Saturday, 31 August 2024

पानी : ज्यादा बरसे तो मुसीबत और कम बरसे तो आफत


भारत में मानसून की अवधि सामान्यतः 15 जून से 15 सितम्बर तक मानी जाती है। दक्षिण पश्चिम मानसून 1 जून को केरल में दस्तक देता है ।शुरुआती अनिश्चितता के बाद जुलाई तक पूरा देश बरसाती फुहारों से नहा उठता है। हालांकि सभी जगह एक सी बरसात नहीं होती। कई बार तो  जिन दक्षिणी राज्यों से मानसून आगे बढ़ता है वहीं सूखा पड़ जाता है जबकि गुजरात और राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले राज्यों में अति वृष्टि होती है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने से वैसे भी ऋतु चक्र की गति और दिशा गड़बड़ाती जा रही है। चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान है इसलिए वर्षा जल की उपयोगिता और अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है। बिजली की उपलब्धता ने खेतों में सिंचाई के लिए जल का उपयोग बढ़ा दिया है। इसके कारण भूजल का स्तर साल दर साल गिरता जा रहा है। वर्षा जल के संग्रहण के लिए किये जाने वाले प्रयास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में बने पुराने तालाब उपेक्षा का शिकार होकर दम तोड़ते जा रहे हैं। वहीं नये बनाये जा रहे सरोवर भ्रष्टाचार का शिकार हैं। बढ़ती आबादी और औद्योगिकीकरण से भी जल की आवश्यकता निरंतर बढ़ती जा रही है। लेकिन मानसून से होने वाली बरसात का इससे कोई सामंजस्य नहीं है। उसकी चाल भी निर्धारित न होकर अप्रत्याशित होती जा रही है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जहां पानी की नितांत आवश्यकता है वहाँ बादल बिन बरसे लौट जाते हैं किंतु जिन क्षेत्रों में जररूत के मुताबिक बारिश हो चुकी है वहाँ बाढ़ की विभीषिका है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मौसम विभाग द्वारा उपग्रहों से प्राप्त सूचना के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणी ज्यादातर गलत निकलती है। इससे अलग हटकर एक नई समस्या  हर वर्ष सामने आने लगी है। ज्यादा बरसात में तो फिर भी ठीक किंतु ज्यादातर शहरों में थोड़ी सी बरसात में ही सड़कों पर पानी भर जाता है। देश के लगभग सभी महानगर इस समस्या से जूझ रहे  हैं। इसका कारण बेतरतीब बसाहट के साथ स्थानीय निकायों में व्याप्त  कामचोरी और भ्रष्टाचार है। इन दिनों गुजरात के सूरत , राजकोट और बड़ोदा में बाढ़ का पानी घरों की छत तक जा पहुंचा है। दिल्ली, राजस्थान भी जलप्लावन से हलाकान हैं। नदियों के किनारे बसे शहरों में भी हालात कभी भी खराब हो जाते हैं। भारी बारिश के चलते बांधों से छोड़ा जाने वाला पानी मुसीबत बन जाता है। कहने का आशय ये है कि हमारे देश में पानी कम बरसे तो मुसीबत और ज्यादा बरसे तो आफत वाली स्थिति है। इसका कारण जल प्रबंधन के समुचित उपाय न किये जाने के अलावा शहरों का अनियोजित विकास है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या व्यवसायिक राजधानी मुंबई, सभी में थोड़ी देर की  बरसात जनजीवन को अस्त- व्यस्त कर देती है। आई टी हब के तौर पर विकसित बेंगुलुरु और गुरुग्राम देखने में कितने भी भव्य दिखें किंतु बरसात के मौसम में वहाँ की सड़कें  नालों की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। चंडीगढ़ जैसे व्यवस्थित कहे जाने वाले नगर में भी कुछ घंटों की बरसात समस्या बन जाती है। हर साल देश भर में  कहीं अनावृष्टि तो कहीं अतिवृष्टि से संकट उत्पन्न होता है ।  लेकिन वर्षाकाल खत्म होते ही रात गई, बात गई वाली मानसिकता के चलते सब भुला दिया जाता है। बड़ी नदियों पर बांध बनाकर वर्षा जल को संग्रहित करने की सोच गलत नहीं थी किंतु ज्यादा बरसात में उनके गेट खोले जाने पर निचले क्षेत्रों में होने वाला जलप्लावन चिंताजनक हालात पैदा कर देता है। आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में कहने को तो काफी प्रगति हुई किंतु जिन आपदाओं को समय रहते रोका जा सकता है उनसे बचाव न कर पाना ये साबित करता है कि गलतियों से सबक लेने की बुद्धिमत्ता का विकास करने में हमारा तंत्र विफल रहा है। हालांकि जनता भी इस मामले में काफी हद तक जिम्मेदार है। जल के दुरुपयोग को रोकने के साथ वर्षा जल का संग्रहण करने के प्रति दायित्व बोध का अभाव  इस समस्या को बढ़ाने वाला है। शहरों में अवैध निर्माण के कारण जल निकासी में अवरोध उत्पन्न होता है। जल की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की फिजूलखर्ची रोकने के अलावा वर्षा जल को जमा करने के प्रयासों ने कई जगह मरुभूमि में भी हरी सब्जियों के उत्पादन जैसा चमत्कार किया है। इसी तरह जल निकासी में रुकावट दूर हो जाए तो शहरों में आने वाली बाढ़ से काफी हद तक मुक्ति पाई जा सकती है। मौसम निश्चित रूप से टेढ़ी चाल चलने लगा है। उस पर मनुष्य का बस नहीं किंतु जो हमारे हाथ में है यदि उसके प्रति भी उदासीन रहा जाए तो फिर प्रकृति को दोष देना कहाँ तक उचित है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 30 August 2024

चुनाव खर्च के ब्यौरे पर विश्वास करना कठिन


विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को सौंपे गए विवरण के अनुसार लोकसभा चुनाव में  पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों को मोटी रकम  दी। कांग्रेस और भाजपा तो राष्ट्रीय पार्टी हैं किंतु आम आदमी पार्टी द्वारा भी अपने उम्मीदवारों को 60 - 60 लाख रु. दिया जाना चौंकाता है। आयोग ने लोकसभा चुनाव में खर्च की सीमा 90 लाख रु. तय की थी। इसीलिए हर प्रत्याशी ने इससे कम ही खर्च किया क्योंकि निर्धारित राशि से अधिक खर्च करने वाले के जीतने पर भी उसका चुनाव चुनाव रद्द हो जाता है। हारने पर भी कुछ वर्षों तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग जाती है। कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं जो सक्षम होने से पार्टी से पैसा नहीं लेते। निर्दलीय उम्मीदवारों को स्वयं के या चंदे के पैसे से चुनाव लड़ना पड़ता है। नामांकन के दिन से ही खर्चों का आकलन होने लगता है। इस समूची कवायद का उद्देश्य चुनावी खर्च को सीमित करना है। टी. एन. शेषन के कार्यकाल में चुनाव प्रचार के परंपरागत तौर - तरीकों में काफी बदलाव किये गए थे। बैनर - पोस्टर सीमित हो गए। रात 10 बजे के बाद सभाएं प्रतिबंधित हो गईं। बिना अनुमति दीवारें पोतने पर रोक लगी। चुनाव कार्यालय से स्वीकृति लिए बगैर वाहन का उपयोग वर्जित हो गया। प्रकाशित प्रचार सामग्री पर  मुद्रण संख्या का उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया। प्रत्याशी द्वारा  कराये जाने वाले नाश्ते तक की दरें तय कर दी गईं। कभी - कभी तो लगता है चुनाव आयोग ज्यादती कर रहा है। नगदी राशि के लाने , ले जाने में पुलिस द्वारा की जाने वाली तलाशी से व्यापारी वर्ग भी त्रस्त हो जाता है। भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात सरकारी मशीनरी चुनाव आचार संहिता लगते ही निरंकुशता की हद तक सख्त हो जाती है। इन सबका लाभ निःसंदेह हुआ है किंतु जहाँ तक बात चुनाव में खर्च कम करने की है तो वह नहीं हो सका। लोकसभा और विधानसभा चुनाव हेतु व्यय की जो उच्चतम सीमा निर्धारित की गई  उसके भीतर चुनाव लड़ने वाले वे प्रत्याशी ही होते हैं जो केवल नाम के लिए मैदान में उतरते हैं। जिन कुछ  सीटों पर बड़ी पार्टियां भी सांकेतिक चुनाव लड़ती हैं वहां उनका खर्च कम होता है। वरना कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा पानी की तरह पैसा बहाने के उदाहरण आम हैं। अनेक उद्योगपति राज्यसभा की सदस्यता हासिल करने करोड़ों लुटा देते हैं। विधायकों की बोली किस तरह लगती है  ये सर्वविदित है। लोकसभा और विधानसभा तो बड़ी बात है लेकिन नगर निगम  पार्षद के चुनाव  में कुछ लोग बेतहाशा खर्च कर देते हैं। अब वे कार्यकर्ता भी नहीं रहे जो विचारधारा के लिए तन, मन और धन तीनों झोंक देते थे। साइकिल पर प्रचार तो वे भी नहीं करते जिनका चुनाव चिन्ह ही साइकिल है। चौपहिया वाहनों का उपयोग आम हो गया है। और तो और छुटभैये नेता तक हेलीकाप्टरों में मंडराते देखे जा सकते हैं। विमानों का उपयोग भी सामान्य हो चला  है। ये सब देखते हुए चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा में चुनाव लड़ पाना अविश्वसनीय प्रतीत होता है। इस आधार पर चुनावी खर्च के  ब्यौरे को कसम खाकर झूठ बोलने का सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं  होगी। जनसेवा या विचारधारा से प्रेरित होकर राजनीति करने वाले समय के साथ लुप्त होते जा रहे हैं क्योंकि उनके लिए चुनाव जीतना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है। राज्यसभा भी जिस वर्ग के लिए बनाई गई थी वह उसमें नजर नहीं आता। इन्हीं सब कारणों से चुनाव उस तबके के बस के बाहर होते जा रहे हैं जिसके मन में विशुद्ध सेवाभाव है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो उम्मीदवारी तय करते समय जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देती हैं। सरकार बनाने के लिए  बहुमत की आवश्यकता ने इस चलन को मज़बूरी बना दिया है किंतु फिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में निःस्वार्थ समाजसेवियों , कलाकारों, खिलाड़ियों, शिक्षाशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों को ज्यादा से ज्यादा स्थान दिये जाना चाहिए। आजादी के बाद प्रारंभिक वर्षों में ऐसा हुआ भी किंतु धीरे - धीरे उच्च सदन की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ होने लगा। राजनीति में अच्छे लोगों के आने की बात तो खूब कही जाती है किंतु उनके लिए कितनी जगह है? अच्छा तो ये हो कि चुनाव खर्च की सीमा घटाई जावे। चुनाव प्रचार के प्रचलित तरीके और बदले जाएं। चुनाव जितना कम खर्चीला होगा उसमें जनभागीदारी उतनी ही बढ़ेगी। करोड़ों रु. के प्रचार और चुनाव आयोग के अथक प्रयासों के बावजूद मतदान का प्रतिशत कम रहना चिंता के साथ चिंतन का भी विषय है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 August 2024

