Saturday, 29 June 2024

संसद के न चलने से विपक्ष का ज्यादा नुकसान होता है

18 वीं लोकसभा का पहला सत्र पूत के पाँव पालने में वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है। प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति से शुरू विवाद अध्यक्ष के चुनाव तक जारी रहा। सदस्यों के शपथ ग्रहण में भी अनावश्यक नारेबाजी और टोकाटाकी चलती रही। स्पीकर चुने जाने पर ओम बिरला को बधाई देते समय भी विपक्षी सदस्यों ने कटाक्ष करने में तनिक भी कंजूसी नहीं की। उसके बाद श्री बिरला के भाषण में आपात्काल के उल्लेख के साथ उस दौरान मारे गए लोगों की स्मृति में मौन रखे जाने पर विवाद की स्थिति बनी। राहुल गाँधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं का जत्था विरोध जताने स्पीकर के कक्ष तक  जा पहुंचा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी आपत्काल का जिक्र आग में घी का काम कर गया। शपथ लेते समय असदुद्दीन ओवैसी द्वारा जय फिलीस्तीन कहे जाने के विरुद्ध मामला पुलिस तक जा पहुंचा। यद्यपि स्पीकर के चुनाव में ममता बैनर्जी की नाराजगी की खबर से इंडिया गठबंधन में दरार की आशंका उत्पन्न हो गई थी किंतु वह खत्म कर दी गई। इसका प्रमाण राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के पहले विपक्ष द्वारा नीट परीक्षा घोटाले पर बहस के लिए स्थगन प्रस्ताव पेश करने से मिला। जिसके लिए न सत्ता पक्ष तैयार हुआ और न ही श्री बिरला। उनका कहना है कि अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव से पूर्व अन्य किसी विषय पर चर्चा नियम और परंपरा दोनों के विरुद्ध है। स्पीकर ने विपक्ष को समझाइश देते हुए कहा कि वे अभिभाषण पर बोलते हुए नीट घोटाले सहित सभी विषयों पर बोल सकते हैं किंतु धन्यवाद प्रस्ताव को रोककर स्थगन प्रस्ताव स्वीकार करना संभव नहीं होगा। विपक्ष ने इस पर नारेबाजी की। उस दौरान  राहुल का माइक बंद किये जाने की शिकायत भी हुई और विपक्षी सदस्य गर्भगृह तक आ पहुंचे। संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष को आश्वस्त करते रहे कि अभिभाषण के बाद उन्हें नीट घोटाले पर बोलने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा लेकिन गतिरोध बने रहने से अंततः स्पीकर ने सोमवार तक सदन स्थगित कर दिया। विपक्षी खेमे से जो संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक अगले हफ्ते भी वह ऐसा ही करेगा। उसकी रणनीति यह है कि नीट घोटाले पर सरकार को रक्षात्मक होने बाध्य किया जावे। दरअसल श्री गाँधी सहित विपक्ष के अन्य दल भी जानते हैं कि अभिभाषण की आलोचना का कोई महत्व नहीं होता क्योंकि बहस के अंत में प्रधानमंत्री  जोरदार भाषण देकर विपक्ष की हालत खराब कर देते हैं। यह सत्र 3 जुलाई तक है विपक्ष  का संख्या बल 10 सालों में सबसे अधिक होने से उसका मनोबल ऊंचा है। इसीलिए वह पहले सत्र से ही सरकार पर हावी होने की रणनीति पर चल रहा है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का सोचना है कि शुरुआत में ही विपक्ष  के सामने झुकने से उसका हौसला और बुलंद हो जाएगा जो भविष्य में परेशानी का कारण बने बिना नहीं रहेगा। पिछले 10 सालों में संसद के दोनों सदनों में इस तरह के हंगामे रोजमर्रे की बात थे। लेकिन विपक्ष की ताकत कम होने से सरकार आसानी से अपना काम निकाल लेती थी। लेकिन इस बार लोकसभा में स्थिति भिन्न है। हालांकि सरकार के पास स्पष्ट बहुमत होने से वह आत्मविश्वास से भरी हुई है। इसका परिचय अध्यक्ष के चुनाव से मिल गया। विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव को मंजूर न करने की नीति भी उसी का प्रमाण है। स्पीकर और राष्ट्रपति दोनों के भाषण में आपात्काल का उल्लेख ये दर्शाता है कि प्रधानमंत्री विपक्ष पर हमला करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे। जहाँ तक बात विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव की है तो वह पुरानी गलती दोहरा रहा है। उसे चाहिए था राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने देता। इस दौरान भी राहुल सहित अन्य विपक्षी नेताओं को सरकार पर हमले करने का पर्याप्त मौका मिलता।यदि सत्र के शेष दिनों में भी ऐसा ही गतिरोध बना रहा तब सत्ता पक्ष तो जैसे - तैसे धन्यवाद प्रस्ताव मंजूर करवा ही लेगा किंतु विपक्ष हवा में ही तलवार घुमाते रह जाएगा। काँग्रेस की 99 सीटें होने से राहुल को नेता प्रतिपक्ष का पद मिला है। उस नाते उन्हें हर विषय पर  बोलने का अवसर उपलब्ध रहेगा। धन्यवाद प्रस्ताव पर भी वे सरकार पर चौतरफा आक्रमण कर सकते थे। परंतु विपक्ष ने वह अवसर गँवा दिया। उसे याद रखना चाहिए कि सरकार के पास अपना पक्ष रखने के अनेक साधन होते हैं किंतु विपक्ष के पास संसद सबसे प्रभावशाली और प्रामाणिक माध्यम है। होहल्ला कर सदन स्थगित होने से विपक्ष उसे मिलने वाले समय से भी वंचित हो जाता है। बीते 10 सालों में इस वजह से उसकी छवि को काफी क्षति पहुँची है। यदि इस बार भी वह  सदन को बाधित करने की नीति पर चलता रहा तो उसका बढ़ा हुआ संख्याबल  भी किसी काम का नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 28 June 2024

आपातकाल : काँग्रेस की दुखती रग पर हाथ रख दिया बिरला ने


काँग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका वाड्रा ने लोकसभा चुनाव के दौरान रायबरेली  की एक जनसभा में इस क्षेत्र से नेहरू - गाँधी परिवार के पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा था कि जब भी आपको लगा कि इस परिवार से गलती हुई तो आपने उसके लिए दंडित भी किया। आगे उन्होंने कहा कि जब आपको इंदिरा गाँधी की कुछ बातें अच्छी नहीं लगीं तो आपने उनको हरा दिया। यद्यपि सुश्री वाड्रा ने इंदिरा जी की पराजय का जिक्र करते हुए आपातकाल का नाम नहीं लिया किंतु बिना कहे ही लोग सब समझ गए। लेकिन जब 18 वीं लोकसभा के स्पीकर चुने जाने के बाद ओम बिरला ने अपने भाषण में आपातकाल को लोकतंत्र और संविधान विरोधी बताते हुए उस दौरान मारे गए लोगों की स्मृति में मौन रखने कहा तो राहुल गाँधी को बेहद नागवार गुजरा।  चूंकि इस वर्ष आपातकाल लगे 50 वर्ष पूरे हुए इसलिए लोकसभाध्यक्ष ने सदन में उसका उल्लेख किया। गत दिवस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी अपने अभिभाषण में आपातकाल को संविधान पर हमला बताया। उसके बाद  राहुल कुछ विपक्षी नेताओं को लेकर श्री बिरला से मिले और उनके द्वारा आपातकाल को लेकर कही गई बातों पर रोष व्यक्त करते हुए उसे राजनीतिक करार दिया। रोचक बात ये है कि उनके साथ अन्य विपक्षी नेताओं के अलावा  मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव तथा लालू यादव की बेटी मीसा भारती भी रहीं। बताने की जरूरत नहीं कि आपातकाल में मुलायम और लालू दोनों जेल गए थे। स्पीकर से मिलने के बाद अखिलेश ने कहा कि इतनी पुरानी बात को भूल जाना ही बेहतर है। स्मरणीय है पूरे लोकसभा चुनाव में राहुल, अखिलेश और तेजस्वी यादव हाथ में संविधान की पुस्तक लेकर भाजपा पर ये आरोप लगाते रहे कि वह उसे बदलना चाहती है। लेकिन ये नेतागण भूल गए कि कि स्वाधीनता के बाद संविधान की हत्या का पहला प्रयास इंदिरा गाँधी द्वारा किया गया और वह भी अपनी गद्दी बचाने के लिए। पूरे विपक्ष को उन्होंने जेल में ठूंस दिया था। समाचार पत्रों पर सेंसर लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई। लोगों के मौलिक अधिकार तक निलम्बित कर दिये गए। इंदिरा ही भारत और भारत ही इंदिरा जैसा राग दरबारी गूंजने लगा। इसी गलती का उल्लेख प्रियंका ने रायबरेली में किया था जिसके दंड स्वरूप 1977 के लोकसभा चुनाव  में पूरे  उत्तर भारत के मतदाताओं ने काँग्रेस का सफाया कर दिया। खुद इंदिरा जी भी रायबरेली में हार गईं। आपातकाल के विरुद्ध हुआ अहिंसक संघर्ष भारत के राजनीतिक इतिहास का वह हिस्सा है जिसके बारे में नई पीढ़ी को विस्तृत जानकारी दी जानी चाहिए ताकि उसे संविधान और लोकतंत्र का खात्मा करने रचे गए उस  षड्यंत्र की सूत्रधार  इंदिरा गाँधी और उनके तानाशाही रवैये की वास्तविकता का पता रहे। स्वाधीनता संग्राम, गाँधी हत्या, बांग्ला देश युद्ध जैसी घटनाओं की याद  तो काँग्रेस हमेशा ताजा रखना चाहती है किंतु कश्मीर के भारत में विलय और 1962 में चीनी हमले के समय पंडित नेहरू की गलतियों के अलावा आपातकाल लगाए जाने जैसे कदमों पर विस्मृति की धूल डालने इसलिए आमादा रहती है क्योंकि उनके लिए नेहरू - गाँधी परिवार कठघरे में खड़ा होता है। बतौर नेता प्रतिपक्ष राहुल को सरकार  और उसकी नीतियों का विरोध करने का अधिकार है किंतु अतीत में जो गलतियाँ तत्कालीन सत्ताधीशों ने कीं उनकी  याद दिलाते रहना इसलिए जरूरी है ताकि कोई दूसरा शासक उनको दोहराने की जुर्रत न कर सके। खुद को समाजवादी कहने वाले अखिलेश  ये कैसे भूल गए कि उनके पिता भी इंदिरा जी की तानाशाही के विरुद्ध लड़ने वालों में अग्रणी रहे। यही स्थिति मीसा भारती के बारे में है जिनके पिता लालू यादव आपातकाल की भट्टी में तपकर ही राजनेता बन सके। गठबंधन राजनीति की मजबूरियों में राजनीतिक पार्टियां  विरोधी विचारधारा वाले दलों से भी गठबंधन करती हैं। इंडिया नामक विपक्षी गठजोड़ भी उसी का रूप है। ऐसे में राहुल , अखिलेश और तेजस्वी का साथ आना चौंकाता नहीं किंतु उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि पूर्व पीढ़ी के संघर्षों को भुला देने से आपकी  पहिचान नष्ट हो सकती है। राहुल के साथ लोकसभा अध्यक्ष के भाषण का विरोध करने पहुंचे विपक्षी सांसदों को आपातकाल के बारे में  अपनी पितृ पीढ़ी के विचारों को जानना चाहिए। राहुल  ने उनको साथ लेकर दरअसल अपनी दादी द्वारा किये गए संविधान और लोकतंत्र को कुचलने के प्रयास को वैधता प्रदान करने की चाल चली। लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाने जैसे निर्णय आपातलाल में लिए गए थे। संसद इंदिरा जी के दरबार जैसा बन गया था। सैकड़ों मीसाबन्दी जेलों में चल बसे थे। लाखों परिवारों के कमाने वाले  सदस्य   के जेल जाने से उनके सामने रोजी - रोटी का संकट उत्पन्न हो गया। भारत की जनता ने उसी का दंड काँग्रेस को दिया था। प्रियंका ने रायबरेली के मतदाताओं को जागरूक बताते हुए इंदिरा जी की हार का जिक्र किया था। क्या राहुल अपनी बहिन के उस भाषण का भी विरोध करेंगे? सही बात तो ये है कि राहुल द्वारा आपातकाल की चर्चा का विरोध करने से  काँग्रेस का अपराधबोध उजागर हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 June 2024

पित्रौदा की पुनर्नियुक्ति से काँग्रेस सवालों के घेरे में


सैम पित्रोदा भारत के बाहर रहने वाले एक पेशेवर व्यक्ति हैं। उनका नाम स्व. राजीव गाँधी के शासनकाल में चर्चित हुआ । उन्हें देश में संचार क्रांति का सूत्रधार माना जाता रहा है। बाद की काँग्रेस सरकारों में भी वे सलाहकार रहे। बीते कुछ सालों में वे काँग्रेस नेता राहुल गाँधी के विदेशी दौरों के प्रायोजक की भूमिका निभा रहे थे। इसीलिए काँग्रेस ने उनको इंडियन ओवरसीज काँग्रेस का अध्यक्ष बना दिया जिसमें किसी को ऐतराज नहीं हो सकता था। लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव के दौरान उनका एक साक्षात्कार अमेरिका में प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने वालों की तुलना कुछ खास नस्लों से करते हुए पूर्वी हिस्से के वासियों को चीनी और दक्षिण भारतीयों को अफ्रीकियों जैसा बताया। जैसे ही उस साक्षात्कार की जानकारी आई देश में बवाल मचने लगा।  उसके पहले उन्होंने अमेरिका में उत्तराधिकार के नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी 55 फीसदी संपत्ति सरकार लेती है जबकि उत्तराधिकारी को महज 45 फीसदी हासिल होता है।  चुनाव के चलते भाजपा सहित काँग्रेस विरोधी अन्य दलों द्वारा श्री पित्रौदा के बयानों को मुद्दा बनाकर काँग्रेस की घेराबन्दी की जाने लगी । फिर क्या था बिना देर किये उनको इंडियन ओवरसीज काँग्रेस पद से हटा दिया गया। साथ ही ये सफाई भी दी जाने  लगी कि पार्टी का उनकी टिप्पणियों से कोई सम्बन्ध नहीं है और वह उनका समर्थन नहीं करती।  उस समय तो बात आई - गई  हो गई। श्री पित्रौदा भी मौन साधकर बैठ गए। लेकिन एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भविष्यवाणी कर दी कि कुछ समय बाद श्री पित्रौदा अपने पद पर पुनः बैठ जायेंगे। यह सब काँग्रेस की चाल है। वह अपने कुछ नेताओं से इस तरह के बयान दिलवाकर विवाद उत्पन्न करवाती है। कुछ दिनों के लिए उन्हें दूर रखकर पुनः वापस पद दे दिया जाता है। उसके बाद लोकसभा चुनाव संपन्न होने तक उनकी कोई चर्चा भी नहीं सुनाई दी। गत दिवस अचानक वे एक बार फ़िर सुर्खियों  में आये किंतु किसी बयान या अन्य गतिविधि की बजाय नहीं अपितु इंडियन ओवरसीज काँग्रेस के अध्यक्ष पद पर दोबारा नियुक्ति को लेकर। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि उन्होंने खुद होकर पद छोड़ा था न कि पार्टी ने हटाया था। इसके अलावा उन लोगों को नस्लीय सोच का बता दिया जिन्होंने उनके बयान की आलोचना की थी। काँग्रेस अपनी पार्टी से जुड़े संगठनों में किसको नियुक्त करे ये उसका अधिकार है किंतु जो व्यक्ति चुनाव के दौरान विवादास्पद बयान देने के कारण पार्टी के लिए असहनीय हो गया था और उसके बचाव के लिए कोई आगे नहीं आया हो उसे चुनाव समाप्त होते ही पुनः उसी पद पर नियुक्त कर देने से श्री मोदी के आरोपों की पुष्टि हो गई है। वैसे भी ये पहला मौका नहीं है जब उन्होंने विवादित बयान देकर पार्टी को मुश्किल में डाल दिया। बीते वर्षों में  राम मन्दिर और  पुलवामा पर की गईं उनकी टिप्पणियां आलोचना का पात्र बनीं। इसी तरह 84 के सिख दंगों पर हुआ तो हुआ जैसा कटाक्ष  सिख समुदाय की नाराजगी की वजह बना। वहीं संविधान के निर्माण में डाॅ. आंबेडकर से ज्यादा भूमिका पण्डित नेहरू की थी जैसे बयान से दलित समुदाय में रोष फैला। उनके तकनीकी ज्ञान और पेशेवर दक्षता पर कोई संदेह किये बिना ये कहा जा सकता है कि ऐसे गैर राजनीतिक सलाहकारों के कारण ही पहले राजीव गाँधी और डाॅ. मनमोहन सिंह के हाथ से सत्ता खिसकी। अब वे राहुल के बेहद नजदीकी बने हुए हैं। उनकी पुनर्नियुक्ति से काँग्रेस के सामने यह सवाल आ खड़ा हुआ है कि क्या चुनाव खत्म होते ही श्री पित्रौदा के वे बयान फायदेमंद हो गए जिनके कारण उन्हें हटना पड़ा या हटाया गया था। और ये भी कि क्या काँग्रेस पार्टी उनके उन बयानों से अब सहमत हो गई जो चुनाव के समय उसे नुकसानदायक प्रतीत हो रहे थे। उनकी पुनर्नियुक्ति से ये लगता है कि श्री गाँधी के करीबी होने के कारण  श्री पित्रौदा को अभयदान मिलता रहा है । लेकिन इस तरह के व्यक्ति अक्ल के अजीर्ण से ग्रसित होने के कारण परेशानी का सबब बन जाते हैं। भविष्य में भी वे पार्टी के लिए मुसीबत नहीं बनेंगे इसकी गारंटी कौन देगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 June 2024

