पाक अधिकृत कश्मीर के हालात भी बलूचिस्तान की तरह ही बेहद तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान के हुक्मरानों के अलावा सेना के जनरल चाहे जब जम्मू - कश्मीर को भारत से छीनने की डींगें हाँकते रहते हैं। आजादी के फौरन बाद उसने कबायलियों की शक्ल में बाकायदा सेना भेजकर कश्मीर के एक हिस्से पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना ने जब हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू किया तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन और शेख अब्दुल्ला के बहकावे में आकर सं.रा संघ में शिकायत कर दी। उसके बाद युद्ध तो रुक गया किंतु पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर का हिस्सा आज तक उसके अधीन ही बना हुआ है। दूसरी समस्या नेहरू जी पैदा कर गए जम्मू - कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा देकर। इसके चलते मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में अलगाववाद बढ़ते - बढ़ते आतंकवाद का रूप ले बैठा जिसके पीछे पाकिस्तान का खुला हाथ था। इसी के तहत घाटी से हिंदुओं को पलायन करने बाध्य किया गया। वहाँ पाकिस्तान का झंडा लहराना और भारत विरोधी नारेबाजी आम बात थी। सेना की टुकड़ियों पर पत्थरबाजी व्यवसाय बन गई थी । इस स्थिति को समाप्त करने के लिए वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने धारा 370 समाप्त करने जैसा साहसिक कदम उठाते हुए जम्मू - कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा विलोपित कर दिया। इसके बाद घाटी में अलगाववाद पूरी तरह समाप्त हो गया हो ये मान लेना तो गलत होगा लेकिन वह लगातार कमजोर होता जा रहा है। आतंकवादियों की गतिविधियां भी पहले से काफी घट गई हैं। हालांकि अपना घर छोड़ने मजबूर किये कश्मीरी हिंदुओं की वापसी अब तक संभव नहीं हो सकी किंतु पहलगाम हत्याकांड के बाद उत्पन्न चिंता और भय अब नहीं दिखाई देता। जिसका प्रमाण वहाँ पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। धारा 370 हटने के बाद राज्य में चुनाव भी सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। लेकिन इसे संयोग कहें या कुछ और कि इधर जम्मू - कश्मीर में शांति स्थापित हो रही है उधर पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के प्रति असंतोष बढ़ते - बढ़ते बगावत की सीमा तक आ पहुंचा है। पाकिस्तानी सेना वहाँ वैसा ही दमन कर रही है जैसा 1971में उसने बांग्लादेश में किया था। गत दिवस ही सेना की गोली से 30 आंदोलनकारियों के मारे जाने की खबर वहाँ की गंभीर स्थिति का प्रमाण है। जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक पाकिस्तान इस समय उसी समस्या में फंसा हुआ है जो उसने जम्मू - काश्मीर सहित भारत के अनेक हिस्सों में पैदा करने का कुचक्र रचा था। पाक अधिकृत कश्मीर उससे अलग होकर भारत से जुड़ने के संकेत दे रहा है। बलूचिस्तान अपने को अलग देश घोषित कर चुका है। पश्चिमी सीमांत पर खैबर पख्तून और तालिबानी इस्लामाबाद की नींद उड़ाए हुए हैं। सिंध में भी अलगाववाद की दबी हुई चिंगारी फिर भड़कती दिख रही है। कुल मिलाकर मुल्क के अंदरूनी हालात बेहद संगीन हैं। भारत का विभाजन कर अस्तित्व में आया ये देश आज खुद खंडित होने के कगार पर है। भारत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है क्योंकि उसका गिलगित वाला हिस्सा पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया। स्मरणीय है चीन इस क्षेत्र से वन बेल्ट वन रोड जैसे प्रकल्प पर तेजी से काम कर रहा है जिससे उसे प. एशिया और यूरोप तक अपना व्यापार विस्तारित करने में मदद मिलेगी । लेकिन बलूचिस्तान के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का बढ़ता विरोध पाकिस्तान के दुर्भाग्य की पटकथा लिख रहा है। पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत में शामिल होने जा रहा है इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि पाकिस्तान के साथ ही चीन भी आसानी से ऐसा नहीं होने देगा। लेकिन उस पार के कश्मीर में पाकिस्तान का नियंत्रण लगातार कमजोर होता जा रहा है जो भारत के हित में है क्योंकि अपनी आंतरिक अशांति से जूझने के कारण आतँकवाद का निर्यात करने की उसकी क्षमता कमजोर होगी। लेकिन एक बात गौरतलब है कि भारत का वह वर्ग जो जम्मू - कश्मीर में अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए भारतीय सेना को अत्याचारी ठहराने में तनिक भी शर्म नहीं करता था वह पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाये जा रहे दमन चक्र पर मुँह में दही जमाये बैठा है। धारा 370 के हटाये जाने पर छाती पीटने वाली रुदालियों की टोली पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ती देखकर भी शांत है। दरअसल उसे इस बात की चिंता सताये जा रही है कि कश्मीर के उस हिस्से पर पाकिस्तान की पकड़ कमजोर पड़ने से कहीं वह जम्मू कश्मीर के साथ वापस न जुड़ जाए। भारत को इस स्थिति पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि पाकिस्तान और चीन मिलकर भारत के लिए कोई परेशानी खड़ी कर सकते हैं। और फिर हमारे यहाँ आस्तीन के सांप भी कम नहीं हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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