश्वसनीयता मिट्टी में मिल गई।  पहले तो उन्होंने यूक्रेन को अधर में छोड़ने जैसी हरकत की और अब पुतिन से मिलकर लड़ाई रोकने की कोशिश के साथ ही यूक्रेन पर रक्षा गारंटी के बदले अरबों डॉलर के हथियार खरीदने का दबाव बना रहे हैं। जबरन अकड़ दिखाने के फेर में वे पूरी दुनिया से दुश्मनी लेकर बैठ गए लेकिन जब घर में ही छीछालेदर होने लगी तब  मजबूरी में शांतिदूत बनने का स्वांग रच रहे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए भी उनकी नीयत साफ नहीं है। इसीलिए एक तरफ वे युद्ध रुकवाने के लिए हाथ- पाँव मार रहे हैं वहीं दूसरी तरफ यूक्रेन को हथियार बेचने की फिराक में हैं। सर्वविदित है कि यूक्रेन आर्थिक दृष्टि से तबाह हो चुका है।  ऐसे में वह अरबों डॉलर के हथियार कहाँ से खरीदेगा ये बड़ा प्रश्न है। पुतिन को खलनायक साबित करने के साथ ही वे भारत पर ये आरोप लगाते रहे कि वह रूस से तेल खरीदकर उसे ताकत दे रहा है किन्तु अब उन्हीं पुतिन  के स्वागत में लाल कालीन बिछाने में लगे हुए हैं। लेकिन उनकी कोशिशों में न तो गंभीरता है और न ही दूरदर्शिता। सच तो ये है  कि रूस , चीन और भारत के एकजुट होने से ट्रम्प की नींद गायब है। टैरिफ का डर दिखाकर सभी देशों को अमेरिका का वर्चस्व स्वीकार करने की उनकी महत्वाकांक्षा उन्हीं के गले का फंदा चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 August 2025

जीएसटी कम होने से अर्थव्यवस्था की गति और तेज होगी



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से अपने उद्बोधन में वैसे तो बहुत सी घोषणाएं कीं किंतु आम जनता को जिसने सबसे ज्यादा खुश किया वह थी जीएसटी की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करते हुए आम उपभोक्ताओं पर सीधे असर डालने वाली चीजों पर जीएसटी कम करना। जो संकेत मिले हैं उनके अनुसार 12 और 28 प्रतिशत की दो दरें समाप्त कर दी जाएंगी। हानिकारक और रईसों के उपयोग में आने वाली महंगी कारों जैसी चीजों को 40 फीसदी की नई दर के दायरे में लाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने इसे जीएसटी सुधार का नाम दिया है। जैसी कि जानकारी है उसके अनुसार सितंबर के प्रारंभ में ही जीएसटी काउंसिल की बैठक में इन सुधारों को लागू करने पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री ने जीएसटी सुधारों के जरिये  देश की जनता को दीपावली पर उपहार देने कहा है। चूंकि दीपावली इस वर्ष अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में पड़ रही है इसलिये ये माना जा सकता है कि जीएसटी काउंसिल की बैठक के तत्काल बाद परिवर्तित दरें लागू हो जाएंगी जिससे उपभोक्ता बाजार में चीजों के दाम काफी घटेंगे और महंगाई भी कम हो जाएगी। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार 12 फीसदी जीएसटी वाली 99 प्रतिशत चीजें 5 फीसदी में शामिल हो जाएंगी जिससे आम उपभोक्ता को जबरदस्त लाभ होगा। 18 प्रतिशत वाली कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर भी जीएसटी घटाने की खबर है। जीवन और स्वास्थ्य बीमा को या तो जीएसटी से मुक्त कर दिया जाएगा अथवा 5 फीसदी की सूची में शामिल कर बीमा करवाने वालों को राहत दी जाएगी। वर्तमान में इन पर 18 फीसदी जीएसटी लगने का भारी विरोध होता रहा है। गत वर्ष केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने भी वित्त मंत्री  निर्मला सीतारमण को स्वास्थ्य बीमा को जीएसटी से मुक्त रखने हेतु पत्र भी लिखा था। दोपहिया और सस्ती कारों पर जीएसटी घटने के साथ ही घरेलू उपकरणों और रोजमर्रे की चीजों पर 5 फीसदी जीएसटी लगने से इनकी मांग बढ़ेगी जिससे उनका उत्पादन करने वाली इकाइयों का व्यवसाय भी बढ़ेगा। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद आज शेयर बाजार खुलने पर सूचकांक ने जबरदस्त उछाल मारकर जीएसटी सुधारों के फैसले का स्वागत कर ये संकेत दे दिया कि इनके लागू होते ही अर्थव्यवस्था और तेज  रफ्तार से दौड़ेगी। सरकारी सूत्रों के अनुसार बीते दो साल से इस दिशा में विमर्श जारी था। रही बात जीएसटी की  एक ही दर की तो उसके लिए अभी लंबा इंतजार करना होगा। जीएसटी से होने वाली कमाई जिस तेजी से साल दर साल बढ़ती गई उसके बाद इस तरह का फैसला पूरी तरह अपेक्षित था। हालांकि इसे राजनीतिक दाँव कहना गलत नहीं होगा। हमेशा चुनाव की तैयारी करते रहने वाले श्री मोदी के निर्णयों का समय काबिले गौर होता है। स्मरणीय है दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले केन्द्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख कर दी गई वहीं 70 साल के सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख रुपये की मुफ्त स्वास्थ्य बीमा योजना में शामिल करने का ऐलान भी किया गया। इनका असर राष्ट्रीय राजधानी के मतदाताओं पर किस हद तक पड़ा ये चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया। कहा जा रहा है विपक्ष चुनाव आयोग के विरुद्ध  आंदोलन में उलझा हुआ है और इधर प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव के महीनों पहले जीएसटी सुधार के रूप में सीधे आम उपभोक्ता को खुश करने का काम कर डाला। ये ऐसा निर्णय है जिसका विरोध विपक्ष नहीं कर सकता क्योंकि वैसा करना अपने पैरों में कुल्हाड़ी  मारने जैसा होगा। लेकिन राजनीति से परे हटकर देखें तो  यह भले ही देर से लिया गया निर्णय है किंतु प्रधानमंत्री द्वारा स्वाधीनता दिवस पर जीएसटी संबंधित जो घोषणा की गई वह हर दृष्टि से जनहितैषी होने से स्वागतयोग्य है। जीएसटी को लेकर राहुल गाँधी अक्सर आलोचनात्मक टिप्पणी किया करते हैं। लेकिन प्रारंभिक अनिश्चितताओं के बाद अब ये कहा जा सकता है कि इस प्रणाली से कर व्यवस्था में अकल्पनीय सुधार हुआ जिसका प्रमाण उसकी वसूली में लगातार वृद्धि होते रहने से मिला। दरें कम होने से राजस्व की हानि की आशंका भी निराधार है क्योंकि बाजार में मांग बढ़ने से उत्पादन और खपत दोनों उसी अनुपात में बढ़ेंगे जिससे जीएसटी से आय की वर्तमान स्थिति में और सुधार ही होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Saturday, 16 August 2025

आज की राजनीति में अटल जी की कमी बहुत खलती है



    आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की  पुण्य तिथि है | स्वाधीन भारत में एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र  थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल हुई |  नेहरू जी और इंदिरा जी तो सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनका सम्मान प्रधानमन्त्री से कम नहीं था | 

     इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीति थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें  पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही सादगी से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | 

     विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि दी वह आज भी उद्धृत की जाती  है | नेहरू जी ने उनकी तेजस्विता को भांपते हुए ही भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | 

     हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी  वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

     बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान अर्जित करने का उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

     मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि  व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | 

      सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह लिया करती थीं  |

     आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - 
बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने , 
तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - 
कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  
खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें ,
कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | 

     और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चुका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

     भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को     उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

     विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

     जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए थे। लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | 

     अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

      उन्हें गये 7 वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |

- आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी

रूस कब्जा छोड़ने वाला नहीं




सही बात ये है कि यूक्रेन का जो हिस्सा रूस ने कब्जा लिया उसे तो वह लौटाने वाला नहीं क्योंकि उसको यूरोप के साथ व्यापार करने के लिए जो समुद्री मार्ग चाहिए उस तक पहुँच यूक्रेन से ही संभव है। इसलिये चाहे ट्रम्प जोर लगा लें या जिनपिंग, रूस जहाँ तक बढ़ चुका उससे पीछे हटने वाला नहीं है। पुतिन समझ चुके हैं कि अमेरिका इस लड़ाई से पीछा छुड़ाने के लिए बेचैन है क्योंकि इजरायल और हमास के बीच की लड़ाई ही उसके लिए बोझ बनने लगी है। वहीं यूरोप में इतनी दम नहीं कि वह लंबे समय तक जेलेंस्की की अंतहीन जरूरतें पूरी कर सके। ट्रम्प की मुश्किल ये है कि टैरिफ के नाम पर वे जो रायता फैला चुके हैं वही उनसे समेटते नहीं बन रहा। 
विश्व राजनीति में आने वाले महीने काफी उथलपुथल भरे होंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 August 2025