पहले मुकाबले में एनडीए भारी पड़ा : काँग्रेस की रणनीति फुस्स साबित हुई

कसभा अध्यक्ष पद के लिए मुकाबले की स्थिति बन जाने का अर्थ ये निकला  कि चुनाव के दौरान उत्पन्न कटुता आगे भी जारी रहेगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा आम सहमति बनाने के लिए की गई बैठक में काँग्रेस ने  शर्त रखी  कि उपाध्यक्ष पद दे दो तो अध्यक्ष के लिए सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को सर्व सम्मति से चुन लिया जाएगा। समझौता न होने के दो कारण सामने आये । पहला ये कि राजनाथ सिंह ने लौटकर फोन नहीं किया और दूसरा यह कि भाजपा द्वारा ओम बिरला का नाम सामने लाने से काँग्रेस सहित विपक्ष बिदक गया। और उसकी ओर से केरल के वरिष्ट सांसद  के. सुरेश को उतारकर  मुकाबले की स्थिति बना दी गई। विपक्ष का मानना था कि  ध्वनि मत की बजाय मतपत्र से चुनाव होने पर एनडीए के कुछ सांसद  भीतरघात करेंगे। हालांकि श्री बिरला की ओर से 10 सेट नामांकन के भरे जाने से  एनडीए की एकजुटता सामने आ गई थी वहीं श्री सुरेश केवल 3 नामांकन सेट ही दाखिल कर पाए। उस पर भी तृणमूल काँग्रेस ने इसे इकतरफा निर्णय बताते हुए काँग्रेस की चौधराहट स्वीकार नहीं करने का संकेत दे दिया। ये इस बात का प्रमाण है कि ममता इंडिया गठबंधन में अपनी शर्तों पर रहेंगी। दरअसल काँग्रेस इस मामले में जल्दबाजी कर गई। पहले तो उसने प्रोटेम स्पीकर पर  विवाद खड़ा कर सत्ता पक्ष को नाराज किया साथ ही उपाध्यक्ष पद की शर्त रखते हुए अध्यक्ष  के चुनाव में टकराव का इशारा कर दिया। यही नहीं तो तेलुगु देशम को अध्यक्ष पद के लिए समर्थन का लालच देकर एनडीए से बाहर आने भी उकसाया । लेकिन इस सबसे भाजपा चौकन्नी हो गई और उसने तेलुगु देशम तथा जनता दल (यू) द्वारा अध्यक्ष पद हेतु बनाये जा रहे कथित दबाव को खत्म करते हुए श्री बिरला को ही दोबारा अध्यक्ष बनाने की बिसात बिछाई और काँग्रेस को उपाध्यक्ष पद हेतु कोई आश्वासन न देकर अपना आत्मविश्वास प्रकट कर दिया । चर्चा है पिछली दो लोकसभा की तरह इस बार भी  उपाध्यक्ष नहीं होगा किंतु गठबंधन में संतुलन के लिए जरूरी लगा तो सहयोगी दल के किसी सांसद को इस पद पर बिठा दिया जाएगा। इस मामले में काँग्रेस नेतृत्व की अपरिपक्वता एक बार उजागर हो गई क्योंकि उसने लोकसभा चुनाव के नतीजों के फ़ौरन बाद अध्यक्ष के चुनाव के लिए सत्ता पक्ष में तोडफ़ोड़ करने का जो दांव चला वह कारगर नहीं हो सका। उलटे तृणमूल काँग्रेस की नाराजगी सामने आने से विपक्ष में बिखराव  का संकेत मिल गया।  हालांकि बाद में राहुल गाँधी द्वारा ममता से बात किये जाने पर वे मान तो गईं किंतु उन्होंने ये नसीहत तो दे ही दी कि वे तृणमूल को हल्के में न लें। असल में राहुल से ममता की नाराजगी की एक वजह चुनाव बाद उनके द्वारा बधाई देने के लिए किया फोन नहीं उठाना और न ही  पलटकर फोन करना भी है। काँग्रेस इन दिनों जिस प्रकार अखिलेश यादव को महत्व दे रही है उससे भी उनको तकलीफ है। बहरहाल, काँग्रेस का सारा बड़बोलापन धरा रह गया जब ओम बिरला ध्वनि मत से ही निर्वाचित हो गए और विपक्ष मत विभाजन की मांग करने का साहस तक न जुटा सका। इस प्रकार सत्तारूढ़ एनडीए ने इंडिया गठबंधन से नये सदन में पहले शक्ति परीक्षण में सफलता ही हासिल नहीं की अपितु ये भी स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष के पास अच्छे रणनीतिकारों की कमी है। वरना वह बिना शर्त लगाए अध्यक्ष के लिए श्री बिरला का समर्थन कर देता और उनके निर्वाचन के बाद फिर उपाध्यक्ष पद हेतु दावा करता। उस स्थिति में यदि सत्ता पक्ष नहीं मानता तब उसे आलोचना का शिकार होना पड़ता। लेकिन पहले प्रोटेम स्पीकर के चयन में अनावश्यक तौर पर दलित का मुद्दा उठाना, फिर अध्यक्ष पद के लिए समर्थन के बदले उपाध्यक्ष की सौदेबाजी करना और अंततः ध्वनि मत से श्री बिरला के चुने जाने पर मत विभाजन की मांग नहीं करने से ये बात सामने आ गई कि विपक्ष में दिखावटी हौसला कितना भी हो लेकिन हिम्मत का अभाव है। विपक्ष को डर था कि मतदान की स्थिति में उसके कुछ वोट श्री बिरला के पक्ष में  जा सकते हैं। दूसरी बार अध्यक्ष बनकर श्री बिरला ने स्व. बलराम जाखड़ की बराबरी कर ली जिनको बतौर अध्यक्ष दो  कार्यकाल मिले। वे अनुभव संपन्न होने के साथ कड़क भी हैं। सदन का संचालन करने में अनुभव काफी मददगार होता है। हालांकि विपक्ष की बेंचों पर इस बार ज्यादा सांसद हैं । इंडिया गठबंधन के तौर पर उनकी ताकत और बढ़ गई है जिससे आसंदी का काम कठिन होगा किंतु वे उस स्थिति से कुशलता पूर्वक निपट सकेंगे ये उम्मीद है। इस चुनाव में मिली विफलता से विपक्ष को यह सीखना चाहिए कि बिना पर्याप्त तैयारी और ताकत के मुकाबले में उतरना बुद्धिमत्ता नहीं होती। अपना अध्यक्ष चुनवाकर भाजपा ने सहयोगी दलों को भी ये एहसास करवा दिया कि उसका संख्याबल  भले ही कम हुआ किंतु मनोबल यथावत है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

आपातकाल ने भारतीय राजनीति की चाल , चरित्र और चेहरा बदल डाला


50 बरस पहले 25 और 26 जून 1975 की दरम्यानी रात भारत में तख्ता पलट जैसी घटना घटी | लेकिन ये तख्ता पलट किसी सत्ताधीश का न होकर इस देश के लोकतंत्र का था | 12 जून 1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा  1971 के लोकसभा  चुनाव में रायबरेली सीट का चुनाव रद्द किए जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता  बचाये रखने के लिए संसदीय लोकतन्त्र को ही बंधक बना लिया |

आपातकाल लगाकर समूचे विपक्ष को जेल में भेजने के साथ ही उन्होंने समाचार माध्यमों पर सेंसर लगाकर लोकतंत्र की आवाज बंद कर दी | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरे बिठाते हुए जीवन सहित सभी मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए | विपक्ष से वंचित संसद राग दरबारी का मंच बन गई | इन्दिरा जी को ही इण्डिया बताने जैसी  भाटगिरी तक हुई | और भी बहुत कुछ ऐसा हुआ जो लोकतंत्र के माथे पर काले धब्बे से कम नहीं  कहा जा सकता | 1977 की  जनवरी में श्रीमती गांधी ने लोकसभा चुनाव का ऐलान कर  दिया |  उन्हें विश्वास हो चला था  कि आपातकाल के बीते डेढ़ साल में जनता को भी विपक्ष से विरक्ति हो गई होगी क्योंकि देश तो सुचारू रूप से चल ही रहा था | आचार्य विनोबा भावे उसे अनुशासन पर्व  नामक चरित्र प्रमाण पत्र भी प्रदान कर चुके थे |

लेकिन जब दो माह बाद चुनाव हुए तब देश ने इंदिरा गांधी को बुरी तरह हराकर लोकतंत्र का पुनः राजतिलक किया | आपस में एक दूसरे की टांग खींचने वाली तमाम गैर कांग्रेसी पार्टियां जनता पार्टी के नाम से मैदान में उतरीं और जनता ने आजाद हिन्दुस्तान में पहली बार केन्द्रीय सत्ता से कांग्रेस को उतार  फेंका । इंदिरा जी  द्वारा आपातकाल लगाने जैसी भयंकर भूल किये जाने का परिणाम विपक्षी एकता के साथ ही जनता के मन में सत्ता परिवर्तन के साहस के तौर पर सामने आया | वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक बदलाव था |

हालांकि प्रखर समाजवादी नेता डा. राममनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का जो सिद्धांत दिया उसके अनुसार 1967 से देश में विपक्ष की अनेक सरकारें बनीं किन्तु वह प्रयोग राज्यों तक ही सीमित रहा और विपक्ष की दर्जनों छोटी - बड़ी पार्टियों में कोई समन्वय और वैचारिक साम्य न  होने से राज्यों में बनी संयुक्त सरकारें जल्द ही  अपने अंतर्विरोधों के चलते जैसे बनीं ,  वैसे ही चलती बनीं | लेकिन इससे एक सबक विपक्ष को  जरुर मिल गया कि उनकी एकजुटता कांग्रेस पर भारी पड़ सकती है | साथ ही जनता के मुंह को भी सत्ता परिवर्तन रूपी स्वाद लग गया |

आपातकाल ने मजबूरी में ही सही एक अवसर विपक्ष के सामने परोसकर रख दिया और जेलखाने में रहते हुए उन सभी को ये बात समझ में आ गयी कि  चाहे - अनचाहे एक होना पड़ेगा | और वैसा करना कारगर भी  रहा | समूचे उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया | इंन्दिरा जी और आपातकाल के शिल्पकार कहे  जाने वाले उनके पुत्र संजय गांधी क्रमशः रायबरेली और  अमेठी से हार गये |

नई - नवेली जनता पार्टी सत्ता में आ गयी | मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बन गए | लेकिन सत्ता  की अतृप्त कामना  एक बड़े अवसर को इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने का कारण बनने लगीं | 27 महीने बाद ही जिन इंदिरा जी और संजय गांधी की तानाशाही के विरुद्ध विपक्षी एकता का जन्म हुआ उन्हीं  ने कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाएँ जगाते हुए दाना फेंका और चौधरी चरण सिंह जैसा अनुभवी राजनेता उसकी लालच में दौड़ पड़ा | यही नहीं तो गैर कांग्रेसवाद का गुरुमंत्र लेकर सियासत की पाठशाला से निकले लोहिया जी के चेले तक कांग्रेस की गोद में जाकर बैठ गये | फिर  होना क्या था , मोरार जी सरकार गिर गयी | चौधरी साहब प्रधानमन्त्री बन तो गये लेकिन चंद रोज बाद ही कांग्रेस ने अपना असली रूप दिखाते हुए उनको दी गई  समर्थन नामक बैसाखी खींच ली | वह सरकार भी चलती बनी |

नये चुनाव हुए और इंदिरा जी पुनः सत्ता में लौट आई | आपातकाल का विरोध करने वाले आपस में ही लड़ मरे जिससे आपातकाल लगाने का अपराध जनता की अदालत में बेअसर होकर रह गया ।  इंदिरा जी ने लोकतंत्र की हत्या का जो प्रयास किया वह केंद्र में पहली बार हुए सत्ता परिवर्तन के साथ ही विपक्षी फूट का नया प्रमाण बनकर सामने आया | यही नहीं तो  गैर कांग्रेसवाद का जनाजा भी निकल गया | कांग्रेस ने भी श्रेष्ठता के भाव को त्यागकर दूसरे दलों के साथ गठबन्धन करने की व्यवहारिकता सीखी |

उसके बाद का एक दशक कांग्रेसी सत्ता का रहा | 1984 में इंदिरा  जी की नृशंस हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने किन्तु एक बार सत्ता का खून मुंह में लग जाने के कारण विपक्षी एकता रूपी काठ की हांडी फिर आग पर चढ़ी तथा 1989 के चुनाव  में राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस दोबारा सत्ता से बाहर हुई और उसी से निकले विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमन्त्री बन बैठे | लेकिन उनके चयन से ही विवाद सतह पर आ गया | लोहिया जी के चेलों ने मौके का लाभ लेकर मंडल कार्ड खेला तो भाजपा राम मन्दिर के मुद्दे के साथ मैदान में कूद पड़ी | उसके समर्थन वापिस लेने से  11 महीने में विश्वनाथ प्रताप चलते बने |  व्यक्तित्वों के टकराव और सत्ता की प्यास ने जनता पार्टी वाला वृतान्त दोहरा  दिया | कांग्रेस ने अपना पुराना दांव आजमाया और इस बार चन्द्रशेखर की  लार टपक पड़ी जो विश्वनाथ प्रताप और देवीलाल की चालबाजी से प्रधानमन्त्री बनते - बनते रह गये थे | अंततः  वे राजीव गांधी का सहारा लेकर सत्ता में आ तो गये किन्तु जल्द ही  वे भी चौधरी साहब की तरह से ही निपटाए गए | नये चुनाव के दौरान राजीव की हत्या हो गई | कांग्रेस सबसे बड़े  दल के रूप में उभरी और बाहरी समर्थन से सरकार बना ली | लेकिन ये पहला अवसर था जब कांग्रेस उन विपक्षियों का समर्थन लेकर सत्ता में आई जिनका वह मजाक उड़ाया करती थी | वह दौर आते तक भारतीय राजनीति में राजनीतिक गठबन्धनों की नई - नई परिभाषाएं गढ़ी जाने लगीं | वैचारिक मतभेद गुजरे ज़माने की बातें हो गईं | पीवी नरसिम्हा राव की  वह सरकार कहने को तो पांच साल चली किन्तु कांग्रेस  के पाँव उखड़ने लगे |

1996 में तेरह दिन के लिए अटल बिहारी  वाजपेयी प्रधानमन्त्री बने लेकिन विपक्ष का ही बड़ा हिस्सा उनके विरोध में आ गया | उनके बाद कांग्रेस के समर्थन से पहले एचडी देवगौड़ा की सरकार बनी लेकिन कांग्रेस ने कोई बहाना  बनाकर उसे चलता किया और तब इंदर कुमार गुजराल ढूंढ़कर निकाले गये | लेकिन कांग्रेस ने उन्हें भी नहीं टिकने दिया और 1998 में देश पर फिर चुनाव लाद दिए गये | लेकिन अस्थिरता बनाये रखने के कारण कांग्रेस जनता की नजरों से गिरती गयी जिसका लाभ राममन्दिर आन्दोलन से लगातार ताकतवर होती गई भाजपा को मिला और वह 180 सीटें ले आई | जिन समाजवादियों ने कभी दोहरी  सदस्यता के नाम पर जनता पार्टी सरकार गिरवा दी थी उनमें से अनेक श्री वाजपेयी के उदारवादी चेहरे से प्रभावित होकर उनकी सरकार बनाने में सहायक बन गये | इनमें 13 दिन की  सरकार को गिरवाने वाले भी थे | लेकिन तब तक भाजपा जरूरी और मजबूरी दोनों बन चुकी थी | वाजपेयी जी भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनका कांग्रेस से कभी सम्बन्ध नहीं रहा परन्तु नाटकीय घटनाक्रम में मात्र 13 महीने बाद अविश्वास प्रस्ताव पर बसपा द्वारा वायदा खिलाफी किये जाने से एक मत से वह सरकार गिर गयी किन्तु मध्यावधि के पहले कारगिल हो गया  और उसमें भारत की जीत वाजपेयी सरकार की  वापिसी का कारण  बन गई |

इस बार उनने  पूरे पांच साल सरकार चलाते हुए कांग्रेस के इस आरोप को गलत साबित कर  दिया कि विपक्ष स्थायी सरकार नहीं  दे सकता | यद्यपि बतौर प्रधानमन्त्री शानदार छवि के बाद भी अटल जी की ऊर्जा सहयोगियों के नखरे  उठाने में खर्च होती रही वरना वे और भी प्रभावशाली हो सकते थे | 2004 में सत्ता उनके हाथ से खिसकी तो फिर दस साल तक कांग्रेस के डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमन्त्री बने रहे किन्तु पूर्ण बहुमत के अभाव में कांग्रेस को दूसरे दलों के साथ यूपीए नामक गठबंधन बनाना पड़ा जिसे वामपंथियों तक का बाहरी समर्थन मिला | वहीं वाजपेयी सरकार में रहे कुछ समाजवादी भी सत्ता से आकर जुड़ गये |

वाजपेयी युग समाप्त होने के बाद विपक्ष के पास कोई चमकदार चेहरा नहीं होने से 2009 में भी मनमोहन सिंह  वापिस लौटे और वह  भी पहले से ज्यादा सीटों के साथ | वामपंथी तब तक दूर जा बैठे थे किन्तु गठबन्धन पूरे पांच वर्ष चला परन्तु मनमोहन सरकार पर गांधी परिवार नामक रिमोट से चलने का  आरोप लगने लगा | भ्रष्टाचार के चर्चित काण्ड उजागर हुए | इन सबसे  व्यक्तिगत ईमानदारी के बावजूद वे  कमजोर  प्रधानमंत्री के रूप में अलोकप्रिय होते गए | और तभी भाजपा ने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में छाप छोड़ने वाले नरेन्द्र मोदी को पेश कर दिया | उसका नतीजा 2014 के चुनाव  में भाजपा को अपने दम पर मिले बहुमत के रूप में सामने आया और पांच साल बाद तो  300 से ज्यादा सीटें जीतकर श्री मोदी अब तक के सबसे ताकतवर  गैरकांग्रेसी प्रधानमन्त्री बनकर उभरे |

लेकिन इस लम्बे इतिहास से  एक बात सामने आई कि 1977 में केंद्र की सत्ता में हुए परिवर्तन के बाद देश में राजनीतिक गठबन्धन  वैचारिक आधार पर न होकर सुविधा के समझौतों पर आकर टिक गये | कौन कब किससे गठबन्धन कर लेगा और कब अलग हो जाएगा ये नीति नहीं वरन नीयत पर निर्भर करने लगा है | भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई तो सपा और बसपा एक साथ हो लिए | कांग्रेस बंगाल में सीपीएम के साथ लड़ी लेकिन उसी समय केरल में दोंनों आमने  - सामने आ गये | महाराष्ट्र में कांग्रेस को शिवसेना की  साम्प्रदायिकता से परहेज नहीं  रहा वहीं आन्ध्र में चन्द्र बाबू नायडू उसके साथी बन बैठे | बिहार में नीतीश ने लालू से लड़ने भाजपा को पकड़ा फिर उसे छोड़ अकेले चले | सफलता हाथ नहीं आने  पर फिर लालू के साथ मिलकर सत्ता में लौटे किन्तु  दोबारा उसी भाजपा के साथ गलबहियां किये हुए हैं |

