Friday, 22 August 2025

ऑन लाइन गेमिंग पर रोक : देर से उठाया गया सही कदम


लाखों लोगों को कंगाल करने, सैकड़ों की जान लेने और अनगिनत परिवारों की शान्ति छीन लेने वाली ऑन लाइन गेमिंग पर रोक लगाने वाले विधेयक का संसद में पारित होना स्वागतयोग्य है। इसके  बाद पैसे से जुड़ी सभी ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लग जाएगा। जिससे गूगल प्ले स्टोर पर ऑनलाइन गेमिंग एप  डाउनलोड नहीं हो सकेगा। मोटे अनुमान के अनुसार  ऑनलाइन गेमिंग के चक्कर में पड़े  45 करोड़ लोग सालाना 20 हजार करोड़ का नुकसान उठाते हैं, जिस वजह से उनका घर तबाह हो गया। बड़ी संख्या में लोगों ने आत्महत्या की क्योंकि उनका बैंक खाता खाली हो गया। हालांकि बिना पैसे के खेले जाने वाले ई-स्पो‌र्ट्स और सोशल गेमिंग को सरकार प्रोत्साहित करेगी। डिजिटल क्रांति के बाद से इस तरह के काम - धंधे बढ़ते जा रहे हैं। इसमें दो मत नहीं कि संचार क्रांति के बेशुमार फायदे हैं । सूचना, शिक्षा, संपर्क, व्यापार, शोध और मनोरंजन के क्षेत्र में इसके  योगदान को स्वीकार करना ही होगा। लेकिन इसी के साथ  अनेक विकृतियाँ भी आईं। अश्लीलता और अपसंस्कृति को बढ़ावा देते हुए मनोरंजन की आड़ में भारतीय सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को कमजोर करने का सुनियोजित षडयंत्र रचा गया। जाहिर है इसके लिए वे विदेशी एजेंसियां सक्रिय हैं जिनका काम ही किसी भी देश में सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाकर वहाँ स्थापित मान्यताओं और परंपराओं से लोगों को दूर करना है। अनेक देशों में इस तरीके से सामाजिक उथलपुथल उत्पन्न कर अराजकता का माहौल बनाया गया जिसकी परिणिति सत्ता परिवर्तन के तौर पर भी देखने मिली। भारत के विशाल मध्यम वर्ग की बचत संस्कृति को उपभोक्तावाद के जरिये नष्ट करने के अलावा अनेक ऐसे दिखावटी आकर्षण पैदा किये गए जिनकी चमक - दमक में लोग अपनी मेहनत की कमाई से हाथ धो बैठे। ऑन लाइन गेमिंग भी उसी षडयंत्र का हिस्सा है। विकसित देशों में भी इसका चलन है किंतु भारत की आम जनता का इसके मोहपाश में फंसना बड़ी समस्या बन गई। करोड़ों लोगों का ऑन लाइन गेमिंग में लिप्त होना उनके परिवार के लिए आर्थिक बदहाली लेकर आया। आये दिन नौजवानों की आत्महत्या की खबरें विचलित करने लगीं। कुछ लोगों ने तो परिवार सहित मौत को गले लगा लिया। संचित धन खत्म होने के बाद कर्ज लेकर इस मकड़जाल में उलझने वालों की संख्या भी अनुमान से अधिक ही होगी क्योंकि बदनामी और शर्मिंदगी से बचने के लिए बहुत से लोग अपने नुकसान की बात छिपा गए होंगे। देर से ही सही केन्द्र सरकार ने इस लूटमार को रोकने के लिए कानून बनाकर अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन किया। हालांकि ऐसा करने में  विलंब क्यों हुआ ये भी बड़ा सवाल है। इस विधेयक के पारित होने के बाद ये मुद्दा भी उठ रहा है कि जिन सुप्रसिद्ध हस्तियों ने  ऑन लाइन गेमिंग का प्रचार कर लोगों को अपना पैसा फंसाने के लिए प्रोत्साहित किया उनके विरुद्ध भी कुछ न कुछ कारवाई होनी चाहिए। अपने देश में आई. पी. एल नामक क्रिकेट प्रातियोगिता के बारे में  तो आम अवधारणा है कि यह सट्टेबाजी के लिए ही होती है। देश भर में ऑन लाइन क्रिकेट सट्टा संगठित अपराध बन चुका है। जब भी मैच होते हैं सटोरियों के यहाँ छापे पड़ने की खबरें आती हैं। हालांकि इस कारोबार में पुलिस की संगामित्ति भी बताई जाती है।  ऑन लाइन गेमिंग में खेलों के आभासी स्वरूप के अलावा तीन पत्ती और लूडो जैसे खेल भी हैं जिनके प्रति आम लोग आसानी से आकर्षित हो जाते हैं। डिजिटल प्लेटफ़ार्म पर गेमिंग की आड़ में जुआ और सट्टा समाज के बहुत बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। चिंता की बात ये है कि इसके चक्रव्यूह में फंसकर  युवा और किशोर बड़ी संख्या में  मोटी  रकम गँवा चुके हैं। इसी वर्ग में आत्महत्या जैसी  घटनाएं हुईं। मध्यमवर्गीय घरेलू महिलाओं को भी इसका चस्का लगने की जानकारी आई है। जैसे ही संसद ने उक्त विधेयक पारित किया ऑन लाइन गेमिंग का कारोबार करने वाली बड़ी कंपनियां बोरिया - बिस्तर समेटने में लग गईं। जो जानकारियां मिल रही हैं उनके मुताबिक इन कंपनियों में अनेक अभिनेताओं और खिलाड़ियों ने भी अपना धन लगाया था। शायद इसीलिए वे बतौर ब्रांड एम्बेसेडर उनके विज्ञापनों में नजर आते रहे। नये कानून के अस्तित्व में आते ही ऑन लाइन गेमिंग का  व्यवसाय गैर कानूनी हो  गया, लेकिन जिन लोगों ने इसमें पैसा और परिवार गंवाया उनके पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



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