घर के भीतर बैठे शत्रुओं को बेनकाब करना जरूरी


आजादी का पर्व प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है , चाहे वह देश में रहता हो या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में। इसलिये इसकी रक्षा करना भी हम सभी का परम कर्तव्य है। स्वाधीनता अर्जित किये लगभग आठ दशक होने जा  रहे हैं। इस दौरान अनगिनत कठिनाइयों से गुजरकर भारत ने विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया तो उसके पीछे प्रत्येक देशवासी का योगदान है फिर चाहे वह किसान , श्रमिक, उद्योगपति - व्यवसायी, स्वरोजगार से जुड़ा छोटा उद्यमी ही क्यों न हो। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों ने भी देश की विकास यात्रा को गतिशील बनाने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्म सम्मान का प्रतीक है। वो दिन इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं जब हमें लोगों का पेट भरने के लिए खाद्यान्न आयातित करना पड़ता था। अपनी सुरक्षा के लिए भी हम बड़ी शक्तियों पर आश्रित थे। शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक जैसे क्षेत्रों में भारत ने सफलता के नये आकाश छूने का करतब कर दिखाया है। धरती से अंतरिक्ष तक हमारी उपस्थिति से पूरा विश्व प्रभावित है। निश्चित रूप से ये उपलब्धियाँ संतोष का विषय हैं। हमारी अर्थव्यवस्था ने दुनिया में पांचवा स्थान अर्जित कर लिया है और तीसरे स्थान की तरफ तेजी से अग्रसर है। वैश्विक समुदाय के रूप में  भारतवंशी दुनिया के हर हिस्से में  स्थापित हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा और परिश्रम से  अपार सफलता अर्जित कर देश का सम्मान बढ़ाया है। हाल ही में हमें एक बड़े संघर्ष से गुजरना पड़ा। पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में  किये गए ऑपरेशन सिंदूर में हमारी सामरिक क्षमता के प्रदर्शन से पूरा विश्व चमत्कृत रह गया। आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान को भारतीय सेनाओं ने जो सबक सिखाया उससे पूरा देश गौरवान्वित हुआ। ये तभी संभव हो सका जब हम आर्थिक और  सैन्य दृष्टि से मजबूत थे। लेकिन इन सुखद स्थितियों के बावजूद देश में एक वर्ग विशेष अपनी नकारात्मक सोच के साथ निराशा फैलाने में जुटा है। किसी भी उपलब्धि पर संदेह व्यक्त करना इनकी कार्यशैली है । यहाँ तक कि सेना के पराक्रम को भी झुठलाने में इन्हें लज्जा नहीं आती। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का जश्न मनाने और पाकिस्तान को हुए जबरदस्त नुकसान पर  सेना का अभिननंदन करने के बजाय  युद्ध में हुई क्षति का ब्यौरा मांगकर जवानों का मनोबल तोड़ने का प्रयास किया गया। सारी दुनिया जब भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती का गुणगान कर रही है तब व्यक्तिगत खुन्नस और घमण्ड में डूबे अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा उसे मृत बताये जाने का समर्थन करने वाले कुछ लोग देश की प्रतिष्ठा को धूमिल कर अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। जनता द्वारा लगातार ठुकराए जाने के बाद हताशा में डूबा ये वर्ग देश को भीतर से कमजोर कर राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का षडयंत्र रच रहा है। जाहिर है भारत के उत्थान से परेशान विदेशी ताकतें इन कोशिशों को हवा दे रही हैं। चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और संसद जैसे संवैधानिक संस्थानों के प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न कर अराजकता में देश को धकेलने के इस सुनियोजित प्रयास के प्रति प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को सतर्क होकर उसे विफल करने आगे आना चाहिए। सीमा के पार बैठे शत्रु की पहिचान करना कठिन नहीं है किंतु घर के भीतर के दुश्मनों के चेहरों को अनावृत करना आज के दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। भारत की बढ़ती शक्ति से बेचैन वैश्विक शक्तियाँ आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाकर हमें दबाना चाहती हैं। उनके आगे न झुकने का जो साहस देश  ने दिखाया वह हमारे आत्मविश्वास का प्रतीक है। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए सब एक आवाज में बोलें ये जरूरी है। राजनीतिक मतभिन्नता अपनी जगह है किंतु जहाँ बात देश के सम्मान और हितों की हो तब सारे मतभेद भुलाना ही राष्ट्रभक्ति है।   ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक ओर जहाँ भारत के सामर्थ्य की सराहना दुनिया भर में हुई वहीं कुछ बड़े देश ईर्ष्या से भर उठे और अनुचित दबाव डालकर हमारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें अपने देश के ही कुछ तत्व प्रोत्साहित कर रहे हैं जिन्हें सिवाय अपने स्वार्थ के और कुछ नहीं दिखता। आज स्वाधीनता दिवस पर कुछ वक्त निकालकर देश के वर्तमान और भविष्य के बारे में भी चिंतन - मनन करें। सीमा के उस पार बैठे दुश्मन से तो  हमारी सेना हर तरह से निपटने में सक्षम है लेकिन घर के भीतर बैठकर देश को कमजोर करने वाली ताकतों के हौसले धवस्त करने का दायित्व हम सबका है। स्वाधीनता दिवस पर इसका संकल्प लीजिये क्योंकि ये देश हमारा सबका है।

स्वाधीनता दिवस की अनंत शुभकामनाएँ। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 August 2025

चुनाव आयोग के विरोध का हश्र भी किसान आंदोलन जैसा ही होगा



लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सरकार की आलोचना स्वाभाविक है। जनहित के मुद्दों पर सत्ता पक्ष को घेरना उसका कर्तव्य भी है। जनता का विश्वास जीतने के लिए उसका संघर्षशील होना जरूरी होता है। दरअसल  आक्रामकता ही  उसके जीवंत होने का प्रमाण  है। लेकिन विरोध में प्रामाणिकता होनी चाहिए अन्यथा वह जनता का विश्वास खो बैठता है। दुर्भाग्य से भारत का मौजूदा विपक्ष भी इसी संकट से गुजर रहा है। नरेंद्र मोदी  को सत्ता में आये 11 साल हो चुके हैं। पहला चुनाव तो वे डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध  सत्ता विरोधी रुझान के बल  पर जीते। लेकिन 2019 में उनकी जीत उनके अपने कार्यों के कारण हुई। पिछले चुनाव में जरूर मोदी सरकार स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई और उसे बाहरी समर्थन से सरकार बनानी पड़ी किंतु ये भी सही है कि जनादेश इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन के पास भी नहीं था। रही बात कांग्रेस की तो भले ही उसकी सीटें बढ़कर दोगुनी हो गईं और लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पाकर राहुल गाँधी नेता प्रतिपक्ष बन सके किंतु ये भी उतना ही सही है कि 1984 के बाद कांग्रेस को किसी भी चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका।  2024 में उसी के नेतृत्व में  इंडिया गठबंधन बना किंतु उसने भी राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। लोकसभा चुनाव के बाद उनका कद जाहिर तौर पर ऊंचा हुआ किंतु उसके बाद हुए जम्मू -  कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के लचर प्रदर्शन से विपक्षी गठबंधन के घटक दल भी श्री गाँधी से छिटकने लगे। इसका कारण उनका अपरिपक्व व्यवहार और हठधर्मी स्वभाव ही है। हालांकि इंडिया गठबंधन नाम के लिए तो जिंदा है लेकिन उसकी एकता और वजनदारी शुरुआती दौर जैसी नहीं रही। हरियाणा के बाद जब महाराष्ट्र में भी भाजपा ने जोरदार सफलता हासिल की तो गठबंधन में उनके प्रति अविश्वास और बढ़ गया ।  दिल्ली के चुनाव में तो इंडिया गठबंधन के दल ही एक दूसरे के विरुद्ध खड़े नजर आये। वहाँ भी भाजपा ने शानदार जीत हासिल करते हुए अजेय मान लिए गए अरविंद केजरीवाल की हेकड़ी निकाल दी। लेकिन खुद मैदान में उतरने के बाद भी राहुल कांग्रेस को लगातार तीसरे शून्य की शर्मनाक स्थिति से उबार नहीं पाए। जब उन्हें लगा कि उनकी चुनाव जिताऊ क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं तब उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में मतदाता सूची में गड़बड़ी का मुद्दा छेड़कर भाजपा पर चुनाव चुराने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग पर चढाई कर दी। धीरे - धीरे वे यहाँ तक बोलने लग गए कि लोकसभा चुनाव में 20 - 25 सीटें कम होती तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। परोक्ष रूप से उनका आशय उतनी सीटों में की गई गड़बड़ी को लेकर था। आश्चर्य की बात ये आरोप उन्होंने एक साल  बाद  लगाया। ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि हरियाणा और  महाराष्ट्र में भाजपा हार जाती तब भी क्या श्री गाँधी लोकसभा चुनाव पर  इस तरह की शंका व्यक्त करते ? इसी बीच चुनाव आयोग द्वारा बिहार में मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण का काम शुरू किया जिससे कांग्रेस के साथ ही लालू प्रसाद यादव की राजद में तो खलबली मची ही प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी घबरा उठीं क्योंकि चुनाव आयोग ने बिहार के बाद उनके राज्य की मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण का ऐलान कर दिया। इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं लगीं किंतु न्यायालय ने उन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। आयोग द्वारा जिन 11 दस्तावेजों में से किसी को भी मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के लिए आवश्यक बताया उनको दी गई चुनौती भी बेअसर रही है। गत दिवस न्यायालय ने यहाँ तक कह दिया कि पुनरीक्षण मतदाताओं के हित में है और समय - समय पर होते भी  रहना चाहिए। उल्लेखनीय है आयोग पूरे देश में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की बात कह चुका है जिसका उद्देश्य फर्जी तरीके से मतदाता बन गए  विदेशी नागरिकों को सूची से बाहर करना है। राहुल  सूचियों में गड़बड़ी के जितने प्रमाण ला रहे हैं उनके सत्यापन की जिम्मेदारी लेने के बजाय उल्टे चुनाव आयोग को खलनायक साबित करने की चाल चल रहे हैं जो उन्हीं के गले का फंदा बनती जा रही है। रायबरेली और वायनाड के अलावा सोनिया गाँधी के भारतीय नागरिक बनने से पहले ही मतदाता बन जाने का मुद्दा भी उछल गया है। ये सब देखते हुए लगता है मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर शुरु किया गया विपक्षी आंदोलन भी कृषि कानूनों के विरुद्ध चले लम्बे किसान आंदोलन जैसा ही बेनतीजा  समाप्त हो जाएगा। चुनाव आयोग द्वारा श्री गाँधी के प्रत्येक आरोप का समुचित जवाब दिये जाने के बाद उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा। बिहार में मतदाता सूचियों का  प्रारूप प्रकाशित कर लोगों से आपत्तियाँ आमंत्रित की गईं किंतु 65 लाख नाम काटे जाने के बावजूद 65 हजार आपतियाँ तक नहीं आईं।  ऐसे में  बड़ी बात  नहीं किसान आंदोलन के बाद जो स्थिति राकेश टिकैत की हुई वैसी ही राहुल गाँधी की भी हो जाए।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 13 August 2025