ममता गृहयुद्ध की भाषा बोल रहीं


प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  संघर्षशील राजनेत्री हैं। वाम मोर्चा सरकार की तानाशाही के विरुद्ध उन्होंने जो लड़ाई लड़ी उसी का नतीजा है कि अपने इस मजबूत गढ़ में वामपंथी पार्टियां लगभग अस्तित्वहीन हो चुकी हैं। और उनके साथ रहने से कांग्रेस भी घुटनों पर आ गई । लेकिन सुश्री बैनर्जी ने भी वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये जिनके बल पर वामपंथियों ने लगभग चार दशक राज किया। मसलन बांग्ला देश से आये घुसपैठियों को मतदान का अधिकार देना, असमाजिक तत्वों के जरिये विरोधियों को आतंकित करना,  प्रशासन पर तृणमूल का वर्चस्व कायम करना आदि। ममता ने कांग्रेस इसलिए छोड़ी थी क्योंकि वह वामपंथियों के अत्याचार पर उदासीन थी। इसलिए उम्मीद थी वे उन बुराइयों से मुक्ति दिलाएंगी । लेकिन ममता ने भी मुस्लिम तुष्टीकरण , राजनीतिक हिंसा, असामाजिक तत्वों को संरक्षण और भ्रष्टाचार को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बना लिया। यद्यपि समाज के निचले हिस्से में उनका जनाधार है किंतु राज्य की 30 फीसदी मुस्लिम आबादी का एकमुश्त समर्थन उनकी चुनावी सफलता का सबसे बड़ा कारण है।  चुनावी हिंसा की जितनी घटनाएं प. बंगाल में होती हैं उतनी अन्य कहीं नहीं।  उनके तुनुकमिजाज  स्वभाव के चलते  विपक्षी दल भी उनसे छड़कते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस या अन्य किसी दल के लिए एक सीट तक नहीं छोड़ी। यहाँ तक कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के विरुद्ध  क्रिकेटर युसुफ पठान को उतारकर उन्हें हरवा दिया। उनके बढ़ते गुस्से का एक कारण ये भी है कि जिन राहुल गाँधी को वे पूरी तरह तिरस्कृत करती थीं वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण शख्सियत बन बैठे। कांग्रेस और सपा को तृणमूल से अधिक सीटें मिलने से इंडिया गठबंधन में भी उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिल रही। गलत नीतियों के कारण वे चारों तरफ से घिरती जा रही हैं।  संदेशखाली की घटना से राज्य सरकार की जबरदस्त बदनामी हुई थी किंतु हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद नृशंस हत्या की वारदात ने ममता की साख और धाक मिट्टी में मिला दी। उक्त प्रकरण में प्राथमिकी दर्ज करवाने में हुए विलम्ब और उसके पहले ही पोस्ट मार्टम करवाने की वजह से उत्पन्न शंकाओं ने उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। घटनास्थल पर सबूत मिटाने के जो सुनियोजित प्रयास हुए उन्होंने भी कई सवाल खड़े कर दिये। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जाँच सीबीआई को सौंपे जाने का भी ममता सरकार विरोध करती रही। लेकिन ये प्रकरण दूसरा निर्भया कांड बनकर पूरे देश में चर्चित हो गया। सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख की वजह से कोई भी विपक्षी दल सुश्री बैनर्जी के बचाव में आगे नहीं आ रहा। गत दिवस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो प्रतिक्रिया दी उसके बाद प. बंगाल सरकार के पास मुँह छिपाने की जगह नहीं बची। और उसी की बौखलाहट में ममता ने धमकी दे डाली कि यदि प. बंगाल में आग लगी तो असम, बिहार और उ.प्र भी नहीं बचेंगे । आग दिल्ली तक जाएगी तथा मोदी सरकार गिर जाएगी। उनके इस बयान से तो लगता है मानों प. बंगाल कोई अलग देश हो जो अपने भीतरी मामलों में हस्तक्षेप के विरुद्ध धमका रहा हो। कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने भी भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न होने की बात कही थी। सुश्री बैनर्जी ने भले ही उनके शब्दों को न दोहराया हो किंतु गत दिवस भाजपा द्वारा आयोजित प. बंगाल बंद को मिली सफलता से संभवतः उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।  उन्होंने गत दिवस जिस प्रकार की धमकी दी वह संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा ली गई शपथ का खुला उल्लंघन है । यदि एक राज्य का मुख्यमंत्री दूसरे राज्यों में आग लगने और केंद्र सरकार गिराने जैसी धमकी देगा तो यह गृहयुद्ध  की ओर कदम बढ़ाने जैसा है। दरअसल जबसे बांग्ला देश में तख्ता पलट हुआ है तभी से कुछ लोग भारत में भी वैसा ही  देखने के लिए लालायित नजर आते हैं। ममता भी उसी बिरादरी में शामिल हो गई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव के पहले धमकी दी थी कि  यदि भाजपा सत्ता में लौटी तो देश में आग लग जायेगी। नरेंद्र मोदी  तीसरी बार सत्ता में आ गए किंतु कहीं पत्ता तक नहीं खड़का। अब ममता भी वैसी ही डींग हांक रही हैं तो उसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय को धमकाना भी हो सकता है। बेहतर हो न्यायपालिका उनकी बात का संज्ञान लेते हुए  पूछे कि  दूसरे राज्यों  सहित दिल्ली तक आग पहुँचने और मोदी सरकार के गिरने जैसी बात क्या देश की अखंडता के लिए खतरा नहीं है और इसके बाद उन्हें सत्ता में रहने का क्या अधिकार  है ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 28 August 2024

जम्मू कश्मीर: धारा 370 और अलग झंडे की बहाली पर कांग्रेस अपना रुख साफ करे


जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस और नेकां ( नेशनल  काँफ्रेंस ) के बीच गठजोड़ पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। दोनों के बीच सीटों का जो बंटवारा  हुआ उसके अनुसार नेकां 51 और कांग्रेस 32 सीटें लड़ेगी । इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस ने इस राज्य में छोटे भाई की भूमिका स्वीकार कर ली है। चुनाव के ऐलान के पहले ये उम्मीद थी कि कश्मीर घाटी में असर रखने वाली तमाम पार्टियां मिलकर संयुक्त मोर्चा बना लेंगी। सबसे ज्यादा उम्मीद नेकां और पीडीपी के साथ आने की थी लेकिन अचानक नेकां के वरिष्ट नेता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला ने अकेले लड़ने की घोषणा कर डाली। इससे भाजपा को काफी राहत मिल गई। क्योंकि घाटी में उसका जनाधार कम होने से उसके लिए एक भी सीट जीत पाना मुश्किल है। परिसीमन के बाद जम्मू के हिन्दू बहुल अंचल में विधानसभा सीटें बढ़ जाने से उसको अपने लिए अच्छी संभावनाएं लग रही हैं। लेकिन घाटी में कोई गठबंधन नहीं होने से कांग्रेस  काफी चिंतित थी क्योंकि उसके पास भी गुलाम नबी आजाद के निकल जाने के बाद इस राज्य में अब कोई ऐसा नेता नहीं बचा जिसके नाम पर वह 10 सीटें भी जीत सके। इसीलिए राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ श्रीनगर पहुंचे और अब्दुल्ला परिवार से मिलकर गठबंधन की पेशकश की। इसके बाद नेकां और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। ये गठबंधन  ऊपरी तौर पर काफी ताकतवर नजर आता है। हालांकि लोकसभा चुनाव में नेकां के दूसरे सबसे बड़े नेता उमर अब्दुल्ला एक ऐसे व्यक्ति से बुरी तरह हार गए जो जेल में बंद है। इसी तरह पीडीपी प्रमुख मेहबूबा मुफ्ती भी लंबे अंतर से शिकस्त खा गईं। इससे ये लगा कि घाटी में अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान का आभामंडल फीका पड़ने लगा है। आम कश्मीरी भी  इतना तो बोलता ही है कि उक्त दोनों परिवारों ने कश्मीर को जमकर लूटा और कश्मीरियों को बदहाली में रहने मजबूर कर दिया। बावजूद इसके  धारा 370 उनके लिए नाक का सवाल है। अन्यथा उसके हटने के बाद  घाटी में जो शांति आई उसकी हर कोई तारीफ करता है। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद फारूक को भी ये लगने लगा कि अब घाटी में उनके परिवार का वह प्रभाव नहीं रहा जो पहले हुआ करता था। यही कारण रहा कि जैसे ही राहुल और खरगे जी आये नेकां ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने पर रजामंदी दे दी। हालांकि घाटी में कुछ छोटी - छोटी पार्टियां ऐसी हैं जो एक - दो सीटों पर प्रभावशाली हैं किंतु नेकां और कांग्रेस गठबंधन एक बड़ी ताकत के तौर पर मैदान में हैं। लेकिन इस गठबंधन से कांग्रेस के लिए एक ऐसी मुश्किल पैदा हो गई जिसका सामना करना उसके लिए मुश्किल होगा। और वह है 370 को लेकर नेकां का रवैया। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला पिता - पुत्र कह चुके हैं कि यदि सत्ता में आये तो 370 को बहाल करने संबंधी प्रस्ताव विधानसभा में लाएंगे । और तो और जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा भी दोबारा फहराने की प्रथा वापस लायेंगे। 370 की बहाली और राज्य के अलग झंडे की बात का समर्थन यदि कांग्रेस करती है तो वह उसके लिए आत्मघाती होगा। जम्मू अंचल में तो इन वायदों से उसे नुकसान होना तय है ही किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में भी  समस्या पैदा हुए बिना नहीं रहेगी। स्मरणीय है धारा 370 को हटाने का अनेक कांग्रेसी नेताओं द्वारा  स्वागत किया गया था। बाद में पार्टी ने भी अधिकृत तौर पर निर्णय की प्रक्रिया पर आपत्ति व्यक्त की थी किंतु मोदी सरकार के उस निर्णय के पक्ष में जबरदस्त जनमत होने से पार्टी विरोध करने का साहस न जुटा सकी। 370 हटने के बाद राज्य आतंकवाद और अलगाववाद से पूरी तरह मुक्त हो गया ये कहना तो सही नहीं है किंतु उसमें जो कमी आई उसने घाटी में व्याप्त भय के माहौल को काफी हद तक घटाया है। इसका प्रमाण पर्यटकों की संख्या में रिकार्ड तोड़ वृद्धि है। दूसरी तरफ विकास कार्यों में भी तेजी आई है। हालांकि इसकी वजह से घाटी में भाजपा को सफलता मिलेगी ये उम्मीद करना जल्दबाजी होगी किंतु कांग्रेस के लिए 370 और राज्य के अलग झंडे  की वापसी के वायदे का समर्थन करना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। अभी तक उसने ये स्पष्ट नहीं किया कि वह नेकां के उक्त वायदों का समर्थन करती है या नहीं किंतु जल्द उसे अपनी स्थिति साफ करनी होगी । वरना उसको  कश्मीर के बाहर भी जवाब देना मुश्किल हो जायेगा। विशेष रूप से ये मुद्दा श्री गाँधी के लिए परेशान करने वाला बनेगा क्योंकि नेकां से गठबंधन करने वही गए थे। 


- रवीन्द्र  वाजपेयी

Tuesday, 27 August 2024

नई भर्ती वालों को उपकृत करने से भाजपा में पनप रहा असंतोष



कल जम्मू कश्मीर विधानसभा के लिए भाजपा द्वारा   प्रत्याशियों की पहली सूची जारी होते ही हंगामा हो गया। इसके बाद फौरन वह सूची रद्द की गई और कुछ देर बाद संशोधित सूची जारी हुई। पहली सूची में जिन वरिष्ट नेताओं के नाम कटे उनमें से कुछ को उम्मीदवार बना दिया गया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुछ दिनों पहले पार्टी में आये लोगों को टिकिट देने से उन लोगों के मन खट्टे हो जाते हैं जो बरसों से पार्टी की सेवा करते आये हैं और वह भी विपरीत परिस्थितियों में। हालांकि  इस तरह के हंगामे सभी दलों में होने लगे हैं । लेकिन भाजपा अपने को अनुशासित कार्यकर्ताओं की पार्टी  कहते नहीं थकती । इसलिए उसके भीतर इस तरह की घटनाएं हैरत पैदा करती हैं।  जम्मू कश्मीर में गत दिवस जो हुआ वह चुनाव वाले  अन्य राज्यों में भी हो सकता है। इसका एक कारण भाजपा में टिकिटार्थियों की बढती संख्या  भी है। जनसंघ के ज़माने में उम्मीदवार ढूँढे जाते थे क्योंकि हारने के लिए लड़ना पड़ता था। वहीं भाजपा बनने के बाद पार्टी को सत्ता मिलने लगी जिस वजह से हर सीट पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन बीते कुछ समय से  कार्यकर्ताओं के साथ ही उसके परंपरागत समर्थकों तक में इस बात को लेकर नाराजगी  है कि तपे - तपाये कैडर  को किनारे रखकर दूसरे दलों से  नये - नये आये लोगों को टिकिट दे दिया जाता है। हालांकि क्षेत्रीय दलों के उभरने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को नई भर्ती वाले नेताओं को उपकृत करना जरूरी हो गया है। लेकिन कुछ ऐसे मामले हैं जिनमें एक दिन पहले आये व्यक्ति को राज्यसभा की टिकिट दे दी गई। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण इसके ताजा उदाहरण हैं। ऐसा ही हरियाणा में  किया गया जब हाल ही में पार्टी में आईं किरण चौधरी को भी राज्यसभा उम्मीदवारी दे दी गई। हालांकि ऐसे निर्णय चुनाव में लाभ उठाने के लिए ही किये जाते हैं लेकिन हर बार वे सफल होंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। महाराष्ट्र में श्री चव्हाण को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बावजूद उनके प्रभाव वाले इलाकों में भी भाजपा के हाथ पराजय ही आई। श्रीमती चौधरी भी हरियाणा में भाजपा को अपेक्षित सफलता दिलवा सकेंगी इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। ताजा चर्चा झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के भाजपा में आने को लेकर चल पड़ी है। झारखण्ड में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 31 जनवरी को  ईडी द्वारा गिरफ्तार किये जाने पर जब हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया तब चंपई सोरेन को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाया गया किंतु जुलाई में जमानत पर रिहा होते ही हेमंत उन्हें हटाकर हटाकर मुख्यमंत्री बन बैठे। चंपई को गद्दी छोड़ना नागवार गुजरा और वे पार्टी छोड़ने की बात करने लगे। सुना है इसके पीछे भी भाजपा ही है। असम के मुख्यमंत्री  के मुताबिक वे 30 तारीख को भाजपा में आ जाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो क्या भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करेगी ये सवाल उठना स्वाभविक है। चूंकि चंपई  मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के कारण झामुमो छोड़कर आएंगे इसलिए वे उससे कम क्यों चाहेंगे ? लेकिन खबर ये है कि जो विधायक उनके साथ थे वे भी हेमंत के पास लौट गए। ऐसे में वे भाजपा का कितना फ़ायदा चुनाव में करवाएंगे ये अनिश्चित है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना तोड़कर भाजपा के साथ आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर अपने पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का अवमूल्यन कर दिया। कुछ समय बाद एनसीपी के अजीत पवार भी सत्ता की खातिर साथ आ गए और उपमुख्यमंत्री बन बैठे। लेकिन लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में भाजपा को जबरदस्त नुकसान हुआ। पार्टी को ये समझना चाहिए कि इस तरह के नेताओं के साथ आने से पार्टी की छवि भी खराब हुई है। बिहार में नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश में चंद्रा बाबू नायडू के साथ गठबंधन का लाभ इसलिए हुआ क्योंकि वहाँ किसी तरह की तोड़ फोड़ नहीं हुई। ये देखते हुए भाजपा नेतृत्व को नई भर्ती के बारे में बेहद सावधान और सतर्क रहना चाहिए। जम्मू कश्मीर, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में उसका अपना संगठन है जिसमें अनुभवी और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की विशाल संख्या है। बाहर से आने वालों पर रोक भले न लगे किंतु उन्हें सीधे टिकिट दे देना बुद्धिमत्ता नहीं है। ऐसा करने का नुकसान उठाने के बाद भी यदि भाजपा इस परिपाटी को जारी रखेगी तब उसे लोकसभा चुनाव जैसे नतीजों के लिए तैयार रहना होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 August 2024

योजनाएं तो सभी अच्छी लेकिन पैसा कहाँ से लाओगे


लोकसभा चुनाव में मध्यम वर्ग की नाराजगी का खामियाजा झेलने के बाद केंद्र सरकार ने ओ.पी.एस अर्थात पुरानी पेंशन स्कीम फिर शुरू करने के बजाय  बीच का रास्ता निकालते हुए यू .पी.एस (यूनीफाइड पेंशन स्कीम) नामक  योजना केंद्रीय कर्मचारियों के लिए लागू करने की घोषणा की है। इस योजना के अंतर्गत सेवा निवृत्ति के पूर्व अंतिम 12 महीने में प्राप्त मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 50 प्रतिशत बतौर पेंशन हर माह दिया जायेगा। इसके लिए 25 वर्ष की सेवा जरूरी होगी वहीं न्यूनतम पेंशन 10 हजार रु. मासिक अनिवार्यतः देय होगी। 1 अप्रैल 2025 से लागू होने वाली इस योजना में कुछ शर्तों के साथ वे कर्मचारी भी शामिल हो सकेंगे जो वर्तमान में लागू एन .पी .एस (न्यू पेंशन स्कीम) योजना के अंतर्गत हैं। केंद्र सरकार के उक्त निर्णय के बारे में  कर्मचारी जगत की प्रतिक्रिया मिली - जुली है। कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को कदम पीछे खींचना बताते हुए कहा यह विपक्ष के दबाव का परिणाम है। दूसरी तरफ भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर वायदा खिलाफ़ी का आरोप लगाते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में  पुरानी पेंशन योजना लागू करने का आश्वसन देने के बाद वह  पलटी मार गई। ऐसे में  उसे यूपीएस का विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। कुछ श्रमिक संगठन नई घोषणा से सहमत हैं तो कुछ ने  बाद में  अपनी राय देने कहा है। ये कहना गलत नहीं है कि  कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक होने से मोदी सरकार ने ये फैसला किया।  महाराष्ट्र सरकार ने इस योजना को अपने राज्य में लागू  करने का ऐलान भी कर दिया। इसे देखते हुए भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी  इसको लागू किया जा सकता है  ताकि विपक्षी पार्टियों के शासन वाली राज्य सरकारों पर भी दबाव पड़े। इस योजना का आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को कितना लाभ मिलेगा ये तो परिणाम ही स्पष्ट करेंगे किन्तु इससे पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी गंभीर विषय  है। कांग्रेस के लिए भी ये गले की हड्डी बन गया है क्योंकि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में  वह इसे लागू नहीं कर सकी। लोकसभा चुनाव में इसीलिए वह इसका वायदा नहीं कर सकी। अन्य विपक्षी दल भी  असमंजस में हैं जो  पुरानी पेंशन योजना का राग अलापते रहे। वाजपेयी सरकार द्वारा इसे समाप्त करने के पीछे आर्थिक कारण ही  थे। इसीलिए मनमोहन सरकार के दस वर्षीय कार्यकाल में राहुल गाँधी या अन्य किसी कांग्रेस नेता ने पुरानी पेंशन स्कीम की बात नहीं की। 2014 के बाद 2919 का लोकसभा चुनाव भी हारने के बाद  उन्हेँ इसकी याद आई  और उसे चुनावी वायदों में शामिल कर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस ने अपनी सरकार भी बना ली किंतु उसको लागू  करने में पसीने छूट गए। भाजपा ने भी इसी बात का उसे उलाहना दिया।  जिस नई पेंशन योजना की केंद्र सरकार ने घोषणा की उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ से किस प्रकार निपटा जाएगा ये बताने के लिए  कोई तैयार नहीं है। सही बात ये है कि सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं। केंद्रीय सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायत तक  में कर्मचारियों की कमी है। अदालतों में न्यायाधीश कम हैं और अस्पतालों में डाक्टर। कंप्युटर आने के बाद अब ए.आई ( रोबोट) और बड़े खतरे का संकेत दे रहा है। आई.ए.एस और आई.पी.एस के अलावा अन्य प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों की भर्ती हेतु तो नियमित परीक्षा होती और परिणाम घोषित होते हैं। लेकिन निचले स्तर पर खाली पड़े  सरकारी पदों को भरने के  लिए  सरकारें पूरी तरह उदासीन हैं। सरकारी शालाओं और महाविद्यालयों के साथ ही विश्व विद्यालयों तक में अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। इसके पीछे आर्थिक कारण ही हैं। ऐसे मैं यू .पी.एस का बोझ सरकार किस  प्रकार वहन कर पायेगी ये बड़ा सवाल है। चुनावी लाभ हेतु राजनीतिक दलों द्वारा जो मुफ्त उपहारों की बरसात की जा रही है उसकी वजह से राज्य  सरकारों पर कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है। इसकी भरपाई नये टैक्स लगाकर की जाती है। सरकारी कर्मचारी  संगठित क्षेत्र के होने से सरकार पर दबाव बनाने की स्थिति में होते हैं। लेकिन जिस तरह से संविदा पर कर्मचारियों को रखे जाने का चलन बढ़ रहा है वह बढ़ते वेतन - भत्तों का ही विपरीत परिणाम है। ये स्थिति अच्छी नहीं है। कुछ लोगों को दिये जा रहे जबरदस्त लाभ का नुकसान संविदा कर्मी भुगत रहे हैं। श्रमिक संगठनो को इस बारे में विचार करते हुए ऐसा कुछ  करना चाहिये जिससे कि समूचे कर्मचारी वर्ग को लाभ हो। कुछ का पेट गले तक भर जाए और बाकी के खाली  रहें ये अन्याय है। सरकार में बैठे लोगों को भी ये सोचना होगा कि केवल चुनाव जीतने के लिए कुछ लोगों को खुश करना आदर्श व्यवस्था नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 August 2024