इस प्रकार आपातकाल के बाद का राजनीतिक परिदृश्य सिद्धांतविहीन राजनीति का दौर लेकर आया | बीते दो दशकों  में मंडल और मंदिर की बजाय साम्प्रदायिकता विरोधी मोर्चा बनता - बिगड़ता रहा और इधर कुछ सालों से समूचा राजनीतिक विमर्श मोदी समर्थन और मोदी विरोध में आकर सिमट गया है | कांग्रेस अपना आधार तेजी से गंवाती जा रही है | एक ही परिवार पर निर्भरता ने उसका वास्तविक स्वरूप ही नष्ट कर दिया | भाजपा का वैचारिक विरोध करने में केवल वामपंथी ही सक्षम थे किन्तु वे जनता से कटते चले गये | मजदूर और किसान दोनों  उनके हाथ से खिसक चुके हैं | और फिर उनकी राजनीति खीज से भरपूर होने से आकर्षण खो बैठी | विपक्ष में कौन किसके साथ और कौन किसके विरुद्ध है ये कोई नहीं बता सकता | भाजपा अपने स्वर्णयुग में पहुंचकर भी अपनी वैचारिक पवित्रता को बनाये नहीं रख सकी | और धीरे - धीरे उसी व्यक्तिवादी राजनीति में लिप्त हो चुकी है जिसके लिए वह दूसरों को कोसा करती थी |

आजाद भारत की  राजनीति इस प्रकार तीन कालखंडों में विभाजित की जा सकती है | पहला 47 से 77, दूसरा 77 से 2014 और तीसरा उसके बाद से जो जारी है | इन तीनों में राष्ट्रीय राजनीति में बड़े चारित्रिक बदलाव हुए | उसकी दिशा और दशा जिस तरह बदलती  गई उसकी वजह से राजनेताओं का सम्मान और साख दोनों घटते जा रहे हैं |

शासन करते हुए कौन सफल रहा कौन नहीं ये उतना बड़ा मुद्दा नहीं बचा | चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने में संकोच नहीं रहा | यहाँ तक कि राजनीतिक हित राष्ट्रीय हितों पर भारी पड़ने लगे हैं | देश पहले से विकसित हुआ है तथा  दुनिया में उसकी ताकत बढ़ी है लेकिन राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता का अवमूल्यन रुकने का नाम नहीं ले रहा |

हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव ने मुस्लिम ध्रुवीकरण का जो उदाहरण पेश किया उसके बाद राजनीति क्या करवट लेती है? गत दिवस लोकसभा में शपथ लेते समय असदुद्दीन ओवैसी द्वारा जय फलस्तीन का नारा लगाया जाना इस ध्रुवीकरण से उपजे साहस का प्रमाण है। 

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  आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 June 2024

25 जून : संविधान को सूली पर चढाए जाने की बरसी

ज 25 जून है | कहने को ये एक तिथि  मात्र है परंतु  आजाद भारत में ये तारीख बेहद महत्वपूर्ण है | आधी सदी पहले आज ही अर्ध रात्रि  के समय उस वक्त की  प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने संविधान और लोकशाही  की हत्या का घिनौना प्रयास किया था | इसके पहले 12 जून  1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से श्रीमती गांधी  के विरुद्ध 1971 का लोकसभा चुनाव लड़े समाजवादी नेता स्व. राजनारायण की चुनाव याचिका मंजूर करते हुए उस चुनाव को अवैध  करार दिया | न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा  के उस फैसले ने राजनीतिक भूचाल ला दिया | 1971 के लोकसभा चुनाव ने इंदिरा जी को राजनीतिक तौर पर बेहद ताकतवर बना दिया था |  बांग्ला देश के  निर्माण के बाद  तो पूरे विश्व में उनकी प्रशस्ति फैल गई। | लेकिन  चुनाव अवैध घोषित हो जाने के कारण उनकी सत्ता  खतरे में पड़ गई | होना तो ये चाहिए था कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की खातिर वे त्यागपत्र दे देतीं | लेकिन हुआ इसके विपरीत। जगह -  जगह न्यायमूर्ति स्व. सिन्हा के पुतले जलाए जाने लगे। इंदिरा जी के उत्तराधिकारी के तौर पर उभर रहे उनके छोटे बेटे  स्व. संजय गांधी ने तो ये तक कहा कि करोड़ों मतदाताओं द्वारा चुनी हुई  प्रधानमंत्री को  एक न्यायाधीश भला कैसे हटा सकता है ? उधर विपक्ष इंदिरा जी से  इस्तीफे  की मांग करने लगा | ऐसे में विशाल बहुमत होते हुए भी श्रीमती गाँधी अलोकप्रिय होने लगीं | गुजरात से 1974 में प्रारंभ छात्र आन्दोलन बिहार होता हुए पूरे  देश में फैल चुका था। सर्वोदयी नेता  स्व. जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व करते हुए उसे सम्पूर्ण क्रांति का नाम दे दिया |  उसके अंतर्गत 6 मार्च 1975 को दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले से बोट क्लब तक जो सर्वदलीय रैली निकली उससे इंदिरा जी चिंतित हो उठीं। | संसद भी चल नहीं पा रही थी | कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता भी श्रीमती गांधी के रवैये और संजय के व्यवहार  से  रुष्ट थे | इस सबसे  इंदिरा जी चारों तरफ से घिर गईं और फिर  तब प्रजातंत्र को ही खत्म करने का पाप किया और 25 जून  1975 की आधी रात में जब  पूरा देश नींद में था तब तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगाने वाले  अध्यादेश पर हस्ताक्षर करवा लिए | सुबह होते तक जयप्रकाश नारायण , आचार्य कृपालानी , अटल बिहारी वाजपेयी , चौधरी चरण सिंह , लालकृष्ण आडवाणी , चन्द्रशेखर , मधु लिमये , राजनारायण , मधु दंडवते , नानाजी देशमुख , प्रकाश सिंह बादल आदि को तो गिरफ्तार किया ही गया किंतु  उनके अलावा देश भर से प्रदेश , जिला और तहसील  तक के विपक्षी नेता हिरासत में ले लिए गये | अभिव्यक्ति की आजादी के साथ ही  मौलिक अधिकार भी निलंबित कर दिए गए | समाचार पत्रों पर सेंसर  लगा दिया गया। जयप्रकाश बाबू के  आन्दोलन को देश  के लिए खतरा बताते हुए उनकी तुलना हिटलर से की गई| सरकार के प्रचार माध्यम ये माहौल बनाने लगे कि  विपक्ष जनता द्वारा चुनी श्रीमती गाँधी की सरकार को अपदस्थ करने का षडयंत्र रच रहा था | यद्यपि आपत्काल के औचित्य को साबित करने के लिए जमाखोरों, मुनाफाखोरों सहित अनेक  समाज विरोधी तत्वों  को भी गिरफ्तार  कर लिया गया | लेकिन इस सबका असली कारण अलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह  फैसला  ही था  |  19 महीने देश में श्रीमती गांधी की तानाशाही  चली | लोकसभा का कार्यकाल  एक वर्ष बढ़ाकर  उच्च न्यायालय का फैसला उलट दिया गया | जब लगा कि विपक्ष दम तोड़ बैठा है तब उन्होंने मार्च 1977 में लोकसभा  चुनाव करवाए  जिसमें कांग्रेस पराजित हुई और नई गठित जनता पार्टी की सरकार बन गयी |  यहाँ तक कि श्रीमती गांधी  रायबरेली और संजय  गांधी अमेठी से चुनाव हार गये | दुनिया के किसी देश के  प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए  संसद का चुनाव हारने का ये पहला अवसर था | हालांकि जनता पार्टी  सरकार भी आपसी खींचतान  के चलते  27 महीने में गिर गई और 1980 में इंदिरा जी की वापिसी हो गई | लेकिन आपातकाल रूपी अपराधबोध के कारण  वे  पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं  | आज जो लोग संविधान को खतरे में बताने का राग अलाप रहे हैं , वे इंदिरा जी द्वारा थोपे गये आपातकाल और उसके दौरान हुए अत्याचारों के बारे में पढ़ें और जानें तब उनको एहसास होगा कि 19 माह का वह दौर कितना भयावह था | हालंकि उस समय की  जनता बधाई की हकदार है जिसने  तानाशाही को उखाड़ फेंका | तबसे हमारा लोकतंत्र मजबूत तो हुआ लेकिन जनता पार्टी की लहर में ऐसे लोग भी प्रथम पंक्ति के नेता बन बैठे जिन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम पर प्रस्तुत व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प की धज्जियां उड़ाते हुए जातिवाद का जो  जहर फैलाया वही आज  भरतीय राजनीति की पहचान बन गया है | उस दृष्टि से  25 जून हर संविधान प्रेमी के लिए आत्मावलोकन का  दिन है | ये भी अजीब संयोग है कि उस आपातकाल के शिकार नेता और उनकी पार्टियां आज उसी कांग्रेस की सहयोगी  हैं जिसके माथे पर संविधान की हत्या का कलंक है | गत दिवस 18 वीं  लोकसभा के शुभारंभ पर काँग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित तमाम नेता संविधान की प्रति लेकर गए थे। देखना है संविधान को सूली पर चढाए जाने वाले दिन की बरसी पर उनके हाथ में क्या होगा?? 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 June 2024

विरोध के लिए विरोध छोड़ बहस के अवसरों का लाभ उठाए विपक्ष


आज से 18 वीं लोकसभा का सत्र प्रारंभ हो रहा है। इस बार का सदन काफी बदला हुआ है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होने से वे  एनडीए में शामिल सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर रहेंगे। इनमें जनता दल (यू) और तेलुगु देशम पार्टी प्रमुख हैं जिनके मुखिया क्रमशः नीतीश कुमार और चंद्रा बाबू नायडू को लेकर ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि वे अधिक धन की मांग के साथ विशेष राज्य का दर्जा मांगेंगे। दोनों को चालाक राजनेता माना जाता है जो राजनीतिक सौदेबाजी में किसी भी तरह का संकोच नहीं करते। इसके अलावा भले ही विपक्ष बिखरा हुआ है किंतु काँग्रेस का मुख्य विपक्षी दल बन जाना और इंडिया गठबंधन के साथ जुड़ी पार्टियों की संख्या 231 तक तक पहुँच जाने से सत्ता पक्ष के सामने कड़ी चुनौती आना अवश्यम्भावी है। इसका संकेत प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति से मिल गया। इस पद का कोई राजनीतिक महत्व नहीं है किंतु काँग्रेस सहित शेष विपक्ष का आरोप है कि केरल से 8 बार के सांसद के. सुरेश को उपेक्षित कर उड़ीसा से 7 वीं बार जीते भर्थहरि मेहताब को नये सदस्यों को शपथ दिलवाने के लिए प्रोटेम स्पीकर बना दिया क्योंकि वे भाजपा के हैं। काँग्रेस श्री सुरेश के दलित होने को मुद्दा बना रही है वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि श्री महताब के चयन का आधार उनका लगातार जीतना है जबकि श्री सुरेश बीच - बीच में हारे भी हैं। विपक्ष ने प्रोटेम स्पीकर के लिए बनाये गए पैनल में शामिल उसके सांसदों द्वारा अपने  दायित्व का निर्वहन करने से मना कर ये जता दिया है कि वह छोटी - छोटी बातों पर सत्ता पक्ष से टकराव करने पर आमादा रहेगा। हालांकि इस सत्र का सबसे पहला मुकाबला लोकसभा स्पीकर के चुनाव में होगा। विपक्ष ने तेलुगु देशम को उकसाया है कि वह अपना उम्मीदवार खड़ा करे तो वह उसे  समर्थन देगा। हालांकि उसकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला। विपक्ष ने ये शर्त  भी रखी है कि यदि उपाध्यक्ष पद परंपरानुसार उसे दे दिया जावे तो वह स्पीकर पद के लिए उम्मीदवार नहीं उतारेगा। उक्त दोनों मामलों में सत्ता पक्ष ने चुप्पी साध रखी है। शुरू में खबर उड़ी कि नीतीश और चंद्र बाबू अपनी पार्टी का अध्यक्ष चाहते हैं। लेकिन भाजपा ने संभवतः उनको मना लिया है और आंध्र प्रदेश की राजमहेंद्रवरम सीट से जीतीं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पुरंदेश्वरी  स्पीकर की प्रत्याशी बनाई जा सकती हैं जो चंद्र बाबू की सगी साली भी हैं। यदि भाजपा अपने अन्य किसी उम्मीदवार को स्पीकर चुनवाने में कामयाब हो गई तब राज्यसभा की तरह से ही लोकसभा में भी सदन के उपाध्यक्ष का पद किसी सहयोगी दल को दे दिया जाएगा। ऐसे में  पहले मुकाबले में हारना विपक्ष के लिए बड़ा झटका होगा ।  इसलिये वह विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने का हरसंभव प्रयास करेगा किंतु इसके लिए इंडिया गठबंधन की एकजुटता  जरूरी है जिससे आम आदमी पार्टी तो किनारा कर चुकी है जबकि तृणमूल काँग्रेस पार्टी साथ रहते हुए भी अपना अलग अस्तित्व जताती रहती है। जहाँ तक प्रश्न सत्ता पक्ष का है तो भाजपा को हालांकि अपना कोर एजेंडा लागू करने में  परेशानी पैदा होगी किंतु वह बाकी के प्रस्ताव पारित करवाने में अपने सहयोगियों के बल पर सफ़ल हो जाएगी। विपक्ष को चूंकि पूर्वापेक्षा ज्यादा समय सदन में मिलेगा इसलिये उसके लिए यही फ़ाययदेमंद होगा कि सदन चले। यद्यपि सदन को सुचारु रूप से चलाना सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी मानी जाती है और इसीलिए संसदीय कार्य मंत्री सभी दलों के नेताओं से समन्वय बनाकर उसे चलाने का प्रयास करते हैं। लेकिन सदन में विपक्ष द्वारा हंगामा किये जाने के कारण सत्ता पक्ष को बिना बहस के प्रस्ताव पारित करने का अवसर मिल जाता है। 17 वीं लोकसभा में अनेक महत्वपूर्ण कानून विपक्ष के बहिर्गमन या निलंबन के कारण बिना बहस के पारित कर दिये गए। इस लोकसभा में विपक्ष को अपने संख्याबल का सही उपयोग करना है तो उसे सदन चलाने में सहयोग देना चाहिए ताकि उसके सांसद ज्यादा से ज्यादा अपना दृष्टिकोण देश के सामने रख सकें। दूसरी बात विपक्ष को केवल विरोध के लिए विरोध करने की गलती से बचकर बुद्धिमत्ता के साथ पेश आना चाहिए। वह उसे मिले बहस के अवसरों का जितना बेहतर उपयोग करे उतनी ही उसकी छवि सुधरेगी। उल्लेखनीय है पिछली दो लोकसभाओं में विपक्ष के प्रभावहीन प्रदर्शन के कारण ही श्री मोदी का विकल्प न होने की अवधारणा जनमानस में घर कर चुकी थी। इसीलिए विपक्ष की एकजुटता के बावजूद भाजपा 240 और एनडीए 293 सीटें लेकर बहुमत में आ गया। काँग्रेस यदि 99 सीटें मिलने पर आत्ममुग्ध है तो यह उसकी भूल है क्योंकि जिन राज्यों में उसका भाजपा से सीधा मुकाबला था उनमें से एक - दो को छोड़कर शेष में वह औंधे मुँह गिरी है। ये देखते हुए  राहुल गाँधी को भी चाहिए वे हवा में न उड़ें क्योंकि जनता  अभी भी उन्हें और काँग्रेस को देश की जिम्मेदारी नहीं सौंपना चाहती। उनके सामने नेता प्रतिपक्ष बनकर स्वयं को विकल्प के तौर पर उभारने का जो अवसर है उसका लाभ वे किस तरह उठाते हैं उसका एहसास इस पहले सत्र से हो जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 June 2024

