शरद पवार देश के सबसे वरिष्ट राजनेता हैं। कांग्रेस से अपना सफर प्रारंभ करने के बाद अपने गुरु वसंत दादा पाटिल की सरकार गिराकर वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। सत्ता के लिए उन्होंने कब किसका साथ पकड़ा और किसका छोड़ा इस पर किताबें लिखी जा सकती है। कांग्रेस में दोबारा लौटने के बाद श्री पवार ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा करते हुए राकांपा (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) बना डाली। लेकिन कुछ वर्षों बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन कर उसी गाँधी परिवार के सलाहकार बन बैठे जिसकी गाड़ी को पटरी से उतारने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वर्तमान में वे विपक्षी गठबंधन इंडिया के दिग्गजों में हैं। शिवसेना को कांग्रेस की गोद में बिठाने जैसा असंभव कार्य उन्हीं के कारण संभव हो सका। हालांकि इसमें उनकी पार्टी भी टूटी और शिवसेना भी दोफाड़ हो गई जिसके कारण महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिलने से भाजपा और शिवसेना ( शिंदे) सरकार पर खतरा मंडराने लगा और विधानसभा चुनाव में अघाढ़ी की वापसी की अटकलें लगने लगीं। लोकसभा चुनाव के बाद वैसे भी विपक्ष का हौसला काफी मजबूत था। लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा ने अपनी सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) और राकांपा ( अजीत) के साथ मिलकर विपक्ष को चारों खाने चित्त कर दिया। हालांकि हरियाणा में भी भाजपा तीसरी बार सरकार बनाकर लोकसभा चुनाव के झटके से उबर चुकी थी किंतु महाराष्ट्र की हार राहुल गाँधी हजम नहीं कर सके जिसके कारण इंडिया गठबंधन की अन्य पार्टियों में कांग्रेस से दूरी बनाने की भावना जाग उठी। इसका प्रमाण दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखने मिला जब सपा और तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए आम आदमी पार्टी के पक्ष में प्रचार किया। हालांकि विपक्षी एकता का गुब्बारा हरियाणा चुनाव में ही फुट चुका था किंतु दिल्ली में बिखराव खुलकर सामने आ गया। यहाँ भी हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे दोहराए गए। इसी के बाद से श्री गाँधी ने चुनाव आयोग को निशाना बनाना शुरू किया। लेकिन विगत दिवस शरद पवार ने भी ये कहते हुए धमाका किया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के पूर्व दो व्यक्तियों ने उन्हें 160 सीटें जिताने की गारंटी दी जिन्हें वे राहुल के पास ले गए जिन्होंने ऐसे लोगों से बचने की सलाह दी इसलिये उनके नाम और संपर्क सूत्र उनके पास नहीं है। एक साल बाद इतनी महत्वपूर्ण बात को उजागर करने के पीछे उनका मकसद चुनावों में धांधली के आरोप का समर्थन करना ही है। लेकिन कहावत है होशियार कौआ भी कभी - कभी गलत जगह बैठ जाता है।और श्री पवार भी वही कर बैठे। उन जैसे अनुभवी नेता द्वारा उन दोनों व्यक्तियों को श्री गाँधी से मिलवाने से ये तो साबित हो ही गया कि वे लालच में आ गए थे, वरना दोनों को पुलिस के हवाले कर देते। उनके नाम और संपर्क सूत्र पता न होने की बात श्री पवार को संदेह के घेरे में खड़ा करती है। उससे भी बड़ा आश्चर्य है कि श्री गाँधी ने भी इतनी बड़ी बात को छिपाये रखा। श्री पवार कोई ऐरे - गैरे व्यक्ति नहीं हैं। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिये कि वे उन अनजान व्यक्तियों को श्री गाँधी के पास क्या सोचकर ले गए थे? इसी तरह की जवाबदेही श्री गाँधी की भी बनती है क्योंकि भले ही उन्होंने उन व्यक्तियों के प्रस्ताव में रुचि नहीं ली हो किंतु उनको सीधे - सीधे चले जाने देना भी कई आशंकाओं को जन्म देता है। पवार साहब ने इतनी गम्भीर बात तब क्यों नहीं उजागर की और एक साल बाद उन्हें ऐसा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई ये पड़ताल का विषय है। चुनाव धांधली पर आसमान सिर पर उठाये घूमने वाले राहुल के लिए भी नई मुसीबत खड़ी हो गई। यदि वे उस मुलाकात का खंडन करते हैं तो श्री पवार झूठे कहलाएंगे और स्वीकार करने पर चुनावी धांधली करने वालों की पहिचान छिपाने के कसूरवार होंगे। इस प्रकार श्री पवार के खुलासे ने श्री गाँधी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिसमें न उगलते बनेगा और न निगलते।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment