Monday, 4 August 2025

हर अस्पताल में जेनेरिक दवाओं के जन औषधि केंद्र खोलना अनिवार्य हो


केन्द्र सरकार ने गत दिवस कुछ दवाइयों के दामों में 10 से 15 प्रतिशत कमी का निर्णय लिया। इनमें मधुमेह, हृदय, दर्द निवारक तथा बुखार की दवाइयाँ शामिल हैं। ये निर्णय निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है।लेकिन अधिकांश चिकित्सकों द्वारा ब्रांडेड दवाइयाँ लिखे जाने के कारण मरीजों पर अनाप - शनाप बोझ पड़ता है।  कानूनन, डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने का आदेश है। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) दोनों ने डॉक्टरों से जेनेरिक दवाएं लिखने को कहा है, और ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान है जिसके अंतर्गत उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। दरअसल जेनेरिक दवाएं, कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं क्योंकि जिन दवाओं पर  पेटेंट खत्म हो जाता है उसका उत्पादन कोई भी कर सकता है। ऐसे में उसे पेटेंट के नाम पर दी जाने वाली राशि से मुक्ति मिल जाती है।जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा को अधिक किफायती, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त  बनाना है। इसीलिए नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद देश भर में जन औषधि केंद्र खोलने की शुरुआत हुई जिनमें मिलने वाली जेनेरिक दवाइयों की कीमत ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 75 से 90 प्रतिशत तक सस्ती होने से उपभोक्ता को अकल्पनीय  बचत होती है। जो लोग उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय और अन्य बीमारियों की दवाइयाँ नियमित लेते हैं उनका मासिक खर्च जन औषधि केंद्र से खरीदी जाने वाली जेनेरिक दवाओं से एक चौथाई रह जाता है। इसीलिए केंद्र सरकार समूचे देश में जन औषधि केंद्र खोलने के कार्यक्रम को आगे बढ़ा रही है जिसके अंतर्गत मार्च 2026  तक इनकी संख्या 25 हजार करने का लक्ष्य है। मोटे - मोटे आंकड़ों के अनुसार जन औषधि केंद्र से दवा खरीदने पर अब तक 25 हजार करोड़ से अधिक की बचत हुई। लेकिन 140 करोड़ की आबादी वाले देश में 25 हजार दुकानें ऊँट के मुँह में जीरा समान हैं। इस बारे में एक बात बिल्कुल साफ है कि चिकित्सा का पेशा  विशुद्ध व्यवसाय बन चुका है। दवा निर्माता कंपनियां, चिकित्सक और अस्पताल रूपी गठजोड़ मरीजों की जेब काटने में जुटा है। अस्पतालों में संचालित दवा दुकानें एम.आर.पी पर बिक्री करती हैं। सर्जिकल सामान में होने वाली लूटमार की तो कोई सीमा नहीं। ग्लूकोज की बोतल के थोक और फुटकर दाम में जमीन - आसमान का अंतर है। दवा कंपनियों  द्वारा चिकित्सकों को बिक्री के लक्ष्य दिये जाते हैं जिन्हें पूरा करने पर उनको विदेश यात्रा के अलावा तरह - तरह से उपकृत किया जाता है। सरकार द्वारा इस पर रोक लगाए जाने के बाद भी कमीशनखोरी का धंधा बेधड़क जारी है। जन औषधि केंद्र जनता को इस लुटाई से बचा सकते हैं । लेकिन एक तो जेनेरिक दवाओं के ये बिक्री केंद्र काफी कम हैं दूसरे जेनेरिक दवाओं के कम असरकारी होने को लेकर चिकित्सा जगत द्वारा भ्रम फैलाया जाता है। जबकि उनका उपयोग करने वालों को  स्वास्थ्य और आर्थिक दोनों लाभ हो रहे हैं। ये देखते हुए केंद्र और राज्य दोनों को चाहिये कि जन औषधि केंद्रों का समुचित प्रचार कर लोगों को आश्वस्त करें जेनेरिक दवाएं सस्ती होने पर भी ब्रांडेड दवाइयों की तरह ही असर करती हैं। इसके अलावा प्रत्येक अस्पताल में अनिवार्य रूप से जन औषधि केंद्र खोलकर मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाइयाँ उपलब्ध करवाने जैसे कदम भी उठाये जाने जरूरी हैं। मोदी सरकार ने आयुष्मान भारत योजना के जरिये गरीबों और 70 वर्ष से ऊपर के सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख रु. तक के इलाज की सुविधा देकर जन स्वास्थ्य की दिशा में जो क्रांतिकारी कदम उठाया उसका लाभ करोड़ों लोगों को मिल रहा है । लेकिन जो लोग इस योजना के दायरे में नहीं आते उन्हें जन औषधि केंद्र बड़ी राहत दे सकते हैं। इसलिए इस दिशा में युद्धस्तरीय प्रयास किये जाने चाहिए हैं क्योंकि चिकित्सा सुलभ होने के साथ ही सस्ती होना भी जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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