50 बरस पहले 25 और 26 जून 1975 की दरम्यानी रात भारत में तख्ता पलट जैसी घटना घटी | लेकिन ये तख्ता पलट किसी सत्ताधीश का न होकर इस देश के लोकतंत्र का था | 12 जून 1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 1971 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट का चुनाव रद्द किए जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाये रखने के लिए संसदीय लोकतन्त्र को ही बंधक बना लिया |
आपातकाल लगाकर समूचे विपक्ष को जेल में भेजने के साथ ही उन्होंने समाचार माध्यमों पर सेंसर लगाकर लोकतंत्र की आवाज बंद कर दी | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरे बिठाते हुए जीवन सहित सभी मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए | विपक्ष से वंचित संसद राग दरबारी का मंच बन गई | इन्दिरा जी को ही इण्डिया बताने जैसी भाटगिरी तक हुई | और भी बहुत कुछ ऐसा हुआ जो लोकतंत्र के माथे पर काले धब्बे से कम नहीं कहा जा सकता | 1977 की जनवरी में श्रीमती गांधी ने लोकसभा चुनाव का ऐलान कर दिया | उन्हें विश्वास हो चला था कि आपातकाल के बीते डेढ़ साल में जनता को भी विपक्ष से विरक्ति हो गई होगी क्योंकि देश तो सुचारू रूप से चल ही रहा था | आचार्य विनोबा भावे उसे अनुशासन पर्व नामक चरित्र प्रमाण पत्र भी प्रदान कर चुके थे |
लेकिन जब दो माह बाद चुनाव हुए तब देश ने इंदिरा गांधी को बुरी तरह हराकर लोकतंत्र का पुनः राजतिलक किया | आपस में एक दूसरे की टांग खींचने वाली तमाम गैर कांग्रेसी पार्टियां जनता पार्टी के नाम से मैदान में उतरीं और जनता ने आजाद हिन्दुस्तान में पहली बार केन्द्रीय सत्ता से कांग्रेस को उतार फेंका । इंदिरा जी द्वारा आपातकाल लगाने जैसी भयंकर भूल किये जाने का परिणाम विपक्षी एकता के साथ ही जनता के मन में सत्ता परिवर्तन के साहस के तौर पर सामने आया | वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक बदलाव था |
हालांकि प्रखर समाजवादी नेता डा. राममनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का जो सिद्धांत दिया उसके अनुसार 1967 से देश में विपक्ष की अनेक सरकारें बनीं किन्तु वह प्रयोग राज्यों तक ही सीमित रहा और विपक्ष की दर्जनों छोटी - बड़ी पार्टियों में कोई समन्वय और वैचारिक साम्य न होने से राज्यों में बनी संयुक्त सरकारें जल्द ही अपने अंतर्विरोधों के चलते जैसे बनीं , वैसे ही चलती बनीं | लेकिन इससे एक सबक विपक्ष को जरुर मिल गया कि उनकी एकजुटता कांग्रेस पर भारी पड़ सकती है | साथ ही जनता के मुंह को भी सत्ता परिवर्तन रूपी स्वाद लग गया |
आपातकाल ने मजबूरी में ही सही एक अवसर विपक्ष के सामने परोसकर रख दिया और जेलखाने में रहते हुए उन सभी को ये बात समझ में आ गयी कि चाहे - अनचाहे एक होना पड़ेगा | और वैसा करना कारगर भी रहा | समूचे उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया | इंन्दिरा जी और आपातकाल के शिल्पकार कहे जाने वाले उनके पुत्र संजय गांधी क्रमशः रायबरेली और अमेठी से हार गये |
नई - नवेली जनता पार्टी सत्ता में आ गयी | मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बन गए | लेकिन सत्ता की अतृप्त कामना एक बड़े अवसर को इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने का कारण बनने लगीं | 27 महीने बाद ही जिन इंदिरा जी और संजय गांधी की तानाशाही के विरुद्ध विपक्षी एकता का जन्म हुआ उन्हीं ने कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाएँ जगाते हुए दाना फेंका और चौधरी चरण सिंह जैसा अनुभवी राजनेता उसकी लालच में दौड़ पड़ा | यही नहीं तो गैर कांग्रेसवाद का गुरुमंत्र लेकर सियासत की पाठशाला से निकले लोहिया जी के चेले तक कांग्रेस की गोद में जाकर बैठ गये | फिर होना क्या था , मोरार जी सरकार गिर गयी | चौधरी साहब प्रधानमन्त्री बन तो गये लेकिन चंद रोज बाद ही कांग्रेस ने अपना असली रूप दिखाते हुए उनको दी गई समर्थन नामक बैसाखी खींच ली | वह सरकार भी चलती बनी |
