गत दिवस उतराखंड में गंगोत्री के निकट धराली में बादल फटने के बाद हुई तबाही के दृश्य देखकर दिल कांप उठा। पलक झपकते पूरा कस्बा पहाड़ से पानी के साथ आए मलबे में दब गया। जान - माल की क्षति का आकलन करना फिलहाल असंभव है। सैकड़ों लोग लापता हैं जिनमें सेना के शिविर में रह रहे सैनिक भी थे। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को बचाव का अवसर ही नहीं मिला। सकरी सी नालेनुमा पहाड़ी नदी अचानक कई गुनी चौड़ी हो गई जिसके कारण उसकी चपेट में आये मकान , होटल, वाहन सब जल प्रलय का शिकार हो गए। बचाव कार्य में जुटे दलों को भी विपरीत मौसम के कारण भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ आज सुबह हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में बादल फटने से कैलाश - मानसरोवर यात्रा रोक दी गई क्योंकि पहाड़ धसकने से जगह - जगह मार्ग अवरुद्ध हो गया है। यद्यपि किसी जनहानि की जानकारी नहीं है किंतु चंडीगढ़ - मनाली मार्ग सहित हिमाचल प्रदेश के दर्जनों भीतरी रास्तों पर आवागमन रुक गया है। अभी - अभी खबर आई कि गंगोत्री के निकट भटवाड़ी में भी बादल फट गया जिसकी वजह से धराली के निकट हर्शिल से उत्तरकाशी आने वाला रास्ता बह गया जिससे धराली में चल रहे बचाव कार्य में अड़चनें आने की आशंका बढ़ गई है। हालांकि बरसात में पहाड़ों के धसकने और बादल फटने की घटनाएं प्रकृति के व्यवहार का हिस्सा हैं जो कभी - कभार हुआ करती थीं। लेकिन बीते दो - तीन दशकों से भारत के हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की पुनरावृत्ति तेजी से देखने मिल रही है जो चिंता का विषय है। हिमालय भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में देवतुल्य माना गया है। इस विशाल पर्वत शृंखला में हमारी सीमाएं स्थित हैं। इसकी गोद में जो तीर्थस्थान हैं उनके दर्शन की अभिलाषा सनातन धर्म के अनुयायियों में होने से सदियों से श्रृद्धालुओं का आना - जाना होता रहा। जब सुख - सुविधा के साधन नहीं थे तब भी तीर्थयात्री तरह - तरह की तकलीफें झेलकर भी आया करते थे। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद सीमा सड़क संगठन बी.आर. ओ) का गठन हुआ और दुर्गम पर्वतीय इलाकों तक सड़कें बनने लगीं। हालांकि ब्रिटिश काल में विकसित किये गये हिल स्टेशन भी आजादी के बाद घरेलू सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने रहे किंतु उतराखंड के चार धाम के अलावा जम्मू कश्मीर के अमरनाथ की यात्रा में जिस तरह से जनसैलाब उमड़ने लगा उससे इन पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा रहा है। हिमाचल प्रदेश के जिन निर्जन इलाकों में कोई जाने का साहस नहीं करता था उनमें भी सैलानियों की भीड़ होने लगी। एक समय था जब साधु - संत मानसिक शंति के लिए हिमालय जाकर तप करते थे किंतु आज के दौर में पहाड़ी क्षेत्रों में जाने वालों ने वहाँ की शांति, सौंदर्य और संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। लेकिन धीरे - धीरे यह विकास की वासना का शिकार होती चली गई। केदारनाथ हादसे के पहले भी गंगोत्री के रास्ते में बना पन बिजली संयंत्र जलसैलाब में बह गया था। तब कहा गया कि पहाड़ में सुरंग खोदने से उसकी भूगर्भीय संरचना को जो क्षति पहुंची उसके कारण वह हादसा हुआ। कुछ साल पहले बद्रीनाथ के निकट जोशीमठ की जमीन धसकने से शहर का अस्तित्व खतरे में आ गया। उसका कारण भी पन बिजली योजना के लिए बनाई गई सुरंग को माना गया था। लेकिन बजाय संभलने के विकास के नाम पर प्रकृति पर बलात्कार करने का पाप किया जाता रहा। पहाड़ों का सीना चीरकर बारहमासी फोर और सिक्स लेन सड़कें बनाने का सिलसिला जारी है। आधुनिक सुख - सुविधा युक्त होटल - गेस्ट हाउस कुकुरमुत्तों जैसे उगते जा रहे हैं। तीर्थयात्रा , धार्मिक पर्यटन में बदलती जा रही है। पहाड़ों की खूबसूरती जिन वृक्षों से थी उनको निर्दयता से काट दिया गया। हिमालय की गोद में पलने वाली बहुमूल्य वनस्पतियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। जिस अलौकिक शांति का वहाँ अनुभव होता था वह इंसानी शोर - शराबे में डूबकर विलुप्त हो गई। वाहनों के धुएं ने स्वच्छ हवा को ज़हरीला कर दिया। प्रकृति हमारी पालनहार है इसीलिये वह समय - समय पर हमें आने वाले खतरों के प्रति सतर्क करती है। कल और आज जो हादसे हुए इनका पूर्वाभास होने के बाद भी यदि हम नहीं जागे तब प्रकृति को कोसने के बजाय अपने अंतःकरण में झांककर देखना चाहिए। गनीमत है अभी तो बादल ही फटे हैं। आगे क्या - क्या होगा कहना मुश्किल है क्योंकि सहने की भी कोई सीमा होती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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