पहाड़ों की चोटी तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक धार्मिक स्थल पहाड़ों में स्थित होने से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। गर्मियों में पहाड़ों पर बसे हिल स्टेशनों में मैदानी इलाकों के सैलानियों की भीड़ उमड़ती है। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में भी पहाड़ों का आकर्षण है। कोलाहल रहित पहाड़ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होते हैं। एक समय था जब ऋषि - मुनि वहाँ तपस्या करते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी उनमें भरे थे। हिमालय से सदा नीरा बड़ी - बड़ी नदियां निकलती हैं। श्रीनगर में मुगल बादशाहों द्वारा विकसित उद्यान पर्यटकों से भरे रहते हैं। लद्दाख और अरुणाचल के भव्य बौद्ध मठ भी पर्वतों के धार्मिक महत्व को साबित करते हैं। ब्रिटिश राज में हिल स्टेशन के रूप में पर्वतीय क्षेत्रों का विकास होने पर सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला तो अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। हालांकि आजादी के बाद भी तीर्थस्थलों के अलावा अन्य पर्वतीय स्थानों का विकास हुआ। बीते कुछ दशकों में मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से इनमें बेतहाशा भीड़ होने लगी है। सड़कों और पुलों आदि के निर्माण हेतु वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के बहाव को मोड़न सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देना जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास और आमोद - प्रमोद हेतु किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों को उपेक्षित किया । यही कारण है कि उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती है वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को हुए नुकसान की वजह से प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं। समूचे हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन, बादल फटने और ग्लेशियरों के टूटने से आये सैलाब की ताजा घटनाओं के लिए पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ ही जिम्मेदार है । जहां कुछ दिनों के भीतर ही सैकड़ों लोग जान गंवा बैठे और अनेक मानवीय बस्तियाँ क्षण भर में जल प्रलय का शिकार होकर अस्तित्वहीन हो गईं। यद्यपि अति वृष्टि को भी इसका कारण माना जा रहा है। लेकिन सही बात ये है कि पहाड़ों को भीतर से कमजोर कर दिए जाने के कारण ही वे अति वृष्टि अथवा भूकंप के मामूली झटके झेलने में असमर्थ होते जा रहे हैं। ये देखते हुए हिमालय पर्वत श्रंखला के विभिन्न क्षेत्रों में आये संकट को तात्कालिक कारणों से जोड़ना सच्चाई से मुँह चुराने जैसा होगा उत्तराखंड में चार धाम यात्रा मार्ग में जिस तरह रुकावट आ रही हैं वे इस बात को इंगित करती हैं कि पहाड़ पर मानवीय गतिविधियों को कम किया जाना चाहिए। वाहनों की आवाजाही के लिए बनाई गई बारहमासी सड़कें भी भूस्खलन के कारण बार - बार अवरुद्ध हो जाती हैं। इन्हें बनाने में भले ही कितनी भी तकनीकी कुशलता दिखाई गई किंतु ये भूल जाना निरी मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है। कुछ वर्ष पहले अमरनाथ में अचानक जल सैलाब आया था। केदारनाथ की त्रासदी के घाव तो अब तक ताजा हैं। दुख इस बात का है कि हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण सुरक्षा की बातें तो होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। हम अपने आनंद के लिए गैर जिम्मेदाराना आचरण से उन्हें दुखी कर आते हैं। इसी कारण उनकी सहनशक्ति जवाब देने लगी है। कभी - कभी तो लगता है कोरोना काल के दौरान देश भर में लगाए गए लॉक डाउन की तरह साल में कुछ समय तक वहां आवाजाही पर नियंत्रण लगाया जावे। उत्तराखंड में स्थित तीर्थस्थलों के साथ हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के पर्यटन स्थलों में भी तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या सीमित करना जरूरी है। लद्दाख में बीते कुछ दशकों के भीतर जिस तरह से पर्यटकों की भीड़ उमड़ने लगी है। लेह से आगे नुब्रा घाटी जैसे इलाकों तक सैलानी जाने लगे हैं उसकी वजह से वहां के जिम्मेदार लोग चिंतित हैं। उत्तराखंड की स्थिति तो ये है कि पहाड़ों के बदलते मौसम और बिगड़ते मिजाज के चलते बड़ी संख्या में गांव खाली होते जा रहे हैं। स्थिति और न बिगड़े इस हेतु गंभीर चिंतन आवश्यक है। बेहतर हो बिना समय गंवाए पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना भविष्य में होने वाली तबाही की कल्पना ही भयभीत कर देती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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