मोदी की यूक्रेन यात्रा किसी बड़े परिणाम का कारण बन सकती है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना कारण और जरूरत के कोई काम नहीं करते। उनके ज्यादातर निर्णय दूरगामी लक्ष्यों पर केंद्रित होते हैं। हालांकि हर काम में कामयाबी मिली हो ऐसा नहीं है किन्तु वे बिना निराश हुए प्रयास करते रहते हैं। विदेश नीति के क्षेत्र में उनकी सक्रियता इसका प्रमाण है। तीसरी बार स्पष्ट बहुमत के बिना जब उन्होंने सरकार बनाई तब ये कहा गया कि सहयोगियों पर उनकी निर्भरता के चलते वे पहले जैसे मजबूत नहीं रह गए। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी तो इस बात का ढिंढोरा पीटते रहते हैं कि प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डिग गया है।लोकसभा में विपक्ष अपने संख्याबल में हुई वृद्धि के कारण  सत्ता पक्ष पर हावी दिखा। सहयोगी दलों के दबाव के चलते सरकार को  कुछ कदम पीछे भी खींचने पड़े । लेकिन इस सबके बावजूद श्री मोदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रभावशाली उपस्थिति  बनाये हुए हैं।  इटली में आयोजित जी - 7 सम्मेलन में उनको विशेष रूप से आमंत्रित किया जाना वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते महत्व का संकेत था। लेकिन उस आयोजन में अमेरिका समर्थक देशों का बोलबाला था जो यूक्रेन युद्ध के कारण रूस विरोधी नीति पर चल रहे हैं। उनमें भारत ही  था जिसने उस विवाद में तटस्थ रहने का जोखिम उठाते हुए सर्वप्रथम तो अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखते हुए रूस के हमले की निंदा से दूरी बनाये रखी, वहीं यूक्रेन में फंसे हजारों भारतीय विद्यार्थियों की सकुशल स्वदेश वापसी के अभियान को सफ़लता पूर्वक पूरा किया। इस युद्ध ने दुनिया को शीतयुद्ध वाले दौर में पहुँचा दिया जब ज्यादातर देश अमेरिका और सोवियत संघ नामक दो खेमों में बँटे हुए थे। भारत कहने को तो गुट निरपेक्ष देशों के साथ था किंतु अमेरिका और ब्रिटेन का झुकाव पाकिस्तान की ओर होने से हमको न चाहते हुए भी अघोषित तौर पर ही सही किंतु सोवियत संघ से नजदीकी बढ़ानी पड़ी। सोवियत संघ तो खैर बिखर गया और उसी के साथ उसे बनाने वाले रूस की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन के  सत्ता में आते ही रूस सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक तौर पर फिर महाशक्ति की श्रेणी में आ गया। हालांकि वैश्वीकरण के बाद आर्थिक नीतियों में हुए बदलाव ने भारत की विदेश नीति को अमेरिका की तरफ झुकाया किंतु श्री मोदी के सत्ता में आने के बाद हमने जिस संतुलन का रास्ता पकड़ा उसके कारण आज भारत के सभी गुटों से अच्छे रिश्ते हैं। परिणामस्वरूप हमारा निर्यात भी बढ़ा। कोरोना काल में  दुनिया के तमाम देशों को वैक्सीन उपलब्ध करवाकर भारत ने जो सम्मान अर्जित किया उसने विदेश नीति के अछूते पहलू को उजागर किया। श्री मोदी हाल ही में रूस गए थे। इस यात्रा से यूक्रेन ही नहीं अमेरिका और उसके पिछलग्गू भी नाराज हुए किंतु रूसी नेतृत्व के समक्ष उन्होंने दो टूक कहा कि युद्ध से कोई मसला नहीं सुलझता। बावजूद इसके राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी की जमकर तारीफ की। अमेरिका में इन दिनों राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी है। मौजूदा राष्ट्रपति के मैदान से हटने के बाद नया चेहरा राष्ट्रपति बनेगा। यदि डोनाल्ड ट्रंप लौटे तब विश्व राजनीति में उथलपुथल और बढ़ेगी। इसका असर विश्व अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा जो रूस- यूक्रेन युद्ध से डगमगा चुकी है। ऐसे में श्री मोदी का रूस के बाद यूक्रेन की यात्रा पर जाना बहुत ही सोचा - समझा कूटनीतिक पैंतरा है। हालाँकि ये मान लेना जल्दबाजी है कि इस यात्रा से युद्ध खत्म हो जायेगा और रूस - यूक्रेन के बीच दोस्ताना कायम हो जायेगा किंतु रूस को न हमलावर न कहने के बावजूद यदि श्री मोदी का यूक्रेन में जोरदार स्वागत हुआ तो यह बड़ी बात है। जिन राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत के प्रधानमंत्री की मास्को यात्रा पर नाराजी दिखाई थी वे ही उनके लिए लाल कालीन बिछाए देखे गए। यूक्रेन में भी श्री मोदी ने युद्ध को समाधान कारक न मानते हुए शांति अपनाने की जो  सलाह दी उससे समूचा विश्व प्रभावित है। इसीलिए कहा जा रहा है कि शायद श्री मोदी दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका में हैं। वरना उनकी मास्को यात्रा के बाद यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचना महज तफरीह नहीं हो सकती। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध के लंबा खिंचने से भी दुनिया परेशान है। ईरान के अमेरिका विरोधी तेवर से तीसरे विश्व युद्ध की पटकथा लिखी जा रही है। ऐसे में यदि रूस और यूक्रेन में सुलह हो सके तो ये पूरे विश्व के लिए राहत की बात होगी।  हो सकता है कि राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी को यूक्रेन से बात कर युद्ध बंद करवाने का अनुरोध किया हो क्योंकि लड़ाई के लम्बे खिंचने के बाद भी यूक्रेन के मुकाबले में डटे रहने और मौका मिलते ही पलटवार करने से रूस भी थकने लगा है। उसे डर है कहीं उसकी हालत वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के फंसने जैसी न हो जाए। यदि श्री मोदी वाकई इस युद्ध को रुकवा सके तो वह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी जिसके बाद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का हमारा दावा और मजबूत हो जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 23 August 2024

बलात्कारियों को फांसी के बाद भी दुष्कर्म नहीं रुकना चिंता का विषय


कोलकाता  में एक महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी नृशंस हत्या  निर्भया कांड से भी वीभत्स है क्योंकि  घटना को अंजाम देने वाले पढ़े - लिखे हैं और उन्हें संरक्षण देने वाले भी जिम्मेदार पदों पर  थे। सर्वोच्च न्यायालय ने Little a as Aa प्रकरण को अपने हाथ में लेकर जाँच सीबीआई को सौंप दी। ये साफ  है कि प. बंगाल की पुलिस ने उस मामले में अव्वल दर्जे की लापरवाही दिखाई। यह उसका निकम्मापन था या राज्य सरकार का दबाव ये कहना जल्दबाजी होगी किन्तु जो बातें सामने आ रही हैं उनसे यह आशंका मजबूत हो रही है कि उक्त कांड  सुनियोजित था। जिस महिला के साथ हैवानियत की गई वह संभवतः किसी अपराध के बारे में जान गई थी। उसका मुँह बन्द करने  उस घटना की साजिश रची गई या फिर यह महज बलात्कार था , ये इस समय कह पाना मुश्किल है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी घटना की जाँच सीबीआई से करवाने कतई राजी न होतीं किंतु सर्वोच्च न्यायालय के कारण वे असहाय होकर रह गईं। उसने भी इस बात पर आश्चर्य और नाराजगी जताई कि मृतका का पोस्टमार्टम पहले किया गया जबकि  प्राथमिकी कई घंटों बाद दर्ज की गई। जिस संस्थान में उक्त वारदात हुई वहाँ के प्राचार्य सहित तमाम लोग हत्या को आत्महत्या प्रचारित करने में लगे रहे। उक्त घटना के बाद देश भर की युवतियों में इसे लेकर गुस्से के साथ भय भी है।  तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी असंतोष के स्वर सुनाई दे रहे हैं। हर मुद्दे पर दहाड़ने वाली मुख्यमंत्री रक्षात्मक  हैं किंतु दिन ब दिन उनकी छवि को बट्टा लग रहा है। राजनीति भी ऐसे अवसरों पर अपनी भूमिका का निर्वहन करती है। भाजपा के साथ ही वामपंथी भी ममता के विरुद्ध हैं।  लेकिन इंडिया गठबंधन में इस घटना का वैसा संगठित विरोध नजर नहीं आ रहा जैसा महाराष्ट्र के बदलापुर में दो अबोध बालिकाओं के साथ हुए अमानुषिक कृत्य पर है। वहाँ की घटना में भी प्राथमिकी देर से दर्ज करवाने का आरोप शिंदे सरकार पर लग रहा है। चूंकि भाजपा भी उसमें भागीदार है लिहाजा उसके दामन पर भी दाग लग रहे है ।  कुल मिलाकर इस प्रकरण में कई बातें एक साथ उठ खड़ी हुई हैं। पहली तो ये कि यह साधारण दुष्कर्म और हत्या नहीं है। दूसरा ये कि  जिस संस्थान में हत्या हुई वहाँ के प्रशासन ने भी  लीपापोती करने का हरसंभव प्रयास किया। पुलिस ने पोस्टमार्टम और प्राथमिकी के समय में जो अंतर रखा वह उसे संदेह के घेरे में लाती है। तीसरा ये कि ममता सरकार ने सीबीआई जाँच से बचने का जो प्रयास किया उससे उसकी मंशा संदिग्ध प्रतीत हो रही है । रही बात महाराष्ट्र के बदलापुर में हुई घटना की तो उसमें भी स्थानीय पुलिस और प्रशासन के साथ ही संबंधित विद्यालय के प्रबंधन की गलती सतह पर तैर रही है। उसकी वजह से देश भर के अभिभावकों में चिंता व्याप्त है क्योंकि इस तरह के मामले अक्सर संस्थान और बच्चियों की पहिचान उजागर होने से बचाने के लिए दबा दिये जाते हैं। जिस व्यक्ति को इस कांड में गिरफ्तार किया गया वह मानसिक रूप से बीमार भी हो सकता है किंतु अबोध बालिकाओं  के साथ इस प्रकार का कुकृत्य करने वाले को तो मृत्युदंड से कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। लेकिन कोलकाता में जिस नृशंस तरीके से महिला चिकित्सक के साथ दुराचार करने के बाद उसकी हत्या की गई वह साधारण अपराध नहीं लगता। लेकिन ये बात  फिर उठ रही है कि ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया बेहद धीमी होने से अपराध करने वालों का खौफ कम हो जाता है। अजमेर में 1992 में हुए  ब्लैकमेलिंग कांड का निपटारा अभी तक पूरी तरह नहीं हो सका क्योंकि एक आरोपी अभी तक फरार है। निर्भया कांड के दोषियों को भी फांसी होने में बरसों लगे। यहाँ तक कि फांसी लगने के कुछ घंटों पहले तक उसे रुकवाने की कोशिशें वकीलों द्वारा की जाती रहीं। संसद भी इस बारे में चिंता व्यक्त कर चुकी है। लेकिन दुष्कर्म की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं। लगभग 100 घटनाएं प्रति दिन होती है। वहीं इससे ज्यादा लोकलाज के फेर में दबी रह जाती हैं। दुःख का विषय ये है कि सामाजिक स्तर पर किसी घटना के बाद गुस्सा तो खूब दिखता है किंतु वह बुलबुले जैसा होता है। कोलकाता में भी खूब प्रदर्शन हो रहे हैं।  पुलिस, प्रशासन और सरकार ऐसे मामलों में कारवाई तो कर सकती है किंतु मानसिकता बदलने का काम तो परिवार और समाज को ही करना होगा। घरों में बेटियों को सावधानी बरतने के साथ ही बेटों को भी लड़कियों के प्रति सम्मान रखने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। इंटरनेट के जरिये परोसी जा रही अश्लील सामग्री हमारे नौनिहालों को यौन अपराधी बना रही है। अभिभावकों को चाहिए  बच्चों को इस बुराई से बचाएं। कोलकाता कांड के बाद देश भर के चिकित्सक हड़ताल पर चले गए। लेकिन ऐसी घटना तो किसी भी महिला के साथ हो सकती है। अपराध होने के बाद अपराधी को दंड मिलना तो स्थापित प्रक्रिया है किंतु इस तरह के अपराध बढ़ते क्यों जा रहे हैं उस कारण को तलाशकर समाधान निकालना जरूरी है। बलात्कारियों को फांसी लगने के बाद भी यदि ऐसा करने वालों में खौफ नहीं है तो स्थिति वाकई गंभीर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 August 2024