पुतिन कोई जेलेंस्की नहीं जिन्हें ट्रम्प दबा सकें



सारी दुनिया की निगाहें दो दिन बाद अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प और व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली शिखर वार्ता पर लगी हुई हैं जिसका मकसद रूस और यूक्रेन के बीच 2022 से  चल रहे युद्ध को बंद करवाना है। हालांकि इस युद्ध की शुरुआत तो 2014 से मानी जाती है जब रूस ने यूक्रेन के महत्वपूर्ण बंदरगाह क्रीमिया पर जबरन कब्जा कर लिया जो व्यापारिक और रणनीतिक दृष्टि से  उसके लिए उपयोगी है किंतु 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला करते हुए उसके बड़े इलाके कब्जा लिए। आज की स्थिति में उसके 20 प्रतिशत भूभाग पर वह काबिज है। यूरोप को गैस आपूर्ति हेतु डाली गई पाइप लाइन का  किराया और  बंदरगाहों के उपयोग सहित अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन रूस की मर्जी से चले। लेकिन जब जेलेंस्की सत्ता में आये तब उन्होंने  अमेरिका के संरक्षण वाले नाटो से जुड़ने का निर्णय लिया। जो उनकी मुसीबत का कारण बन गया। पुतिन को ये कतई मंजूर नहीं है कि अमेरिका और उसके समर्थक देशों की सेनाओं की उपस्थिति उसकी सीमाओं के नजदीक हो। इसलिये नाटो की सदस्यता मिलने के पहले ही रूस द्वारा हमला शुरू कर दिये जाने से अन्य देशों की सेनाएं  मदद हेतु तो नहीं आ सकीं किंतु अमेरिका और लगभग सभी प्रमुख यूरोपीय देशों ने धन और युद्ध सामग्री द्वारा  यूक्रेन को जमकर सहायता देने के साथ ही रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। यद्यपि पुतिन लगातार आक्रमण करते आ रहे हैं लेकिन  बाहर से मिल रहे  साजो - सामान और आर्थिक मदद के बल पर बर्बादी के कगार पर पहुंचकर भी यूक्रेन लड़ाई में बना  हुआ  है । जंग  लम्बे समय तक जारी रहने पर ये आशंका व्यक्त की जाने लगी कि  रूस भी यूक्रेन में वैसे ही उलझकर रह गया  जैसे साठ के दशक में अमेरिका वियतनाम में फंस गया था। लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों के जरिये रूस को अलग - थलग करने की अमेरिकी रणनीति शुरुआत में तो असर दिखाती दिखी किंतु जल्द ही उसका विपरीत प्रभाव होने से  पूरे यूरोप में गैस और अनाज का संकट छा गया। दूसरी तरफ रूस ने चीन और भारत  के रूप में दो बड़े ग्राहकों की मदद से अपना व्यापार बचाए रखा और लड़ाई को लंबा खींचते हुए अमेरिका को ही ऐसे जाल में फंसा दिया जिससे निकलने के लिए ट्रम्प छटपटा रहे हैं। जनवरी में पदभार संभालने के बाद वे पुतिन से दोस्ती का गाना गाते रहे और जेलेंस्की को वाशिंगटन बुलाकर युद्ध रोकने का दबाव बनाया। लेकिन नहीं मानने पर उन्हें बुरी तरह अपमानित करते हुए बाहर निकल जाने कहा। उसके बाद से अमेरिका इस लड़ाई से खुद को दूर करने में जुट गया जिससे यूरोपीय देश भी नाराज हो उठे क्योंकि इकतरफा युद्धविराम पुतिन की विस्तारवादी सोच को बढ़ावा देगा जो पड़ोसी देशों की जमीन हथियाने का इरादा जता चुके हैं। इस बीच अपने व्यापार घाटे की पूर्ति के लिए ट्रम्प ने अनेक देशों पर अनाप - शनाप टैरिफ थोपना शुरू कर दिया जिनमें चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका भी हैं जो रूस के साथ ब्रिक्स नामक संगठन के सदस्य हैं। इन सभी ने मिलकर अमेरिका के विरुद्ध जो मोर्चेबंदी की उससे ट्रम्प भी भीतर तक हिल गए। अमेरिका के अंदरूनी हालात दिन ब दिन खराब हो रहे हैं। ट्रम्प का विरोध बढ़ता जा रहा है। उनकी टैरिफ नीति को अर्थशास्त्रियों द्वारा विनाशकारी बताया जाने लगा है। यूरोप भी उसकी छाया से निकलने छटपटा रहा है। ये सब देखते हुए ट्रम्प ने पुतिन से मिलकर शांतिदूत बनने का दाँव चला। वैसे भी उन पर शांति का नोबल पुरस्कार हासिल करने का भूत सवार है परंतु पुतिन उनकी तुलना में ज्यादा गंभीर और ठोस इरादे वाले हैं। उनकी शर्त है यूक्रेन के जिन प्रांतों पर रूस का कब्जा है वे उसे मिल जाएं । उल्लेखनीय है इन क्षेत्रों में अपार खनिज संपदा है जिस पर अमेरिका की लार भी टपक रही है । दूसरी शर्त यूक्रेन को नाटो में शामिल होने का इरादा त्यागने की है। इनके अतिरिक्त भी अन्य बातें हैं लेकिन रूस यूरोप तक अपने व्यापार की पहुँच आसान बनाने हेतु यूक्रेन से हर तरह की छूट चाहेगा। उधर जेलेंस्की का कहना है कि यूक्रेन के भविष्य का फैसला करने वाली बैठक में उनको नहीं बुलाना आपत्तिजनक है।  ऐसे में यदि ट्रम्प वाहवाही लूटने के लिए पुतिन की शर्तों पर युद्ध रुकवाने तैयार होते हैं तब यूक्रेन ही नहीं बल्कि यूरोप भी इसे स्वीकार करेगा इसमें संदेह है। कुल मिलाकर दुनिया भर में निंदा और उपहास का पात्र बन चुके ट्रम्प अपनी स्थिति सुधारने के लिए पुतिन से मिलने जा रहे हैं किंतु इस मुलाकात से ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए क्योंकि पुतिन कोई जेलेंस्की नहीं जिन्हें वे  दबा सकें। उनके साथ ब्रिक्स देश मुस्तैदी से खड़े हैं जबकि ट्रम्प का साथ  अमेरिका के परंपरागत साथी देश तक छोड़ते जा रहे हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 August 2025

आवारा पशु केवल दिल्ली नहीं पूरे देश की समस्या हैं


सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर आवारा कुत्तों को पकड़कर उनके लिए बनाये आश्रय स्थल पर रखने की व्यवस्था करे। इसमें  व्यवधान डालने वालों पर कड़ी कारवाई की जाएगी। अदालत की नाराजगी इस बात को लेकर है कि सार्वजनिक स्थलों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी लोगों की असुविधा के साथ ही सुरक्षा के लिए खतरा बनती है। उनके काटने से अनेक लोगों की मृत्यु भी हो चुकी है जिन्हें वापस नहीं लाया जा सकता। न्यायालय ने राजधानी के सभी स्थानीय निकायों को समन्वय बनाकर आवारा कुत्तों को पकड़ने  कहा है। उल्लेखनीय है दिल्ली में  6 लाख आवारा कुत्ते हैं। जिन्हें रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि उनकी नसबन्दी करें तो भी एक वर्ष में 75 फीसदी कुत्तों का ही बंध्याकरण संभव होगा। न्यायालय के फैसले को पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गाँधी ने अव्यावहारिक, महंगा और पर्यावरण के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि सरकर के पास न तो पर्याप्त आश्रय स्थल हैं और न ही नसबंदी के समुचित प्रबंध। पशुओं के संरक्षण हेतु सक्रिय मेनका के अनुसार  आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाये जाने के बाद बंदरों का आतंक शहरी इलाकों में बढ़ जाएगा।  मोटे अनुमान के अनुसार सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर कर आश्रय स्थल में रखे जाने के लिए दिल्ली सरकार पर सालाना 10 हजार करोड़ रु. का आर्थिक बोझ आएगा जिसकी व्यवस्था मुश्किल  है। और फिर ये समस्या चूंकि पूरे देश की है इसलिये सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले के परिप्रेक्ष्य में राज्यों के उच्च न्यायालय भी ऐसा ही आदेश पारित कर दें तब आवारा कुत्तों की व्यवस्था के लिए कितना खर्च आयेगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन ये भी देखना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय को आखिर इतना कड़ा फैसला लेना क्यों पड़ा? आवारा कुत्तों की समस्या केवल दिल्ली में नहीं बल्कि   देश के हर शहर, कस्बे और गाँव में है। अनेक राज्य जहाँ गोवंश के वध पर कानूनी रोक लगा दी गई वहाँ सड़कों पर मंडराती गायें यातायात को बाधित करने के साथ ही गंदगी फैलाती हैं। बीते कुछ वर्षों में राजमार्गों का जाल बिछ गया है। इन पर तेजगति से वाहन दौड़ते हैं। लेकिन गायों के झुंड  जगह - जगह बैठे होने से वाहन चालकों को भारी परेशानी होती है जिससे दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। गायों के अलावा इनमें मनुष्य भी मौत के शिकार होते हैं। इस समस्या का भी इलाज नहीं हो पा रहा। जहाँ तक बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली में आवारा कुत्तों को पकड़ने संबंधी आदेश की है तो  मेनका गाँधी ने उसके लागू होने में जो अड़चनें बताईं वे अपनी जगह वाजिब हैं किंतु स्वतः संज्ञान लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो आदेश दिया उसकी अंतर्निहित भावना को भी समझा जाना चाहिए क्योंकि केवल आवारा कुत्ते और गायें ही नहीं बल्कि बन्दर भी शहरी क्षेत्रों में लोगों की परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। इन्हें पकड़ने की सारी सरकारी व्यवस्थाएं विफल साबित हो चुकी हैं। बढ़ते नगरीय क्षेत्रों के कारण जंगल सिमटने से भी भोजन की तलाश में शहरों में बन्दरों की धमाचौकड़ी बढ़ती जा रही है। गाय - भैंस पालने वाले पहले अपने पशुओं को चरने शहर के बाहर के घास युक्त मैदानों में भेजते थे किंतु  वहाँ कांक्रीट के ढांचे खड़े होते जा रहे हैं। ऐसे में पर्यावरण और प्रदूषण की जिस समस्या से मनुष्यों को जूझना पड़ रहा है वह पशुओं के लिए भी उतनी ही तकलीफदेह है। कुल मिलाकर इस समस्या का हल कानून की सख्ती और प्रशासन की चुस्ती से तब तक नहीं हो सकता जब तक समाज इस बारे में स्वेच्छा से आगे न आये। गोवंश के वध पर रोक लगाए जाने के बाद राज्य सरकारें  गोशाला संचालकों को जो अनुदान देती है उतने में उनका भरण - पोषण संभव नहीं है। इसीलिए वहाँ उनकी दशा बेहद खराब हो जाती है और मरने की शिकायतें भी आम हैं। आवारा कुत्तों के अलावा पालतू कुत्तों के मालिक भी सुबह शाम उन्होंने घर के बाहर ले जाते हैं जहाँ वे मल - मूत्र त्यागकर गंदगी फैलाते हैं जबकि विकसित देशों में कुत्ते के मालिक को वह गंदगी साफ करनी होती है। ऐसे में जरूरी है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो आदेश दिल्ली के संदर्भ में दिया गया उस पर सभी राज्य सरकारों को विचार करना चाहिए क्योंकि आवारा पशुओं की समस्या राष्ट्रव्यापी हो चुकी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 11 August 2025