गरीब सर्वोपरि किंतु बाकी का ध्यान रखना भी जरूरी


कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश  विधानसभा चुनाव में काँग्रेस ने जिन गारंटियों के नाम पर चुनाव जीता उनको पूरा करने में पसीने छूट रहे हैं। म.प्र में लाड़ली बहना योजना ने भाजपा को बहुत बड़ी विजय तो दिला दी किंतु उसकी राशि में क्रमशः  वृद्धि करने का साहस प्रदेश सरकार प्रदर्शित नहीं कर पा रही। 12 वीं में अच्छे अंक लाने वाले छात्र / छात्राओं को लैपटॉप देने के लिए भी आर्थिक साधन  कम पड़ रहे हैं।  राज्यों के साथ ही केंद्र सरकार भी गरीब कल्याण योजनाओं से खजाने पर पड़ने वाले बोझ से परेशान है। रोचक बात ये है कि  मुफ्त उपहार रूपी इन योजनाओं को शुरू करना शेर पर सवार होने जैसा है  क्योंकि उन्हें बंद करना  उसकी पीठ से उतरने के बाद निर्मित हालात जैसा होता है। मोदी सरकार द्वारा किसानों के खाते में 2 हजार रु. की सम्मान निधि तीन किश्तों में जमा होती है। सालाना 6 हजार रु. पाने वाले ज्यादातर किसान ये उलाहना देते नहीं थकते कि इतनी राशि में होता क्या है? लेकिन सरकार इसे बंद कर दे तो पूरी किसान लाॅबी उसके विरुद्ध सड़कों पर उतर आयेगी। यही स्थिति उन समस्त योजनाओं के साथ जुड़ी हुई है जिनके जरिये वोट बटोरने का धंधा चल पड़ा है। ऐसी योजनाएं चुनाव में तात्कालिक लाभ तो दे देती हैं किंतु कालांतर में इनसे भारी  नुकसान  होता है जिसकी भरपाई हेतु सरकार कर और दर दोनों बढ़ाती है। ताजा उदाहरण कर्नाटक का ही है जहाँ की राज्य सरकार ने लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित होते ही पेट्रोल - डीजल महंगा करने के साथ ही बिजली की दरें भी बढ़ा दीं। भाजपा ने  इसे जनविरोधी कदम बताया किंतु लगभग दो दशक से उसके द्वारा  शासित म.प्र में पेट्रोल - डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के चुनाव में काँग्रेस ने ओल्ड पेंशन योजना शुरू करने का वायदा किया। इस राज्य में शासकीय कर्मचारी बड़ी संख्या में होने के कारण उस वायदे ने जादू का काम किया । लेकिन कुछ महीने ही बीते और यह वायदा गले में हड्डी की तरह फंस गया। निकट भविष्य में हरियाणा और महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लोकसभा चुनाव में इन दोनों में विपक्ष का प्रदर्शन  जबरदस्त रहने के कारण उसकी तरफ से तमाम लोक - लुभावन वायदे किये जाने की संभावना है। दूसरी तरफ भाजपा अपनी सरकार बचाने के लिए जवाबी दाँव चलेगी। ऐसे में जीत किसी को भी मिले किंतु लाभार्थी समुदाय को छोड़कर  बाकी जनता की पीठ पर नये करों का बोझ बढ़ना तय है। इस खेल से समाज का वह मध्यमवर्ग निराश है जिसे राजनीतिक दल घर की मुर्गी दाल बराबर समझते हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उ.प्र में इस वर्ग के बीच किये गए सर्वेक्षण में उनका यह गुस्सा खुलकर सामने आया कि  आयकर छूट की सीमा न बढ़ने से उनकी बचत करने की क्षमता घटती जा रही है। उनका यही असंतोष मतदान का प्रतिशत कम होने के तौर पर सामने आया। यहाँ तक कि वाराणसी तक में भाजपा का प्रतिबद्ध मध्यमवर्गीय मतदाता  उत्सहविहीन होकर घर बैठा रहा। हालांकि वह नरेंद्र मोदी सरकार की वापसी भी चाहता था। दूसरी तरफ  मुस्लिम और यादव मतदाता केंद्र और राज्य की अनेक लोक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के बावजूद भाजपा के विरुद्ध खुलकर मतदान करते नजर आये। हालांकि म.प्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहाँ भाजपा की जड़ें गहरी हैं उनमें कम मतदान के बावजूद भाजपा को अच्छी सफ़लता मिली किंतु बाकी राज्यों के मध्यमवर्ग में मुफ्त योजनाओं के प्रति गुस्से का असर कम मतदान के रूप में देखने मिला जिसने भाजपा की लुटिया डुबो दी। ऐसा नहीं है कि अन्य पार्टियों के शासन वाले राज्यों में इनका असर नहीं हुआ। मसलन हिमाचल प्रदेश में जहाँ काँग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया वहीं कर्नाटक में वह भाजपा की बढ़त नहीं रोक सकी। चुनाव बाद इस तरह के वायदों पर रोक लगाने की मांग उठने लगी है। चुनाव आयोग से  पहल की अपेक्षा की जा रही है।  सर्वोच्च न्यायालय से भी स्वतः संज्ञान लेकर इसे रोकने की अपील हो रही है। विशेष रूप से काँग्रेस द्वारा मल्लिकार्जुन खरगे एवं राहुल गाँधी के हस्ताक्षरयुक्त वह गारंटी पत्र चर्चा में है जिसमें महिलाओं को 8500 रु. प्रति माह देने की बात कही गई थी। ये आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि उस आधार पर काँग्रेस के नव निर्वाचित सांसदों का चुनाव भी रद्द हो सकता है। बहरहाल समय आ गया है जब  चुनाव प्रक्रिया को फुथपाथ बाजार के स्तर से उठाने कड़े निर्णय लिए जाएं। गरीबों का हितचिंतन सर्वोच्च प्राथमिकता है किंतु जब बात सबका साथ सबका विकास की हो रही हो तब समाज के अन्य वर्गों की जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए वरना उनमें व्याप्त असंतोष बढ़ता ही जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 21 June 2024

आरक्षण के नाम पर बेवकूफ बनाने का सिलसिला बंद हो

बिहार में आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाकर 65 किये जाने सम्बन्धी कानून को उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। इसके अंतर्गत ईबीसी, ओबीसी, दलित और आदिवासी आरक्षण में 15 प्रतिशत की वृद्धि कर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई 50 फीसदी की सीमा से अधिक कर दिया गया था। आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को भी 10 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त होने से पूरा आंकड़ा 75 प्रतिशत हो गया जिसे न्यायालय ने संविधान विरोधी मानते हुए निरस्त कर दिया। इसी के साथ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को ये सुझाव भी दिया कि वह आरक्षित वर्ग में शामिल क्रीमी लेयर को छांट कर जरूरतमंदों को इस व्यवस्था का लाभ पहुंचाए। इस फैसले को चुनौती देने का ऐलान उपमुख्यमंत्री द्वारा कर दिया गया है। ये पहला अवसर नहीं है जब आरक्षण का प्रतिशत 50 से अधिक किये जाने के फैसले को अदालत ने रद्द किया हो। महाराष्ट्र  सहित कुछ अन्य राज्यों द्वारा की गई ऐसी ही कोशिश अतीत में न्यायपालिका द्वारा रद्द की जा चुकी है। बावजूद इसके ऐसी हिमाकत क्यों की जाती है ये समझ से परे है। दरअसल तमिलनाडु की जयललिता सरकार ने पी.वी नरसिंहराव की  तत्कालीन केंद्र सरकार पर दबाव डालकर अपने राज्य में 69 प्रतिशत आरक्षण को संविधान की 9 वीं सूची में डलवा दिया जिसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। राव सरकार चूंकि अल्पमत में थी इसलिए उसे जयललिता की पार्टी से मिल रहे समर्थन के बदले उनकी वह मांग माननी पड़ी जो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध थी। उससे प्रेरित होकर कुछ और राज्यों में ऐसे प्रयास सरकार द्वारा किये गए जिन्हें या तो अदालत ने रद्द कर दिया या वे विचाराधीन हैं। आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए सभी राजनीतिक दल अपने - अपने स्तर पर प्रयासरत रहते हैं । हालांकि वे जानते हैं कि वैसा करना आसान नहीं होगा किंतु जनता को फुसलाकर वोट बटोरने के लिए बड़े - बड़े नेता तक आरक्षण के नाम पर फुसलाने और डराने का काम करते हैं । हाल में संपन्न लोकसभा चुनाव में काँग्रेस नेता राहुल गाँधी हर सभा में आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का वायदा करते सुनाई दिये। चूंकि उनको पता था कि न तो काँग्रेस और न ही इंडिया गठबंधन को सरकार बनाने लायक संख्याबल मिलेगा इसलिए उन्होंने मतदाताओं को संविधान की किताब दिखा - दिखाकर डराया कि भाजपा इसमें संशोधन कर आरक्षण छीन लेगी। इस तरह की तथ्यहीन बातें आरक्षण को लेकर रोज सुनाई देती हैं। सही बात तो ये है कि कोई भी राजनीतिक दल इस बारे में अपनी प्रामाणिकता साबित नहीं कर सका है। जो मायावती एक जमाने में सवर्णों के प्रति बेहद अपमानजनक  बातें कहा करती थीं उन्होंने एक ब्राह्मण को बसपा का महासचिव बनाकर उन्हें आरक्षण दिये जाने का शिगूफा छोड़ दिया। 2007 में उ.प्र की सत्ता उनको सवर्ण जातियों के समर्थन से ही प्राप्त हुई थी। उस चुनाव में तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार की जगह राज्य की दीवारों पर हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है , का नारा देखने मिला। आज मायावती यदि हाशिये पर चली गईं तो उसके पीछे वही दोगली सोच है। ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार कानूनी स्थिति नहीं समझते लेकिन मतदाताओं को भ्रमित करने का प्रयास कोई राजनेता नहीं छोड़ते। श्री गाँधी भी भली - भाँति जानते हैं कि आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन उतना सरल नहीं जितना वे बताते थे किंतु मुँह चलाने में क्या जाता है, सो चला दिया। म.प्र में ओबीसी आरक्षण का पेच लंबे समय से फंसा हुआ है। 2018 के विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने आरक्षण के पक्ष में बयान देते हुए कह दिया कि कोई माई का लाल उसे हटा नहीं सकता। इसकी गैर आरक्षित वर्ग में जबरदस्त रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई जिसके परिणामस्वरूप भाजपा स्पष्ट बहुमत से थोड़ा सा ही सही किंतु पीछे रह गई। बेहतर हो राजनीतिक दल एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर एक दिशा तय करें। आरक्षण का मुख्य फायदा जिन सरकारी नौकरियों में हैं वे धीरे - धीरे घटती जा रही हैं। निजीकरण तो इसका एक कारण है ही लेकिन सरकारी खजाने पर बढ़ता बोझ भी बड़ी वजह है। ये देखते हुए जरूरी है कि आरक्षण के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाना बन्द हो। राजनेताओं को ये समझना होगा कि ऐसे वायदे न करें जिन्हें पूरा करना संभव नहीं होता। आरक्षण के कारण समाज को खंडित करने के बाद भी राजनेताओं का मन नहीं भरा। जातियों के भीतर से उपजातियों का उदय एक नये वर्ग संघर्ष का कारण बन रहा है। जिसके आगे कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है का नारा अर्थ खोता जा रहा है। यदि अभी भी राजनेताओं ने अपना रवैया नहीं बदला तो देश जातीय संघर्ष के जाल में फंसकर रह जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 June 2024

परीक्षाएं रद्द होने का प्रभाव हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव पर होना तय

क दिन पहले ही संपन्न  यूजीसी - नेट परीक्षा रद्द कर दी गई। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को कुछ गड़बड़ियों की जानकारी मिलने के बाद सीबीआई को जांच भी सौंप दी गई । परीक्षा की नई तारीख जल्द घोषित की जाएगी। नीट नामक परीक्षा को लेकर अनिश्चितता बरकरार है और जैसी परिस्थितियाँ  हैं उनमें यह परीक्षा भी रद्द की जा सकती है । प्राप्त जानकारी के मुताबिक यूजीसी - नेट में 9 लाख और नीट में लगभग 24 लाख छात्रों द्वारा परीक्षा दी गई। पर्चा लीक होने और ग्रेस अंक जैसे मुद्दों पर नीट परीक्षा का मसला विवादों के बाद सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा वहीं यूजीसी - नेट के रद्द होने का कारण स्पष्ट नहीं है। वैसे उसके पीछे भी पर्चा लीक होना बड़ा कारण हो सकता है। इन दो परीक्षाओं के बाद नेट ( नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) की कार्य कुशलता और ईमानदारी दोनों पर उंगलियाँ उठ रही हैं जो पूरी तरह से सही भी है। इस बारे में सबसे अखरने वाली बात ये है कि नेट के अध्यक्ष डाॅ. प्रदीप जोशी के विरुद्ध केंद्र सरकार ने कोई कारवाई नहीं की जबकि नेट के कारण ही नव नियुक्त शिक्षा  मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को अपना बयान बदलने पर आलोचना झेलनी पड़ी। इसमें दो राय नहीं कि उक्त परीक्षाओं में हुई धांधली के लिए नेट पूरी तरह जिम्मेदार है किंतु इसके साथ ही उन कोचिंग संस्थानों की भी भूमिका है जो छात्रों को परीक्षा में उत्तीर्ण करवाने की गारंटी देकर मोटी रकम वसूलते हैं। सफल छात्रों  के चित्र सहित अखबारों में पूर्ण पृष्ठ के विज्ञापन भी प्रकाशित करवाए जाते हैं। इन कोचिंग संस्थानों के परीक्षा से जुड़े   विभागों से मधुर संबंध होते हैं। जिसका माध्यम जाहिर है सौजन्य भेंट होती है। नीट परीक्षा घोटाले में बिहार के एक मंत्री के अलावा पूर्व उपमुख्यमन्त्री का नाम भी उछल रहा है ।  यदि इसमें सच्चाई निकली तब मामले की गहराई और बढ़ जाएगी। सरकारी नौकरियों के अलावा नीट और यूजीसी - नेट जैसी परीक्षाओं के पर्चे लीक होने अथवा किसी कारण से रद्द होने पर लाखों युवाओं की मेहनत के साथ - साथ उनके अभिभावकों द्वारा खर्च किया जाने वाला धन भी बरबाद होता है। परीक्षा रद्द होने से उन युवाओं की ज़िंदगी का मूल्यवान समय भी नष्ट होता है जिसकी भरपाई संभव नहीं। सबसे बड़ी बात नेट नामक संस्थान की विश्वसनीयता की है जो इन दिनों मिट्टी में  मिल चुकी है। इतने बड़े घोटाले के बाद अब तक उसके मुखिया द्वारा नैतिकता के नाम पर स्तीफे की पेशकश न करना ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उनमें शर्म नाम की चीज नहीं है। भले ही जाँच में वे निर्दोष निकलें किंतु नेट की अक्षमता तो उजागर हो ही गई जिसके प्रमुख होने के नाते वे अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। आश्चर्य की बात है केंद्र सरकार ने अभी तक डाॅ. जोशी की छुट्टी क्यों नहीं की। बताया जाता है उन पर मौजूदा सरकार की असीम कृपा है जिसके चलते वे यूजीसी ( वि.वि अनुदान आयोग के सदस्य और अध्यक्ष) बनाए गए और फिर नेट का सर्वोच्च पद उन्हें सौंप दिया गया। लेकिन किसी जिले में कोई बड़ी आपराधिक घटना के बाद कलेक्टर और एस.पी को जिस तरह हटा दिया जाता है वैसा ही नेट के मुखिया सहित कुछ वरिष्ट ओहदेदारों के साथ होना चाहिए था। लेकिन केंद्रीय  शिक्षा मंत्री श्री प्रधान ठीक तरह से सरकार का पक्ष तक नहीं रख सके। मोदी सरकार की तीसरी पारी में ये मुद्दा सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने की कहावत चरितार्थ कर रहा है। संसद सत्र शुरू होने के पहले ही विपक्ष के हाथ बड़ा मुद्दा लग गया है सत्ता पक्ष को घेरने का। नई लोकसभा में विपक्ष संख्याबल के आधार पर   पूर्वापेक्षा काफी ताकतवर है । ऐसे में सरकार के लिए बचाव करना कठिन होगा क्योंकि उसके पास विपक्ष को शांत करने के लिए कोई संतोषजनक उत्तर अब तक तो नजर नहीं आ रहा। जाँच एजेंसियों को मामले की तह तक पहुँचने में लम्बा वक्त लगेगा। उसके पहले ही  यूजीसी - नेट  परीक्षा दोबारा करवाने की घोषणा हो गई। लेकिन नीट को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जिसके कारण लाखों युवाओं की साँस ऊपर - नीचे हो रही है और अभिभावक भी मानसिक तनाव में हैं। आने वाले  महीनों में हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जिनमें विपक्ष इस विषय को उछालकर भाजपा को घेरेगा। इस विवाद से वे युवा भी नाराज हैं जो निकट भविष्य में उक्त परीक्षाओं में बैठने की तैयारी कर रहे हैं और  मतदाता भी हैं। लोकसभा चुनाव में राजस्थान और उ.प्र में सरकारी नौकरियों के लिए आयोजित  परीक्षा  पर्चा लीक होने के कारण रद्द होने से युवा मतदाताओं की नाराजगी भाजपा की सीटें घटने के रूप में सामने आ चुकी है। यदि इस विवाद का समय रहते हल नहीं निकला तो हरियाणा और महाराष्ट्र में भी उ.प्र  और राजस्थान जैसे परिणाम की पुनरावृत्ति हो सकती है। जो युवा इन परीक्षाओं में भाग नहीं लेते वे भी भविष्य की चिंता में डूबकर अपना गुस्सा वोट के रूप में व्यक्त करने से बाज नहीं आयेंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 June 2024

वामपंथी : बंगाल की खाड़ी के बाद अरब सागर में डूबने के कगार पर


आजादी के बाद  पहली लोकसभा में वामपंथी सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर उभरे ।  बाद में उनकी संख्या ऊपर - नीचे होती रही । कालांतर में प. बंगाल , त्रिपुरा और केरल साम्यवाद के मजबूत गढ़ के तौर बने  किंतु अविभाजित आंध्र  प्रदेश, बिहार, उ.प्र, म.प्र और महाराष्ट्र की कुछ सीटें साम्यवादी सांसद चुनती रहीं जिनमें एस. एम. बैनर्जी,,चतुरानंद मिश्र, चंद्रजीत यादव, होमी दाजी जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। प.बंगाल में लगभग चार दशक के शासन के दौरान दर्जनों वामपंथी नेता लोकसभा सदस्य बने। लेकिन मौजूदा हालात में त्रिपुरा और प. बंगाल में वामपंथी शून्य पर हैं। बिहार में एक तो सरकार होते हुए भी केरल में आधा दर्जन सीटें तक साम्यवादियों को नसीब न हो सकीं। नई लोकसभा में हंसिया- हथौड़ा , लाल निशान वालों को पहचानना मुश्किल हो जायेगा। सबसे बड़ी बात प. बंगाल की  उर्वरा भूमि का बंजर  हो जाना है।  जहाँ से कभी दर्जनों वामपंथी  सांसद लोकसभा में आते रहे हों वहाँ से एक भी सांसद में नहीं होगा। विधानसभा में भी लाल निशान  वालों का नामो- निशां मिट गया । राज्य में  वामपंथ को अपराजेय बनाए रखने वाले ज्योति बसु को जब संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया तब उनकी पार्टी सीपीएम ने इंकार कर दिया। ज्योति बाबू ने उस फैसले का मान रखा। हालांकि बाद में उसे  हिमालयी भूल का नाम भी दिया। यद्यपि इंद्रजीत गुप्त और चतुरानन मिश्र सरकार में मंत्री बने। इसी तरह 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह की अल्पमत सरकार को वामपंथियों ने बाहर से समर्थन देने की नीति तय की किन्तु अपने वरिष्ट  नेता सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष बनवा दिया। इस मामले में रोचक मोड़ तब आया जब भारत - अमेरिका परमाणु संधि के विरोध में वामपंथियों ने समर्थन वापस लेते हुए सोमनाथ दा से पद छोड़ने कहा तो उन्होंने इंकार कर दिया और पार्टी से निष्कासित हो गए। 2011 में प.बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार  बनने के बाद वाममोर्चा कमजोर होता गया और अंततः काँग्रेस के साथ गठबंधन को मजबूर हुआ। 2014 के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी के सत्तासीन होने के बाद त्रिपुरा नामक  एक और वामपंथी गढ़ में भाजपा काबिज हो गई। साम्यवादियों के पास केवल केरल बचा जहाँ काँग्रेस की अगुआई में एल. डी. एफ उनका प्रसिद्वंदी है। संयोग से प. बंगाल और केरल विधान सभा के चुनाव एक साथ - साथ होते हैं जिनमें वामपंथी प. बंगाल में काँग्रेस के साथ मिलकर ममता बैनर्जी के विरुद्ध खड़े होते हैं वहीं केरल में एक -  दूसरे  पर तलवार  भाँजते हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी ये हुआ और वायनाड में राहुल गाँधी के विरुद्ध सीपी आई महासचिव डी. राजा की पत्नी को खड़ा कर दिया गया । वामपंथी 2014 के बाद से भाजपा विरोधी सभी गठबंधनों में शामिल हैं । वर्तमान में इंडिया नामक गठबंधन में भी उनकी हिस्सेदारी है। बावजूद इसके केरल में काँग्रेस ने  लोकसभा की अधिकांश सीटें जीतकर वामपंथियों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। सच ये है कि भाजपा के अंध विरोध में वामपंथी उस काँग्रेस की गोद में  जा बैठे जो उनका उपयोग तो करती है किन्तु उनके लिए कांटे बिछाने से भी  बाज नहीं आती। जातिवादी नेताओं का समर्थन करने में भी वामपंथी संकोच नहीं करते। इन कारणों से साम्यवाद अपनी विशिष्टता खो बैठा है। नक्सलियों या माओवादियों  के रूप में जो सशस्त्र उग्रवादी सत्तर के दशक से देश में खूनी क्रांति के जरिये साम्यवाद थोपना चाहते थे वे भी अब माफिया गिरोह बन चुके हैं जिनका काम  आतंक फैलाकर पैसे वसूलना  है। खनिज संपन्न आदिवासी इलाके इनका कार्यक्षेत्र हैं। सरकार की सख्ती से हताशा में वे हिंसक वारदात करने से बाज नहीं आते किन्तु उनका सफाया तेजी से हो रहा है। आजादी के बाद से ही  साम्यवादियों ने काँग्रेस को बहला - फुसलाकर  शैक्षणिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थानों में अपने लोग बिठाये थे किन्तु मोदी सरकार आने के बाद उन सबकी छंटनी होने लगी जिससे कि वामपंथी बुद्धिजीवियों में छटपटाहट बढ़ी और असहिष्णुता जैसे मुद्दे उछालकर  अवार्ड वापसी रूपी नाटक किया गया। शहरी नक्सली नामक एक नया वर्ग भी सामने आया जो छद्म रूप से देश विरोधी हिंसक ताकतों को सहायता और संरक्षण देता है। लेकिन साम्यवाद का जो ग्लैमर 60 - 70 के दशक में हुआ करता था वह कमजोर पड़ा है। जे .एन.यू जैसे कुछ संस्थान भले ही वामपंथ की नर्सरी बने हों किन्तु कन्हैया कुमार का सीपीआई में जाना और फिर काँग्रेस में आ जाना  इस बात का प्रमाण है कि युवाओं को इस विचारधारा की रूमानियत अब लुभाती नहीं है। ऐसे में  बंगाल की खाड़ी के बाद साम्यवाद  अरब सागर (केरल) में भी डूबने के कगार पर है। भाजपा के विरोध में डाॅ. मनमोहन सिंह जैसे पूंजीवाद समर्थक व्यक्ति की सरकार को टेका लगाकर साम्यवादियों ने अपनी वैचारिक पहचान नष्ट कर ली। यही वजह है कि नई लोकसभा में वे दहाई का आंकड़ा छूने को तरस गए। आश्चर्य नहीं होगा यदि  जल्द ही ये नारा सुनने मिले कि हंसिया, हथौड़ा, लाल निशान ढूढ़ रहा है हिंदुस्तान। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 June 2024