आरक्षण हर मर्ज की दवा नहीं : उचित विकल्प की तलाश जरूरी


ट्रेड यूनियन के मित्रों से सुना करता था कि हड़ताल अंतिम अस्त्र  है। फिर बंद नामक उससे बड़ा हथियार ईजाद हुआ । कुछ आंदोलनों में रेल रोककर लोग पटरियों पर बैठे रहे।  शाहीन बाग और किसान आंदोलन में सड़क पर कब्जा करने का तरीका भी देखने मिला , जिसे प्रयोग कहा गया। लेकिन इनसे हासिल क्या हुआ? न पटरियों पर बैठने वाले कुछ प्राप्त कर सके और न ही सड़क घेर कर बैठे लोग। सवाल ये है कि इसके बाद क्या होगा क्योंकि पूरा भारत तो बंद हुआ नहीं। दरअसल ऐसे आंदोलन किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित होते हैं जिनका मुहूर्त चुनाव के इर्द - गिर्द होता है। चुनावी लाभ उठाकर  वे तो सफल हो जाती हैं जबकि आंदोलनकारी खाली हाथ रह जाते हैं। उदाहरण के लिए रेल यातायात ठप्प करने वाले ठंडे होकर बैठ गए, शाहीन बाग की जमातें भी न जाने कहाँ हैं? किसान आंदोलन का भाग - 2 चाहकर भी शुरू नहीं हो सका। कल के बंद को जिन दलों ने समर्थन दिया, यदि वे खुलकर सामने आते तो उसे ज्यादा  सफलता मिल सकती थी किंतु दलितों और आदिवासियों के संगठनों में ही आपसी विश्वास का अभाव है। मायावती को चंद्रशेखर आजाद खटक रहे हैं। कांग्रेस और सपा सहित शेष विपक्षी दल भी जुबानी समर्थन देकर घर बैठे रहे। उनको भी चन्द्रशेखर का उभार खतरे की घण्टी लग रहा है।  आजादी के कई दशकों बाद तक कांग्रेस दलितों की निर्विवाद मसीहा थी किंतु 80 का दशक आते तक कांशीराम ने दलित ध्रुवीकरण का जो प्रयास किया उसका प्रतिफल मायावती को उ.प्र  की सत्ता तक पहुँचाने के रूप में मिला। 2007  में  किसी भी  दल की बैसाखी के बिना इस बड़े राज्य में एक दलित महिला का राजतिलक बड़े सामाजिक परिवर्तन के तौर पर देखा गया  किंतु मायावती भी जल्द ही सत्ता के मायाजाल में उलझ गईं । दलित राजनीति का वह ज्वार जैसे आया वैसे ही लौट गया। एक जमाना वह था जब मायावती केंद्र सरकार को गिराने या बचाने का माद्दा रखती थीं किंतु आज उनके पास न लोकसभा की सीट है न राज्यसभा की। उ.प्र विधानसभा में भी  एकमात्र  बसपा विधायक है। इसका कारण दलितों के उत्थान के नाम पर खुद का उत्थान करने की सोच रही । कांशीराम ने उनको राजनीतिक वारिस बनाया किंतु उन्हें अपने भतीजे के  सिवाय कोई नहीं मिला । जिससे पार्टी नेताओं से खाली होती चली गई। इसी कारण चंद्रशेखर आज़ाद लोकसभा में पहुँचने में सफल हो गये। ये दोनों नेता एक हो जाएं तो उ.प्र में बसपा  फिर ताकतवर हो सकती है किंतु इसकी संभावना न के बराबर है। परिणाम स्वरूप  एक भी ऐसा नेता नहीं बचा जिसकी आवाज पर सारे दलित लामबंद हो जाएं।  यही स्थिति आदिवासियों के बीच है।  समय आ गया है जब दलित/ आदिवासी संख्याबल  पर आत्ममुग्ध होने की बजाय  अपने बीच में से  ऐसा  प्रामाणिक नेतृत्व  विकसित करें जिसकी प्रतिबद्धता अपने  समाज के  पिछड़ेपन को दूर करने के साथ ही उन्हें अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना हो। मायावती ने जो धन स्मारकों पर खर्च किया उतना यदि वे दलित बच्चों की शिक्षा पर कर देतीं तो अब तक उनमें से  सैकड़ों  का भविष्य उज्ज्वल हो जाता। यही हाल ओबीसी नेताओं का भी है।  कल के बंद से एक बार फिर ये बात उजागर हो गई कि दलित समुदाय कुछ राजनीतिक नेताओं का मोहताज है। यदि उसके पास राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर प्रभावशाली नेता होते तो कल का बंद पूरी तरह सफल रहता। जहाँ तक बात केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू न करने का आश्वासन देने की है तो उसके पीछे महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड विधानसभा के चुनाव हैं। लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद प्रधानमंत्री किसी भी प्रकार का खतरा नहीं लेना चाहते । लेकिन इसका श्रेय चिराग पासवान को मिला जो मोदी सरकार में मंत्री हैं। दलित अस्मिता को लेकर बातें तो बड़ी - बड़ी होती हैं लेकिन ओबीसी में जितने बड़े राजनीतिक छत्रप हैं उतने दलित और आदिवासियों में नहीं। आजादी के बाद बाबू जगजीवनराम दलितों के बड़े नेता थे किंतु प्रशासनिक दक्षता के बावजूद उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई पहल नहीं हुई। सही बात ये है कि दलितों और आदिवासियों को आरक्षण का झुनझुना पकड़ाकर बहलाया जाता रहा है। और उनके कंधों पर सवाल होकर चंद परिवार अपना और अपनी औलादों का विकास करते रहे। आज भी  कमोबेश वही स्थिति है। आरक्षण को हर मर्ज की दवा मानकर ढोने के बजाय उसका ऐसा कोई  ऐसा विकल्प तलाशा जाना चाहिए जिससे इन वर्गों का जीवन स्तर सुधरे और वे विकास की मुख्य धारा में शामिल हो सकें। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 August 2024

क्रीमी लेयर का विरोध करने वाले न्यायाधीश भी दलित ही हैं

एक समय था जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर टिप्पणी से परहेज किया जाता था। यहाँ तक कि संसद के भीतर भी उनकी आलोचना नहीं होती थी। लेकिन समय के साथ वह लिहाज टूटने लगा और अब किसी भी अदालती निर्णय की जमकर आलोचना होने लगी है। इसकी शुरूआत कब हुई, ये पक्के तौर पर कह पाना तो कठिन है किंतु 12 जून 1975 को जब अलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का लोकसभा चुनाव अवैध घोषित किया तब  उनके बेटे संजय गाँधी ने इस बात पर अचरज जताया कि करोड़ों लोगों द्वारा चुने प्रधानमंत्री को एक अदना सा न्यायाधीश कैसे अपदस्थ कर सकता है? अनेक स्थानों पर श्री सिन्हा के पुतले जलाए जाने की खबरें भी आईं। कुछ दिनों बाद आपात्काल लगाकर इंदिरा जी ने जनता को अभिव्यक्ति के अधिकार से भी वंचित कर दिया। अखबारों पर सेंसर लग गया। 19 महीने बाद चुनाव होने पर इंदिरा जी सत्ता से बाहर हो गईं और जनता पार्टी की सरकार बनी किंतु वह महज 27 माह में गिर गई। नये चुनाव हुए जिसमें इंदिरा जी की वापसी हुई। उनके बेटे संजय गाँधी के साथ  युवाओं की जो  टोली संसद और कांग्रेस संगठन में आई वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं की बजाय व्यक्ति केंद्रित राजनीति में विश्वास रखती थी। संसद में होने वाले हंगामे उसी दौर की देन हैं। ये कहना गलत न होगा कि न्यायपालिका की सरे आम आलोचना भी उसी समय से शुरू हुई। इसके लिए संसद के मंच का उपयोग होने लगा क्योंकि वहाँ कही गई किसी भी बात के लिए मानहानि का प्रकरण दर्ज नहीं होता। राजीव गाँधी के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय के शाहबानो को गुजारा भत्ता दिये जाने संबंधी निर्णय को संसद ने पलटकर एक नई शुरुआत कर दी। और उसी के बाद से ये देखने में आने लगा कि जो भी न्यायालायीन फैसला किसी वर्ग विशेष को नापसंद हो तो उसको रद्द करवाने का दबाव बनाया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में  आरक्षण व्यवस्था का लाभ कुछ जाति विशेष तक सीमित रहने पर ऐतराज जताते हुए कोटे के भीतर कोटा तय करने का अधिकार राज्यों को दे दिया। साथ ही अनु. जाति / जनजाति वर्ग में भी क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर करने की बात कही। इस फैसले का आम तौर पर स्वागत हुआ। अनु. जाति / जनजाति में बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो संख्या और राजनीतिक वजनदारी में कम होने से आरक्षण से जुड़े लाभों से वंचित रह गया।  इस वर्ग में सर्वोच्च न्यायालय ने उम्मीद जगाई कि अब उनकी भी बेहतरी होगी । लेकिन आरक्षण के साथ जुड़ी राजनीति एक बार फिर अवरोध बनकर सामने आ खड़ी हुई। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की जमकर आलोचना की जाने लगी। उसे संविधान की भावनाओं के विरुद्ध बताने में भी संकोच नहीं किया गया। भीम आर्मी के नेता सांसद  चंद्र शेखर आजाद ने तो फैसला सुनाने वाले न्यायाधीशों की जाति जानने जैसी बात कह डाली जबकि क्रीमी लेयर वाली टिप्पणी करने वाले न्यायाधीश बी. आर. गवई  खुद दलित वर्ग से आते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा  कि राज्य  को एक नीति लानी चाहिए, ताकि अनु. जाति / जनजाति वर्गों में आरक्षण का लाभ उठाकर समर्थ हो चुके लोगों को इसके दायरे से बाहर किया जा सके। जस्टिस गवई  अगले साल देश के प्रधान न्यायाधीश बनने वाले हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि दलित वर्ग के भीतर ही आरक्षण को लेकर असंतोष है जिसकी अभिव्यक्ति  श्री गवई ने  फैसले के माध्यम से की। बेहतर होता सभी राजनीतिक दल और दलित संगठन उक्त फैसले की मूल भावना को समझते हुए आरक्षण से वंचित वर्ग के कल्याण की बात सोचते किंतु बजाय ऐसा करने के भारत बंद का आव्हान कर डाला गया । विभिन्न विपक्षी दल भी इसके समर्थन में आ गए । इस बंद को कितना जन  समर्थन मिला वह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि इसके आयोजन का कोई औचित्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के एक दलित न्यायाधीश के  बजाय किसी और  न्यायाधीश ने क्रीमी लेयर को आरक्षण न दिये जाने की बात की होती तो उसे दलित विरोधी प्रचारित कर दिया गया होता। उस फैसले की अंतर्निहित भावना को समझे बिना हाय तौबा मचा देना निश्चित रूप से अनुचित है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने आरक्षण को ईमानदार और पारदर्शी बनाने का रास्ता साफ किया तथा दलित/आदिवासियों के बीच उत्पन्न नव सामंतवाद पर चोट की। आज जिन संगठनों ने भारत बंद का आयोजन किया , बेहतर होता वे मायावती , चिराग पासवान, मल्लिकार्जुन खरगे, हेमंत सोरेन जैसे नेताओं से  पूछते कि उनकी राजनीतिक विरासत उनके परिवार तक ही सीमित क्यों है? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 20 August 2024