पवार ने राहुल के लिए मुसीबत खड़ी कर दी



    शरद पवार देश के सबसे वरिष्ट राजनेता हैं। कांग्रेस से अपना सफर प्रारंभ करने के बाद अपने गुरु वसंत दादा पाटिल की सरकार गिराकर वे महाराष्ट्र के  मुख्यमंत्री बने। सत्ता के लिए उन्होंने कब किसका साथ पकड़ा और किसका छोड़ा इस पर किताबें लिखी जा सकती है। कांग्रेस में दोबारा लौटने के बाद श्री पवार ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा करते हुए  राकांपा (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) बना डाली। लेकिन कुछ वर्षों बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन कर उसी गाँधी परिवार के सलाहकार बन बैठे जिसकी गाड़ी को पटरी से उतारने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।  वर्तमान में वे विपक्षी गठबंधन इंडिया के दिग्गजों में  हैं। शिवसेना को कांग्रेस की गोद में बिठाने जैसा असंभव कार्य उन्हीं के कारण संभव हो सका। हालांकि इसमें उनकी पार्टी भी टूटी और शिवसेना भी दोफाड़ हो गई जिसके कारण महाविकास अघाड़ी  सरकार गिर गई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिलने से भाजपा और शिवसेना ( शिंदे)  सरकार  पर खतरा मंडराने लगा और विधानसभा चुनाव में अघाढ़ी की वापसी की अटकलें लगने लगीं। लोकसभा चुनाव के  बाद  वैसे भी विपक्ष का हौसला काफी मजबूत था। लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा ने अपनी सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) और राकांपा ( अजीत) के साथ मिलकर विपक्ष को चारों खाने चित्त कर दिया। हालांकि हरियाणा में भी भाजपा तीसरी बार सरकार बनाकर लोकसभा चुनाव के झटके से उबर चुकी थी किंतु महाराष्ट्र की हार राहुल गाँधी हजम नहीं कर सके जिसके कारण इंडिया गठबंधन की अन्य पार्टियों में कांग्रेस से दूरी बनाने की भावना जाग उठी। इसका प्रमाण दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखने मिला जब सपा और तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए आम आदमी पार्टी के पक्ष में प्रचार किया। हालांकि विपक्षी एकता का गुब्बारा हरियाणा चुनाव में ही फुट चुका था किंतु दिल्ली में बिखराव खुलकर सामने आ गया। यहाँ भी हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे दोहराए गए। इसी के बाद से श्री गाँधी ने चुनाव आयोग को निशाना बनाना शुरू किया।  लेकिन विगत दिवस शरद पवार ने भी ये कहते हुए धमाका किया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के पूर्व दो व्यक्तियों ने उन्हें 160 सीटें जिताने की गारंटी दी जिन्हें वे राहुल के पास ले गए जिन्होंने ऐसे लोगों से बचने की सलाह दी इसलिये उनके नाम और संपर्क सूत्र उनके पास नहीं है। एक साल बाद इतनी महत्वपूर्ण बात को उजागर करने के पीछे उनका मकसद चुनावों में धांधली के आरोप का समर्थन करना ही है। लेकिन कहावत है होशियार कौआ भी कभी - कभी गलत जगह बैठ जाता है।और श्री पवार भी वही कर बैठे।  उन जैसे अनुभवी  नेता द्वारा उन दोनों व्यक्तियों को श्री गाँधी से  मिलवाने से ये तो साबित हो ही गया कि वे लालच में आ गए थे, वरना  दोनों को पुलिस के हवाले कर देते।  उनके नाम और संपर्क सूत्र पता न होने की बात श्री पवार को संदेह के घेरे में खड़ा करती है। उससे भी बड़ा आश्चर्य  है कि श्री गाँधी ने भी इतनी बड़ी बात को छिपाये रखा। श्री पवार  कोई ऐरे - गैरे व्यक्ति नहीं हैं। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिये कि वे उन अनजान व्यक्तियों को श्री गाँधी के पास क्या सोचकर ले गए थे? इसी तरह की जवाबदेही श्री गाँधी की भी बनती है क्योंकि भले ही   उन्होंने उन व्यक्तियों के प्रस्ताव में रुचि नहीं ली हो किंतु उनको सीधे - सीधे चले जाने देना भी कई आशंकाओं को जन्म देता है। पवार साहब ने इतनी गम्भीर बात तब क्यों नहीं उजागर की और एक साल बाद उन्हें ऐसा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई ये पड़ताल का विषय है। चुनाव धांधली पर आसमान सिर पर उठाये घूमने वाले राहुल के लिए भी  नई मुसीबत खड़ी हो गई। यदि वे उस मुलाकात का खंडन करते हैं तो श्री पवार झूठे कहलाएंगे और स्वीकार करने पर  चुनावी धांधली करने वालों की पहिचान छिपाने  के कसूरवार होंगे। इस प्रकार  श्री पवार के खुलासे ने श्री गाँधी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिसमें न उगलते बनेगा और न निगलते।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 August 2025