नये चुनाव हुए और इंदिरा जी पुनः सत्ता में लौट आई | आपातकाल का विरोध करने वाले आपस में ही लड़ मरे जिससे आपातकाल लगाने का अपराध जनता की अदालत में बेअसर होकर रह गया । इंदिरा जी ने लोकतंत्र की हत्या का जो प्रयास किया वह केंद्र में पहली बार हुए सत्ता परिवर्तन के साथ ही विपक्षी फूट का नया प्रमाण बनकर सामने आया | यही नहीं तो गैर कांग्रेसवाद का जनाजा भी निकल गया | कांग्रेस ने भी श्रेष्ठता के भाव को त्यागकर दूसरे दलों के साथ गठबन्धन करने की व्यवहारिकता सीखी |
उसके बाद का एक दशक कांग्रेसी सत्ता का रहा | 1984 में इंदिरा जी की नृशंस हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने किन्तु एक बार सत्ता का खून मुंह में लग जाने के कारण विपक्षी एकता रूपी काठ की हांडी फिर आग पर चढ़ी तथा 1989 के चुनाव में राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस दोबारा सत्ता से बाहर हुई और उसी से निकले विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमन्त्री बन बैठे | लेकिन उनके चयन से ही विवाद सतह पर आ गया | लोहिया जी के चेलों ने मौके का लाभ लेकर मंडल कार्ड खेला तो भाजपा राम मन्दिर के मुद्दे के साथ मैदान में कूद पड़ी | उसके समर्थन वापिस लेने से 11 महीने में विश्वनाथ प्रताप चलते बने | व्यक्तित्वों के टकराव और सत्ता की प्यास ने जनता पार्टी वाला वृतान्त दोहरा दिया | कांग्रेस ने अपना पुराना दांव आजमाया और इस बार चन्द्रशेखर की लार टपक पड़ी जो विश्वनाथ प्रताप और देवीलाल की चालबाजी से प्रधानमन्त्री बनते - बनते रह गये थे | अंततः वे राजीव गांधी का सहारा लेकर सत्ता में आ तो गये किन्तु जल्द ही वे भी चौधरी साहब की तरह से ही निपटाए गए | नये चुनाव के दौरान राजीव की हत्या हो गई | कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और बाहरी समर्थन से सरकार बना ली | लेकिन ये पहला अवसर था जब कांग्रेस उन विपक्षियों का समर्थन लेकर सत्ता में आई जिनका वह मजाक उड़ाया करती थी | वह दौर आते तक भारतीय राजनीति में राजनीतिक गठबन्धनों की नई - नई परिभाषाएं गढ़ी जाने लगीं | वैचारिक मतभेद गुजरे ज़माने की बातें हो गईं | पीवी नरसिम्हा राव की वह सरकार कहने को तो पांच साल चली किन्तु कांग्रेस के पाँव उखड़ने लगे |
1996 में तेरह दिन के लिए अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमन्त्री बने लेकिन विपक्ष का ही बड़ा हिस्सा उनके विरोध में आ गया | उनके बाद कांग्रेस के समर्थन से पहले एचडी देवगौड़ा की सरकार बनी लेकिन कांग्रेस ने कोई बहाना बनाकर उसे चलता किया और तब इंदर कुमार गुजराल ढूंढ़कर निकाले गये | लेकिन कांग्रेस ने उन्हें भी नहीं टिकने दिया और 1998 में देश पर फिर चुनाव लाद दिए गये | लेकिन अस्थिरता बनाये रखने के कारण कांग्रेस जनता की नजरों से गिरती गयी जिसका लाभ राममन्दिर आन्दोलन से लगातार ताकतवर होती गई भाजपा को मिला और वह 180 सीटें ले आई | जिन समाजवादियों ने कभी दोहरी सदस्यता के नाम पर जनता पार्टी सरकार गिरवा दी थी उनमें से अनेक श्री वाजपेयी के उदारवादी चेहरे से प्रभावित होकर उनकी सरकार बनाने में सहायक बन गये | इनमें 13 दिन की सरकार को गिरवाने वाले भी थे | लेकिन तब तक भाजपा जरूरी और मजबूरी दोनों बन चुकी थी | वाजपेयी जी भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनका कांग्रेस से कभी सम्बन्ध नहीं रहा परन्तु नाटकीय घटनाक्रम में मात्र 13 महीने बाद अविश्वास प्रस्ताव पर बसपा द्वारा वायदा खिलाफी किये जाने से एक मत से वह सरकार गिर गयी किन्तु मध्यावधि के पहले कारगिल हो गया और उसमें भारत की जीत वाजपेयी सरकार की वापिसी का कारण बन गई |
इस बार उनने पूरे पांच साल सरकार चलाते हुए कांग्रेस के इस आरोप को गलत साबित कर दिया कि विपक्ष स्थायी सरकार नहीं दे सकता | यद्यपि बतौर प्रधानमन्त्री शानदार छवि के बाद भी अटल जी की ऊर्जा सहयोगियों के नखरे उठाने में खर्च होती रही वरना वे और भी प्रभावशाली हो सकते थे | 2004 में सत्ता उनके हाथ से खिसकी तो फिर दस साल तक कांग्रेस के डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमन्त्री बने रहे किन्तु पूर्ण बहुमत के अभाव में कांग्रेस को दूसरे दलों के साथ यूपीए नामक गठबंधन बनाना पड़ा जिसे वामपंथियों तक का बाहरी समर्थन मिला | वहीं वाजपेयी सरकार में रहे कुछ समाजवादी भी सत्ता से आकर जुड़ गये |