सीधी नियुक्ति के विरोध में छिपा है राजनीतिक स्वार्थ


केंद्र सरकार ने कुछ प्रशासकीय पदों पर सीधी  नियुक्ति हेतु निजी क्षेत्र के अनुभवी लोगों से आवेदन आमन्त्रित किये हैं। संयुक्त सचिव, संचालक और उपसचिव  हेतु तकरीबन 50  पदों पर  सीधी नियुक्ति किये जाने के लिए दिये विज्ञापन पर राजनीति गर्मा गई है। राहुल गाँधी सहित अनेक  विपक्षी नेताओं का विरोध तो स्वाभविक है किंतु मोदी सरकार में मंत्री चिराग पासवान भी इसके विरोध में आ गए हैं। लेटरल एंट्री नामक इस तरीके से सरकार संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली परीक्षा के बिना विभिन्न पदों पर भर्ती करती है।  इसमें आरक्षण का प्रावधान नहीं होने से इसका विरोध किया जा रहा है। राहुल का आरोप है कि सीधी नियुक्ति आरक्षण को खत्म करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है जिसके जरिये सरकार  रा .स्व.संघ के लोगों को सरकारी पदों पर बिठाना चाहती है। वहीं चिराग का कहना है कि आरक्षण पर कोई भी किंतु - परंतु स्वीकार्य नहीं है। हो सकता है  भाजपा के भीतर से भी  विरोध में आवाजें उठें। उल्लेखनीय है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में क्रीमी लेयर संबंधी जो फैसला दिया गया उसको लागू होने से रोकने के लिए आरक्षित वर्ग के भाजपा सांसद प्रधानमंत्री से मिले जिसके बाद मंत्रीपरिषद की बैठक में उस निर्णय पर अमल न करने का प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। हालांकि  सीधी नियुक्ति के विवाद में सरकार का बचाव करने के लिए आगे आ रहे कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल  खुद आरक्षित वर्ग से हैं और राजनीति में आने से पहले आई.ए.एस अधिकारी भी रहे हैं। भाजपा का आरोप है कि लेटरल एंट्री की शुरुआत कांग्रेस के कार्यकाल में हुई। जिसके अंतर्गत  डा. मनमोहन सिंह को वित्त सचिव, मोंटेक सिंह अहलूवालिया को योजना आयोग का उपाध्यक्ष और सोनिया गाँधी को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का अध्यक्ष बनाया गया। जबकि कांग्रेस का कहना है ये प्रथा 2018 में मोदी सरकार ने शुरू की। वैसे केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार की भी सीधी नियुक्ति होती रही है। केंद्र सरकार के अनुसार  लेटरल एंट्री के जरिये   नियुक्ति संविदा के तौर पर 3 वर्षों के लिए होती है जिसे 2 साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। इस आधार पर देखें तो केंद्र सरकार के इतने बड़े प्रशासनिक ढांचे में यदि 50 लोग सीधी भर्ती से कुछ वर्षों के लिए शामिल किये जाएं तो इससे आरक्षण के प्रावधान की बहुत ज्यादा अवहेलना होने की संभावना नजर नहीं आती। राहुल और चिराग अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भले ही लेटरल एंट्री प्रथा का विरोध कर रहे हों किंतु उन्हें ये भी सुझाना चाहिए कि निजी क्षेत्र में कार्यरत प्रतिभाओं का उपयोग शासन की कार्य प्रणाली में समयोचित सुधार हेतु किस प्रकार किया जा सकता है? श्री गाँधी और श्री पासवान को इस बात का तो अनुभव होगा ही कि विभिन्न क्षेत्रों के योग्य व्यक्तियों को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया जाता रहा है। वर्तमान केंद्र सरकार में एस. जयशंकर, अश्विनी वैष्णव, हरदीप पुरी जैसे मंत्री गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि से आये और अच्छा काम कर रहे हैं। स्व. राजीव गाँधी ने सैम पित्रोदा को इंटरनेट और मोबाइल सेवा प्रारंभ करने अमेरिका से बुलाकर सरकारी पद दिया। बाद में वे मनमोहन सरकार में भी सलाहकार बनाये गए। और फिर कांग्रेस की विदेश शाखा के अध्यक्ष बन गए। खुद डाॅ. मनमोहन सिंह भी विभिन्न सरकारी पदों पर सीधी नियुक्ति के बाद प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे । उक्त सभी महानुभाव अपनी योग्यता और पेशवर अनुभव के कारण ही सरकार के हिस्से बने। आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद चंद्रा बाबू नायडू ने प्रतिभाशाली लोगों की गणना करवाने की बात कही थी ताकि उनका उपयोग देश के विकास हेतु किया जा सके। संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं के जरिये चयनित सामान्य और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी 60 वर्ष की आयु तक के लिए भर्ती किये जाते हैं जबकि लेटरल एंट्री से नियुक्त व्यक्ति अधिकतम 5 साल के लिए सेवा में रहेगा। इस संबंध में नंदन नीलेकणी का नाम भी लिया जा सकता है जिन्हें आधार कार्ड बनाने वाले महत्वपूर्ण प्रकल्प का  मुखिया बनाया गया जबकि वे निजी क्षेत्र की प्रमुख आई. टी कंपनी इंफोसिस के सह संस्थापक थे। बाद में उन्हें कांग्रेस ने बेंगुलूरु से लोकसभा चुनाव भी लड़ाया किंतु वे हार गए। रा. स्व. संघ के लोगों को सीधी नियुक्ति से सरकारी पदों पर बिठाने का आरोप लगाने से पहले श्री गाँधी को श्री पित्रोदा और श्री नीलेकणी के बारे में सोचना चाहिए था जो कांग्रेस पार्टी से जुड़े। इस सबसे जाहिर है कि लेटरल एंट्री का विरोध विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थ के लिए किया जा रहा है। लोकसभा में श्री गाँधी ने बजट बनाने वाले अधिकारियों में एक भी ओबीसी या अनु. जाति/जनजाति का न होने का मुद्दा छेड़ा तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनसे पूछा कि राजीव गाँधी ट्रस्ट और फाउंडेशन में आरक्षित वर्ग के कितने न्यासी हैं तो श्री गाँधी ने आज तक उसका उत्तर नहीं दिया। दरअसल लेटरल एंट्री का तरीका सरकारी कामकाज को पेशेवर स्वरूप प्रदान करना है। चूंकि यह व्यवस्था सीमित अवधि के लिए है इसलिए इससे आरक्षण को खतरे जैसी बात बेमानी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 17 August 2024

मो. यूनुस के आश्वासन पर भरोसा करना भारी भूल होगी


बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के सलाहकार  मो. यूनुस ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत करते हुए दोनों देशों के आपसी संबंधों पर चर्चा की। इस दौरान श्री मोदी द्वारा बांग्ला देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा  का मुद्दा छेड़े जाने पर उन्होंने आश्वासन दिया कि उनकी सरकार इस बारे में प्रयासरत है। कुछ दिनों पहले उन्होंने ढाका स्थित ढाकेश्वरी मंदिर जाकर हिंदुओं की हिफाजत का वायदा भी किया था। 5 अगस्त को जैसे ही वहाँ सत्ता परिवर्तन हुआ उसके बाद से ही शेख हसीना के विरोध में आंदोलन कर रहे लोगों का गुस्सा हिंदुओं पर कहर बन कर टूटने लगा।  मंदिरों में तोडफ़ोड़ के अलावा घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूटपाट के साथ ही महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें आने लगीं। इस सबसे डरे हजारों हिन्दू सीमा पर जमा होकर भारत में प्रवेश की कोशिश करने लगे किंतु सुरक्षा बलों ने उनको वापस जाने बाध्य कर दिया । लेकिन जो हिन्दू बांग्ला देश के भीतरी क्षेत्रों में रहते हैं वे अपनी जान माल की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित हैं। ये भी लग रहा है कि अल्पसंख्यकों  के साथ किये गए अत्याचारों की खबरें और चित्र सारी दुनिया में प्रसारित होने से हुई बदनामी को रोकने के लिए बांग्ला देश की सरकार ने उन खबरों को दबाने के इंतजाम कर दिये। हिंदुओं को भी इस बारे में आगाह किया जा रहा है कि वे बाहरी दुनिया से संपर्क न रखें वरना उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। हिंदुओं द्वारा ढाका में किये गए विशाल प्रदर्शन ने भी विश्व जनमत का ध्यान आकर्षित किया।  मो. यूनुस द्वारा  श्री मोदी को फोन करने के पीछे भी वही दबाव काम कर रहा था। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। बांग्ला देश का भीतरी वातावरण अभी भी हिंदुओं  के लिए अनुकूल नहीं है। इसका पता वहाँ के कट्टरपंथी नेता रब्बानी के उस बयान से मिला कि देश के सभी मंदिर और प्रतिमाएँ गिरा देनी चाहिए। रब्बानी के संगठन का एक प्रतिनिधि अंतरिम सरकार में भी है। रब्बानी बांग्ला देश में मुस्लिमों के कट्टरपंथी संगठन के मुखिया हैं जो हिंदुओं का घोर विरोधी है। इस देश के जन्म में भारत और हिंदुओं के योगदान को पूरी तरह जमीन में गाड़  देने का सुनियोजित प्रयास बांग्ला देश के जन्म के कुछ समय बाद ही शुरू हो गया था। यहाँ तक कि शेख हसीना के राज में भी हिंदुओं और मंदिरों पर हमले होते रहे। बांग्ला देश , भाषा और संस्कृति की दृष्टि से भारत के काफी करीब है। शायद इसी कारण से पूर्वी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिन्दू आबादी रह गई जबकि विभाजन के समय मुस्लिम कट्टरपंथियों ने बड़ी संख्या में उनका कत्ले आम किया था। उम्मीद की जाती थी कि पाकिस्तान के अत्याचारों का सामना करने के बाद अस्तित्व में आया यह देश  हिंदुओं और भारत के प्रति कृतज्ञता का भाव रखेगा किंतु महज 4 साल के बाद ही बांग्ला देश के राष्ट्रपिता शेख मुजीब की हत्या से इस देश की दिशा ही बदल गई और धीरे  - धीरे वह भी पाकिस्तान के रास्ते पर चल पड़ा। इस देश के मौजूदा हालात पूरी तरह से हिन्दू और भारत विरोधी हैं। शेख हसीना को दिल्ली में रहने की अनुमति से भी  कट्टरपंथी भन्नाए हुए हैं। ऐसे में मो. यूनुस द्वारा प्रदत्त आश्वासन पर विश्वास करना भारी भूल होगी क्योंकि बांग्ला देश में हुए राजनीतिक परिवर्तन की जड़ में ही हिन्दू और भारत विरोध है। इसलिए केंद्र सरकार को ढाका के नये हुक्मरानों पर दबाव बनाने के  प्रयास तेज करना होंगे।  सैन्य दृष्टि से कोई कदम उठाना तो गलत होगा किंतु अतीत में जिस प्रकार नेपाल की आर्थिक नाका बंदी की गई थी वैसा ही कदम बांग्ला देश के विरुद्ध उठाया जा सकता है। उल्लेखनीय है भारत यदि उंगली टेढ़ी कर दे तो बांग्ला देश में खाद्यान्न का संकट उत्पन्न हो जायेगा। भारत  को बांग्ला देश सरकार पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि जिस तरह वह छात्र आंदोलन में हुई मौतों की जाँच करवा रही है वैसी ही जाँच हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों की भी होनी चाहिए तथा जाँच दल में हिन्दू को भी रखा जाए। मो. यूनुस को ये समझाना भी जरूरी है कि बांग्ला देश में रह रहे हिन्दू भले ही उस देश के नागरिक हों किंतु उन पर किये जाने वाले अत्याचारों को भारत अपने ऊपर हमला मानेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 15 August 2024