राहुल का रायबरेली से सांसद रहना अखिलेश के लिए खतरे की घंटी

राहुल गाँधी रायबरेली नहीं छोड़ेंगे ये तो तय था। काँग्रेस  6 लोकसभा सीटें मिलने से लंबे समय बाद  इस राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकी।  अमेठी भी  जीतने से उसका उत्साह बढ़ा है। पहले कहा गया कि वे श्री गाँधी वायनाड से सांसद रहेंगे और रायबरेली से  प्रियंका वाड्रा को उपचुनाव लड़वाया जाएगा। दरअसल गाँधी परिवार श्रीमती वाड्रा को पहले चुनाव में पराजय की शर्मिंदगी से बचाना चाहता था। इसीलिए उन्हें अमेठी से नहीं उतारा गया जहाँ राहुल पराजय का स्वाद चख चुके थे। जब  तय हो गया कि सोनिया गाँधी चुनाव। से दूर हो रही हैं तब उनकी जगह बेटी को उतारने की चर्चा चली। राहुल के दोबारा  वायनाड से लड़ने पर  ये संभावना और बढ़ी। लेकिन काँग्रेस ने वहाँ मतदान होने तक रायबरेली और अमेठी के प्रत्याशी की घोषणा रोके रखी तब लगा कि श्री गाँधी संभवतः अमेठी से लड़कर स्मृति ईरानी से अपनी हार का बदला लेंगे किंतु नामांकन के आखिरी दिन उन्हें रायबरेली और किशोरीलाल शर्मा नामक गाँधी परिवार के करीबी  को अमेठी से उम्मीदवारी सौंप दी गई। जो कई दशकों से उक्त दोनों सीटों पर परिवार का राजनीतिक प्रबंधन देख रहे  थे। रायबरेली से तो राहुल की जीत लगभग तय थी।किंतु अमेठी में श्री शर्मा को कमजोर मानने की गलती भाजपा ने की और स्मृति ईरानी एक ऐसे शख्स से पराजित हो गईं जिसकी हैसियत गाँधी परिवार के एक मुलाजिम जैसी थी। हार का अंतर डेढ़ लाख से ज्यादा होना साबित कर गया कि यदि श्री गाँधी होते तब  वह और  बड़ा होता। रायबरेली में राहुल अपनी माताजी की पिछली जीत से दोगुना मतों से विजयी हुए। इन दोनों जीतों में गाँधी परिवार के प्रभाव  से अधिक सपा का खुला समर्थन रहा। यद्यपि सपा लोकसभा चुनाव में  अमेठी और रायबरेली से पहले भी अपने  प्रत्याशी नहीं उतारती थी  किंतु इस बार जहाँ अखिलेश ने रायबरेली में राहुल का प्रचार किया वहीं कन्नौज में श्री गाँधी द्वारा अखिलेश के लिए वोट मांगे गए। चुनाव परिणामों में सपा  36 और काँग्रेस 6 पर विजेता रही। वहीं भाजपा 62 से घटकर 33 पर आ गई। उसके सहयोगी 3 सीट जीत पाए। इन नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति को तो प्रभावित किया ही क्योंकि इन्हीं के कारण भाजपा 272 के आंकड़े से काफी पीछे रह गई। लेकिन उ.प्र के सियासी समीकरण भी काफी उलट - पलट गए। मसलन बसपा जो सपा के साथ मिलकर 2019 में 10 सीटें जीत गई थी वह शून्य पर खिसक गई। वहीं  1 सीट पर सिमटी काँग्रेस को  पुनर्जीवन मिल गया। हालांकि इतने बड़े राज्य में महज 6 सांसद होना उसके लिए शर्मनाक है और ये सीटें भी उसे सपा के समर्थन से मिल सकीं। वरना उसे 2022 के विधानसभा  चुनाव जैसे परिणाम झेलना पड़ते जब उसे 403 में से मात्र 2 सीटें ही नसीब हुईं। इस बार सपा ने उसे कुल 17 सीटें लड़ने दी थीं जो राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत से बेहद कम होने के बाद भी उसने स्वीकार कीं क्योंकि अपनी दयनीय स्थिति का आभास गाँधी परिवार को था। पिछले  चुनाव में अमेठी के किले का ढह जाना और रायबरेली में जीत का अंतर आधा हो जाने  के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका के लड़की हूँ , लड़ सकती हूँ नारे के साथ धुंआधार प्रचार करने के बावजूद केवल 2 सीटें मिलने से  राज्य में काँग्रेस के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया। यदि इस लोकसभा चुनाव में वह अकेले लड़ती तब रायबरेली और अमेठी भी हाथ से निकलना असम्भव नहीं था । राहुल द्वारा रायबरेली सीट से सांसद बने रहने के पीछे पार्टी को उ.प्र में अपने पैरों पर खड़ा करने की सोच है । इसीलिए उन्होंने वायनाड छोड़ दी जहाँ से प्रियंका किस्मत आजमायेंगी। यद्यपि केरल में दो साल बाद विधानसभा चुनाव हैं। इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद इस राज्य में काँग्रेस और वामपंथी अलग - अलग हैं। यहाँ तक वायनाड से भी वामपंथियों ने  अपना उम्मीदवार  उतारा।  राहुल वायनाड से सांसद बने रहकर आगामी विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे से सत्ता छीनने का प्रयास करते  किंतु उन्होंने उ.प्र को प्राथमिकता दी जहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में काँग्रेस को मजबूत करना है तो उ.प्र में उसकी प्रभावशाली मौजूदगी जरूरी है। रायबरेली से सांसद रहकर वे इस उद्देश्य को कितना पूरा कर सकेंगे ये कहना कठिन है किंतु उनका फैसला अखिलेश के लिए खतरे की घंटी है जो राज्य की सत्ता दोबारा हासिल करने का सपना  देखा करते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश और राहुल मिलकर लड़े किंतु निराशा हाथ लगने के बाद अलग हो गए। इस बार गठबंधन के परिणाम तो उत्साहवर्धक रहे किंतु मोदी सरकार की वापसी हो जाने के बाद दोनों दलों के एक दूसरे के विरुद्ध हो जाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। राहुल जानते हैं सपा को कमजोर किये बिना काँग्रेस का उत्थान असंभव है। दूसरी तरफ श्री यादव भी उ.प्र में अपनी हैसियत खोना नहीं चाहेंगे। ऐसे में  दोनों  में महत्व की लड़ाई होने की संभावना है । राहुल जहाँ राष्ट्रीय नेता  की छवि के कारण हावी होने की कोशिश करेंगे जो सपा प्रमुख को शायद ही गंवारा होगा। ये देखते हुए आने वाले दिन उ.प्र की राजनीति में बेहद उथल - पुथल भरे होंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 17 June 2024

असम के मुख्यमंत्री द्वारा उठाया कदम स्वागत योग्य



असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा  विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं। अपने राज्य में उनकी लोकप्रियता भी स्वयं सिद्ध है। गत दिवस उन्होंने एक कार्यक्रम में घोषणा की कि 1 जुलाई से मुख्यमंत्री, मंत्री और सरकारी अधिकारियों को अपने आवास का बिजली बिल खुद भरना होगा। राज्य में बिजली की दरें बढ़ाकर जनता पर बोझ डालने की बजाय ऐसे कदम उठाये जाने की वकालत करते हुए श्री सरमा ने वीआईपी संस्कृति खत्म करने पर भी जोर दिया। 2026 में राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और एक कुशल राजनेता के तौर पर मुख्यमंत्री ने जनता को खुश करने के लिए उक्त कदम उठाया जिसकी विपक्ष भी आलोचना नहीं करेंगे। लेकिन उनका यह फैसला देश में एक नई बहस को जन्म दे सकता है । आम जनमानस में ये बात तेजी से समा चुकी है कि वीआईपी वर्ग को मिलने वाली विशेष सुविधाओं का आर्थिक बोझ अंततः उसी के कंधों पर तो आता है। हमारे देश में सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और अफसरों  को नाम मात्र के किराये पर बड़े बड़े बंगले तथा रेल और हवाई यात्रा मुफ्त मिलती है। टोल टैक्स भी नहीं देना पड़ता। आयकर छूट के अलावा बिजली और फोन सुविधा भी सरकारी खर्च पर उपलब्ध है । और तो और सांसद - विधायक न रहने पर भी पेंशन के अलावा निःशुल्क चिकित्सा और रेल यात्रा की सुविधा है। विभिन्न आयोगों, मंडलों और निगम के पदाधिकारी बनाये गए नेताओं को भी सरकारी खजाने से राजसी सुविधाएं दी जाती हैं। सरकारी अधिकारी भी अनेक सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। हालांकि वीआईपी संस्कृति को रोकने की बातें भी खूब होती हैं। नरेन्द्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने संसद भवन की कैंटीन में भोजन की दरें बढ़वाकर प्रशंसा बटोरी। पूर्व सांसदों और पूर्व मंत्रियों द्वारा दिल्ली मेें बड़े - बड़े बंगले घेरे रहने पर भी रोक लगी। उनके कार्यकाल में सांसदों का वेतन भी बहुत अधिक नहीं बढ़ा। लेकिन वे भी इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सके। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि सांसदों की पेंशन बन्द करने जैसा दुस्साहसिक निर्णय लेने की हिम्मत न दिखा सके। ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग करने वाले भी सांसदों - विधायकों की पेंशन का मामला उठाकर अपनी बात का औचित्य साबित करते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि आम जनता भी ये खुलकर कहने लगी है लोकशाही में सामंतवाद के प्रतीक चिन्ह रूपी मुफ्त सुविधाओं को खत्म करना चाहिए। और ये भी कि श्री मोदी ही ऐसा निर्णय लेने में सक्षम हैं। ये बात और है कि भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में उनके लिए ऐसे फैसले करना मुश्किल भरा हो सकता है किंतु  वे प्रबल इच्छा शक्ति का परिचय दें तो जनमत के दबाव के आगे सभी दल समर्थन करने मजबूर होंगे। जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों को समुचित वेतन, भत्ते और सुविधाएं जरूर  मिलें  ताकि वे अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन कर सकें किंतु ऐसा करते समय देश के आम आदमी की हालत भी  देखी जानी चाहिए। सांसद, विधायक ,मंत्रियों औरअफसरों को जिस प्रकार की सुविधाएं दी जा रही हैं उन्हें देखकर नहीं लगता कि ब्रिटिश राज को गए हुए सात दशक से ज्यादा बीत चुके हैं। मोदी सरकार ने हालांकि मुफ्त सुविधाएं बंद करने की दिशा में कुछ कदम उठाये किंतु वे उम्मीद से काफी कम हैं। देश के मध्यम वर्ग में इस बात को लेकर जबरदस्त असंतोष है कि उससे अनाप - शनाप कर वसूलकर किसानों और गऱीबों को  नगद , मकान और राशन आदि मुफ्त  दिया जाता है। लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने युवाओं और महिलाओं को सालाना 1 लाख देने का ऐलान कर दिया। लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था में ऐसा करना स्वाभाविक है लेकिन इनमें संतुलन होना चाहिए। आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग को सहायता और संरक्षण  न्यायोचित है किंतु शासक वर्ग और नौकरशाही को विशेष सुविधाएं मिलना एक सीमा के बाद आम जनता का शोषण है। असम के मुख्यमंत्री की पहल कितनी सफल होगी ये आज आकलन करना ठीक नहीं होगा किंतु शुरुआत हुई ये  प्रशंसा योग्य है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Saturday, 15 June 2024

महाराष्ट्र में काँग्रेस को मिली सफलता से उद्धव की चिताएं बढ़ीं


हमारे देश में जिस तरह खेती का काम कहीं न कहीं चलता ही रहता है ठीक वैसे ही चुनाव भी हर मौसम में कहीं न कहीं होते रहते हैं। बीते 4 जून को लोकसभा चुनाव के परिणाम आते ही अगले कुछ महीनों में होने वाले महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव की चर्चा शुरू हो गई। इन दोनों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। हरियाणा में तो फिर भी उसने 5 अर्थात आधी सीटें जीत लीं किंतु महाराष्ट्र में पार्टी को जबरदस्त झटका लगा। 2019 में मिली 23 सीटों में से 14 उसने गँवा दीं। शिवसेना (उद्धव) गुट ने भाजपा के बराबर 9 सीटें जीतकर  एकनाथ शिंदे को पीछे छोड़ दिया जिनको असली शिवसेना का दर्जा मिलने के बाद भी महज 7 सीटें हासिल हुईं। शरद पवार के हाथ  से एनसीपी भले निकल गई किंतु वे भी 8 सीटें जीतकर  सम्मानजनक स्थिति में आ गए। लेकिन  उनके भतीजे अजीत पवार मात्र 1 सांसद जितवा सके। यहाँ तक कि उनकी पत्नी तक बारामती में शरद पवार की बेटी से पराजित हो गई। इस प्रकार भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 48 सीटों वाले इस सूबे में भारी नुकसान हुआ। लेकिन लाॅटरी खुली काँग्रेस की जिसे 2019 में केवल एक सीट मिली थी किंतु इस चुनाव में उसका आंकड़ा 13 तक जा पहुंचा। जहाँ तक इंडिया गठबंधन की बात है तो  29 सीटें मिलने से आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर  उसका हौसला बढ़ गया है किंतु राजनीति में सब कुछ इतनी आसानी से नहीं होता। और इसीलिए राजनीतिक विश्लेषक अब इस  राज्य में विधानसभा  चुनाव के समीकरणों पर नजरें गड़ाये हुए हैं। सतही तौर पर देखें तो इंडिया गठबंधन काफी आगे है। वहीं एनडीए के अस्तित्व पर खतरा मंडराता दिख रहा है। शिंदे और अजीत के साथ आये कुछ विधायकों की वापसी चर्चा में है। ये भी कि चुनाव के पहले शिंदे सरकार को गिरवा दिया जाएगा जिससे कि भाजपा और उसके साथियों पर दबाव बढ़ाया जा सके। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में उपयुक्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के कारण शिंदे और अजीत नाराज हैं। हालाँकि वे अभी भी भाजपा के साथ हैं। वैसे चुनाव परिणाम आते ही उद्धव और भाजपा के बीच बातचीत की खबरें उड़ने से लगा कि वे वापस एनडीए में आएंगे। शिवसेना के एकीकरण की  अटकलें भी लगने लगीं। दरअसल लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में एनडीए की पराजय सही मायनों में  भाजपा के लिए बहुत बड़ा धक्का है। मुख्यमंत्री शिंदे की शिवसेना ने  तो 7 सीटें जीतकर अपना प्रभाव साबित कर दिया और अजीत पवार को एक सीट मिलना भी कम नहीं है किंतु 14 सीटें गंवाने वाली भाजपा की स्थिति दयनीय हो गई। हालांकि चुनाव के दौरान ही ये नजर आने लगा था  किंतु वह इतने नीचे चली जायेगी ये अंदाज शायद उसके विरोधियों को भी नहीं था । इतिहास में पहली बार भाजपा के विरुद्ध गोलबंद हुए मुसलमानों ने अपने घोर विरोधी उद्धव ठाकरे के उम्मीदवारों को मत देकर सारे अनुमान ध्वस्त कर दिये। लेकिन काँग्रेस को मिली अप्रत्याशित सफलता के कारण उद्धव की खुशी पर पानी पड़ गया। भाजपा के साथ गठबंधन के दौर में सीटों के बंटवारे में शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में रही। स्व. बाल ठाकरे ने  फार्मूला बनाया था कि  जिसके ज्यादा विधायक होंगे उसी पार्टी का मुख्यमंत्री होगा। लेकिन 2014 से पांसा पलटा और भाजपा बड़े भाई की हैसियत में आ गई। उसी के बाद देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन 2019 में शिवसेना ने कम सीटें आने के बाद भी मुख्यमंत्री की ज़िद पकड़ी जिससे गठबंधन टूट गया और उद्धव ने शरद पवार की सलाह पर काँग्रेस के साथ महाअगाढ़ी का साथ लेकर मुख्यमंत्री बनने की  आकांक्षा पूरी कर डाली। उसके बाद जो हुआ वह बेहद नाटकीय था किंतु लोकसभा चुनाव के बाद जो काँग्रेस महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव के सामने बौनी नजर आती थी वह गठबंधन की सिरमौर बन बैठी। और यही उद्धव और उनके समर्थकों के लिए चिंता का सबब है। जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक काँग्रेस अब श्री ठाकरे को और उपकृत करने के मूड में नहीं है। उसे यह समझ आ चुका है कि पार्टी में विभाजन के बाद उद्धव सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। यदि शिंदे गुट भी उनके साथ आ जाए तब भी उनका भाजपा के पास लौटना लगभग असंभव होगा। और अकेले लड़ने का दुष्परिणाम वह 2014 में भोग चुकी थी। ऐसे में उद्धव का इंडिया में बने रहना मजबूरी  है ।  लेकिन  लोकसभा में शानदार प्रदर्शन के आधार पर काँग्रेस गठबंधन की ज्यादा  सीटें मांगेगी जो श्री ठाकरे को शायद ही मंजूर होगा। हालांकि बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते वे ज्यादा बोझ उठाने की स्थिति में नहीं हैं किंतु अपने पुत्र आदित्य को राजनीति में स्थापित करना उसी तरह उनके जीवन का लक्ष्य है । जैसी खबरें मुंबई से निकल रही हैं उनके अनुसार काँग्रेस ने उद्धव को ज्यादा भाव नहीं देने का मन बना लिया है। उसने ये समझ लिया है कि भाजपा विरोधी मतदाता अपने मत का सही उपयोग करना सीख गया है। ऐसे में उद्धव यदि इंडिया गठबंधन छोड़ने का दुस्साहस करते हैं तब उन्हें लोकसभा जैसी सफलता भी नहीं मिलने वाली। हालांकि चुनाव में अभी दो - ढाई महीने बाकी हैं किंतु काँग्रेस अभी से अपनी गर्दन ऊँची करते हुए घूम रही है। हालांकि चिंता में शरद पवार भी हैं लेकिन वे राजनीति के कितने बड़े खिलाड़ी हैं ये जगजाहिर है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 14 June 2024

