Thursday, 14 August 2025

चुनाव आयोग के विरोध का हश्र भी किसान आंदोलन जैसा ही होगा



लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सरकार की आलोचना स्वाभाविक है। जनहित के मुद्दों पर सत्ता पक्ष को घेरना उसका कर्तव्य भी है। जनता का विश्वास जीतने के लिए उसका संघर्षशील होना जरूरी होता है। दरअसल  आक्रामकता ही  उसके जीवंत होने का प्रमाण  है। लेकिन विरोध में प्रामाणिकता होनी चाहिए अन्यथा वह जनता का विश्वास खो बैठता है। दुर्भाग्य से भारत का मौजूदा विपक्ष भी इसी संकट से गुजर रहा है। नरेंद्र मोदी  को सत्ता में आये 11 साल हो चुके हैं। पहला चुनाव तो वे डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध  सत्ता विरोधी रुझान के बल  पर जीते। लेकिन 2019 में उनकी जीत उनके अपने कार्यों के कारण हुई। पिछले चुनाव में जरूर मोदी सरकार स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई और उसे बाहरी समर्थन से सरकार बनानी पड़ी किंतु ये भी सही है कि जनादेश इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन के पास भी नहीं था। रही बात कांग्रेस की तो भले ही उसकी सीटें बढ़कर दोगुनी हो गईं और लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पाकर राहुल गाँधी नेता प्रतिपक्ष बन सके किंतु ये भी उतना ही सही है कि 1984 के बाद कांग्रेस को किसी भी चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका।  2024 में उसी के नेतृत्व में  इंडिया गठबंधन बना किंतु उसने भी राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। लोकसभा चुनाव के बाद उनका कद जाहिर तौर पर ऊंचा हुआ किंतु उसके बाद हुए जम्मू -  कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के लचर प्रदर्शन से विपक्षी गठबंधन के घटक दल भी श्री गाँधी से छिटकने लगे। इसका कारण उनका अपरिपक्व व्यवहार और हठधर्मी स्वभाव ही है। हालांकि इंडिया गठबंधन नाम के लिए तो जिंदा है लेकिन उसकी एकता और वजनदारी शुरुआती दौर जैसी नहीं रही। हरियाणा के बाद जब महाराष्ट्र में भी भाजपा ने जोरदार सफलता हासिल की तो गठबंधन में उनके प्रति अविश्वास और बढ़ गया ।  दिल्ली के चुनाव में तो इंडिया गठबंधन के दल ही एक दूसरे के विरुद्ध खड़े नजर आये। वहाँ भी भाजपा ने शानदार जीत हासिल करते हुए अजेय मान लिए गए अरविंद केजरीवाल की हेकड़ी निकाल दी। लेकिन खुद मैदान में उतरने के बाद भी राहुल कांग्रेस को लगातार तीसरे शून्य की शर्मनाक स्थिति से उबार नहीं पाए। जब उन्हें लगा कि उनकी चुनाव जिताऊ क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं तब उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में मतदाता सूची में गड़बड़ी का मुद्दा छेड़कर भाजपा पर चुनाव चुराने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग पर चढाई कर दी। धीरे - धीरे वे यहाँ तक बोलने लग गए कि लोकसभा चुनाव में 20 - 25 सीटें कम होती तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। परोक्ष रूप से उनका आशय उतनी सीटों में की गई गड़बड़ी को लेकर था। आश्चर्य की बात ये आरोप उन्होंने एक साल  बाद  लगाया। ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि हरियाणा और  महाराष्ट्र में भाजपा हार जाती तब भी क्या श्री गाँधी लोकसभा चुनाव पर  इस तरह की शंका व्यक्त करते ? इसी बीच चुनाव आयोग द्वारा बिहार में मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण का काम शुरू किया जिससे कांग्रेस के साथ ही लालू प्रसाद यादव की राजद में तो खलबली मची ही प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी घबरा उठीं क्योंकि चुनाव आयोग ने बिहार के बाद उनके राज्य की मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण का ऐलान कर दिया। इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं लगीं किंतु न्यायालय ने उन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। आयोग द्वारा जिन 11 दस्तावेजों में से किसी को भी मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के लिए आवश्यक बताया उनको दी गई चुनौती भी बेअसर रही है। गत दिवस न्यायालय ने यहाँ तक कह दिया कि पुनरीक्षण मतदाताओं के हित में है और समय - समय पर होते भी  रहना चाहिए। उल्लेखनीय है आयोग पूरे देश में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की बात कह चुका है जिसका उद्देश्य फर्जी तरीके से मतदाता बन गए  विदेशी नागरिकों को सूची से बाहर करना है। राहुल  सूचियों में गड़बड़ी के जितने प्रमाण ला रहे हैं उनके सत्यापन की जिम्मेदारी लेने के बजाय उल्टे चुनाव आयोग को खलनायक साबित करने की चाल चल रहे हैं जो उन्हीं के गले का फंदा बनती जा रही है। रायबरेली और वायनाड के अलावा सोनिया गाँधी के भारतीय नागरिक बनने से पहले ही मतदाता बन जाने का मुद्दा भी उछल गया है। ये सब देखते हुए लगता है मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर शुरु किया गया विपक्षी आंदोलन भी कृषि कानूनों के विरुद्ध चले लम्बे किसान आंदोलन जैसा ही बेनतीजा  समाप्त हो जाएगा। चुनाव आयोग द्वारा श्री गाँधी के प्रत्येक आरोप का समुचित जवाब दिये जाने के बाद उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा। बिहार में मतदाता सूचियों का  प्रारूप प्रकाशित कर लोगों से आपत्तियाँ आमंत्रित की गईं किंतु 65 लाख नाम काटे जाने के बावजूद 65 हजार आपतियाँ तक नहीं आईं।  ऐसे में  बड़ी बात  नहीं किसान आंदोलन के बाद जो स्थिति राकेश टिकैत की हुई वैसी ही राहुल गाँधी की भी हो जाए।

- रवीन्द्र वाजपेयी


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