Tuesday, 19 August 2025

रूस, चीन और भारत की एकजुटता से ट्रम्प की नींद गायब


कुछ महीनों पहले जिस जेलेंस्की को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस से निकल जाने कहकर अपमानित किया था उसे ही वे ससम्मान बगल में बिठाने मजबूर हो गए। यूरोपीय यूनियन के तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की बैठक में रूस - यूक्रेन युद्ध रुकवाने की जो कवायद ट्रम्प ने की उसका तात्कालिक परिणाम  जैसा वे दावा कर रहे हैं रूस के राष्ट्रपति पुतिन का जेलेंस्की के साथ बातचीत के लिए तैयार होने के तौर पर निकला है। साथ ही यूक्रेन को नाटो  सदस्य न बनाने की रूसी ज़िद को अमेरिका ने मान लिया किंतु यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी भी दे दी जिसके बदले उसे 90 अरब डॉलर ( 8 लाख करोड़ रु.) के अमेरिकी हथियार खरीदने होंगे।  विगत 15 अगस्त को अलास्का में ट्रम्प और पुतिन की मुलाकात में युद्ध युद्धविराम का फैसला नहीं हो सका था। प्राप्त जानकारी  के अनुसार पुतिन ही ट्रम्प पर हावी रहे। यूक्रेन की जो भी शर्तें ट्रम्प ने उन्हें बताईं उन्हें रूसी राष्ट्रपति ने नामंजूर कर दिया। वहीं रूस द्वारा कब्जा किये गए इलाके खाली किये बिना युद्धविराम के लिए जेलेंस्की तैयार नहीं हुए। मार्च में भी जब ट्रम्प ने उन पर युद्धविराम का दबाव बनाया तब भी इसी बात पर दोनों के बीच गरमागरम बहस हो गई थी। उस बैठक में भी जेलेंस्की ने अपने देश की सुरक्षा की गारंटी मांगी जिस ट्रम्प ने उन्हें कमरे से बाहर जाने कहकर बेइज्जत किया। जेलेंस्की और यूरोपीय यूनियन के नेताओं के साथ  ताजा बातचीत का भी उद्देश्य भी  केवल ये है कि ट्रम्प अपनी उस फजीहत से उबरना चाह रहे हैं जो अलास्का में हुई। वैसे भी युद्धविराम की कोई भी पहल पुतिन द्वारा नहीं की गई। वरना वे भारत जैसे किसी देश को मध्यस्थ बनाकर यूक्रेन के साथ शांति वार्ता करने बैठ सकते थे। गौरतलब है पुतिन और जेलेंस्की दोनों ही समय - समय पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात करते रहते हैं जो भारत के कूटनीतिक महत्व का परिचायक है। दरअसल इस विवाद में भारत के संतुलित रवैये से रूस और यूक्रेन दोनों संतुष्ट हैं। भारत ने रूस द्वारा यूक्रेन पर  हमले का न तो समर्थन किया और न ही  रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का। इसीलिए ट्रम्प, भारत से खुन्नस खाए हुए हैं और अनाप - शनाप टैरिफ लगाकर रूस से व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ने का दबाव बना रहे हैं। लेकिन न रूस धौंस में आया और न ही भारत। चीन से तो वैसे भी वे टकराने से कतराते हैं। जब उनको लगा कि टैरिफ नामक हथियार बेअसर साबित होने लगा तब उन्होंने पुतिन की मिजाजपुर्सी शुरू कर दी। सही बात तो ये है कि ट्रम्प को खुद ही नहीं समझ आ रहा कि क्या करें ? यूक्रेन को रूस जैसी महाशक्ति से टकराने के लिए निश्चित रूप से पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उकसाया किंतु ट्रम्प की  दोगली नीतियों से भी अमेरिका की विश्वसनीयता मिट्टी में मिल गई।  पहले तो उन्होंने यूक्रेन को अधर में छोड़ने जैसी हरकत की और अब पुतिन से मिलकर लड़ाई रोकने की कोशिश के साथ ही यूक्रेन पर रक्षा गारंटी के बदले अरबों डॉलर के हथियार खरीदने का दबाव बना रहे हैं। जबरन अकड़ दिखाने के फेर में वे पूरी दुनिया से दुश्मनी लेकर बैठ गए लेकिन जब घर में ही छीछालेदर होने लगी तब  मजबूरी में शांतिदूत बनने का स्वांग रच रहे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए भी उनकी नीयत साफ नहीं है। इसीलिए एक तरफ वे युद्ध रुकवाने के लिए हाथ- पाँव मार रहे हैं वहीं दूसरी तरफ यूक्रेन को हथियार बेचने की फिराक में हैं। सर्वविदित है कि यूक्रेन आर्थिक दृष्टि से तबाह हो चुका है।  ऐसे में वह अरबों डॉलर के हथियार कहाँ से खरीदेगा ये बड़ा प्रश्न है। पुतिन को खलनायक साबित करने के साथ ही वे भारत पर ये आरोप लगाते रहे कि वह रूस से तेल खरीदकर उसे ताकत दे रहा है किन्तु अब उन्हीं पुतिन  के स्वागत में लाल कालीन बिछाने में लगे हुए हैं। लेकिन उनकी कोशिशों में न तो गंभीरता है और न ही दूरदर्शिता। सच तो ये है  कि रूस , चीन और भारत के एकजुट होने से ट्रम्प की नींद गायब है। टैरिफ का डर दिखाकर सभी देशों को अमेरिका का वर्चस्व स्वीकार करने की उनकी महत्वाकांक्षा उन्हीं के गले का फंदा चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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