वाजपेयी युग समाप्त होने के बाद विपक्ष के पास कोई चमकदार चेहरा नहीं होने से 2009 में भी मनमोहन सिंह वापिस लौटे और वह भी पहले से ज्यादा सीटों के साथ | वामपंथी तब तक दूर जा बैठे थे किन्तु गठबन्धन पूरे पांच वर्ष चला परन्तु मनमोहन सरकार पर गांधी परिवार नामक रिमोट से चलने का आरोप लगने लगा | भ्रष्टाचार के चर्चित काण्ड उजागर हुए | इन सबसे व्यक्तिगत ईमानदारी के बावजूद वे कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में अलोकप्रिय होते गए | और तभी भाजपा ने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में छाप छोड़ने वाले नरेन्द्र मोदी को पेश कर दिया | उसका नतीजा 2014 के चुनाव में भाजपा को अपने दम पर मिले बहुमत के रूप में सामने आया और पांच साल बाद तो 300 से ज्यादा सीटें जीतकर श्री मोदी अब तक के सबसे ताकतवर गैरकांग्रेसी प्रधानमन्त्री बनकर उभरे |
लेकिन इस लम्बे इतिहास से एक बात सामने आई कि 1977 में केंद्र की सत्ता में हुए परिवर्तन के बाद देश में राजनीतिक गठबन्धन वैचारिक आधार पर न होकर सुविधा के समझौतों पर आकर टिक गये | कौन कब किससे गठबन्धन कर लेगा और कब अलग हो जाएगा ये नीति नहीं वरन नीयत पर निर्भर करने लगा है | भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई तो सपा और बसपा एक साथ हो लिए | कांग्रेस बंगाल में सीपीएम के साथ लड़ी लेकिन उसी समय केरल में दोंनों आमने - सामने आ गये | महाराष्ट्र में कांग्रेस को शिवसेना की साम्प्रदायिकता से परहेज नहीं रहा वहीं आन्ध्र में चन्द्र बाबू नायडू उसके साथी बन बैठे | बिहार में नीतीश ने लालू से लड़ने भाजपा को पकड़ा फिर उसे छोड़ अकेले चले | सफलता हाथ नहीं आने पर फिर लालू के साथ मिलकर सत्ता में लौटे किन्तु दोबारा उसी भाजपा के साथ गलबहियां किये हुए हैं |
इस प्रकार आपातकाल के बाद का राजनीतिक परिदृश्य सिद्धांतविहीन राजनीति का दौर लेकर आया | बीते दो दशकों में मंडल और मंदिर की बजाय साम्प्रदायिकता विरोधी मोर्चा बनता - बिगड़ता रहा और इधर कुछ सालों से समूचा राजनीतिक विमर्श मोदी समर्थन और मोदी विरोध में आकर सिमट गया है | कांग्रेस अपना आधार तेजी से गंवाती जा रही है | एक ही परिवार पर निर्भरता ने उसका वास्तविक स्वरूप ही नष्ट कर दिया | भाजपा का वैचारिक विरोध करने में केवल वामपंथी ही सक्षम थे किन्तु वे जनता से कटते चले गये | मजदूर और किसान दोनों उनके हाथ से खिसक चुके हैं | और फिर उनकी राजनीति खीज से भरपूर होने से आकर्षण खो बैठी | विपक्ष में कौन किसके साथ और कौन किसके विरुद्ध है ये कोई नहीं बता सकता | भाजपा अपने स्वर्णयुग में पहुंचकर भी अपनी वैचारिक पवित्रता को बनाये नहीं रख सकी | और धीरे - धीरे उसी व्यक्तिवादी राजनीति में लिप्त हो चुकी है जिसके लिए वह दूसरों को कोसा करती थी |
आजाद भारत की राजनीति इस प्रकार तीन कालखंडों में विभाजित की जा सकती है | पहला 47 से 77, दूसरा 77 से 2014 और तीसरा उसके बाद से जो जारी है | इन तीनों में राष्ट्रीय राजनीति में बड़े चारित्रिक बदलाव हुए | उसकी दिशा और दशा जिस तरह बदलती गई उसकी वजह से राजनेताओं का सम्मान और साख दोनों घटते जा रहे हैं |
शासन करते हुए कौन सफल रहा कौन नहीं ये उतना बड़ा मुद्दा नहीं बचा | चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने में संकोच नहीं रहा | यहाँ तक कि राजनीतिक हित राष्ट्रीय हितों पर भारी पड़ने लगे हैं | देश पहले से विकसित हुआ है तथा दुनिया में उसकी ताकत बढ़ी है लेकिन राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता का अवमूल्यन रुकने का नाम नहीं ले रहा |
हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव ने मुस्लिम ध्रुवीकरण का जो उदाहरण पेश किया उसके बाद राजनीति क्या करवट लेती है? गत दिवस लोकसभा में शपथ लेते समय असदुद्दीन ओवैसी द्वारा जय फलस्तीन का नारा लगाया जाना इस ध्रुवीकरण से उपजे साहस का प्रमाण है।
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आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी