Monday, 25 August 2025

ट्रम्प जो गड्ढा खोद रहे हैं उसी में उनका गिरना तय


 
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पूरी तरह से भारत विरोधी रुख अख्तियार कर लिया है। जिन सर्जिया गोर को भारत में अपना  राजदूत नियुक्त किया गया वे राजनयिक अनुभव शून्य हैं। भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में राजनयिक अनुभव शून्य राजदूत भेजना  दर्शाता है कि ट्रम्प का व्यवहार बेहद उपेक्षापूर्ण है। भारत  ने भी  जैसे को तैसा की नीति अपना ली है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्रम्प से बात नहीं की। और कैनेडा की यात्रा के बाद उनके आमंत्रण पर वॉशिंगटन जाने में भी असमर्थता व्यक्त कर दी।  ट्रम्प को ये तौहीन बर्दाश्त नहीं हुई और उसके बाद उनका रवैया शत्रुतापूर्ण होने लगा। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध रोक पाने में असफलता हाथ लगने से उनका हौसला पस्त है। रूस और चीन दोनों  जिस तरह खुलकर भारत के पक्ष में खड़े हो गए उससे भी वे भन्नाये हुए हैं। उनको  उम्मीद थी कि  50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की उनकी धमकी के बाद भारत  हाथ जोड़कर गिड़गिड़ायेगा और रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना  बंद कर  देगा। लेकिन मोदी सरकार ने ट्रम्प के दबाव को पूरी तरह नजरंदाज करते हुए रूस से तेल के साथ ही रक्षा सामग्री के नये सौदे कर डाले। अमेरिका का भारत के इस व्यवहार से परेशान होना स्वाभविक था। बीते कुछ दिनों में वैश्विक परिस्थितियाँ जिस तरह बदलीं उनसे ट्रम्प की वजनदारी में गिरावट आई। ये कहना गलत न होगा कि अमेरिका के कमजोर माने गए राष्ट्रपतियों की भी इतनी जगहंसाई नहीं हुई जितनी ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ही करवा ली। इसका सबसे बड़ा कारण उनका भारत जैसे भरोसेमंद देश के साथ किया गया घटिया व्यवहार है। पाकिस्तान सरीखे धोखेबाज को जिसने न्यूयॉर्क में 9/11 की आतँकवादी घटना के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को छिपाकर रखा, गोद में बिठाने की जो हिमाकत ट्रम्प ने की उसके बाद उनके प्रति भारत का कठोर होना स्वाभाविक ही है। प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने परिपक्व कूटनीति का परिचय देते हुए ट्रम्प की बेहूदी टिप्पणियों और धमकियों की उपेक्षा करते हुए ठोस रणनीति बनाते हुए विभिन्न देशों के साथ व्यापार के दरवाजे खोल दिये। सबसे बड़ी बात ये देखने मिली कि रूस और चीन ने भी भारत को अपने बाजार उपलब्ध करवाने की पेशकश कर दी। यही वजह है कि 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने के दो दिन पहले देश में कोई घबराहट नहीं है। इसका  प्रमाण आज सप्ताह के पहले दिन शेयर बाजार के उछाल मारने से मिला। भारत के तमाम उद्योगपतियों ने भी जिस हिम्मत के साथ  अमेरिकी दबाव में नहीं आने की नीति का समर्थन करते हुए निर्यात से होने वाले नुकसान की चिंता को हवा में उड़ा दिया वह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब प्रतिकूल हालातों में मजबूती से खड़े रहने की क्षमता अर्जित कर चुका है। ऐसी स्थितियों में जनता का समर्थन  सरकार के लिए बेहद जरूरी होता है। उस दृष्टि से भारत के आम नागरिक ने भी अपने  बुलंद हौसलों का परिचय देकर पूरी दुनिया को ये संदेश दे दिया कि केवल युद्ध ही नहीं वरन देश की प्रतिष्ठा पर आये किसी भी संकट का सामना करने पूरा देश एकजुट है। 50 फीसदी टैरिफ लागू होने में मात्र दो दिन शेष हैं। लेकिन न सरकार चिंतित है और न ही उद्योग - व्यापार जगत में लेश मात्र भी घबराहट दिख रही है। आपदा में अवसर उत्पन्न करने का जो आह्वान कोविड काल में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने किया वह इस संकट के दौरान भी पूरी तरह फलीभूत होता प्रतीत हो रहा है। ट्रम्प के मूर्खतापूर्ण फैसलों से  दुनिया भर में अस्थिरता फैल गई है।  विश्व व्यापार संगठन के तहत हुए समझौते रद्दी की टोकरी में फेंककर ट्रम्प ने जो दुस्साहस किया वह उन्हीं के गले की फांस बन गया है। यूरोप के बड़े - बड़े देशों को घुटनाटेक करवाने के बाद ट्रम्प का दिमाग सातवें आसमान पर था किंतु भारत ने उनकी ऐंठ की कोई परवाह नहीं की और अमेरिका के साथ रक्षा और उड्डयन के तमाम बड़े सौदे ठंडे बस्ते में डालकर दिखला दिया कि उसका काम अमेरिका के बिना भी चल सकता है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ट्रम्प अपनी हरकतों से बाज आ जाएंगे। सर्वशक्तिमान होने का जो दंभ उनमें भरा है उसके कारण बौखलाहट में वे और भी ऊलजलूल  हरकतें करते रहेंगे। लेकिन भारत ने जिस धैर्य और रणनीतिक चातुर्य का परिचय अब तक दिया वही आगे भी जारी रखना चाहिए क्योंकि ट्रम्प दूसरों के लिए जो गड्ढा खोद रहे हैं उसमें उनका गिरना तय है। अमेरिका में ही उनके विरुद्ध माहौल तैयार होने लगा है। बड़ी बात नहीं वे अपना कार्यकाल भी पूरा न कर पाएं।


-रवीन्द्र वाजपेयी

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