Tuesday, 12 August 2025

आवारा पशु केवल दिल्ली नहीं पूरे देश की समस्या हैं


सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर आवारा कुत्तों को पकड़कर उनके लिए बनाये आश्रय स्थल पर रखने की व्यवस्था करे। इसमें  व्यवधान डालने वालों पर कड़ी कारवाई की जाएगी। अदालत की नाराजगी इस बात को लेकर है कि सार्वजनिक स्थलों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी लोगों की असुविधा के साथ ही सुरक्षा के लिए खतरा बनती है। उनके काटने से अनेक लोगों की मृत्यु भी हो चुकी है जिन्हें वापस नहीं लाया जा सकता। न्यायालय ने राजधानी के सभी स्थानीय निकायों को समन्वय बनाकर आवारा कुत्तों को पकड़ने  कहा है। उल्लेखनीय है दिल्ली में  6 लाख आवारा कुत्ते हैं। जिन्हें रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि उनकी नसबन्दी करें तो भी एक वर्ष में 75 फीसदी कुत्तों का ही बंध्याकरण संभव होगा। न्यायालय के फैसले को पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गाँधी ने अव्यावहारिक, महंगा और पर्यावरण के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि सरकर के पास न तो पर्याप्त आश्रय स्थल हैं और न ही नसबंदी के समुचित प्रबंध। पशुओं के संरक्षण हेतु सक्रिय मेनका के अनुसार  आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाये जाने के बाद बंदरों का आतंक शहरी इलाकों में बढ़ जाएगा।  मोटे अनुमान के अनुसार सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर कर आश्रय स्थल में रखे जाने के लिए दिल्ली सरकार पर सालाना 10 हजार करोड़ रु. का आर्थिक बोझ आएगा जिसकी व्यवस्था मुश्किल  है। और फिर ये समस्या चूंकि पूरे देश की है इसलिये सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले के परिप्रेक्ष्य में राज्यों के उच्च न्यायालय भी ऐसा ही आदेश पारित कर दें तब आवारा कुत्तों की व्यवस्था के लिए कितना खर्च आयेगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन ये भी देखना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय को आखिर इतना कड़ा फैसला लेना क्यों पड़ा? आवारा कुत्तों की समस्या केवल दिल्ली में नहीं बल्कि   देश के हर शहर, कस्बे और गाँव में है। अनेक राज्य जहाँ गोवंश के वध पर कानूनी रोक लगा दी गई वहाँ सड़कों पर मंडराती गायें यातायात को बाधित करने के साथ ही गंदगी फैलाती हैं। बीते कुछ वर्षों में राजमार्गों का जाल बिछ गया है। इन पर तेजगति से वाहन दौड़ते हैं। लेकिन गायों के झुंड  जगह - जगह बैठे होने से वाहन चालकों को भारी परेशानी होती है जिससे दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। गायों के अलावा इनमें मनुष्य भी मौत के शिकार होते हैं। इस समस्या का भी इलाज नहीं हो पा रहा। जहाँ तक बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली में आवारा कुत्तों को पकड़ने संबंधी आदेश की है तो  मेनका गाँधी ने उसके लागू होने में जो अड़चनें बताईं वे अपनी जगह वाजिब हैं किंतु स्वतः संज्ञान लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो आदेश दिया उसकी अंतर्निहित भावना को भी समझा जाना चाहिए क्योंकि केवल आवारा कुत्ते और गायें ही नहीं बल्कि बन्दर भी शहरी क्षेत्रों में लोगों की परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। इन्हें पकड़ने की सारी सरकारी व्यवस्थाएं विफल साबित हो चुकी हैं। बढ़ते नगरीय क्षेत्रों के कारण जंगल सिमटने से भी भोजन की तलाश में शहरों में बन्दरों की धमाचौकड़ी बढ़ती जा रही है। गाय - भैंस पालने वाले पहले अपने पशुओं को चरने शहर के बाहर के घास युक्त मैदानों में भेजते थे किंतु  वहाँ कांक्रीट के ढांचे खड़े होते जा रहे हैं। ऐसे में पर्यावरण और प्रदूषण की जिस समस्या से मनुष्यों को जूझना पड़ रहा है वह पशुओं के लिए भी उतनी ही तकलीफदेह है। कुल मिलाकर इस समस्या का हल कानून की सख्ती और प्रशासन की चुस्ती से तब तक नहीं हो सकता जब तक समाज इस बारे में स्वेच्छा से आगे न आये। गोवंश के वध पर रोक लगाए जाने के बाद राज्य सरकारें  गोशाला संचालकों को जो अनुदान देती है उतने में उनका भरण - पोषण संभव नहीं है। इसीलिए वहाँ उनकी दशा बेहद खराब हो जाती है और मरने की शिकायतें भी आम हैं। आवारा कुत्तों के अलावा पालतू कुत्तों के मालिक भी सुबह शाम उन्होंने घर के बाहर ले जाते हैं जहाँ वे मल - मूत्र त्यागकर गंदगी फैलाते हैं जबकि विकसित देशों में कुत्ते के मालिक को वह गंदगी साफ करनी होती है। ऐसे में जरूरी है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो आदेश दिल्ली के संदर्भ में दिया गया उस पर सभी राज्य सरकारों को विचार करना चाहिए क्योंकि आवारा पशुओं की समस्या राष्ट्रव्यापी हो चुकी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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