Friday, 8 August 2025

भारत की अगुआई में ब्रिक्स देशों की मोर्चेबंदी से डॉलर का दबदबा खतरे में


डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी इतिहास के सबसे असफल राष्ट्रपति साबित होने जा रहे हैं। दूसरी बार  चुनाव जीतने पर उन्हें ये गुमान हो गया मानों वे दुनिया के भाग्यविधाता बन गए हों। उन्होंने जिस तरह के तेवर दिखाना शुरू किये उनसे अन्य देश ही नहीं बल्कि पड़ोस के वे राष्ट्र भी चौंक गए जिनसे अमेरिका के रिश्ते बेहद करीबी रहे। यूरोप के तमाम देशों को भी उन्होंने दुत्कारना शुरू कर दिया जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही अमेरिकी कैम्प में रहे। सोवियत संघ के विघटन के बाद लगभग सभी यूरोपीय देश अमेरिका के प्रभावक्षेत्र में आ गए। अरब जगत में भी  कुछ कट्टरपंथी देशों के अलावा बाकी ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमेरिका के साथ दोस्ताना कायम कर लिया। यही हाल अफ्रीका और दक्षिण एशिया का भी कहा जा सकता है। ट्रम्प ने दूसरी बार सत्ता ग्रहण करने के बाद अपने मित्रों के साथ भी शत्रुओं जैसा व्यवहार शुरू कर दिया और इसके लिए व्यापार को हथियार बना लिया। मसलन जिन देशों से अमेरिका के व्यापारिक रिश्ते हैं उनसे आयात होने वाले सामान पर टैरिफ में कई गुना वृद्धि कर देना। कुछ देश टैरिफ रूपी आतंकवाद से डरकर उनके सामने नतमस्तक हो गए जिनको अमेरिका ने कुछ रियायतें देकर उपकृत किया। लेकिन चीन, भारत, ब्राज़ील, द. अफ्रीका सहित दर्जन भर देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए झुकने से इंकार कर दिया। तब ट्रम्प ने  अनाप - शनाप आयात शुल्क थोपकर उन्हें  दबाना चाहा। चीन ने जब अमेरिका की कमजोर नस पर हाथ रखा तो उस पर लादे गए टैरिफ कुछ घटा दिये गए ।  लेकिन उनकी सबसे ज्यादा नाराजगी भारत और ब्राजील पर  बरस रही है जिन्होंने  ट्रम्प को ये एहसास  करवा दिया कि आपसी व्यापार की जरूरत  अमेरिका को  भी उतनी ही है। इसलिये टैरिफ में  इकतरफा अनाप - शनाप वृद्धि अनुचित है। ट्रम्प को इस प्रतिक्रिया ने आगबबूला कर दिया और उन्होंने दोनों पर पहले 25 और फिर 50 फीसदी आयात शुल्क  लाद दिया। ब्राज़ील ने तो पहले दिन से ही ट्रम्प के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी थी किंतु अब भारत ने चार कदम आगे बढ़कर ट्रम्प की मनमानी को चुनौती दी डाली। किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों के विरुद्ध कोई समझौता नहीं करने का ऐलान करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन में शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में शामिल होने की घोषणा कर अमेरिका को चौंकाया और इसी बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को मॉस्को भेजकर  रूस के राष्ट्रपति पुतिन को भारत आने राजी कर लिया। उल्लेखनीय है ट्रम्प की भारत से नाराजगी का कारण रूस से कच्चा तेल और रक्षा उपकरण खरीदना है। उन्होंने रूस से व्यापारिक और सामरिक सौदे रोकने का दबाव बनाया किंतु भारत के इंकार से नाराज होकर टैरिफ की दरें 50 प्रतिशत तक  बढ़ा दीं। उन्हें  उम्मीद  थी कि भारत उनकी शर्तों को स्वीकार कर लेगा। लेकिन उसने रूस से खरीदी रोकने की बजाय अमेरिका से होने वाले रक्षा सौदों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया जो ट्रम्प के लिए यह किसी  तमाचे  से कम नहीं है। एयर इंडिया के स्वामित्व वाले टाटा समूह द्वारा अमेरिका से बोइंग यात्री विमानों का जो सौदा हुआ वह भी रद्द करने के संकेत दे दिये गए हैं। दूसरी तरफ रूस से रक्षा उपकरणों की खरीद और बढ़ाई जा रही है। इससे स्पष्ट हो गया कि श्री डोभाल की रूस यात्रा केवल ट्रम्प को चिढ़ाने के लिए न होकर कूटनीति और व्यापार का बेहतरीन मिश्रण थी।  पुतिन द्वारा जल्द ही भारत आने की सहमति भी ट्रम्प को ये एहसास करवाने की कोशिश है कि अमेरिकी चौधराहट के दिन लद गए हैं। श्री मोदी के चीन जाने के फैसले से अमेरिका की चिंता और बढ़ गई।  ट्रम्प की नींद ये सुनकर भी उड़ रही है कि ब्रिक्स देश डॉलर के मुकाबले  नई साझा मुद्रा प्रारंभ करने जा रहे हैं। इस संगठन से जुड़े ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और द. अफ्रीका विश्व की 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था संचालित करते हैं इसलिए यदि उन्होंने यूरो जैसी  मुद्रा प्रारम्भ की तो डॉलर का रौब - रुतबा खत्म होने को आ जायेगा। ट्रम्प के टैरिफ हमले से हलाकान गैर ब्रिक्स देश भी मौका मिलते ही डॉलर के चंगुल से निकलकर उस नई मुद्रा में लेनदेन करने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। इस प्रकार श्री मोदी ने राहुल गाँधी के उकसावे में आकर ट्रम्प के विरुद्घ एक शब्द कहे बिना उनकी हेकड़ी निकालने की जो रणनीति बनाई उसके कारण अब अनेक छोटे - छोटे देश तक ट्रम्प की धौंस का जवाब उन्हीं की शैली में देने का दुस्साहस कर रहे हैं। इस लिहाज से आने वाले कुछ महीनों के दौरान विश्व राजनीति में बड़ा उलट - पलट देखने मिलेगा। ब्रिक्स देशों की मोर्चेबन्दी में भारत की व्यूह रचना सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और नरेंद्र मोदी एक बार फिर विश्वस्तर पर सबसे कुशल राजनेता साबित होने जा रहे हैं। ट्रम्प द्वारा डाले जा रहे दबाव के जवाब में डॉलर की चमक और धमक कम कर देने का दाँव सोवियत संघ के बिखराव के बाद विश्व राजनीति की सबसे बड़ी घटना होगी जिसका सेहरा भी श्री मोदी के सिर बंधेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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