अटल जी जैसा निर्विवाद और निष्कलंक नेता कोई नहीं :आज की राजनीति में उनकी कमी बहुत खलती है





    आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की  पुण्य तिथि है | स्वाधीन भारत में एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र  थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल हुई |  नेहरू जी और इंदिरा जी तो सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनका सम्मान प्रधानमन्त्री से कम नहीं था | 

     इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीति थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें  पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही सादगी से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | 

     विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि दी वह आज भी उद्धृत की जाती  है | नेहरू जी ने उनकी तेजस्विता को भांपते हुए ही भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | 

     हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में उनके  विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी  वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

     बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान अर्जित करने का उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

     मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि  व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | 

      सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह लिया करती थीं  |

     आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - 
बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने , 
तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - 
कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  
खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें ,
कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | 

     और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चूका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

     भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को     उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

     विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

     जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए थे। लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | 

     अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

      उन्हें गये 6 वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |

चित्र:-1996 में जबलपुर के पत्रकारों के साथ अटल जी का यादगार चित्र।

- आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी

देश को तोड़ने का खेल देश के भीतर से ही चल रहा





यह स्वाधीनता दिवस कई मायनों में महत्वपूर्ण है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में मिली - जुली सरकार के साथ ही मजबूत विपक्ष का जनादेश आया। यद्यपि सत्ता में लौटने पर भी भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलना चौंकाने वाला रहा जो अपने लिए 350 से अधिक और  एन.डी.ए नामक गठबंधन के 400 से अधिक सांसद जीतने के आत्मविश्वास से भरी हुई थी। लेकिन उसे 240 और गठबंधन को 292 सीटें मिलने को भाजपा की पराजय के तौर पर देखा गया। विशेष रूप से  उ.प्र में भाजपा की सीटें सपा और कांग्रेस के गठजोड़ से  कम होना आश्चर्यचकित कर गया। उसका मुख्य कारण विपक्ष द्वारा  आरक्षण खत्म किये जाने का खतरा दिखाना रहा। लेकिन उससे भी बड़ा कारण बना मुस्लिम समुदाय का भाजपा के विरुद्ध  ध्रुवीकृत होना। इस प्रकार दलित और मुस्लिमों के विरोध ने भाजपा को बहुमत  से पहले ही रोक दिया। उ.प्र जैसा ही खेल महाराष्ट्र में हुआ। हालांकि विपक्ष का प्रदर्शन  2014 और 19 की तुलना में बेहतर रहा परंतु मतदाताओं ने उसे भी सत्ता संभालने योग्य नहीं माना। इसीलिए कांग्रेस भाजपा के आसपास भी नहीं पहुँच सकी । इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि न तो भाजपा को मनमाने फैसले करने की छूट मिली और न ही विपक्ष को सत्ता का स्वाद चखने का अवसर । लेकिन चुनाव बाद जिस तरह से जाति के नाम पर समाज को टुकड़ों में बाँटने का कुचक्र रचा जा रहा है उससे  लगने लगा है कि हम निजी स्वार्थों को राष्ट्रहित से ज्यादा प्राथमिकता देने की वही भूल दोहराने से बाज नहीं आ रहे जिसने हमें सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रखा। उस दृष्टि से आज के दिन हमें इतिहास के उन पन्नों को उलटना चाहिए जिनमें आपसी फूट की गाथाएँ भरी पड़ी हैं। दुर्भाग्य से हमारे राजनेता उनको अनदेखा कर रहे हैं तभी  पहले प्रांत और भाषा के नाम पर बाँटने का कुकृत्य किया गया और अब धर्म और जाति के नाम पर समाज को टुकड़ों में  बांटने का पाप किया जा रहा है। राजनीति  का मकसद यदि देश और जनता का हित हो तभी उसकी सार्थकता है किंतु हमारे देश में वह सत्ता हासिल कर अपने और अपनों के हितों की पूर्ति करने का माध्यम बन गई है।  इसीलिए जनमानस में उसके प्रति वह सम्मान नहीं रहा जो आज़ादी की लड़ाई और उसके बाद के प्रारंभिक वर्षों में दिखाई देता था। आज देश की  स्थिति  देख कर ये चिंता होने लगी है कि  प्रांतीय और केंद्रीय सत्ता के बीच होने वाला टकराव कहीं देश को दूसरे विभाजन की ओर न धकेल दे। प्रांतीय भावनाओं की कद्र अवश्य होना चाहिए। उनकी सांस्कृतिक विविधता और भाषायी विशिष्टता की भी रक्षा होनी चाहिए। लेकिन इस विविधता में एकता बनाये रखना तभी संभव होगा जब राष्ट्रीयता की भावना सबसे ऊपर हो। आज़ादी के बाद से ही एक तबका इस बात को प्रचारित करने पर तुला हुआ है कि भारत के मूल निवासी दक्षिण में रहने वाले द्रविड़ हैं जबकि आर्य बाहर से आये। भारत के इतिहास को भी बेहद विकृत तरीके से पेश किया जाता रहा । दुष्परिणाम यह हुआ कि नई पीढ़ी को अकबर की  महानता का पाठ महाराणा प्रताप की वीरता और त्याग से कहीं ज्यादा पढ़ाया गया। राष्ट्रवाद को फ़ासिज्म से जोड़ दिया गया और भारतीय संस्कृति को पिछड़ेपन से। जब ये प्रयास भी सफलीभूत नहीं हुए तब जातिवाद का जिन्न बोतल से बाहर निकालकर भारतीय समाज के ढांचे को तहस - नहस करने का ताना - बाना बुना जाने लगा। लोकसभा चुनाव में तमाम हथकंडों के बावजूद सत्ता से वंचित रह गईं ताकतें जाति नामक हथियार का उपयोग कर सत्ता हासिल करने जिस प्रकार जुटी हुई हैं वह बेहद खतरनाक है। लेकिन वे भूल रही हैं कि विभिन्न जातियों के बीच शत्रुता पैदा कर एक - दो चुनाव भले जीत लिए जाएं किंतु कालांतर में ये तरीका आत्मघाती साबित हुए बिना नहीं रहेगा। जो क्षेत्रीय या पारिवारिक  पार्टियां जाति के नाम पर सियासत कर रही हैं  , उनका प्रभावक्षेत्र सीमित है परंतु किसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा जाति को अपना एजेंडा बनाया जाए तो इससे समूचा देश संकट में फंस जायेगा। आज का दिन इन्हीं बातों को सोचने का है। हाल ही में हमारे एक पड़ोसी देश में जिस प्रकार का वातावरण है वैसा  ही भारत में बन जाने की आशंका  किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता द्वारा जताया जाना ये दर्शाता है कि देश को कमजोर करने का खेल देश के भीतर ही चल रहा है।  जनता को इसके विरोध में खुलकर सामने आना होगा क्योंकि सब कुछ सरकार और नेताओं के भरोसे छोड़ना अपने दायित्व से भागना होगा। जिस तरह इस देश की आजादी के संग्राम में हर नागरिक की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी थी उससे अधिक आज आज़ादी की रक्षा के लिए आवश्यक है। हमारे पूर्वजों ने हमें स्वाधीन देश की विरासत सौंपी थी। अब हमें अपनी भावी पीढी़ को एक सुरक्षित, सुविकसित और समृद्ध भारत सौंपने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। 

