संसद के मानसून सत्र का आज अंतिम दिन है। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने भोजनावकाश के पूर्व ही सत्रावसान की घोषणा कर दी। राज्यसभा की कारवाई भी विपक्ष द्वारा हंगामे के बाद दोपहर तक स्थगित कर दी गई । जैसा सदन का माहौल है उसे देखते हुए उसका पूरे दिन चलना मुश्किल है। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र समाप्ति की घोषणा करने से पहले बताया कि एक माह चले इस सत्र में महज 37 घंटे सदन का कामकाज हुआ जबकि अधिकांश समय होहल्ले में बर्बाद हो गया। हालांकि इस दौरान सरकार ने कई विधेयक पारित करवा लिए। वहीं कुछ संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिये जिसकी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र में आने के बाद आगे की कार्रवाई होगी। इस सत्र के प्रारंभ में ही जगदीप धनखड़ द्वारा उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दिये जाने से राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण हो गया। साथ ही दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग से शुरु विवाद चुनाव आय़ोग के विरुद्ध विपक्ष के अभियान पर केंद्रित हो गया । गत दिवस गृह मंत्री अमित शाह द्वारा प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की गिरफ्तारी के एक माह बाद उन्हें पद से हटाये जाने संबंधी विधेयक पेश किये जाते समय भी अप्रिय स्थिति बनी। कुल मिलाकर इस सत्र में भी जनता के धन की बर्बादी उसी के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों द्वारा बेरहमी से की गई। विपक्ष इसके लिए सरकार को दोषी बताएगा वहीं सत्ता पक्ष पूरा ठीकरा विपक्ष पर फोड़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन जनता के पास ऐसी कोई ताकत नहीं है जिसके जरिये वह सदन को बाधित करने वाले अपने सांसद को दंडित और प्रताड़ित कर सके। यही कारण है कि मुफ्त के टिकिट पर हवाई और रेल यात्रा करते हुए दिल्ली जाकर संसद की बैठक में हंगामा करने वाले सांसद सीना तान कर घूमते हैं। वैसे भी यदि कोई सांसद एक मिनिट के लिए भी सदन में प्रवेश करता है तो उसको पूरे दिन का बैठक भत्ता मिल जाता है। यही कारण है कि सदन में सामान्य तौर पर बहुत कम उपस्थिति रहती है। कुछ विशेष अवसरों को छोड़ दें तो ऐसा लगता है कि सांसद गण सदन में चेहरा दिखाने आते हैं। इस सत्र में विपक्ष ने ज्यादातर मुद्दे ऐसे उठाये जिनके बारे में उसे एहसास था कि उन पर चर्चा होना संभव ही नहीं है। जब मंजूरी नहीं मिली तब होहल्ला कर सदन को चलने से रोका जाता रहा। ऐसा करने से उसे कोई लाभ होता हो ऐसा भी नहीं है। विपक्ष को ये समझना चाहिए कि सरकार के पास तो अपनी बात रखने के अनेक साधन हैं । कुछ बड़े नेताओं को भी समाचार माध्यमों में महत्व मिल जाता है लेकिन साधारण सदस्य के लिए संसद ही वह मंच है जिससे वह अपनी बात पूरे देश के सामने रख सकता है। उस दृष्टि से विपक्ष के जिन नेताओं ने हंगामा करते हुए सदन को चलने से रोकने की रणनीति बनाई उन्होंने अपने ही दल के अन्य सांसदों के बोलने के हक पर डाका डालने का कार्य किया। विपक्ष के इसी आचरण के कारण सत्ता पक्ष की रुचि भी सदन चलाने में कम होती जा रही है। सदन मेें यदि बहस हो तो विपक्ष को सरकार की घेराबंदी करने के अनेक मौके मिलते हैं। इसका एक लाभ ये भी है कि वह जनता के बीच अपनी जागरूकता और सक्रियता प्रमाणित करने में सफल हो जाता है। आजकल टीवी पर कारवाई का सीधा प्रसारण होने से देश ही नहीं दुनिया भर में बैठे लोग संसद की कारवाई देखते हैं। जो सांसद सदन में होने वाली चर्चा में प्रभावशाली ढंग से अपनी बात प्रस्तुत करते हैं उनकी प्रसिद्धि उनके निर्वाचन क्षेत्र से बाहर सब दूर फैलती है। ये देखते हुए विपक्ष को चाहिए था वह सदन को ज्यादा से ज्यादा चलाने में सहायक बनता किंतु उसने गलतियों से सीखने के बजाय दोहराए जाने की नासमझी दिखाई। जहाँ तक सवाल सत्ता पक्ष का है तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बहस में उसे भी खास रुचि नहीं है। प्रतिपक्ष के तीखे आरोपों का और भी तीखे अंदाज में उत्तर देकर वह सदन के वातावरण में और उत्तेजना भर देता है। होना यह चाहिये कि दोनों पक्षों के वरिष्ट सांसद आपस में बैठकर सदन चलाने का रास्ता निकालें। वरना संसद की उपयोगिता को लेकर भी सवाल खड़े होने लगेंगे। बेहतर तो यही होगा कि हंगामा करने विशेष रूप से गर्भ गृह में घुसने वाले सांसदों को बतौर दंड पूरे माह के वेतन से वंचित किया जाए। जब तक इस तरह के प्रावधान नहीं होंगे सदन के सुचारु रूप से चलने की उम्मीद करना बेकार है। सांसद अपने सम्मान के प्रति बेहद सतर्क रहते हैं किंतु सदन को बाधित कर जनता का अपमान करने में उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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