रिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का जोश विगत कुछ दिनों से ठण्डा पड़ता जा रहा है। 15 अगस्त को बातचीत हेतु रूसी राष्ट्रपति पुतिन द्वारा अलास्का आने की सहमति प्रदान करने पर ट्रम्प यह मुगालता पाल बैठे कि वे रूस और यूक्रेन के बीचयुद्ध रुकवाकर नोबल शांति पुरस्कार हेतु अपना दावा और पुख्ता कर लेंगे। हालांकि इस युद्ध की शुरुआत तो 2014 में रूस द्वारा यूक्रेन के क्रीमिया बंदरग़ाह पर जबरन कब्जे से हो गई थी किंतु फरवरी 2022 में यूक्रेन के दो प्रमुख प्रांतों पर दावा ठोंकने के बाद रूस ने बड़े पैमाने पर सैन्य कारवाई करते हुए उसके लगभग 20 फीसदी भूभाग पर आधिपत्य कायम कर लिया। ट्रम्प का दावा था वे दोनों देशों को जमीन की अदला - बदली करने के लिए राजी कर युद्ध रोकने के लिए तैयार कर लेंगे। वार्ता के पहले उनके कुछ बयानों से लगा कि वे पुतिन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में कामयाब हो जाएंगे। उन्होंने कूटनीतिक शिष्टाचार की उपेक्षा करते हुए ये धमकी तक दे डाली कि पुतिन नहीं माने तो वे भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ के फैसले को लागू कर देंगे। स्मरणीय है ट्रम्प ये दबाव बनाते आ रहे हैं कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दे । 2022 में रूस ने यूक्रेन पर जब हमला किया तब अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये ताकि उसका निर्यात रुक जाए किंतु पुतिन ने चीन और भारत को सस्ते दाम पर कच्चा तेल बेचना शुरू कर दिया। ट्रम्प का कहना है इससे मिलने वाले धन से ही रूस को युद्ध लम्बा खींचने में मदद मिली। चीन पर तो अमेरिका का बस चलता नहीं इसलिये उसने भारत को कमजोर समझकर दबाने का प्रयास किया। अलास्का वार्ता के पूर्व आया उनका ये बयान काफी चर्चित हुआ कि भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी के कारण ही पुतिन बातचीत के लिए राजी हुए। इन सब बातों से ऐसा लगने लगा कि पुतिन वाकई अमेरिका के दबाव में आकर युद्ध रोकने तैयार हो जाएंगे। लेकिन अलास्का वार्ता के पहले ही यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ये कहकर ट्रम्प को झटका दिया कि उनकी अनुपस्थिति में किया कोई फैसला उन्हें मंजूर नहीं। रूस के साथ जमीन की अदला - बदली के सुझाव को भी उन्होंने पूरे तौर पर खारिज कर दिया। लेकिन उनकी सबसे ज्यादा किरकिरी भारत ने कर दी। ट्रम्प ने अपने मन से ही ये कहना शुरू कर दिया कि अमेरिका के दबाव में भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया । लेकिन भारत ने खरीदी और बढ़ाने के साथ ही खुलकर कह दिया कि उसे जहाँ से सस्ता तेल मिलेगा वह खरीदना जारी रखेगा। ट्रम्प को और बड़ा झटका तब लगा जब रूस और चीन ने भारत के साथ व्यापार बढ़ाने के साथ ही अमेरिकी टैरिफ की आलोचना कर डाली। अलास्का वार्ता के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमले और तेज कर दिए । कुल मिलाकर इस युद्ध को रुकवाने का श्रेय लूटने के फेर में ट्रम्प अपनी भद्द पिटवा बैठे। न तो वे पुतिन को युद्ध रोकने मना सके और न ही जेलेंस्की पर ही उनका दबाव कारगर होता दिख रहा है। टैरिफ रूपी दाँव भी बेअसर हो चुका है। चीन के मामले में तो अमेरिका पहले ही ठंडा पड़ने लगा था किंतु भारत जिस दबंगी से टैरिफ वृद्धि के सामने अविचलित खड़ा रहा उसकी वजह से ट्रम्प की हेकड़ी निकल गई। रूस और चीन के अलावा दुनिया के अनेक देश भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते जोड़ने प्रयासरत हैं। चीन और रूस ने तो अपने बाजार भारतीय चीजों के लिए खोल दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी सप्ताह चीन यात्रा पर जा रहे हैं वहीं दिसंबर में पुतिन ने भारत आने की पुष्टि कर दी है। रक्षा उत्पादन का निर्यात तेजी से बढ़ने के साथ ही फ्रांस और रूस अपने सैन्य सामग्री के उत्पादन हेतु भारत में अपनी इकाइयाँ स्थापित करने तैयार हैं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि ट्रम्प के देश में ही अनेक आर्थिक विशेषज्ञ भारत पर लगाए जा रहे टैरिफ को अमेरिका के लिए आत्मघाती बता रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी पार्टी के कुछ नेता तक भारत के पक्ष में खड़े हो गए। शायद यही वजह है कि न तो आजकल ट्रम्प रूस - यूक्रेन युद्ध रुकवाने की डींग हाँक रहे हैं और न ही भारत को धमकाने की हिम्मत उनकी पड़ रही है। उल्टे उनकी बेवकूफियों के कारण भारत, रूस और चीन ने एकजुट होकर अमेरिका के विरुद्ध तगड़ी मोर्चेबंदी खड़ी कर दी। बीते कई दशकों बाद अमेरिका इस तरह अलग - थलग पड़ गया है। आर्थिक और सामरिक महाशक्ति होने का उसका घमंड इस बुरी तरह टूटेगा ये कोई सोच भी नहीं सकता था। ट्रम्प के दबाव का श्री मोदी ने जिस आत्मविश्वास के साथ प्रतिकार किया उससे चीन जैसा देश तक भारत के महत्व को स्वीकार करने बाध्य हो गया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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