चयन परीक्षाओं में गड़बड़ियों के दोषी कठोरतम दंड मिलना चाहिए



मेडिकल और डेंटल कालेजों में प्रवेश हेतु आयोजित  होने वाली नीट - 2024 परीक्षा में कुछ छात्रों को ग्रेस मार्क्स  दिये जाने के बाद वे प्रतिस्पर्धा में अन्य छात्रों के साथ शामिल हो गए। प्रश्न पत्र लीक होने का विवाद भी उठा। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। गत दिवस इन परीक्षाओं को आयोजित करने वाली संस्था नेट ने अदालत में ग्रेस मार्क्स प्राप्त छात्रों की परीक्षा दोबारा लेने के बाद परिणाम 30 जून तक घोषित करने के निर्णय की जानकारी दी। इस प्रकार ग्रेस मार्क्स दिये जाने के विवाद पर पर तो विराम लगा किंतु प्रश्नपत्र लीक होने का मुद्दा  सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।  यह कहना गलत न होगा कि सरकार द्वारा आयोजित  प्रतियोगी परीक्षाओं में धाँधली अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी है। म.प्र का  व्यापमं घोटाला देश भर में चर्चित हुआ था। पिछले विधानसभा चुनाव के पहले पटवारी चयन परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार पर भी बवाल मचा। राजस्थान और उ. प्र में भी सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने से परीक्षाएं टाली जाती रहीं जिससे लाखों युवाओं  में नाराजगी बढ़ी जिसका खामियाजा भाजपा को हालिया लोकसभा में उठाना पड़ा। शिक्षित युवा वर्ग में सरकारी नौकरी का आकर्षण काफी होता है। और फिर बड़ी संख्या में पद खाली भी पड़े हैं। जिसकी वजह से सरकारी कामकाज प्रभावित होता है। ऐसे में प्रश्न पत्रों के लीक होने की वजह से परीक्षाओं को टालने से दोहरा नुकसान होता है। जहाँ तक बात नीट या उस जैसी अन्य परीक्षाओं की है तो उनकी प्रामाणिकता असंदिग्ध होनी चाहिए क्योंकि इनसे देश का भविष्य जुड़ा हुआ है। संघ लोकसेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं को लेकर भी इस तरह की शिकायतें मिलती रही हैं। प्रश्न ये है कि जिन परीक्षाओं के जरिये देश की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय विकास की मुख्य धारा मैं शामिल किया जाता है उनमें होने वाले भ्रष्टाचार को कब तक साधारण गलती मानकर लीपापोती होती रहेगी। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार चाहे प्रश्न पत्रों को लीक करने का मामला हो या फिर परीक्षाओं में गड़बड़ी का, उसमें कोचिंग संस्थानों और परीक्षाओं को आयोजित करने वाली सरकारी संस्था की संगामित्ती  के कारण ये घोटाले होते हैं। ये बात तो किसी से छिपी नहीं है कि निजी कोचिंग संस्थान अब एक उद्योग का रूप ले चुके हैं। उनका व्यवसाय इसी  पर टिका होता है कि उनके संस्थान से कितने बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए। कोटा का कोचिंग उद्योग तो सुप्रसिद्ध है। ऐसे में यह शंका करना गलत नहीं है कि इस तरह की गड़बड़ियां बिना गिरोहबंदी के संभव नहीं होतीं। जबसे शिक्षा में निजी क्षेत्र की उपस्थिति बढ़ी है तबसे वह अपने पवित्र उद्देश्य से भटक चुकी है। इसका प्रमाण विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक फैला हुआ है। निजी क्षेत्र द्वारा की जाने वाली अनियमियताएं तो अनपेक्षित नहीं होतीं किंतु प्रतिष्ठित शासकीय एजेंसियां भी जब उनके गोरखधंधे में हिस्सेदार हो जाती हैं तब स्थिति चिंताजनक हो जाती है। व्यापमं , नीट अथवा अन्य कोई एजेन्सी के किसी कार्य में अनियमितता सामने आने पर  समूची व्यवस्था कटघरे में खड़ी हो जाती है। नई पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले चाहे सरकारी के हों या निजी क्षेत्र के, उनको कड़े से कड़ा दंड सुनिश्चित किये बिना इस तरह की विसंगतियाँ रोक पाना असंभव होगा। निजी क्षेत्र के शिक्षा संस्थानों में  राजनेताओं की उपस्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक होने और ग्रेस मार्क्स देने के मामलों में उनकी भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में जो अंतिम निर्णय देगा उससे स्थिति काफी कुछ साफ हो जायेगी किंतु केन्द्र सरकार को चाहिए वह अपने स्तर पर भी जाँच करे क्योंकि अपना घर साफ रखना उसका भी तो दायित्व है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 12 June 2024

बेसुरे बजते विपक्ष के ढोल


पूरे लोकसभा चुनाव का प्रचार देखें तो झूठ और भ्रम का सबसे अधिक सहारा लिया गया है। संघ शिक्षा वर्ग में संघ प्रमुख डॉक्टर मोहन राव भागवत ने कई महत्वपूर्ण बातें कही है। उनके बौद्धिक का कुछ-कुछ हिस्सा अपने हिसाब से उपयोग में लाया जा रहा है। कुछ के लिए सुविधाजनक अहंकार शब्द वाला हिस्सा है तो कुछ के लिए विरोधी दल को प्रतिपक्ष मानना चाहिए,  यह वाला हिस्सा है। संघ प्रमुख ने झूठ और फरेब के आधार पर चुनाव जीतने को पूरी तरह अनुचित  बताते हुए कहा कि जनता के बीच में ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया गया कि वह सच को समझ नहीं पाई । ऐसी स्थिति में विजय प्राप्त करना या कुछ सीट बढ़ा लेना अंततोगत्वा राष्ट्र के लिए नुकसानदायक ही सिद्ध होगा। यह नहीं कहा जा सकता कि भ्रमित करने का कार्य केवल विपक्ष के द्वारा ही किया गया है? सत्ता पक्ष को जब यह लगा कि भ्रमित करने का प्रयास तेजी से हो रहा है और उस प्रयास के साथ अल्पसंख्यक समुदाय का वोट बैंक शामिल हो रहा है तब भ्रमित करने वाले बाण सत्ता पक्ष की ओर से भी चलाए गए। इस चुनाव में संविधान को समाप्त करना और आरक्षण को समाप्त करने जैसे जुमले ने जनमानस में एक ऐसा वातावरण पैदा किया जो नरेंद्र मोदी की छवि के तिलिस्म को भेदने में कुछ हद तक तो कामयाब रहा। यह लोकसभा चुनाव अंत तक इसी प्रकार के वातावरण के घटाटोप में चलता रहा और अपेक्षित  परिणाम प्रभावित हो गए। जब चुनाव परिणाम आए तब भी सरकार बनाने के दावों -  प्रतिदावों में ऐसा ही वातावरण बनाने का प्रयास किया , जिसमें भ्रम अधिक हो और वास्तविकता का कोई सरोकार न हो।  टीडीपी और जदयू को लेकर अफवाह फैलाई जा रही थीं उनको मिलाकर भी सरकार बनाने लायक संख्या नहीं हो रही। सरकार बन गई , विभाग बंट गए , अब वही भ्रम पैदा करने का खेल लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर खेला जाने लगा है। जिस आम आदमी पार्टी की लोकसभा में तीन सांसदों की संख्या है, वह तेदेपा के लोकसभा अध्यक्ष की अफवाह उड़कर सहयोग देने की बात कर रहे हैं। इसको न तो टीडीपी मानने वाली और न ही अन्य राजनीतिक दल। क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष के निर्वाचन की प्रक्रिया दो ही कारणों से होती है। पहले यदि जीतने की संभावना दिखाई दे और दूसरा जब राजनीतिक तनातनी हद से ज्यादा ही हो जाए। चुनाव प्रचार में भी ऐसी स्थिति नहीं बनी और न ही सरकार के गठन के समय  में। लोकसभा अध्यक्ष के समर्थन देने वाली बात भ्रम पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं हो सकती? भ्रम पैदा करने का एक प्रयास शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव को लेकर भी पैदा करने का प्रयास किया गया था। हालांकि आधी - अधूरी जानकारी के कारण यह विषय तूल नहीं पकड़ पाया। सरकार गठन से पहले राहुल गांधी ने पत्रकार वार्ता करके शेयर बाजार के उतार - चढ़ाव में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते हुए जेपीसी गठन और जांच की मांग की थी। जबकि सबको यह पता है। सत्रहवीं लोकसभा भंग हो चुकी है और 18वीं लोकसभा अस्तित्व में नहीं आई है। न ही संसद सदस्यों ने शपथ ली है। ऐसे में जेपीसी की मांग करना राजनीतिक अपरिपक्वता का उदाहरण है। इसलिए भ्रमित करने का यह एक प्रयास शुरू होने के साथ ही खत्म हो गया। अब जब सरकार ने काम करना प्रारंभ कर दिया है। लोकसभा का सत्र आहूत किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में इसी भ्रमित करने के वातावरण को सदन में भी विरोध के रूप में जारी रखने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि सदन में संचालन कर्ता तथ्यों पर बात करने के लिए विवश कर सकते हैं। इसलिए वर्तमान में बना हुआ राजनीतिक आडंबर लंबे समय तक चलाने का प्रयास होगा। यह जरूर कहा जा सकता है कि विपक्ष जिस तरह का वातावरण बनाने का प्रयास कर रहा है उस प्रयास पर आम जनता अधिक विश्वास करने वाली नहीं है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को गठबंधन का लाभ मिला। समाजवादी पार्टी को मुस्लिम समुदाय के साथ एका करने का लाभ मिला। यही लाभ ममता बनर्जी को भी मिला। बाकी विपक्षी दलों के सामने कोई ऐसा लाभ उठाने का वातावरण नहीं बना। जिससे भ्रमित करने का लाभ उठाया जा सके। इसलिए यह कहना उचित होगा कि विपक्ष ने राजनीतिक लाभ जरूर उठाया लेकिन उसका ढोल अब बेसुरी थाप दिखाई/सुनाई दे रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 June 2024

जैसी सोच वैसी अवधारणा



लोकसभा के चुनाव में सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई है। अब जब सरकार बन गई, विभाग बंट गये इसके बाद भी यह वर्ग सक्रिय है। जिसने चुनाव में संविधान और आरक्षण खत्म करने जैसी अवधारणा फैलाई थी। आज सरकार बनने के बाद और विभागों का बंटवारा हो जाने के बाद भी भ्रम पैदा करने की स्थिति जारी है। यह चुनावी युद्ध जीतने का एक कौशल हो चला है। एक वरिष्ठ वकील ने कहा था कि सरकार चाहे कोई भी बना ले लेकिन उसका संचालन तो कांग्रेस और वाम विचारधारा ही करेगी? वह न्यायालय में बार-बार मामले ले जायेगी और सत्ता में अपना हस्तक्षेप बरकरार रखेगी। बात तो इससे भी आगे हो गई है। वर्तमान में देश की सरकार का संचालन एक सशक्त विचारधारा के हाथें में है। उसको क्या करना है यह पता भी है। वह कर भी रही है। लेकिन समर्थक द्वंद्व में हैं।  कहा जा रहा है कि भाजपा सारे प्रमुख धार्मिक स्थलों वाले चुनाव हार गई। द्वंद्व में फंसे लोग यह विचार नहीं कर पा रहे हैं कि देवभूमि उत्तराखंड में सभी सीटें, भगवान शिव की नगरी काशी और महाकाल की नगरी उज्जैन और कृष्ण जन्मभूमि मथुरा की संसदीय सीट किसके पास है? देश के बहसंख्यक समाज की यही विडंबना रही है कि वह खुद पर भरोसा करने की बजाए अफवाहों पर भरोसा करता है। नरेन्द्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगतार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है। लेकिन कहा यह जा रहा है कि इससे पहले लगातार तीन बार शपथ लेने का रिकार्ड पंडित नेहरू के नाम है। पंडित नेहरू आजादी के महानायक थे और जनता के पास उस समय कोई खास विकल्प नहीं थे। हिन्दू-मुसलमान की मानसिकता से वोट नहीं दिये जाते थे। मोदी के साथ ऐसा वातावरण नहीं है। मोदी सांस्कृतिक बदलाव के महानायक हैं लेकिन उस संस्कृति को फिर से स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं जिसके जानकार आत्मविश्वास में कमजोर हैं। उन्हें खुद पर भरोसा ही नहीं है। इसलिए चुनाव के परिणाम में सीटों का कम होना मायने नहीं रखता है। यह सच है कि यह मिलीजुली सरकार है। किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। देश ने राजीव गांधी के बाद मिलीजुली सरकारों का दौर देखा है। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की अगुवाई में नरसिंह राव की सरकार बनी थी। मौत के बाद की सहानुभूति के बाद कांग्रेस को 244 सीटें मिली थीं अब तो भयंकर प्रतिस्पर्धा में 240 सीटें मिली हैं। मतलब मोदी की लोकप्रियता काफी ऊँची है। मिलीजुली सरकारों ने काम का निष्पादन सलीके से नहीं किया क्योंकि उन्हें सरकार को बचाने पर अधिक ध्यान देना था। मोदी 3.0 में ऐसी कोई विवशता नहीं है। यह सरकार के गठन, विभाग बंटवारे और काम की शुरूआत में दिखाई दे रहा है। मोदी को बहुमत की सरकार क्यों नहीं मिली इसको लेकर भी भ्रम फैलाने के प्रयास हो रहे हैं। समर्थक यह मान रहे हैं कि मोदी का अंहकार और मनमाने निर्णयों के कारण उपजी नाराजगी से ऐसा हुआ है। यह उथली सोच है। जो व्यक्ति उपलब्धियों के परिपूर्ण और अपने विजन को क्रियान्वित करने की क्षमता रखता है उसके तेज और आत्मविश्वास को नकारा व्यक्ति अहंकार ही समझता है। जबकि कम सीटें आने का कारण आजादी के बाद भारत को अपना घर समझने वाला वह समुदाय है जिसने पाकिस्तान के रूप में अपना हिस्सा ले लिया था और अब भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सत्ता पर अधिकार चाह रहा है। बदले में बहुसंख्यक समाज ठीक उसी प्रकार का उदारवादी बना हुआ है और अपने नायक की खामियां खोजने, देखने और विश्वास करने में लगा है जैसा वह पहले भी करके विनाश देख चुका है। यह  अवधारणा विकसित करने वालों के कौशल का परिणाम है। यदि खुली आंखों के साथ विवेक का इस्तेमाल कर लिया जायेगा तो वह सच दिख जायेगा जो राष्ट्रवादी विचार समझाना चाहता है।

Monday, 10 June 2024

बिना दबाव वाला मंत्रिमंडल


लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद उठी राजनीतिक अवधारणाओं को समाप्त करते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने नाम एक और इतिहास जोड़ लिया। उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बराबरी कर ली। इसके पहले देश के किसी भी प्रधानमंत्री को लगातार तीसरी बार शपथ लेने का अवसर नहीं मिला। पंडित नेहरू ने अपने तीनों कार्यकाल में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया था जबकि नरेंद्र मोदी को दो कार्यकाल में तो स्पष्ट बहुमत मिला लेकिन तीसरे कार्यकाल में बहुमत से थोड़ा दूर रह गए। इसके बाद भी भाजपा का देशव्यापी विस्तार हुआ है। दक्षिण के जिन राज्यों में पार्टी को सफलता नहीं मिलती थी उनमें तमिलनाडु को छोड़कर अधिकांश राज्यों ने भाजपा को समर्थन दिया है। कर्नाटक, तेलंगाना, ओडीशा ऐसे राज्य हैं जहां अपेक्षा से अधिक सफलता मिली है। वही उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान व हरियाणा ऐसे राज्य हैं जहां समर्थन में थोड़ी से ज्यादा तक गिरावट आई है। इसलिए नरेंद्र मोदी ने बहुमत का आंकड़ा नहीं छुआ। इस चुनाव परिणाम में यह बात भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होती है कि भाजपा के मुकाबले किसी भी अन्य दल को या समूह को व्यापक समर्थन नहीं मिला। भाजपा, कांग्रेस से 10 करोड़ अधिक वोट प्राप्त करके 141 सीटों के अंतर पर ज्यादा है। इंडी गठबंधन को मिले कुल वोट से भाजपा को सवा दो लाख वोट अधिक मिले हैं। अधिक दालों का गठबंधन इंडी है जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले राजग में दहाई वाले दो दल हैं। शेष दलों में अधिक अड़ंगा डालने की सामर्थ्य नहीं है। इसलिए भाजपा नीत गठबंधन राजग को सरकार चलाने के लिए अधिक सतर्कता और परिश्रम की आवश्यकता नहीं होगी। मोदी को गठबंधन संसदीय दल का नेता चुनने के समय तेलुगु देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू और जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार का व्यवहार और भाषण गठबंधन की एकता को प्रदर्शित करते हैं। दोनों ही दलों को अपने राज्य की माली हालत सुधारने के लिए आर्थिक पैकेज की जरूरत है। जिसे देने में केंद्र सरकार को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। इसलिए गठबंधन सरकार के अस्थिर होने की संभावनाएं काम हो जाती है। अभी कुछ अन्य राजनीतिक दलों को राजग में शामिल करके सरकार की स्थिरता को और मुकम्मल करने की योजना पर भी काम करना होगा। इस बात की दृढ़ता इस बात में दिखाई देती है कि मंत्रिमंडल के गठन में जिस प्रकार का दृश्य दिखाई दे रहा है उससे यह परिलक्षित हो रहा है कि मोदी सरकार पहले की तरह ही आत्मविश्वास से लबरेज है। उसे अपने हार्डकोर विषयों को क्रियान्वित करने में भी अधिक परेशानी का सामना नहीं आने वाला है। जिन विषयों में विवाद हो सकता है उनके बारे में भी समर्थक दलों की भाषा नियंत्रित रूप में ही सुनाई दे रही है। इसलिए अभी यह माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी की गठबंधन वाली तीसरी सरकार को आसानी से चलने में कोई परेशानी नहीं होगी। विपक्षी दलों की ओर से जैसा भ्रम चुनाव प्रचार में पैदा किया गया था वैसा ही भ्रम सरकार गठन की प्रक्रिया में किया जा रहा है। पहले मंत्रिमंडल में भागीदारी, फिर विभाग वितरण और अब अध्यक्ष को लेकर भ्रमित करने का प्रयास जारी है। मंत्रिमंडल गठन में किसी प्रकार की परेशानी या असुविधा दिखाई नहीं दी। ऐसा ही वातावरण विभागों के बंटवारे में भी सामने आएगा। विपक्ष की आशा अध्यक्ष के निर्वाचन के समय भी पूरी नहीं होगी। इसलिए मंत्रिमंडल गठन में जब किसी प्रकार का दबाव नहीं दिखाई दिया तब आगे किसी प्रकार का कोई दबाव होगा इसकी संभावनाएं तत्काल नहीं देखना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन में विरोध के स्वर दिखाई दे रहे हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना को यह समझ में आ गया है कि महाअघाडी में तीसरे नंबर का राजनीतिक दल लोकसभा में पहले नंबर का कैसे बन गया? गठबंधन का सहारा लेकर कांग्रेस ने अपनी सीटों को दो गुना के करीब कर लिया है। इसलिए क्षेत्रीय दलों को नुकसान भाजपा से कम कांग्रेस से अधिक हुआ है। ऐसे में नरेंद्र मोदी का आत्मविश्वास स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा ही। यही आत्मविश्वास सरकार की सफलता का आधार बनेगा। यही आत्मविश्वास मंत्रिमंडल के गठन में दिखाई दिया है।

Friday, 7 June 2024

नेता बिरादरी समझ ले जो वायदा किया वो निभाना पड़ेगा


लोकसभा चुनाव में यूँ तो सभी दलों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह - तरह के वायदे किये किंतु काँग्रेस द्वारा गरीब परिवारों की महिलाओं के खाते में हर महीने 8 हजार ( सालाना 1 लाख) जमा करवाने का जो वायदा किया गया उसकी काफी चर्चा हुई। ऐसा ही आश्वासन बेरोजगार नौजवानों को भी दिया गया था। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि इन वायदों का काँग्रेस को काफी लाभ मिला। हालांकि उसकी सरकार तो नहीं बनी लेकिन लखनऊ में मुस्लिम महिलाओं का एक समूह काँग्रेस दफ्तर के सामने जमा हो गया। उनके हाथों में चुनाव प्रचार के दौरान काँग्रेस द्वारा बाँटा गया वह पर्चा था जिसमें उक्त वायदों को गारंटी का नाम दिया गया था। कुछ महिलाओं द्वारा पर्चे पर अपना नाम - पता लिखकर दफ्तर में मौजूद व्यक्ति को दे भी दिया लेकिन उसके बाद दरवाजा बंद हो गया। और बाहर खड़ी अनेक महिलाएं शिकायत करती रहीं कि उनका विवरण नहीं लिया जा रहा। बात छोटी सी थी किंतु एक टीवी चैनल के पत्रकार ने पूरे घटनाक्रम को कैमरे में उतारकर प्रसारित कर दिया। उसके बाद पूरे देश में उसका संज्ञान लिया गया। आश्चर्य इस बात का है कि जरा - जरा सी बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले काँग्रेस प्रवक्ता लखनऊ के उस समाचार पर पूरी तरह मौन साधे रहे। हालांकि देखने में वह छोटा सा वाकया लगता है  लेकिन भविष्य की दृष्टि से इसका सांकेतिक महत्व बहुत बड़ा है। इसे इस तरह से भी देखना चाहिए कि मतदाता अब नेताओं के भाषणों और घोषणापत्र में किये गये उन वायदों को गंभीरता से लेने लगे हैं जिनसे उनको तात्कालिक लाभ होता है। गत वर्ष म.प्र विधानसभा के चुनाव में  भाजपा की हार संभावित थी किंतु छह महीने पहले लाड़ली बहना योजना लाकर शिवराज सिंह चौहान ने बाजी अपने पक्ष में कर ली।  चुनाव के समय किये जाने वाले वायदे कोई नई बात नहीं है लेकिन  पहले मतदाता उन पर  ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। 1971 में स्व. इंदिरा गाँधी द्वारा गरीबी हटाओ का नारा उछालकर भारी बहुमत हासिल कर लिया किंतु किसी ने भी उसके बाद उनसे सवाल नहीं किया कि गरीबी क्यों नहीं हटी? रोजगार देने की बात भी हर पार्टी कहती है किंतु सत्ता में आने के बाद आर्थिक संकट का रोना लेकर बैठ जाती है। लेकिन अब मतदाता चुनावी वायदों के पूरा नहीं होने पर सरकार को उलाहना देना नहीं भूलते। 2014 में 2 करोड़ रोजगार और 15 लाख हर खाते में जमा करने जैसे वायदे आज भी भाजपा और नरेंद्र मोदी के गले की फांस बने हुए हैं। ये इस बात को प्रमाणित करता है कि जाति - धर्म में बँटे मतदाता अपने फायदे की बात को न सिर्फ सुनते  और समझते अपितु उसके लिए दबाव भी बनाने लगे हैं। लखनऊ में जो हुआ वह बदलते दौर की शुरुआत कही जा सकती है। ये भी कहा जा सकता है कि चुनाव के समय दिये गए प्रलोभन को हासिल करने के लिए जनता अब इंतजार करने के बजाय पार्टी दफ्तर और नेताओं के घर जा धमकेगी।    ये समूचे राजनीतिक तंत्र को सतर्क करने वाली बात है। म.प्र में लाड़ली बहना योजना 1 हजार से शुरू हुई थी। विधानसभा चुनाव से पहले  उसे 1250 रु. प्रति माह किया गया। धीरे - धीरे इसे 3 हजार तक बढ़ाया जाना है। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में मतदान का प्रतिशत घटने का एक कारण इस योजना की राशि में वृद्धि नहीं होना भी रहा । हिमाचल प्रदेश में  पाँच गारंटियों के बल पर काँग्रेस ने प्रदेश में सरकार तो बना ली किन्तु  उन पर अमल न हो पाने के कारण लोकसभा चुनाव में जनता ने उसे सभी सीटें हरवा दीं। पंजाब में आम आदमी पार्टी के प्रति भी इस चुनाव में जनता का मोहभंग हो गया क्योंकि विधानसभा चुनाव में उसके द्वारा किये गए बड़े - बड़े वायदे हवा में लटक गए। चुनाव को बाजार और मतदाता को उपभोक्ता समझने की जो संस्कृति  भारतीय राजनीति में स्थापित हो चुकी है उसके प्रति  बढ़ती नाराजगी एक शुभ संकेत कहा जा सकता है। फर्ज कीजिये काँग्रेस शासित राज्यों के मतदाता यदि  राहुल गाँधी द्वारा महिलाओं और बेरोजगारों को 1 लाख देने वाले वायदे पर दबाव बनाने लगें तो पार्टी को मुँह छिपाना कठिन हो जायेगा।  नीतिगत वायदों के पूरे न होने पर तो बहानेबाजी चल जाती है किंतु जहाँ आर्थिक लाभ की बात होती है , मतदाताओं का धैर्य जवाब देने लगता है। ये एक शुभ लक्षण है क्योंकि चुनाव जीतने के लिए मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से समाज में विद्वेष बढ़ रहा है। सूचना क्रांति के दौर में अब झूठे वायदों की कलई खुलते देर नहीं लगती। लखनऊ की मुस्लिम महिलाओं ने पूरे देश को रास्ता दिखा दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 June 2024

नीतियों और नियुक्तियों में नीतीश और नायडू का दबाव झेलना होगा मोदी को


चुनाव परिणाम आने के बाद काँग्रेस इस तरह पेश आ रही थी जैसे उसे  स्पष्ट बहुमत मिल गया हो। यद्यपि  99 सीटें जीतकर उसने मुख्य विपक्षी दल की हैसियत प्राप्त कर ली  और इस नाते लोकसभा में उसके नेता को  लोक लेखा समिति के अलावा अनेक महत्वपूर्ण नियुक्तियों की निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी भी मिलेगी। सही अर्थों में तो उसे विपक्ष में बैठने का  जनादेश मिला है। जहाँ तक बात सरकार बनाने की है तो एनडीए में शामिल दलों द्वारा नरेंद्र मोदी को नेता चुनने के साथ दो दिनों से व्याप्त अनिश्चितता पर भी विराम लग गया। जैसे संकेत आये हैं उनके अनुसार 8 जून को वे तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लेंगे। लेकिन  2014 और 2019 जैसी स्वतंत्रता उनके पास नहीं होगी। एनडीए के घटक दल ज्यादा से ज्यादा मंत्री पद चाहेंगे । सबसे ज्यादा दबाव नीतीश कुमार और चंद्रा बाबू नायडू बनाएंगे क्योंकि सत्ता की राजनीति में वे श्री मोदी के बराबर अनुभव रखते हैं।  भाजपा से उनकी वैचारिक मतभिन्नता भी जगजाहिर है। अब सवाल ये है कि पूरी पार्टी और सरकार को अपने इशारे पर चलाने के अभ्यस्त श्री मोदी और अमित शाह क्या पहले जैसे स्वछंद रह सकेंगे क्योंकि  नीति निर्धारण के साथ ही महत्वपूर्ण नियुक्तियों में भी नीतीश और श्री नायडू का  दखल रहेगा। नतीजे आने के पहले जब नीतीश इलाज के बहाने दिल्ली आने के बाद प्रधानमंत्री से मिले तब खबर उड़ी कि भाजपा उन्हें केंद्र सरकार में शामिल कर बिहार की गद्दी पर अपने किसी नेता को बिठायेगी जहाँ आज तक  भाजपा उप मुख्यमंत्री पद से आगे नहीं बढ़ पाई। लेकिन बहुमत से पीछे रह जाने के कारण वह  अब  सहयोगी दलों पर हावी होने की ताकत गँवा चुकी है। यदि उसका आंकड़ा 260 तक पहुँच जाता तब उसे नीतीश और श्री नायडू जैसे घाघ राजनेताओं का दबाव नहीं झेलना पड़ता। लेकिन जो स्थितियाँ हैं उनमें प्रधानमंत्री को 240 सीटों के बाद भी दो ऐसे क्षेत्रीय छत्रपों का दबाव झेलना पड़ेगा जो राजनीतिक दृष्टि से वजनदार हैं। हालांकि नीतीश की सरकार  तो फिर भी भाजपा के समर्थन पर टिकी  है किंतु चंद्राबाबू के पास भारी - भरकम बहुमत होने से वे बेहद ताकतवर हैं। वैसे श्री मोदी को 12 वर्ष मुख्यमंत्री और 10 साल तक प्रधानमंत्री रहने के कारण अच्छा खासा अनुभव प्राप्त है। कठिन परिस्थितियों में सूझ बूझ भरे निर्णय लेना उनकी खासियत है किंतु इस तरह का दबाव उनके सामने पहली बार आया है। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि  बदली हुई परिस्थितियों में वे कैसा प्रदर्शन करते हैं ? बीते 10 वर्षों में केंद्र की आर्थिक नीतियों के साथ ही राजनीतिक फैसलों पर श्री मोदी का निर्णय ही सर्वोपरि था। भाजपा संगठन पर भी अपने गृहमंत्री अमित शाह के जरिये उनकी पूरी - पूरी पकड़ थी। ऐसे में  अपने मंत्रीमंडल के  सदस्य  , प्रदेशों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल सहित अन्य नियुक्तियों में मोदी - शाह की जोड़ी का निर्णय अंतिम होता था। अब सहयोगी दल भी कुछ नियुक्तियों में अपने लोगों को चाहेंगे। चंद्राबाबू द्वारा लोकसभा अध्यक्ष का पद अपनी पार्टी के लिए मांगे जाने की खबर से श्री मोदी पर पड़ने वाले दबावों की बानगी मिलने लगी है। यद्यपि प्रधानमंत्री बन जाने के बाद  वे अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए इंडिया गठबंधन में तोडफोड़ कर सकते हैं। बड़ी बात नहीं उद्धव ठाकरे और अकाली दल  के साथ एक बार फिर भाजपा की जुगल बंदी हो जाए। लेकिन तीसरी पारी के शुरुआती 100  दिनों में बड़े और कड़े निर्णय करने के जो संकेत उन्होंने चुनाव के दौरान दिये उनको किस प्रकार लागू  कर पाएंगे वह महत्वपूर्ण होगा । आगामी कुछ महीनों में ही अनेक राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इन राज्यों में भाजपा के सहयोगी दल ज्यादा सीटें मांगेंगे। इस प्रकार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद श्री मोदी को कुछ नये मोर्चों पर जूझना होगा। लोकसभा में भी विपक्षी खेमा अब काफी सशक्त है जो सरकार की नाक में दम करने से बाज नहीं आयेगा। पिछली लोकसभा में तो विपक्ष की कम संख्या के बावजूद सरकार को सदन चलाना मुश्किल होता था। सियासत के समीकरण जिस तरह से उलट - पलट गए उनमें श्री मोदी को संभल - संभलकर कदम बढ़ाने के साथ ही  उस कार्यशैली को भी जारी रखना होगा जिसके लिए वे जाने जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 5 June 2024

जनसंख्या नियंत्रण और समान नागरिक संहिता कानून खटाई में पड़ सकते हैं



लोकसभा चुनाव का जो जनादेश आया उसकी व्याख्या सभी अपने - अपने तरीके से कर रहे हैं। हालांकि भाजपा अपने दम पर इंडिया गठबंधन से ज्यादा सीटें जीत गई किंतु मतदाताओं ने उसे स्पष्ट बहुमत से वंचित करते हुए सहयोगी दलों के सहारे सरकार चलाने मजबूर कर दिया। ये परिणाम इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि  भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को तो बहुमत मिल गया  लेकिन जिन नरेंद्र मोदी के नाम पर उसने पूरा चुनाव लड़ा वे मजबूत होने के बजाय कमजोर हो गए। जहाँ तक बात विपक्ष की है तो उसकी ताकत और हिम्मत दोनों में वृद्धि हुई। अनेक राज्यों में वह श्री  मोदी के विजय रथ को रोकने में कामयाब भी रहा। हालांकि मतदाताओं ने उसे भी सत्ता सौंपने योग्य नहीं समझा। वैसे तो भाजपा को  बहुमत से वंचित करने में कई राज्यों का योगदान रहा किंतु सबसे बड़ी भूमिका उ.प्र ने निभाई जहाँ से खुद प्रधानमंत्री चुनाव लड़ रहे थे। इस  राज्य ने भाजपा से 30 सीटें छीनकर उसकी जीत को फीका कर दिया। अयोध्या स्थित राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद पूरे देश के हिंदुओं में ऐतिहासिक उत्साह परिलक्षित हुआ था। वहाँ  सिर्फ राम मंदिर ही नहीं बना अपितु उसके सौंदर्यीकरण पर अरबों रुपये खर्च कर दिये गए। विश्वस्तरीय  हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन  बनाए जाने से यह उपेक्षित शहर दुनिया भर के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। इसका असर उसकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा। लेकिन अयोध्या के मतदाताओं ने भाजपा को इसका बदला उसके उम्मीदवार को हराकर दिया। ऐसा ही वाराणसी में देखने मिला जो  श्री मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है। 2014 में यहाँ से सांसद बन जाने के बाद उन्होंने वाराणसी में विकास की गंगा बहा दी । लेकिन इस बार वे शुरुआत में पिछड़ने के बाद महज डेढ़ लाख मतों से जीत पाए। उ.प्र में कानून व्यवस्था की स्थिति से गुंडे  - मवालियों और उनके संरक्षकों को छोड़कर हर कोई खुश था । लेकिन भाजपा को रोकने के लिए अखिलेश यादव ने राहुल गाँधी के साथ जो गठबंधन बनाया उसकी सफलता से साबित हो गया कि देश की सत्ता का फैसला करने वाले इस राज्य में विकास और सुशासन की बजाय जाति विशेष और मुसलमानों के बीच गठबंधन को ज्यादा पसन्द किया जाता है। आजकल भाजपा भी जातीय समीकरण की सियासत करने लगी है ।  लेकिन चूँकि वह मुसलनानों के तुष्टीकरण पर ध्यान नहीँ देती इसलिए  बिना भेदभाव के सरकारी योजनाओं का भरपूर लाभ उठाने के बाद भी यह समुदाय भाजपा को फूटी आँखों नहीं देखना चाहता। ऐसे में ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं है कि उ.प्र और बाकी सभी राज्यों में मुस्लिम मतदाता भाजपा को हराने के लिए एकजुट हो चुके थे । यहाँ तक कि महाराष्ट्र में उन्होंने उद्धव ठाकरे की पार्टी को भी महज इसलिए समर्थन दिया क्योंकि वह भाजपा के विरोधी खेमे में है। प. बंगाल में 30 फीसदी मुस्लिम आबादी के दम पर ही ममता बैनर्जी का प्रभुत्व बना हुआ है। हालांकि महंगाई, बेरोजगारी, आरक्षण और अग्निवीर जैसे मुद्दे भी भाजपा के लिए नुकसानदेह रहे लेकिन जातियों में बँटा हिन्दू समाज छोटी - छोटी बातों में उलझा रहा वहीं मुस्लिम मतदाताओं ने धर्म को महत्व देते हुए भाजपा की जीत में रुकावट पैदा की और वे  कामयाब भी रहे। अयोध्या में भाजपा की हार और वाराणसी में प्रधानमंत्री की फीकी जीत पर विपक्ष की खुशी तो राजनीतिक है किंतु मुस्लिम समुदाय मन ही मन बेहद खुश है क्योंकि उसने समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने के पहले ही भाजपा से  ऐसे निर्णय लेने की ताकत छीन ली। नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू भले ही भाजपा का साथ न छोड़ें किंतु वे भी ऐसे किसी निर्णय में साथ नहीं देंगे जिससे मुसलमान नाराज हो जाएं। हालाँकि विपक्ष के गठबंधन को भी जनता ने सत्ता नहीं सौंपी लेकिन भाजपा के हाथ भी बांध दिये। काँग्रेस ने इस चुनाव में अपनी संख्या दोगुनी कर ली किंतु उसके द्वारा शासित हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना में वह भाजपा के मुकाबले कमजोर साबित हुई। उ.प्र में जो सफलता उसे मिली उसका श्रेय दरअसल अखिलेश यादव को है जिन्होंने  मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति व्याप्त नाराजगी को एकजुट होने के लिए तैयार किया। भाजपा के लिए ये परिणाम चेतावनी हैं। उसे विकास कार्यों के साथ ही जनता की रोजमर्रे की मुश्किलों को भी समझना होगा। बेरोजगारी दूर करना तो बहुत कठिन है किंतु पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसी चीजों के दाम घटने जरूरी हैं। इसमें दो मत नहीं हैं कि देश का जनमानस अभी भी श्री मोदी के साथ है किंतु ये भी उतना ही सच है कि मुस्लिम समुदाय उनको सत्ता से हटाने के लिए प्रतिबद्ध है। इंडिया गठबंधन को इसी बात का फ़ायदा मिला। यदि कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तब मोदी सरकार की तीसरी पारी कुछ दिनों में शुरू हो जायेगी किंतु भाजपा भी अपने एजेंडे को कितना लागू कर पाएगी ये बड़ा सवाल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 4 June 2024