भारत की अगुआई में ब्रिक्स देशों की मोर्चेबंदी से डॉलर का दबदबा खतरे में


डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी इतिहास के सबसे असफल राष्ट्रपति साबित होने जा रहे हैं। दूसरी बार  चुनाव जीतने पर उन्हें ये गुमान हो गया मानों वे दुनिया के भाग्यविधाता बन गए हों। उन्होंने जिस तरह के तेवर दिखाना शुरू किये उनसे अन्य देश ही नहीं बल्कि पड़ोस के वे राष्ट्र भी चौंक गए जिनसे अमेरिका के रिश्ते बेहद करीबी रहे। यूरोप के तमाम देशों को भी उन्होंने दुत्कारना शुरू कर दिया जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही अमेरिकी कैम्प में रहे। सोवियत संघ के विघटन के बाद लगभग सभी यूरोपीय देश अमेरिका के प्रभावक्षेत्र में आ गए। अरब जगत में भी  कुछ कट्टरपंथी देशों के अलावा बाकी ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमेरिका के साथ दोस्ताना कायम कर लिया। यही हाल अफ्रीका और दक्षिण एशिया का भी कहा जा सकता है। ट्रम्प ने दूसरी बार सत्ता ग्रहण करने के बाद अपने मित्रों के साथ भी शत्रुओं जैसा व्यवहार शुरू कर दिया और इसके लिए व्यापार को हथियार बना लिया। मसलन जिन देशों से अमेरिका के व्यापारिक रिश्ते हैं उनसे आयात होने वाले सामान पर टैरिफ में कई गुना वृद्धि कर देना। कुछ देश टैरिफ रूपी आतंकवाद से डरकर उनके सामने नतमस्तक हो गए जिनको अमेरिका ने कुछ रियायतें देकर उपकृत किया। लेकिन चीन, भारत, ब्राज़ील, द. अफ्रीका सहित दर्जन भर देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए झुकने से इंकार कर दिया। तब ट्रम्प ने  अनाप - शनाप आयात शुल्क थोपकर उन्हें  दबाना चाहा। चीन ने जब अमेरिका की कमजोर नस पर हाथ रखा तो उस पर लादे गए टैरिफ कुछ घटा दिये गए ।  लेकिन उनकी सबसे ज्यादा नाराजगी भारत और ब्राजील पर  बरस रही है जिन्होंने  ट्रम्प को ये एहसास  करवा दिया कि आपसी व्यापार की जरूरत  अमेरिका को  भी उतनी ही है। इसलिये टैरिफ में  इकतरफा अनाप - शनाप वृद्धि अनुचित है। ट्रम्प को इस प्रतिक्रिया ने आगबबूला कर दिया और उन्होंने दोनों पर पहले 25 और फिर 50 फीसदी आयात शुल्क  लाद दिया। ब्राज़ील ने तो पहले दिन से ही ट्रम्प के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी थी किंतु अब भारत ने चार कदम आगे बढ़कर ट्रम्प की मनमानी को चुनौती दी डाली। किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों के विरुद्ध कोई समझौता नहीं करने का ऐलान करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन में शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में शामिल होने की घोषणा कर अमेरिका को चौंकाया और इसी बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को मॉस्को भेजकर  रूस के राष्ट्रपति पुतिन को भारत आने राजी कर लिया। उल्लेखनीय है ट्रम्प की भारत से नाराजगी का कारण रूस से कच्चा तेल और रक्षा उपकरण खरीदना है। उन्होंने रूस से व्यापारिक और सामरिक सौदे रोकने का दबाव बनाया किंतु भारत के इंकार से नाराज होकर टैरिफ की दरें 50 प्रतिशत तक  बढ़ा दीं। उन्हें  उम्मीद  थी कि भारत उनकी शर्तों को स्वीकार कर लेगा। लेकिन उसने रूस से खरीदी रोकने की बजाय अमेरिका से होने वाले रक्षा सौदों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया जो ट्रम्प के लिए यह किसी  तमाचे  से कम नहीं है। एयर इंडिया के स्वामित्व वाले टाटा समूह द्वारा अमेरिका से बोइंग यात्री विमानों का जो सौदा हुआ वह भी रद्द करने के संकेत दे दिये गए हैं। दूसरी तरफ रूस से रक्षा उपकरणों की खरीद और बढ़ाई जा रही है। इससे स्पष्ट हो गया कि श्री डोभाल की रूस यात्रा केवल ट्रम्प को चिढ़ाने के लिए न होकर कूटनीति और व्यापार का बेहतरीन मिश्रण थी।  पुतिन द्वारा जल्द ही भारत आने की सहमति भी ट्रम्प को ये एहसास करवाने की कोशिश है कि अमेरिकी चौधराहट के दिन लद गए हैं। श्री मोदी के चीन जाने के फैसले से अमेरिका की चिंता और बढ़ गई।  ट्रम्प की नींद ये सुनकर भी उड़ रही है कि ब्रिक्स देश डॉलर के मुकाबले  नई साझा मुद्रा प्रारंभ करने जा रहे हैं। इस संगठन से जुड़े ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और द. अफ्रीका विश्व की 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था संचालित करते हैं इसलिए यदि उन्होंने यूरो जैसी  मुद्रा प्रारम्भ की तो डॉलर का रौब - रुतबा खत्म होने को आ जायेगा। ट्रम्प के टैरिफ हमले से हलाकान गैर ब्रिक्स देश भी मौका मिलते ही डॉलर के चंगुल से निकलकर उस नई मुद्रा में लेनदेन करने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। इस प्रकार श्री मोदी ने राहुल गाँधी के उकसावे में आकर ट्रम्प के विरुद्घ एक शब्द कहे बिना उनकी हेकड़ी निकालने की जो रणनीति बनाई उसके कारण अब अनेक छोटे - छोटे देश तक ट्रम्प की धौंस का जवाब उन्हीं की शैली में देने का दुस्साहस कर रहे हैं। इस लिहाज से आने वाले कुछ महीनों के दौरान विश्व राजनीति में बड़ा उलट - पलट देखने मिलेगा। ब्रिक्स देशों की मोर्चेबन्दी में भारत की व्यूह रचना सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और नरेंद्र मोदी एक बार फिर विश्वस्तर पर सबसे कुशल राजनेता साबित होने जा रहे हैं। ट्रम्प द्वारा डाले जा रहे दबाव के जवाब में डॉलर की चमक और धमक कम कर देने का दाँव सोवियत संघ के बिखराव के बाद विश्व राजनीति की सबसे बड़ी घटना होगी जिसका सेहरा भी श्री मोदी के सिर बंधेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

कुबेरेश्वर : रुद्राक्ष की चाहत में मिली मौत


म.प्र में सीहोर जिले के पं. प्रदीप मिश्रा पिछले कुछ वर्षों से चर्चाओं में हैं।  कुबेरेश्वर धाम नामक प्राचीन धर्मस्थान उनका कार्यक्षेत्र है।  2022  में उनके द्वारा रुद्राक्ष  महोत्सव शुरू किया गया जिससे कुबेरेश्वर की ख्याति दूर - दूर तक फैलने लगी। लेकिन उनके  प्रत्येक आयोजन में अव्यवस्था का बोलबाला आम हो चला है। पं. मिश्रा साधारण पूजा - पाठ  से बढ़ते - बढ़ते नामी - गिरामी या यूँ कहें कि पांच सितारा शख़्सियत बन गए। बड़े प्रवचनकार होने के कारण राजनेता भी उनके प्रति आकर्षित होने लगे। और फिर  जिन धर्मगुरुओं या प्रवचनकारों के पास नेताओं की आवक बढ़ती है , शासकीय अधिकारी भी उनकी भक्त मंडली में शामिल हो जाते हैं। परिणामस्वरूप उन्हें बिना कुछ किये वी.आई.पी की हैसियत मिल जाती है। पं. मिश्रा भी उसी श्रेणी में आ चुके हैं। इसीलिए उनके आयोजनों में होने वाली बदइंतजामी पर शासन और प्रशासन आँखें मूँद लेते हैं। जबरदस्त भीड़ और वाहनों की असीमित संख्या से भोपाल - इंदौर मार्ग में लंबा जाम लगने से आवागमन बाधित हो जाता है। लेकिन  सबसे बड़ी बात जो  पं. मिश्रा द्वारा किये जाने वाले धार्मिक आयोजनों के साथ स्थायी रूप से जुड़ गई वह है उनमें होने वाली मौतें। लाखों की भीड़ पवित्र रुद्राक्ष प्राप्त करने के साथ ही पं.मिश्रा के दर्शन की अभिलाषा से जमा तो हो जाती है किंतु उसके भोजन, पेयजल, आवास आदि की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से धक्का - मुक्की होती है जिसमें अनेक श्रद्धालु अपनी जान गँवा बैठते हैं। बीते कुछ दिनों से वहाँ कांवड़ यात्रा में शामिल होने आये लाखों श्रद्धालुओं को भी पिछले  आयोजनों की तरह से ही भारी कष्ट उठाने पड़े और आधा दर्जन मौतें भी हो गईं। पं. मिश्रा ने पहले तो इस पर औपचारिक दुःख व्यक्त कर दिया किंतु जब चौतरफा आलोचना हुई तो मृतकों को अपने परिवार का हिस्सा बताकर अपनी संवेदनशीलता  प्रदर्शित की। इधर राजनीतिक जगत संभलकर प्रतिक्रिया दे रहा है। जिनके मिश्रा जी से मधुर रिश्ते हैं उनकी मानें तो ये सब होता रहता है। इतनी बड़े जनसमूह के एकत्र होने से धक्का - मुक्की और अन्य प्रकार की अव्यवस्था उनकी नजर में सामान्य घटना है। राजनेताओं के लिए भीड़ चूंकि प्राणवायु की तरह होती है इसलिये जो भी भीड़ जुटा सके वह उनकी नजर में महत्वपूर्ण हो जाता है। और ये बात केवल कुबेरेश्वर वाले पं. मिश्रा नहीं बल्कि उन जैसी अन्य आध्यात्मिक शख्सियतों पर भी लागू होती है जिनके आयोजनों में आजकल राजनेताओं से अधिक जनता जमा होने लगी है। यही वजह है कि कुबेरेश्वर में लगातार हो तरह हादसों के बावजूद शासन - प्रशासन दोनों ने समुचित व्यवस्थाओं के लिए जरूरी कदम नहीं उठाये। वहाँ आये लोगों  में  पं. मिश्रा के साथ ही पुलिस और प्रशासन के प्रति जिस प्रकार से नाराजगी दिखाई दी वह किसी अकल्पनीय स्थिति को जन्म दे सकती थी क्योंकि समाजविरोधी तत्व ऐसे आयोजनों में कारस्तानी दिखाने से बाज नहीं आते। बहरहाल, कुबेरेश्वर में बीते कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ उससे  एक बात तो स्पष्ट है कि पं. मिश्रा भले ही अच्छे प्रवचनकार हों और उनका आध्यात्मिक ज्ञान भी उच्चस्तरीय हो किंतु बड़े आयोजनों के प्रबंधन में वे बेहद कमजोर हैं। काफी पहले से प्रचार कर लाखों लोगों का जमावड़ा कर लेने के बाद उनके भोजन - आवास आदि को भगवान भरोसे छोड़ देना बेहद गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक है। मिश्रा जी के साथ ही स्थानीय प्रशासन भी बराबरी का कसूरवार है जिसने कुबेरेश्वर में पिछले आयोजनों में हुई मौतों और अव्यवस्था के बाद भी  समुचित कदम नहीं उठाये। हमारे देश में आस्था का अतिरेक दिन ब दिन बढ़ते जाने से धार्मिक आयोजन कुप्रबंध के लिए कुख्यात होते जा रहे हैं। कुबेरेश्वर के अलावा भी अन्य धार्मिक स्थलों पर ऐसे ही हादसे होना आम बात है। जैसा कि प्रारंभ में कहा  गया चूंकि नेता और नौकरशाह भी प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर ऐसे आयोजनों से जुड़े होते हैं इसलिये उनमें होने वाली तमाम गलतियाँ नजरंदाज कर दी जाती हैं। यदि व्यवस्था का यही स्तर बना रहा तब कुबेरेश्वर के भावी आयोजनों में भी श्रृद्धालु धक्के खाने मजबूर होंगे और रुद्राक्ष की चाहत में  कुछ लोगों को मौत नसीब होती रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 August 2025

मोदी द्वारा सही समय पर सही जवाब


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आज से लागू 25 फीसदी आयात शुल्क के बाद गत दिवस घोषणा कर दी कि आगामी 27 अगस्त से इसे 50 प्रतिशत कर दिया जाएगा।  इसी बीच उनका एक और बयान आ गया जिसके अनुसार भारत पर इसके अतिरिक्त आयात शुल्क सहित कुछ प्रतिबंध लगाए जाएंगे। चूंकि भारत ने उनके दबाव के सामने झुकने का कोई संकेत नहीं दिया इसलिये वे बौखलाहट में हैं। रूस से कच्चा तेल  खरीदने के  मामले में भारत ने ये कहते हुए  आईना दिखा दिया कि खुद अमेरिका और उसके समर्थक अनेक देश रूस के साथ हर तरह का व्यापार कर रहे हैं। दूसरी बात जिससे ट्रम्प भन्नाए हुए हैं वह है कृषि क्षेत्र में अमेरिका को प्रवेश की अनुमति नहीं देना। अभी तक तो भारत सरकार अपने प्रवक्ताओं के जरिये कूटनीतिक औपचरिकताओं के साथ अमेरिका को जवाब दे रही थी किंतु आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि यद्यपि उन्हें इसके लिए व्यक्तिगत कीमत चुकानी पड़ेगी किंतु  भारत अपने किसानों, मछुआरों और डेयरी क्षेत्र से जुड़े लोगों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। उनके इस बयान में भले ही  ट्रम्प का नाम नहीं लिया गया किंतु आशय स्पष्ट है कि अमेरिका को भारत के कृषि क्षेत्र पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जाएगी। प्रधानमंत्री रोज - रोज किसी विषय पर बोलने के बजाय सही समय और सही जगह अपनी बात रखते हैं। उक्त  बात  उन्होंने आज दिल्ली में  प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के जनक स्वर्गीय डॉ. एम़ एस़ स्वामीनाथन की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में  आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कही।  इस विवाद में अब तक भारत की ओर से जो कुछ कहा गया उसे साधारण प्रतिक्रिया माना जा रहा था। लेकिन अब प्रधानमंत्री का खुलकर सामने आना सरकार की नीति का ऐलान माना जाएगा। ट्रम्प इससे नाराज होकर और कड़े कदम उठा सकते हैं किंतु भारत ने बजाय उत्तेजित होने के सुलझे हुए तरीके से अपनी बात रखने का तरीका चुना । श्री मोदी ने बिना नाम लिए अमेरिका को संदेश दे दिया कि भारत अपने हितों की रक्षा हेतु कटिबद्ध है। इसके साथ ही कूटनीतिक मोर्चे पर भी जवाब देने की रणनीति बना ली गई है जिसके तहत राष्ट्रीय रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल रूस भेजे गए। ट्रम्प ने पिछले दिनों शिगूफा छोड़ा था कि भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीदी घटाई जा रही है। ऐसा कहकर वे दिखाना चाह रहे थे कि वह झुक गया। लेकिन भारत ने इसका खंडन करते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह अपने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में रक्षा सलाहकार का मॉस्को प्रवास किसी बड़े मिशन का हिस्सा माना जा सकता है। इसके साथ ही ये खबर भी आ गई कि श्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन में भाग लेने चीन जाएंगे।   लेकिन उसके पहले वे जापान की यात्रा भी करेंगे जो अमेरिका  समर्थक होने के बाद भी ट्रम्प के रवैये से त्रस्त है। उल्लेखनीय है हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी चीन गए थे जहाँ उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी. जिनपिंग से हुई । ऐसा लगता है उसी दौरान श्री मोदी के वहाँ जाने की रूपरेखा तैयार हुई क्योंकि गलवान घाटी में हुई मुठभेड़ के बाद उनके और जिनपिंग के बीच बातचीत बंद सी थी। चूंकि यूक्रेन और रूस की जंग के बाद चीन और भारत दोनों रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीददार बनकर सामने आये जिससे अमेरिकी लॉबी द्वारा उस पर लगाए आर्थिक प्रतिबंध बेअसर हो गए। ट्रम्प इसे लेकर ही भारत पर हमलावर हैं। ऐसे में कूटनीतिक मोर्चेबंदी मजबूत करने का दांव खेलकर भारत ने ये दिखा दिया कि वह अमेरिका के अनुचित दबाव में झुकने के बजाय उसका सामना करने तैयार है। प्रधानमंत्री द्वारा प्रदर्शित दृढ़ता का ही परिणाम है कि जिन उद्योगपतियों को अमेरिका द्वारा आयात शुल्क बढ़ाये जाने से नुकसान होने का अंदेशा है वही इसे अवसर मानकर सरकार के साथ खड़े हैं। आम जनता भी यही चाहती है कि भारत इस संकट का सामना साहस के साथ करे।  श्री मोदी द्वारा आज दिये बयान से इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि भारत ट्रम्प के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से उत्तेजित हुए बिना अपने हितों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ा रहेगा। किसी शक्तिशाली राष्ट्र की यही पहिचान भी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 6 August 2025

गनीमत है अभी तो बादल ही फटे हैं.....


गत दिवस उतराखंड में गंगोत्री के निकट धराली में बादल फटने के बाद हुई तबाही के दृश्य देखकर दिल  कांप उठा। पलक झपकते पूरा कस्बा पहाड़ से पानी के साथ आए मलबे में दब गया। जान - माल की  क्षति का आकलन करना फिलहाल असंभव है। सैकड़ों लोग लापता हैं जिनमें सेना के शिविर में रह रहे सैनिक भी थे। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को बचाव का अवसर ही नहीं मिला। सकरी सी नालेनुमा पहाड़ी नदी  अचानक कई गुनी चौड़ी हो गई जिसके कारण उसकी चपेट में आये मकान , होटल, वाहन सब जल प्रलय का शिकार हो गए। बचाव कार्य में जुटे दलों को भी विपरीत मौसम के कारण भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ  आज सुबह हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में बादल फटने से कैलाश - मानसरोवर यात्रा रोक दी गई क्योंकि पहाड़ धसकने से जगह - जगह मार्ग अवरुद्ध हो गया है। यद्यपि किसी जनहानि की जानकारी नहीं है किंतु चंडीगढ़ - मनाली मार्ग सहित हिमाचल प्रदेश के दर्जनों भीतरी रास्तों पर आवागमन रुक गया है। अभी - अभी खबर आई कि गंगोत्री के निकट भटवाड़ी में भी बादल फट गया जिसकी वजह  से धराली के निकट हर्शिल से उत्तरकाशी आने वाला रास्ता बह गया जिससे  धराली में चल रहे बचाव कार्य में अड़चनें आने की आशंका बढ़ गई है। हालांकि बरसात में पहाड़ों के धसकने और बादल फटने की घटनाएं प्रकृति के व्यवहार का हिस्सा हैं जो कभी - कभार हुआ करती थीं। लेकिन बीते दो - तीन दशकों से भारत के हिमालयी  क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की पुनरावृत्ति  तेजी से देखने मिल रही है जो चिंता का विषय  है। हिमालय भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में देवतुल्य माना गया है। इस विशाल पर्वत शृंखला में हमारी  सीमाएं स्थित हैं। इसकी गोद में जो तीर्थस्थान हैं उनके दर्शन की अभिलाषा सनातन धर्म के अनुयायियों में होने से सदियों से  श्रृद्धालुओं का आना - जाना होता रहा। जब सुख - सुविधा के साधन नहीं  थे तब भी  तीर्थयात्री तरह - तरह की  तकलीफें झेलकर भी  आया करते थे। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद सीमा सड़क संगठन बी.आर. ओ) का गठन हुआ और  दुर्गम पर्वतीय इलाकों तक सड़कें बनने लगीं। हालांकि ब्रिटिश काल में विकसित किये गये हिल स्टेशन भी आजादी के बाद घरेलू सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने रहे किंतु उतराखंड के चार धाम के अलावा जम्मू कश्मीर के अमरनाथ की यात्रा में जिस तरह से जनसैलाब उमड़ने लगा उससे इन पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा रहा है। हिमाचल प्रदेश के जिन निर्जन इलाकों में कोई जाने का साहस नहीं करता था उनमें भी सैलानियों की भीड़ होने लगी। एक समय था जब साधु - संत मानसिक शंति के लिए हिमालय जाकर तप करते थे किंतु आज के दौर में पहाड़ी क्षेत्रों में जाने वालों ने वहाँ की शांति, सौंदर्य और संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता  है। लेकिन धीरे - धीरे यह विकास की वासना का शिकार होती चली गई। केदारनाथ हादसे के पहले भी गंगोत्री के रास्ते में बना पन बिजली संयंत्र  जलसैलाब में बह गया था। तब कहा गया कि पहाड़ में सुरंग खोदने से उसकी भूगर्भीय संरचना को जो क्षति पहुंची उसके कारण वह हादसा हुआ। कुछ साल पहले  बद्रीनाथ के निकट जोशीमठ की जमीन धसकने से शहर का अस्तित्व खतरे में आ गया। उसका कारण भी पन बिजली योजना के लिए बनाई गई सुरंग को माना गया था। लेकिन बजाय संभलने के  विकास के नाम पर प्रकृति पर बलात्कार करने का पाप किया जाता रहा। पहाड़ों का सीना चीरकर बारहमासी फोर और सिक्स लेन सड़कें   बनाने का सिलसिला जारी है। आधुनिक सुख - सुविधा युक्त होटल - गेस्ट हाउस कुकुरमुत्तों जैसे उगते जा रहे हैं। तीर्थयात्रा , धार्मिक पर्यटन में बदलती जा रही है। पहाड़ों की खूबसूरती जिन वृक्षों से थी उनको निर्दयता से काट दिया गया। हिमालय की गोद में पलने वाली बहुमूल्य वनस्पतियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। जिस अलौकिक शांति का वहाँ अनुभव होता था वह इंसानी शोर - शराबे में डूबकर विलुप्त हो गई। वाहनों के धुएं ने  स्वच्छ हवा को ज़हरीला कर दिया। प्रकृति हमारी पालनहार है इसीलिये वह  समय - समय पर हमें आने वाले खतरों के प्रति सतर्क  करती है। कल और आज जो हादसे हुए इनका पूर्वाभास होने के बाद भी यदि हम नहीं जागे तब प्रकृति को कोसने के बजाय अपने अंतःकरण में झांककर देखना चाहिए। गनीमत है अभी तो बादल ही फटे हैं। आगे क्या - क्या होगा कहना मुश्किल है  क्योंकि सहने की भी कोई सीमा होती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 August 2025

शासक की बजाय विदूषक बनते जा रहे ट्रम्प


भारत पर रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने बनाये जाल में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं।  1 अगस्त से 25 फीसदी आयात शुल्क लगाए जाने के कुछ देर बाद ही उन्होंने उसे एक सप्ताह आगे बढ़ा दिया। गौरतलब है इसी माह के अंतिम सप्ताह अमेरिका का एक दल यहाँ आकर व्यापार समझौते पर बातचीत करेगा। उसके पहले ही भारत पर मनमाने तरीके से आयात शुल्क थोपने के साथ ही रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भारी - भरकम आर्थिक दंड लगाने की धौंस देकर वे भारत को भयभीत करना चाह रहे हैं। हालांकि भारत सरकार ने उनके बयानों का सीधा जवाब तो नहीं दिया किंतु ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि हम अपने हितों के बारे में जागरूक हैं और उनसे समझौता नहीं करेंगे। कूटनीतिक जगत में इस बात की चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  द्वारा इस दौरान  बात नहीं करने से ट्रम्प बौखलाए हुए हैं। भारत ने  दृढ़ता का प्रदर्शन किये जाने के बाद अमेरिका को ही कठघरे में खड़ा करते हुए स्पष्ट कर दिया कि न सिर्फ वह अपितु उसके समर्थक यूरोपीय यूनियन b के अनेक देश रूस से कच्चे तेल के अलावा अन्य चीजें भी बड़ी मात्रा में खरीद रहे हैं। ऐसे में ट्रम्प किस मुँह से भारत पर रूस से व्यापार न  करने का दबाव बना रहे हैं ये समझ से परे है। रोचक बात ये है कि भारत की ही तरह चीन भी रूसी कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं का बड़ा खरीददार है। उस पर अनाप - शनाप  आयात शुल्क लगाने के बाद अमेरिका को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे क्योंकि उसने भी ट्रम्प को उन्हीं की शैली में जवाब दिया। इसीलिए उन्होंने चीन पर रूस से कच्चा तेल नहीं  खरीदने का दबाव नहीं बनाया। असल में अमेरिका को ये गलतफहमी हो गई कि वे भारत को अपनी मर्जी से जैसा चाहे झुका लेंगे। लेकिन अब तक जो कुछ भी हुआ उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत ने भी  ट्रम्प की धौंस के सामने झुकने से इंकार कर दिया है। उल्टे अमेरिका की पोल खोलते हुए बता दिया कि  वह खुद भी रूस का व्यापारिक साझेदार है इसलिए भारत को रोकने का कोई नैतिक अधिकार उसे नहीं है। अपने को दुनिया का चौधरी समझने वाले अमेरिका जैसे देश के लिए ये स्थिति वाकई अकल्पनीय है। ट्रम्प के दिमाग में अपने देश की शक्ति का जो घमंड है वही उनकी सनक का कारण  है परंतु जिस तरह से उन्होंने पूरी दुनिया पर हंटर चलाने की बेअक्ली दिखाई उसके कारण अब तो अनेक देश उनसे तू - तड़ाक करने की हिम्मत दिखाने लगे हैं। ब्राज़ील और द.अफ्रीका ने भी ट्रम्प को खरी - खरी सुना दी। पड़ोसी कैनेडा भी अमेरिका की चौधराहट स्वीकार करने तैयार नहीं है। यूरोप के बाद जापान भी अमेरिका के प्रभुत्व से बाहर आने प्रयासरत है। भारत तो पूरी तरह अमेरिका के गुट में कभी रहा ही नहीं और रूस से उसके रिश्ते समय की कसौटी पर  हमेशा खरे साबित हुए हैं। दूसरे कार्यकाल में ट्रम्प जिस प्रकार पाकिस्तान के प्रति झुकाव दिखा रहे हैं उसके बाद उनसे किसी अक्लमंदी की उम्मीद करना बेकार है। इसलिए भारत ने उनकी अकड़ के सामने नहीं झुकने का जो हौसला दिखाया वह पूरी तरह सही है। ट्रम्प  को ये बताने का समय आ गया है कि आज  कोई एक देश या नेता पूरी दुनिया को अपने मुताबिक चलाने में सक्षम नहीं रहा । और अमेरिका भी कोई अपवाद नहीं है। आयात शुल्क में मनमानी वृद्धि से अमेरिका को ऊपरी तौर पर तो आर्थिक लाभ मिलने लगा है। लेकिन वहाँ उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ने से आम जनता काफी नाराज है। चीजें महंगी होने से उनके आयात में भी कमी आई जिससे उनका अभाव भी महसूस किया जा रहा है। भारत ने वैकल्पिक बाजार खोजने की जो पहल की वह बुद्धिमत्ता भरा कदम है। यदि यही स्थिति रही तो दुनिया को अपनी मर्जी से हांकने का मंसूबा देख रहे ट्रम्प अपने देश में ही कमजोर होते जाएंगे। वैसे भी उनकी छवि शासक की बजाय विदूषक की बनती जा  रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 August 2025

हर अस्पताल में जेनेरिक दवाओं के जन औषधि केंद्र खोलना अनिवार्य हो


केन्द्र सरकार ने गत दिवस कुछ दवाइयों के दामों में 10 से 15 प्रतिशत कमी का निर्णय लिया। इनमें मधुमेह, हृदय, दर्द निवारक तथा बुखार की दवाइयाँ शामिल हैं। ये निर्णय निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है।लेकिन अधिकांश चिकित्सकों द्वारा ब्रांडेड दवाइयाँ लिखे जाने के कारण मरीजों पर अनाप - शनाप बोझ पड़ता है।  कानूनन, डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने का आदेश है। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) दोनों ने डॉक्टरों से जेनेरिक दवाएं लिखने को कहा है, और ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान है जिसके अंतर्गत उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। दरअसल जेनेरिक दवाएं, कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं क्योंकि जिन दवाओं पर  पेटेंट खत्म हो जाता है उसका उत्पादन कोई भी कर सकता है। ऐसे में उसे पेटेंट के नाम पर दी जाने वाली राशि से मुक्ति मिल जाती है।जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा को अधिक किफायती, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त  बनाना है। इसीलिए नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद देश भर में जन औषधि केंद्र खोलने की शुरुआत हुई जिनमें मिलने वाली जेनेरिक दवाइयों की कीमत ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 75 से 90 प्रतिशत तक सस्ती होने से उपभोक्ता को अकल्पनीय  बचत होती है। जो लोग उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय और अन्य बीमारियों की दवाइयाँ नियमित लेते हैं उनका मासिक खर्च जन औषधि केंद्र से खरीदी जाने वाली जेनेरिक दवाओं से एक चौथाई रह जाता है। इसीलिए केंद्र सरकार समूचे देश में जन औषधि केंद्र खोलने के कार्यक्रम को आगे बढ़ा रही है जिसके अंतर्गत मार्च 2026  तक इनकी संख्या 25 हजार करने का लक्ष्य है। मोटे - मोटे आंकड़ों के अनुसार जन औषधि केंद्र से दवा खरीदने पर अब तक 25 हजार करोड़ से अधिक की बचत हुई। लेकिन 140 करोड़ की आबादी वाले देश में 25 हजार दुकानें ऊँट के मुँह में जीरा समान हैं। इस बारे में एक बात बिल्कुल साफ है कि चिकित्सा का पेशा  विशुद्ध व्यवसाय बन चुका है। दवा निर्माता कंपनियां, चिकित्सक और अस्पताल रूपी गठजोड़ मरीजों की जेब काटने में जुटा है। अस्पतालों में संचालित दवा दुकानें एम.आर.पी पर बिक्री करती हैं। सर्जिकल सामान में होने वाली लूटमार की तो कोई सीमा नहीं। ग्लूकोज की बोतल के थोक और फुटकर दाम में जमीन - आसमान का अंतर है। दवा कंपनियों  द्वारा चिकित्सकों को बिक्री के लक्ष्य दिये जाते हैं जिन्हें पूरा करने पर उनको विदेश यात्रा के अलावा तरह - तरह से उपकृत किया जाता है। सरकार द्वारा इस पर रोक लगाए जाने के बाद भी कमीशनखोरी का धंधा बेधड़क जारी है। जन औषधि केंद्र जनता को इस लुटाई से बचा सकते हैं । लेकिन एक तो जेनेरिक दवाओं के ये बिक्री केंद्र काफी कम हैं दूसरे जेनेरिक दवाओं के कम असरकारी होने को लेकर चिकित्सा जगत द्वारा भ्रम फैलाया जाता है। जबकि उनका उपयोग करने वालों को  स्वास्थ्य और आर्थिक दोनों लाभ हो रहे हैं। ये देखते हुए केंद्र और राज्य दोनों को चाहिये कि जन औषधि केंद्रों का समुचित प्रचार कर लोगों को आश्वस्त करें जेनेरिक दवाएं सस्ती होने पर भी ब्रांडेड दवाइयों की तरह ही असर करती हैं। इसके अलावा प्रत्येक अस्पताल में अनिवार्य रूप से जन औषधि केंद्र खोलकर मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाइयाँ उपलब्ध करवाने जैसे कदम भी उठाये जाने जरूरी हैं। मोदी सरकार ने आयुष्मान भारत योजना के जरिये गरीबों और 70 वर्ष से ऊपर के सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख रु. तक के इलाज की सुविधा देकर जन स्वास्थ्य की दिशा में जो क्रांतिकारी कदम उठाया उसका लाभ करोड़ों लोगों को मिल रहा है । लेकिन जो लोग इस योजना के दायरे में नहीं आते उन्हें जन औषधि केंद्र बड़ी राहत दे सकते हैं। इसलिए इस दिशा में युद्धस्तरीय प्रयास किये जाने चाहिए हैं क्योंकि चिकित्सा सुलभ होने के साथ ही सस्ती होना भी जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 August 2025

राहुल द्वारा एटम बम फोड़े जाने का इंतजार

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी इन दिनों चुनाव आयोग पर हमलावर हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ही वे वोटों की चोरी का रोना रोते फिर रहे हैं। उधर चुनाव आयोग का कहना है कि उसके बुलाने पर श्री गाँधी आते नहीं और न ही पत्रों का जवाब देते हैं। पहले विपक्ष की ओर से ईवीएम में गड़बड़ी का शोर मचाकर मतपत्रों से मतदान करवाने का दबाव बनाया जाता रहा। लेकिन चुनाव आयोग ने ऐसे सभी दलों को बुलाकर आरोप साबित करने कहा तब कोई नहीं पहुंचा। बिहार में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण के बाद 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम कट जाने से भी विपक्ष भन्नाया हुआ है । संसद इसके कारण चल नहीं पा रही । सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिकाएँ विचाराधीन हैं। आयोग ने मतदाता सूची का प्रारंभिक प्रकाशन कर आपत्तियाँ आमंत्रित की हैं जिसके बाद अंतिम प्रकाशन किया जाएगा। लेकिन राहुल बीते कुछ दिनों से ये दावा करते आ रहे हैं कि उनके पास चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों के पुख्ता प्रमाण आ गए हैं। संभवतः ये कर्नाटक का मामला है जो उनके अनुसार छह महीने तक की गई खोजबीन के बाद उजागर हुआ है। बकौल श्री गाँधी ये एटम बम है  जिसके फूटने के बाद चुनाव आयोग मुँह दिखानें लायक  नहीं रह जाएगा। इसी के साथ उन्होंने आयोग के कर्मचारियों को धमकी दे डाली कि गड़बड़ी करने पर उन्हें बख्शा नहीं जाएगा भले ही वे सेवा निवृत्त हो चुके हों। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आयोग ने अपने अमले को निडर होकर कार्य करते रहने का निर्देश दिया। मतदाता सूचियों में गड़बड़ी के  आरोप नई बात नहीं है। चूंकि इसका काम सरकारी कर्मचारी करते हैं जिनकी चुनाव  ड्यूटी की तरह  इस कार्य में भी कोई रुचि नहीं होती।  ऐसे में कुछ नाम छूटना तो आम है किंतु जबसे बी.एल.ओ नामक व्यवस्था हुई तबसे इस तरह की गड़बड़ी कम होने लगी। इसी तरह मतदाता पर्चियाँ घर - घर पहुंचाए जाने से मतदान के प्रति उत्साह भी बढ़ा है। लेकिन बड़े पैमाने पर अतिरिक्त नाम जोड़ने की शिकायतें जैसी श्री गाँधी बता रहे हैं , गले नहीं उतरती। जो लोग काम - धंधे के सिलसिले में बाहर रहते हैं उनके नाम दो अलग शहरों या राज्यों में बतौर मतदाता दर्ज होने के तो प्रकरण जरूर हैं। बिहार में  पुनरीक्षण के दौरान काटे गए लोगों में ऐसे मतदाता भी हैं। लेकिन श्री गाँधी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में लाखों  नाम जोड़कर चुनाव चोरी करने का जो आरोप लगाते रहते हैं उसका ठोस प्रमाण वे आज तक नहीं दे सके। चुनाव आयोग ऐसे आरोपों पर खुलकर कहता आया है कि सबूत है तो चुनाव याचिका लगाएं या अदालत में शिकायत दर्ज करवाएं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनके द्वारा कही गई बातों में गंभीरता और प्रामाणिकता की अपेक्षा रहती है। ऐसे में वे जिस एटम बम का हल्ला मचा रहे हैं उसे फोड़ने में विलंब क्यों किया जा रहा है ये सवाल उठ खड़ा होता है। यदि जैसा वे कह रहे हैं वैसा है तब उन्हें ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए और बिहार की मतदाता सूचियों के अंतिम प्रकाशन के पहले धमाका कर अपनी विश्वसनीयता कायम करना चाहिए। साथ ही  वे सरकार और आयोग पर चाहे जितने हमले करें किंतु उसके कर्मचारियों और अधिकारियों को परिणाम भुगतने की धमकी देना  शोभनीय नहीं है। हालांकि आजकल चुनावों के दौरान विपक्षी नेताओं द्वारा सरकारी अमले को इस तरह से डराने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है किंतु चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। यदि यही चलन जारी रहा तो भविष्य में न्यायपालिका पर भी इसी तरह दबाव बनाया जाने लगेगा। बहरहाल श्री गाँधी ने जिस एटम बम को फोड़ने की धमकी चुनाव आयोग को दी उसके धमाके का पूरा देश इंतजार कर रहा है। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि यदि वह बम फुस्स निकला तब उसके नुकसान से वे और कांग्रेस दोनों बच नहीं सकेंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 1 August 2025

ट्रम्प का समर्थन कर कांग्रेस की फजीहत करवा रहे राहुल




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विश्वसनीयता दिन ब दिन घटती जा रही है। वे जो मुँह में आया बोल जाते हैं और फिर पलटी मारने में भी उन्हें शर्म नहीं आती। दो दिन पहले उन्होंने भारत पर 25 फीसदी आयात शुल्क थोपने का ऐलान कर दिया जो आज से प्रभावशील होना था किंतु फिर उसे एक सप्ताह के लिए टाल दिया। लेकिन इसी के साथ  भारत की अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बता दिया। आयात शुल्क बढ़ने से भारत के उद्योग - व्यापार को बड़ा नुकसान होने की आशंका जताई जा रही थी। लेकिन गत दिवस शेयर बाजार मामूली गिरावट के बाद बंद हुए और वही आज भी प्रारंभिक घण्टों में दिखाई दिया। उद्योगपतियों के अलावा तमाम आर्थिक विशेषज्ञों ने भी आत्मविश्वास व्यक्त किया कि अमेरिका के साथ व्यापार राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का बहुत  छोटा अंश है और ट्रम्प की नीतियों से भारत को नये बाजार तलाशने का अवसर मिल गया है । ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ कहने पर ट्रम्प हंसी का पात्र बन गए हैं । भारत के तमाम आर्थिक विशेषज्ञों ने अर्थव्यवस्था की मजबूती की पुष्टि की है।   लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ट्रम्प की टिप्पणी के समर्थन में कूदते हुए बोले कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को छोड़कर हर कोई यह जानता है  कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक मरी हुई  है। मुझे खुशी है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने फैक्ट सामने रखा।बीजेपी ने अडानी की मदद के लिए अर्थव्यवस्था को खत्म कर दिया है। नेता प्रतिपक्ष का सरकार से विरोध स्वाभविक है किंतु भारत की अर्थव्यवस्था को मृत कहने से साधारण बुद्धि वाला भी सहमत नहीं होगा। श्री गाँधी की पार्टी के ही दो वरिष्ट सांसद शशि थरूर और राजीव शुक्ला ने ही ट्रम्प की निंदा करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती की पुष्टि की। शिवसेना  उद्धव गुट की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने तो ट्रम्प के बयान की खिल्ली उड़ाते हुए उन्हें अहंकार में डूबा बता दिया। इस प्रकार राहुल के बयान को उनके अपने ही लोगों द्वारा नकार दिया गया। उल्लेखनीय है स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 1998  में किये गए परमाणु परीक्षण से भन्नाए अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध थोप दिये थे।  लेकिन अटल जी ने  दबाव में आने से इंकार कर दिया और विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीयों का देश की सहायता हेतु आगे आने हेतु आह्वान किया। देखते - देखते ही देश का विदेशी मुद्रा भंडार भर गया और  प्रतिबंध दम तोड़ बैठे। तबसे भारत आर्थिक , वैज्ञानिक और सामरिक तौर पर कई गुना विकसित और शक्तिशाली हो चुका है। जो ट्रम्प भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बता रहे हैं उसे ही उनके देश में बैठी दिग्गज रेटिंग एजेंसियां भारत को दुनिया की पांचवी और सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का प्रमाणपत्र दे रही हैं। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष भी इसकी पुष्टि करते हैं जिनमें अमेरिका का दबदबा है। आज भारत की वार्षिक विकास दर अमेरिका और चीन को पीछे छोड़ चुकी है। आने वाले कुछ सालों में हमारी अर्थव्यवस्था के तीसरे स्थान पर आने की प्रबल संभावनाएं हैं। बतौर विपक्षी नेता श्री गाँधी का सरकार की आलोचना करना और उसकी उपलब्धियों को कमतर आंकना कोई अपराध नहीं है लेकिन अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बताने के अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान का आँख मूँदकर समर्थन  करना उनकी नासमझी का ताजा प्रमाण है। बेहतर होता वे अपनी पार्टी के वरिष्ट नेताओं के अलावा आर्थिक विशेषज्ञों के साथ विमर्श करने के बाद इस विषय पर अपनी राय रखते। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों से श्री गाँधी की असहमति सैद्धांतिक कम राजनीतिक ज्यादा है क्योंकि मौजूदा दौर में कांग्रेस नीतिगत शून्यता की शिकार है। हालांकि  सरकार की आलोचना करने के लिए अनेक मुद्दे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बताये जाने के ट्रम्प के बयान का शब्दशः समर्थन कर श्री गाँधी भी अपनी हँसी उड़वा बैठे। उनकी यही  अपरिपक्वता कांग्रेस को भारी पड़ रही है । लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उन्हें इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि आज की दुनिया में किसी भी देश की आर्थिक स्थिति खुली किताब जैसी हो गई है। विश्व व्यापार संगठन के बनने के बाद सब कुछ खुला हुआ है। यहाँ तक कि चीन तक कुछ भी छिपाने में असमर्थ है ।  फिर भारत में तो पूर्ण लोकतंत्र है। भले ही भारत में करोड़ों लोग गरीब हैं और  बेरोजगारी  भी बड़ी समस्या है। रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या पूरी तरह हल नहीं हो पाई है किंतु भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ कहना दिमागी दिवालियापन ही हो सकता है। उस लिहाज से ट्रम्प और राहुल दोनों का मानसिक स्तर एक जैसा ही कहा जाए तो गलत न होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी