श में आज जो माहौल है उसमें उपराष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध होने की उम्मीद करना अर्थहीन था। इसलिये भाजपा द्वारा महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. पी . राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर विपक्ष से उनका समर्थन करने का अनुरोध महज रस्म अदायगी ही थी। जगदीप धनखड़ और सत्यपाल मलिक से मिले कड़वे अनुभव के बाद भाजपा ने बाहर से आये नेताओं को जरूरत से ज्यादा महत्व न दिये जाने की नीति बनाई । इसीलिए श्री राधाकृष्णन के परिचय में रास्वसंघ से उनके जुड़ाव को प्रचारित किया गया। उसके बाद तो विपक्ष से समर्थन मिलने की गुंजाइश ही नहीं थी। लेकिन तमिलनाडु में जहाँ भाजपा अभी तक अपने पाँव जमाने में लगी है वहाँ का प्रत्याशी उतारने को आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा गया। ऐसे में दक्षिण भारत के ही किसी चेहरे को सामने लाना विपक्ष की मजबूरी थी । इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को श्री राधाकृष्णन के मुकाबले उतारा गया जो मूलतः तेलंगाना के हैं। हालांकि उनका नाम सामने आने के बाद ये अटकलें भी लगने लगीं कि चंद्राबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी तेलुगु भाषी होने के नाते उनका समर्थन करने बाध्य होंगे। लेकिन वे दोनों पहले ही श्री राधाकृष्णन के समर्थन का ऐलान कर चुके थे। ऐसे में विपक्ष द्वारा भाजपा के दक्षिण कार्ड को बेअसर करने का दाँव चल तो दिया गया किंतु उसी के साथ उठ खड़े हुए विवादों से श्री रेड्डी सहित इंडिया गठबंधन भी कठघरे में खड़ा हो गया। सबसे पहले तो न्यायपालिका से जुड़ी हस्तियों के सेवा निवृत्ति के बाद भाजपा से जुड़ने पर विपक्ष हमेशा से हल्ला मचाता रहा है। हालाँकि श्री रेड्डी 2011 में सर्वोच्च न्यायालय से सेवा निवृत्ति के बाद किसी राजनीतिक दल में नहीं आए किंतु तेलंगाना की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने उन्हें जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले पैनल का अध्यक्ष बनाकर उनसे अपनी निकटता उजागर कर दी। वैसे भी लोकतंत्र में चुनाव लड़ने वाले किसी भी व्यक्ति की कर्मपत्री खुलना अत्यन्त ही स्वाभाविक होता है। और इसीलिये श्री रेड्डी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में दिये गए कुछ विवादास्पद फैसले सुर्खियों में आ गए। इनमें सबसे प्रमुख सलवा जुडूम को असंवैधानिक घोषित करना था जो छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा माओवादी विद्रोहियों से लड़ने के लिए आदिवासी युवाओं को हथियारबंद करने की नीति थी। इसी तरह भोपाल गैस त्रासदी के मामले में दिये उनके फैसले पर आरोप लगे कि उससे मुख्य अभियुक्त वॉरेन एंडरसन को बचने में मदद मिली। इसके अलावा इजरायल को भारतीय हथियारों के निर्यात के खिलाफ दायर याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले 25 नागरिकों में भी वे शामिल थे। इन सबसे इतना तो स्पष्ट है ही कि वे वामपंथी रुझान वाले हैं , वरना सलवा जुडूम जैसी पहल को रद्द करने का और कोई कारण नहीं था। यूनियन कार्बाइड वाले मामले को दोबारा खोलने से इंकार करने वाला उनका निर्णय भी विवादग्रस्त हुआ। इजरायल को हथियार देने का विरोध करने वाले किस मानसिकता के होंगे ये बताने की जरूरत नहीं है। हालाँकि श्री रेड्डी के चुने जाने की उम्मीद तो खुद उन्हें ही नहीं होगी किंतु बतौर न्यायाधीश दिये गये उनके उक्त फैसलों से इतना तो स्पष्ट है कि वे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी हैं वरना माओवादियों से लड़ने के लिए छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को शस्त्रों से लैस करने की नीति को असंवैधानिक न बताते। इसी तरह भारत के भरोसेमंद मित्र इजरायल को हथियार देने का विरोध करने वाले समूह में शामिल होकर श्री रेड्डी ये जता चुके हैं कि वे तुष्टीकरण वाली मंडली से जुड़े हुए हैं। ऐसा लगता है विपक्ष के पास कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं था उपराष्ट्रपति पद हेतु लड़ाने के लिए । इसीलिये श्री रेड्डी को बलि का बकरा बनाया गया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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