Thursday, 28 August 2025

ट्रम्प के घमंड का जवाब है भारत की स्वतंत्र विदेश नीति



बात सिर्फ रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने तक सीमित होती तब सोचा भी जा सकता था क्योंकि हर देश को अपने व्यापारिक हितों के मद्देनजर अपनी नीति बनाने का अधिकार है । लेकिन उसके लिए राजी नहीं होने पर डोनाल्ड ट्रम्प ने  50 फीसदी का जो टैरिफ भारत पर थोपा उसके पीछे केवल रूस से तेल खरीदी नहीं है। अन्यथा यूरोप के अन्य देश भी तो आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ  व्यापार कर रहे हैं। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तो इसकी जानकारी खुले आम देते हुए ट्रम्प के फैसले को औचित्यहीन बताया। साथ ही ये खुलासा भी किया कि भारत से ज्यादा तो रूसी तेल की खरीददारी चीन  करता है। अमेरिका के भीतर भी ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए अनाप - शनाप टैरिफ की सार्थकता पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कूटनीतिक माध्यमों से बातचीत जारी है किंतु 27 अगस्त से 50 फीसदी टैरिफ लागू करने का आदेश निकालकर ट्रम्प  अमेरिका का हाथ ऊपर रखने की रणनीति अपना रहे हैं। चूंकि अब तक भारत ने उनकी बेहूदी टिप्पणियों का जवाब देने की जरूरत नहीं समझी इसलिए वे और भन्नाए हुए हैं। जर्मनी के एक अखबार की मानें तो उन्होंने  चार बार फोन किये गए किंतु नरेंद्र मोदी ने बात नहीं की। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत पर दबाव डालकर युद्धविराम करवाने के उनके दावे का भी श्री जयशंकर ने स्पष्ट रूप से खंडन किया किंतु वे अभी भी झूठे बयान दे रहे हैं। इन सबसे लगता है ट्रम्प झूठ का पुलिंदा हैं  और अहंकार में पूरी तरह डूब चुके हैं। उनका टैरिफ दांव अमेरिका के सरकारी खजाने को भरने में तो फिलहाल सफल दिखाई दे रहा है किंतु  अमेरिका द्वारा आयात किये जाने वाले भारतीय सामान की कीमतों में आई उछाल से वहाँ मंहगाई भी बढ़ गई जिससे आम उपभोक्ता नाराज हैं। भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं का उपयोग भारतीय मूल के अप्रवासियों के अलावा अमेरिका में बसे  एशियाई देशों के लोगों द्वारा भी किया जाता है। कुछ चीजें तो अमेरिकी जनता को भी बेहद पसंद हैं। ऐसे में ट्रम्प  जिस भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बता चुके हैं उसमें तो जीएसटी की दरों में कमी के अलावा आम जनता के उपयोग की वस्तुओं पर टैक्स कम कर सरकार महंगाई घटाने जैसे कदम उठा रही है वहीं अपनी अमीरी पर ऐंठने वाले अमेरिका में  जनता पर मूल्य वृद्धि का बोझ महज इसलिए लादा जा रहा है क्यों कि भारत ने ट्रम्प के दबाव के समक्ष झुकने से इंकार कर दिया। प्रधानमंत्री श्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच दोस्ताना रिश्ते कूटनीतिक औपचरिकताओं से ऊपर उठ चुके थे। लेकिन दोबारा चुने जाने के बाद  ट्रम्प जिस तरह से  पाकिस्तान के करीब आने लगे वह निश्चित रूप से रहस्यमय है। भारत पर रूस से सम्बन्ध खत्म करने के लिए दबाव बना रहे ट्रम्प उस पाकिस्तान को गोद में बिठाने पर आमादा हैं जो चीन के चरणों में लोटपोट है। रूस के साथ भारत से ज्यादा मजबूत व्यापारिक रिश्ते चीन के हैं। लेकिन उसके बाद भी ट्रम्प चीन को छूने में घबराते हैं। ये  सब देखने के बाद ही लगता है कि ट्रम्प के मन में कुछ और पक रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सैन्य बलों के शानदार प्रदर्शन और सामरिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता अमेरिका के लिए चिंता का कारण बन गई है। ब्रिक्स जैसे संगठन में भारत की वजनदार उपस्थिति से भी अमेरिका डरा हुआ है। इसीलिए वह टैरिफ रूपी अस्त्र छोड़कर भारत को ब्लैकमेल कर अपनी कुछ शर्तें मनवाना चाहता है। मोदी सरकार ने विदेश नीति को  विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित कर बजाय किसी का पिछलग्गू बनने के  स्वतंत्र बना दिया। इसका लाभ ये हुआ कि फ्रांस, इजराइल, ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष श्री मोदी से फोन पर बात करने में नहीं डरते। चीन के विदेश मंत्री की हालिया नई दिल्ली यात्रा और प्रधानमंत्री की इसी सप्ताह होने वाली चीन यात्रा काफी कुछ कह रही है। अलास्का से लौटकर रूसी राष्ट्रपति पुतिन का श्री मोदी द्वारा फोन पर लंबी बातचीत भारत के कूटनीतिक महत्व का प्रमाण है। इससे भी बड़ी बात ये हुई कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने श्री मोदी से बात कर भारत आने की मंशा  जताई। जाहिर है ट्रम्प ये सब पचा नहीं पा रहे। टैरिफ  बढ़े हुए दो दिन होने के बाद भी भारत द्वारा दिखाई जा रही बेफिक्री अमेरिका के घमण्ड का जवाब है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

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