हिंदुओं का बिखराव और मुस्लिमों की एकता मोदी के करिश्मे पर भारी पड़ गई


हालांकि  नरेंद्र मोदी फिर प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं लेकिन 400 पार का उनका नारा हवा हवाई होकर रह गया। भले ही अपने सहयोगियों के साथ भाजपा तीसरी बार केंद्र की सत्ता पर काबिज हो जायेगी किंतु प्रधानमंत्री के करिश्माई व्यक्तित्व के लिए ये परिणाम बड़ा धक्का है। मतगणना के अंतिम दौर तक हो सकता है भाजपा 272 के जादुई आंकड़े को छू ले लेकिन उसका दबदबा पहले जैसा नहीं रहेगा। उसके लिए सबसे बड़ा गच्चा उ.प्र साबित हुआ जहाँ मोदी - योगी की डबल इंजिन सरकार के बल पर वह 70 - 75 सीटें जीतने का ख्वाब देख रही थी। हालांकि पार्टी ने उड़ीसा में नवीन पटनायक के वर्चस्व को तोड़कर पूर्वी भारत में कदम आगे बढ़ाया किंतु प. बंगाल में वह उतना ही नुकसान कर बैठी। वैसे पूरे परिणाम आये बिना अंतिम विश्लेषण करना जल्दबाजी होगी फिर भी  इतना जरूर कहा जा सकता है कि काँग्रेस अपनी उस रणनीति में सफल हो गई जिसके अंतर्गत वह भाजपा को 250 के लगभग रोकना चाहती थी। यदि वाकई भाजपा अपने दम पर बहुमत के आंकड़े को छूने से पीछे रह गई तो 15 - 15 सीटों के साथ नीतीश कुमार की जद (यू) और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी  श्री मोदी की उन्मुक्त उड़ान को रोकने का कोई मौका नहीं गँवायेगी। इस चुनाव में भाजपा की लहर को यदि किसी ने रोका तो वे हैं अखिलेश यादव। उनका सहारा लेकर कॉंग्रेस भी उ.प्र में फिर खड़ी हो सकी। उस दृष्टि से तमाम संभावनाओं के बावजूद बिहार में तेजस्वी यादव अपेक्षित असर नहीं दिखा सके और नीतीश कुमार का  राजनीतिक चातुर्य एक बार लालू परिवार  पर भारी पड़ गया।  भाजपा यदि उ.प्र में अपनी संख्या 60 से ऊपर ले जाने में सफल हो सकी तब उसका हाथ एनडीए में ऊंचा बना रहेगा। यद्यपि वह म.प्र , दिल्ली, हिमाचल, उत्तराखंड और गुजरात का किला तो सुरक्षित रख पा रही है और उड़ीसा उसके लिए नई उम्मीद लेकर आया किंतु राजस्थान और हरियाणा में हुए नुकसान के साथ महाराष्ट्र में लगे धक्के से उबरना उसके लिए फिलहाल मुश्किल लग रहा है। नुकसान तो उसे कर्नाटक में भी हो रहा है लेकिन विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद भाजपा ने वहाँ काफी कुछ हासिल किया। केरल में अगर वह दो सीटें जीत जाती है तो वह बड़ा उलटफेर होगा। तमिलनाडु में भी उसकी मौजूदगी निश्चित रूप से बढ़ी है। काँग्रेस के लिए आज का दिन खुशियाँ मनाने का है क्योंकि लगभग 100 सीटों के साथ वह लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल बनेगी और राहुल गाँधी भी नई ताकत के साथ प्रधानमंत्री के सामने खड़े होंगे। हालांकि एनडीए की सरकार के मुखिया तो श्री मोदी ही रहेंगे किंतु उसमें बड़े भाई की भूमिका में होने के बावजूद भाजपा को सहयोगी दलों की बात न सिर्फ सुनना अपितु मानना भी होगी। पूरी तस्वीर तो शाम तक स्पष्ट हो सकेगी । भाजपा के लिए सोचने वाली बात ये है कि उसके हिंदुत्व को हिन्दू समाज ने ही एकमुश्त समर्थन नहीं दिया जबकि मुस्लिम मतदाताओं ने इस चुनाव में बिना शोर मचाए उसको  हराने के लिए अपने मत को बिखरने से बचा लिया। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि 1992 में बाबरी ढांचा गिरने के बाद भाजपा को उ. प्र विधान सभा चुनाव में पराजय मिली और इस बार राम मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने उसे झटका दे दिया। वैसे इंडिया गठबंधन के लिए भी आने वाले दिन आसान नहीं रहेंगे क्योंकि उसके छोटे  - छोटे घटक सत्ता की चाशनी चखने एनडीए के साथ जा सकते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 June 2024

एग्जिट पोल से असहमति विपक्ष का अधिकार किंतु प्रतिक्रिया गरिमामय होना चाहिये

नीरस कहे जा रहे लोकसभा चुनाव को एग्जिट पोल के नतीजों ने रोमांचक बना दिया। जिन  सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल अतीत में सटीक साबित होते रहे उनमें से कुछ ने तो भाजपा के 400 पार वाले  नारे के हकीकत में बदलने की भविष्यवाणी  कर दी। यद्यपि सर्वेक्षण करने वाले भी ये कहते हैं कि वे अनुमान है, परिणाम नहीं। लेकिन  सही पद्धति से किए जाएं तो वे परिणामों के काफी करीब पहुँच जाते हैं। कुछ तो  शत - प्रतिशत सही निकल भी  चुके हैं। बहरहाल, भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए तो ये पोल खुशी लेकर आये लेकिन विपक्ष की उम्मीदों पर वज्रापात हो गया। जैसी कि परंपरा है उसने इनको फर्जी बता दिया। पहले तो काँग्रेस पार्टी ने टीवी चैनलों में एग्जिट पोल पर होने वाली चर्चा के  बहिष्कार की घोषणा कर दी। हालांकि बाद में उसके प्रवक्ता उसमें शामिल तो हुए किंतु उनको अस्वीकार  करते हुए विपक्षी गठबंधन की सरकार बनने का दावा करते रहे। आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह के अनुसार एग्जिट पोल भाजपा दफ्तर में बैठकर बनाये गए। राहुल गाँधी ने  भी ऐसी ही टिप्पणी कर डाली।  हालांकि जो भी पक्ष हारता हुआ दिखाया जाता है वह एग्जिट पोल को कभी स्वीकार नहीं करता। बावजूद इसके कि  सभी दल  चुनाव के पहले से ही जनता का मन टटोलने के अलावा प्रत्याशी चयन हेतु भी सर्वेक्षण  एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं। चुनावी रणनीति बनाने हेतु भी पेशेवर विशेषज्ञों का भी उपयोग होने लगा है। उदाहरण के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का चुनाव अभियान संचालित कर प्रसिद्ध हुए प्रशांत किशोर की सेवाएं बाद में नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, राहुल गाँधी, जगन मोहन रेड्डी और स्टालिन ने भी लीं। लेकिन मतदान के अंतिम चरण के पहले जब उन्होंने अपना आकलन प्रस्तुत करते हुए  भाजपा को 2019 से कुछ ज्यादा और एनडीए को 350 - 360 सीटों की संभावना व्यक्त की तो पूरा विपक्ष उन पर चढ़ बैठा। जबकि श्री किशोर ने 400 पार के भाजपाई दावे का मखौल उड़ाते हुए कहा कि वह. पार्टी कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने के लिए था। गत दिवस  काँग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने ये कहते हुए अपनी हताशा  व्यक्त कर डाली कि गृह मंत्री अमित शाह ने 150 जिला कलेक्टरों को फोन कर मतगणना में गड़बड़ी करने कहा है।  उल्लेखनीय है 1 जून की शाम इंडिया गठबंधन के नेताओं की बैठक के  बाद ये दावा किया गया था कि गठबंधन को 295 सीटें मिलने जा रही हैं। पूरे चुनाव अभियान के दौरान राहुल, प्रियंका, तेजस्वी, अखिलेश और केजरीवाल जैसे नेता भाजपा के 150 सीटों पर  सिमटने का दावा करते  रहे। श्री किशोर के आकलन के फ़ौरन बाद योगेंद्र यादव ने भाजपा को 220 से 250 तक सीमित कर दिया। नतीजों के बाद यदि उक्त अनुमान गलत निकले तब क्या ये नेता इस तरह के ऐलान करना बन्द कर देंगे ? खबर है चुनाव परिणाम के बाद बड़े पैमाने पर अशांति फैलाने की तैयारी भी की जा रही है। ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने की तो परंपरा रही है। इसे मानसिक दिवालियापन ही कहा जायेगा क्योंकि कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहाँ एनडीए विरोधी क्षेत्रीय दलों को बड़ी सफलता मिलने की संभावना एग्जिट पोल में बताई जा रही है। काँग्रेस द्वारा केरल में वाम दलों और पंजाब में आम आदमी पार्टी को हराने का अनुमान भी उनमें लगाया गया है। क्या काँग्रेस इसे भी नकारेगी ? कहने का आशय ये है कि विपक्ष को नकारात्मकता की मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए। एग्जिट पोल से असहमत होना उसका अधिकार है किंतु उसे भाजपा दफ्तर में बना हुआ बताना हताशा का परिचायक है। ये वही सर्वे एजेंसियां हैं जिन्होंने गत वर्ष कर्नाटक और तेलंगाना में काँग्रेस की भारी विजय की भविष्यवाणी की थी। तब किसी काँग्रेस नेता ने उसकी आलोचना नहीं की। ऐसे में एग्जिट पोल के अनुमानों पर बजाय गैर जिम्मेदाराना रवैया दिखाने के विपक्ष को धैर्य और शांति का परिचय देना चाहिए। पराजय को गरिमा के साथ स्वीकार करने से नेता की परिपक्वता ही झलकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 June 2024

अर्थव्यवस्था भले मजबूत हो किंतु आंकड़ों से पेट नहीं भरता

कसभा चुनाव के आखिरी चरण के मतदान के ठीक पहले खबर आई कि बीते वित्तीय वर्ष में विकास दर 8.2 प्रतिशत पहुँच गई जो अनुमान से 0.06 फीसदी अधिक है। इस मामले में हमने चीन और अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। सरकार को मिले टैक्स में 14 फीसदी की वृद्धि भी इसकी पुष्टि करती है। यद्यपि खेती, बिजली, गैस, जल, व्यापार, होटल और परिवहन जैसे क्षेत्रों में गिरावट   चिंता का विषय है किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग में उल्लेखनीय वृद्धि अच्छा संकेत  है। विकास दर बढ़ने  का सबसे बड़ा कारण मेन्यूफैक्चरिंग और माइनिंग सेक्टर का जोरदार प्रदर्शन रहा। सरकार द्वारा किये पूंजीगत निवेश ने भी उसमें टेका लगाया। रिजर्व बैंक ने इसी आधार पर कहा है कि आगामी एक दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए  उत्साहजनक रहेगा। साधारण समझ रखने वाले भी विकास दर में बढ़ोतरी से ये उम्मीद करेंगे कि प्रत्यक्ष न सही , परोक्ष रूप से तो इसका  लाभ उनके हिस्से में भी आये। उपभोक्ताओं  की बाजार में मौजूदगी भी उत्साहजनक है वहीं  इलेक्ट्रानिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योग में भारी माँग ने अर्थव्यवस्था को जबर्दस्त संबल दिया। यद्यपि जमीन - जायजाद के व्यवसाय पर अभी भी कोरोना का प्रभाव है। वहीं वर्क फ्राम होम और वीडियो काँफ़्रेंसिंग जैसे तरीकों ने होटल एवं परिवहन क्षेत्र को प्रभावित किया। सबसे बड़ी चिंता का विषय है आनलाइन व्यापार का बढ़ता दायरा जिसने छोटे और मझोले व्यवसायी के लिए  अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। इसके साथ ही ये अवधारणा भी तेजी से मजबूत हो रही है कि भारत का समूचा अर्थतंत्र कुछ धनकुबेरों के हाथों में चला गया है जो अपनी संपन्नता के बल पर सरकार को अपनी उंगलियों पर नचा सकते हैं। इसी के साथ  नौजवानों के मन में ये  बात बैठती जा रही है कि सरकार निजीकरण के जरिये नौकरियों के अवसर घटाती जा रही है और  लाखों पद खाली  रहने के बावजूद भर्ती नहीं की जाती। जैसे - तैसे परीक्षा की नौबत आती है तो प्रश्नपत्र लीक हो जाते हैं। इसी तरह परीक्षा तथा साक्षात्कार  के बाद परिणाम आने में भी बरसों लगने से युवाओं में व्यवस्था के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। अनेक अर्थशास्त्री इस बात के प्रति आगाह कर चुके हैं कि भारत रोजगार रहित विकास की राह पर बढ़ रहा है। छोटे - छोटे यूरोपियन देशों में  तो कम जनसंख्या के कारण मशीनों का सहारा लेना लाजमी है किंतु वहाँ सामाजिक सुरक्षा का दायरा बड़ा होने से बेरोजगारी भत्ता भी देना संभव है। लेकिन भारत की स्थिति सर्वथा भिन्न है। विशाल जनसंख्या और करोड़ों लोगों के गरीब होने के आगे समूचा विकास बौना साबित हो जाता है। स्व. इंदिरा गाँधी ने हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की शुरुआत कर खाद्यान्न और दूध उत्पादन में तो भारत को आत्मनिर्भरता के मुकाम तक पहुंचा दिया किंतु 1971 के लोकसभा चुनाव में गरीबी हटाओ का जो नारा दिया वह हवा - हवाई होकर रह गया। यहाँ तक कि  करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे बसर करने मजबूर हैं। मोदी सरकार द्वारा 80 करोड़ गरीबों को हर माह 5 किलो खाद्यान्न देने पर विपक्ष तंज कसता है कि अर्थव्यवस्था कुलांचे मार रही है तब 80 करोड़ गरीब क्यों है ? सवाल वाजिब है किंतु आजादी के बाद लगभग 60 साल तक देश पर राज करने वाली काँग्रेस को ही इस सवाल का उत्तर देना चाहिए। खैर , दुनिया की पाँचवी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद जब देश तीसरे स्थान पर आने का हौसला दिखा रहा है तब जरूरी हो जाता है कि विकास के मायने बदले जाएं। अर्थात 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देने के साथ विकास की प्रक्रिया में शामिल करने की कार्य योजना अमल में लाई जाए। ऐसा करने से बेरोजगारी को लेकर फैल रहा असंतोष कम किया जा सकेगा। इस अवधारणा को दूर करना समय की माँग है कि सरकारी नौकरी से पूरे देश को रोजगार उपलब्ध करवाना संभव है। जहाँ तक बात महंगाई की है तो सरकार को  समझना होगा कि आयकर  दरों में वृद्धि नहीं करने और कारपोरेट टैक्स में कमी करने के बावजूद करदाताओं और कर की राशि में जबर्दस्त उछाल आया। इससे साबित हो गया कि  करों का बोझ कम हो तथा  जटिलताएं दूर कर दी जाएं तो लोग कर देने के प्रति प्रोत्साहित होते हैं। अगले हफ्ते देश में नई सरकार का गठन होगा। चुनाव में सत्ता और विपक्ष दोनों ने वायदों की झड़ी लगा दी है। उन सबको पूरा करना तो आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा असंभव कार्य होगा लेकिन यदि अर्थव्यवस्था मजबूत है तो फिर उसकी सुखानुभूति  साधारण व्यक्ति को भी होना चाहिए क्योंकि आंकड़े भले ही कितने भी आकर्षक हों किंतु उनसे पेट नहीं भरता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी