कूटनीति में सही समय का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है। उस दृष्टि से शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में चीन जाने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ रूपी आतंकवाद के विरुद्ध एक बड़े दांव के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि बीते 11 वर्ष में उन्होंने जापान की अनेक यात्राएं कीं किंतु यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब पूरी दुनिया में ट्रम्प के पागलपन के कारण उथलपुथल मची हुई है। उल्लेखनीय है राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद का मुद्दा जोर - शोर से उठाया था। दरअसल बीते कुछ सालों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ने के अलावा बेरोजगारी की वजह से युवाओं में नाराजगी है। अप्रवासियों की बढ़ती संख्या के कारण संसाधनों पर भी उनका कब्जा होते जाने से भी अमेरिकी समाज में चिंता व्याप्त थी। बड़ी - बड़ी कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय मूल के लोग आसीन हो गए। वित्तीय संस्थानों में चीनी पूंजी हावी होने लगी। ट्रम्प ने अमेरिकी जनमानस के मन में व्याप्त असंतोष को भांपकर भावनात्मक माहौल बनाया जिसने उनको दोबारा राष्ट्रपति तो बना दिया किंतु उनके पास अमेरिका के सामने मंडराती समस्याओं का कोई प्रभावी उपाय नहीं था और इसीलिये उन्होंने टैरिफ को अपनी कूटनीति का जरिया बनाते हुए जनता को फुसलाने का दांव चला किंतु अमेरिका के तमाम दिग्गज अर्थशास्त्रियों के अलावा विश्व स्तरीय रेटिंग एजेंसीज ने भी ट्रम्प द्वारा मनमर्जी से थोपे जा रहे टैरिफ को देश के लिए आत्मघाती बताकर उसकी आलोचना की। यहाँ तक कि अमेरिकी अदालतों तक ने टैरिफ लगाने के उनके कृत्य को संविधान के विरुद्ध माना। लेकिन ट्रम्प के दिमाग में ये बात बैठ चुकी है कि अपने इस दाँव से वे पूरी दुनिया को घुटनाटेक करवा लेंगे। दरअसल सोवियत संघ के विखंडन के बाद दुनिया एक ध्रुवीय हो गई थी। विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से अमेरिका ही विश्व की आर्थिक दिशा तय करने लगा था किंतु बीते एक दशक में वैश्विक परिदृश्य में बड़ा बदलाव हुआ। चीन के साथ ही भारत और ब्राज़ील जैसे देश आर्थिक प्रगति के रास्ते पर तेज गति से आगे बढ़े। उधर दक्षिण अफ्रीका ने भी उपनिवेशवाद की यादों से निकलकर अपनी ताकत दिखाई। अमेरिका के लिए ये चुनौती से कम नहीं था। लेकिन बजाय सामंजस्य बिठाने के ट्रम्प रिंग मास्टर की तरह हंटर फटकारने पर आमादा हो गए। इस बदहवासी में उन्होंने न दोस्त देखा न दुश्मन। जिस यूरोप के साथ अमेरिका के रिश्ते बेहद मधुर रहे उनसे भी ट्रम्प ने पंगा ले लिया। लेकिन जापान जैसे देश से सम्बन्ध बिगाड़ने की उनकी नीति समझ से परे है क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका के हाथों बर्बाद हुए इस देश की विदेश नीति बीते 80 सालों से तो अमेरिका परस्त ही रही। टैरिफ रूपी आतंकवाद ने जब जापान पर भी वार किया तब उसने भी अमेरिकी प्रभुत्व से बाहर निकलने का साहस दिखाया। गत दिवस श्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री की मुलाकात के बाद ये घोषणा हुई कि जापान आगे से भारत में किये जाने वाला निवेश अमेरिकी डॉलर की बजाय अपनी मुद्रा येन में करेगा। श्री मोदी ने जापान की तकनीक और भारतीय कौशल के समन्वय का जो उल्लेख किया वह ट्रम्प को एशिया का जवाब है। वहीं से उन्होंने चीन और भारत को मिलकर इस वैश्विक संकट से निपटने का जो आह्वान किया वह भी कूटनीतिक कुशलता ही कही जायेगी। दक्षिण एशिया के जिन छोटे देशों ने बीते कुछ दशकों में आर्थिक प्रगति की वे भी टैरिफ के विरुद्ध किसी मंच की तलाश में हैं, ऐसे में यदि जापान भी भारत और चीन के साथ खड़ा हो जाए तब एशिया अकेला ही ट्रम्प की दादागिरी का मुकाबला करने में सक्षम हो जाएगा। अमेरिका के समक्ष सबसे बड़ा संकट आने वाला है अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर को आधार मुद्रा मानने के प्रति बढ़ता विरोध। रूस, चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका के साथ जापान भी डॉलर की चौधराहट से इंकार करने लगा तब ट्रम्प का टैरिफ रूपी तीर लौटकर उन्हीं को आहत करेगा। चीन के बाद भारत और अब जापान ने भी अमेरिका के विरुद्ध आगे आने की जो हिम्मत दिखाई वह ट्रम्प के टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालने में सफल साबित होगी ये सोचना गलत नहीं है। जापान की देखासीखी अमेरिका के पिछलग्गू अन्य देश भी ट्रम्प के विरुद्ध मुखर होंगे ये उम्मीद की जा सकती है। श्री मोदी की जापान यात्रा उस दृष्टि से बहुत ही सामयिक और सार्थक है।
-रवीन्द्र वाजपेयी