Wednesday, 13 August 2025

पुतिन कोई जेलेंस्की नहीं जिन्हें ट्रम्प दबा सकें



सारी दुनिया की निगाहें दो दिन बाद अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प और व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली शिखर वार्ता पर लगी हुई हैं जिसका मकसद रूस और यूक्रेन के बीच 2022 से  चल रहे युद्ध को बंद करवाना है। हालांकि इस युद्ध की शुरुआत तो 2014 से मानी जाती है जब रूस ने यूक्रेन के महत्वपूर्ण बंदरगाह क्रीमिया पर जबरन कब्जा कर लिया जो व्यापारिक और रणनीतिक दृष्टि से  उसके लिए उपयोगी है किंतु 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला करते हुए उसके बड़े इलाके कब्जा लिए। आज की स्थिति में उसके 20 प्रतिशत भूभाग पर वह काबिज है। यूरोप को गैस आपूर्ति हेतु डाली गई पाइप लाइन का  किराया और  बंदरगाहों के उपयोग सहित अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन रूस की मर्जी से चले। लेकिन जब जेलेंस्की सत्ता में आये तब उन्होंने  अमेरिका के संरक्षण वाले नाटो से जुड़ने का निर्णय लिया। जो उनकी मुसीबत का कारण बन गया। पुतिन को ये कतई मंजूर नहीं है कि अमेरिका और उसके समर्थक देशों की सेनाओं की उपस्थिति उसकी सीमाओं के नजदीक हो। इसलिये नाटो की सदस्यता मिलने के पहले ही रूस द्वारा हमला शुरू कर दिये जाने से अन्य देशों की सेनाएं  मदद हेतु तो नहीं आ सकीं किंतु अमेरिका और लगभग सभी प्रमुख यूरोपीय देशों ने धन और युद्ध सामग्री द्वारा  यूक्रेन को जमकर सहायता देने के साथ ही रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। यद्यपि पुतिन लगातार आक्रमण करते आ रहे हैं लेकिन  बाहर से मिल रहे  साजो - सामान और आर्थिक मदद के बल पर बर्बादी के कगार पर पहुंचकर भी यूक्रेन लड़ाई में बना  हुआ  है । जंग  लम्बे समय तक जारी रहने पर ये आशंका व्यक्त की जाने लगी कि  रूस भी यूक्रेन में वैसे ही उलझकर रह गया  जैसे साठ के दशक में अमेरिका वियतनाम में फंस गया था। लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों के जरिये रूस को अलग - थलग करने की अमेरिकी रणनीति शुरुआत में तो असर दिखाती दिखी किंतु जल्द ही उसका विपरीत प्रभाव होने से  पूरे यूरोप में गैस और अनाज का संकट छा गया। दूसरी तरफ रूस ने चीन और भारत  के रूप में दो बड़े ग्राहकों की मदद से अपना व्यापार बचाए रखा और लड़ाई को लंबा खींचते हुए अमेरिका को ही ऐसे जाल में फंसा दिया जिससे निकलने के लिए ट्रम्प छटपटा रहे हैं। जनवरी में पदभार संभालने के बाद वे पुतिन से दोस्ती का गाना गाते रहे और जेलेंस्की को वाशिंगटन बुलाकर युद्ध रोकने का दबाव बनाया। लेकिन नहीं मानने पर उन्हें बुरी तरह अपमानित करते हुए बाहर निकल जाने कहा। उसके बाद से अमेरिका इस लड़ाई से खुद को दूर करने में जुट गया जिससे यूरोपीय देश भी नाराज हो उठे क्योंकि इकतरफा युद्धविराम पुतिन की विस्तारवादी सोच को बढ़ावा देगा जो पड़ोसी देशों की जमीन हथियाने का इरादा जता चुके हैं। इस बीच अपने व्यापार घाटे की पूर्ति के लिए ट्रम्प ने अनेक देशों पर अनाप - शनाप टैरिफ थोपना शुरू कर दिया जिनमें चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका भी हैं जो रूस के साथ ब्रिक्स नामक संगठन के सदस्य हैं। इन सभी ने मिलकर अमेरिका के विरुद्ध जो मोर्चेबंदी की उससे ट्रम्प भी भीतर तक हिल गए। अमेरिका के अंदरूनी हालात दिन ब दिन खराब हो रहे हैं। ट्रम्प का विरोध बढ़ता जा रहा है। उनकी टैरिफ नीति को अर्थशास्त्रियों द्वारा विनाशकारी बताया जाने लगा है। यूरोप भी उसकी छाया से निकलने छटपटा रहा है। ये सब देखते हुए ट्रम्प ने पुतिन से मिलकर शांतिदूत बनने का दाँव चला। वैसे भी उन पर शांति का नोबल पुरस्कार हासिल करने का भूत सवार है परंतु पुतिन उनकी तुलना में ज्यादा गंभीर और ठोस इरादे वाले हैं। उनकी शर्त है यूक्रेन के जिन प्रांतों पर रूस का कब्जा है वे उसे मिल जाएं । उल्लेखनीय है इन क्षेत्रों में अपार खनिज संपदा है जिस पर अमेरिका की लार भी टपक रही है । दूसरी शर्त यूक्रेन को नाटो में शामिल होने का इरादा त्यागने की है। इनके अतिरिक्त भी अन्य बातें हैं लेकिन रूस यूरोप तक अपने व्यापार की पहुँच आसान बनाने हेतु यूक्रेन से हर तरह की छूट चाहेगा। उधर जेलेंस्की का कहना है कि यूक्रेन के भविष्य का फैसला करने वाली बैठक में उनको नहीं बुलाना आपत्तिजनक है।  ऐसे में यदि ट्रम्प वाहवाही लूटने के लिए पुतिन की शर्तों पर युद्ध रुकवाने तैयार होते हैं तब यूक्रेन ही नहीं बल्कि यूरोप भी इसे स्वीकार करेगा इसमें संदेह है। कुल मिलाकर दुनिया भर में निंदा और उपहास का पात्र बन चुके ट्रम्प अपनी स्थिति सुधारने के लिए पुतिन से मिलने जा रहे हैं किंतु इस मुलाकात से ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए क्योंकि पुतिन कोई जेलेंस्की नहीं जिन्हें वे  दबा सकें। उनके साथ ब्रिक्स देश मुस्तैदी से खड़े हैं जबकि ट्रम्प का साथ  अमेरिका के परंपरागत साथी देश तक छोड़ते जा रहे हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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