स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी






Wednesday, 14 August 2024

ढाका के नये हुक्मरान ये न भूलें कि भारत के दखल से ही बांग्ला देश बना था

1947 में आज के ही दिन भारत का विभाजन हुआ था। पाकिस्तान के रूप में देश के पश्चिमी और पूर्वी सिरे पर एक इस्लामिक देश का जन्म हुआ। यह दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसके दो हिस्सों के बीच में 2000 कि.मी से ज्यादा की दूरी और बीच में भारत जैसा विशाल देश था। सांस्कृतिक और भाषायी दृष्टि से भी दोनों पूर्णतः भिन्न थे। पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना जब 1948 में पूर्वी पाकिस्तान गए तभी ये कहकर आ गए थे कि देश की राष्ट्रभाषा उर्दू ही होगी। उनका वह कथन वह पहली ईंट थी जिस पर पाकिस्तान के विभाजन की नींव रखी गई थी। आखिरकार 1971 में वह आशंका सही साबित हुई और पूर्वी पाकिस्तान के स्थान पर बांग्ला देश नामक नया मुल्क अस्तित्व में आया जहाँ बंगला भाषा और संस्कृति का बोलबाला था। रवीन्द्र संगीत जितना कोलकाता में प्रचलित था उतना ही ढाका में। इस देश के जन्म में भारत का योगदान इतिहास में दर्ज है जिसे पाकिस्तान और बांग्ला देश ही नहीं पूरी दुनिया को स्वीकार करना पड़ेगा। भारतीय सेना यदि वहाँ घुसकर पाकिस्तान की सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचार को न रोकती तो बांग्ला देश की कल्पना करना ही असंभव था। 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्म समर्पण सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी घटना बन गई। बांग्ला देश के राष्ट्रपिता शेख मुजीब पाकिस्तानी कैद से रिहा हुए और विश्व के नक्शे पर नये देश का उदय हुआ । शुरुआत में वह भारत को अपना बड़ा भाई मानता रहा। लेकिन चार साल बाद ही मुजीब परिवार के 18 सदस्यों सहित मार दिये गए। वह भी 15 अगस्त को भोर के समय। उसी दिन भारत का स्वाधीनता दिवस था। उस घटना के बाद बांग्ला देश में भी पाकिस्तान की तरह से ही भारत विरोधी भावनाएं भड़कने लगीं। यहाँ तक कि जिस पाकिस्तान ने वहाँ के लोगों पर आमानुषिक अत्याचार किये उसी के आतंकवादियों को बांग्ला देश अपनी जमीन से भारत विरोधी हरकतें करने की सुविधा और संसाधन उपलब्ध करवाने लगा। लेकिन  जब मुजीब की बेटी शेख हसीना सत्ता में आईं तबसे भारत के साथ उसके रिश्ते सुधरने लगे। हालांकि हिन्दू समुदाय पर हमले और मंदिरों में तोडफ़ोड़ तब भी जारी रही। हसीना के 15 साला राज का गत 5 अगस्त को अंत हो गया। छात्रों की आड़ में कट्टरपंथियों ने उनके विरुद्ध जो आंदोलन किया उसके बाद वे भागकर भारत आ गईं। देखते - देखते  ढाका में भारत विरोधी तत्व सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज हो गए। हसीना विरोधी जो लोग विदेशों में निर्वासित जीवन जी रहे थे वे लौटने लगे। उन्हीं में से एक मो. यूनुस को अंतरिम सरकार का मुखिया बना दिया गया। उधर हसीना के अपदस्थ होते ही पूरे देश में हिंदुओं पर जो कहर टूटा उसने 1947 में हुए रक्तपात की दुखद स्मृतियों को ताजा कर दिया। मुस्लिम गुंडों ने हिंदुओं की हत्या, महिलाओं से दुष्कर्म, मंदिरों पर हमले, और लूटपाट शुरू कर दी। अंतरिम सरकार के गृह मंत्री की हैसियत वाले सेवा निवृत्त फौजी  अधिकारी सनावद हुसैन ने हालांकि हिंदुओं पर हुए हमलों के लिए माफी मांगी किंतु उसी के साथ ये हिदायत भी दे डाली कि भारत हमारे यहाँ दखल न दे। उन्होंने भारत  को व्यापारिक हितों पर आंच आने की चेतावनी भी दी। उनके अलावा मो. यूनुस भी भारत के प्रति अपनी नफरत को व्यक्त करने में पीछे नहीं हैं। दरअसल बांग्ला देश के नये हुक्मरानों को ये बात बर्दाश्त नहीं हो रही कि जब दुनिया के किसी भी देश में उनको पनाह नहीं मिल रही थी तब भारत ने शेख हसीना को अपने यहाँ आने की न सिर्फ अनुमति दी अपितु उनके पूरी तरह से सुरक्षित रहने का प्रबंध भी किया। बीते 10 दिनों से वे यहीं हैं। वे आगे भी भारत में ही रहेंगी या किसी और देश में ठिकाना तलाशेंगी यह अनिश्चित है किंतु बांग्लादेश के नये शासक जिस भाषा  का इस्तेमाल कर रहे हैं वह एहसान फ़रामोशी  है। भारत को उसकी हद समझाने वाले बांग्ला देश के नये हुक्मरान भूल रहे हैं कि भारत यदि दखल न देता तो बांग्ला देश का बनना नामुमकिन था। पश्चिमी पाकिस्तान के फौजी शासक इस इलाके की भाषा  और संस्कृति ही नहीं बंगाली मुसलमानों की नस्ल खत्म करने तक में सफल हो जाते। लाखों लड़कियों को  पाकिस्तानी फौजियों द्वारा गर्भवती किया जाना उसी कार्य योजना का हिस्सा था । 1 करोड़ शरणार्थियों को अपने यहाँ शरण देकर भारत ने जो मानवीयता दिखाई उसका नुकसान आज तक वह भुगत रहा है। यदि नये शासकों में जरा भी स्वाभिमान है तो उनको वापस बुलाने का साहस दिखाएं। भारत ने बांग्ला देश के मौजूदा घटनाक्रम पर अब तक बड़ी ही सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। लेकिन वहाँ की अंतरिम सरकार के कुछ सदस्य जिस तरह का बड़बोलापन दिखा रहे हैं उसके मद्देनजर हमको उंगली टेढ़ी करनी चाहिए। जिस तरह मालदीव के चीन समर्थक शासक की ऐंठ  केंद्र सरकार ने खत्म की वैसा ही ढाका के नये हुक्मरानों के साथ करना जरूरी है। जब भारत चीन जैसी महाशक्ति की नाराजगी के बावजूद दलाई लामा को शरण देने में नहीं डरा तो शेख हसीना को पनाह देने में कैसा डर? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 August 2024

बांग्ला देश में हिंदुओं पर अत्याचार का विरोध करने में हिचक क्यों



बांग्ला देश बनने के 4 साल के भीतर उसके राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान की सपरिवार हत्या कर दी गई। उसका कारण आज तक स्पष्ट नहीं है। उनकी दो बेटियां हसीना और रेहाना विदेश में रहने से बच गईं। वर्षों बाद  हसीना ने देश लौटकर पिता की विरासत संभाली। बीच में दो बार और फौजी बगावत हुई किंतु बीते 15 साल से हसीना के शासन के रूप में वहाँ लोकतंत्र था। जिसके बारे में कहा जाता है कि वे तानाशाह बन बैठी थीं। विपक्षी पार्टी बी.एन.पी की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भ्रष्टाचार के आरोप में जेल चली गईं। उनके बेटे ताहिर रहमान भी वतन से दूर  रह रहे थे। 5 अगस्त के बाद  जिन  मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया वे भी उनके राज में विदेश चले गए थे। 2024 के आम चुनाव में बी.एन.पी के बहिष्कार के कारण हसीना की अवामी लीग आसानी से जीत गई। लेकिन अमेरिका सहित अनेक देशों ने चुनाव में धाँधली का आरोप लगाना शुरू कर दिया। हसीना ने इस पर अमेरिका के विरोध में कड़े बयान जारी किये। वहीं जुलाई में वे चीन की यात्रा पर गईं किंतु कुछ मतभेदों के चलते एक दिन पहले लौट आईं। तब तक देश में आरक्षण विरोधी छात्रों का आंदोलन शुरू हो चुका था। जिसमें 500 लोगों की जानें चली गईं। हालात यहाँ तक बिगड़ गए कि हसीना को भागकर भारत आना पड़ा। ढाका छोड़ने के पहले उनसे त्यागपत्र लिखवा लिया गया। बजाय उनकी रक्षा करने के सेनाध्यक्ष ने उन्हें  कहा कि यदि  देश नहीं छोड़ा तो उनके आवास की ओर बढ़ रही भीड़ उनकी हत्या कर देगी। मजबूर हसीना ने अपने सबसे अच्छे मित्र भारत का रुख किया और दिल्ली आ गईं। यद्यपि अभी भी यह अनिश्चित है कि वे कहाँ रहेंगी क्योंकि अमेरिका और ब्रिटेन ने उन्हें वीजा देने से इंकार कर दिया। उनके और  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कूटनीतिक  रिश्ते बेहद मजबूत होने से बीते डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सहित अनेक ऐसे मुद्दों पर सहमति बनी जो लंबे समय से उलझे थे। आपसी व्यापार भी खासा बढ़ा।  अपने आपको एशिया का चौधरी समझने वाले चीन को यह बर्दाश्त नहीं था। पाकिस्तान तो शुरुआत से ही बांग्ला देश को अस्थिर करने के लिए वहाँ के इस्लामिक कट्टर पंथियों को मदद देता रहा। लेकिन हसीना से अमेरिका भी नाराज हो उठा। मोहम्मद यूनुस काफी समय वहाँ रहे भी। उनको नोबेल और रमन मैगेसेसे से पुरस्कार मिलने के पीछे भी अमेरिकी लॉबी का खेल बताया जाता है। चुनावी धांधली और विपक्ष का दमन तो  पाकिस्तान में भी खुलकर होता है किंतु अमेरिका और चीन आँख बंद किये रहते हैं। ज़ाहिर है छात्र आंदोलन के पीछे बड़ी विदेशी साजिश थी वरना जिस आरक्षण को लेकर उसकी शुरुआत हुई थी वह तो सर्वोच्च न्यायालय रद्द कर चुका था। हसीना का त्यागपत्र होते ही  वहाँ शेख मुजीब की मूर्ति गिराए जाने के साथ ही हिंदुओं की हत्या, उनकी महिलाओं के साथ दुष्कर्म और मंदिरों के विध्वंस जैसी जो वारदातें हुईं, उनका मुख्य उद्देश्य भारत का विरोध ही है। गत दिवस 1971 का विजय स्मारक भी तोड़ दिया गया क्योंकि उसमें भारतीय सेना की गौरवगाथा थी। भले ही वहाँ के नये शासक और कतिपय छात्र नेता हिंदुओं की सुरक्षा के आश्वसन दे  रहे हों किंतु असलियत इसके ठीक विपरीत है। अंतरिम सरकार के गृह मामलों के सलाहकार का माफीनामा अपने आप में काफी कुछ कह जाता है। भारत से सहयोग की अपेक्षा किंतु दखल न देने की समझाइश भारत के प्रति नई सरकार के बदलते रुख का संकेत है। लेकिन  चौंकाने वाली बात ये है कि भारत के विपक्षी दल बांग्ला देश में हिंदुओं के दमन का विरोध करने के बजाय इस बात पर खुशी मना रहे हैं कि वहाँ धर्मनिरपेक्ष सत्ता बन गई। वहीं असहिष्णुता का ढोल पीटने वाले कथित बुद्धिजीवी यह  प्रचार करने में जुटे हैं कि शेख मुजीब तानाशाह थे और उन्होंने एक दलीय प्रणाली को बढ़ावा दिया। दरअसल हसीना की भारत से निकटता चीन के तरफदारों को सहन नहीं थी। इसी के साथ जिन विदेशी शक्तियों ने लोकसभा चुनाव में मोदी विरोधी मुहिम चलाई उनसे उपकृत लॉबी भी हसीना को खलनायिका साबित करने में जुट गई। उल्लेखनीय है 1975 में  मुजीब की हत्या के समय हसीना पति और बच्चों के साथ जर्मनी में थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें दिल्ली बुलाकर शरण दी और 1981 में ढाका लौटने तक वे दिल्ली में रहीं। लेकिन आज उनके प्रति सहानुभूति महज इसलिए नहीं दिखाई जा रही है क्योंकि उनका तख्ता पलट करने में अमेरिका , चीन और पाकिस्तान का हाथ  माना जा रहा है। श्री मोदी से अच्छे सम्बन्धों के कारण भी विपक्ष हसीना से ख़फ़ा है। बांग्ला देश के निर्माण का श्रेय निश्चित रूप से इंदिरा जी को है लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत के दावेदार वहाँ के ताजा घटनाक्रम के प्रति जिस प्रकार से उदासीन हैं वह हतप्रभ करने वाला है। रही बात केंद्र सरकार के रुख की तो हसीना को भारत आने की अनुमति देना और किसी देश में शरण मिलने तक यहाँ सुरक्षित रहने की सुविधा देकर उसने उनके प्रति मित्रता का निर्वहन कर दिया। विपक्षी दलों से  सरकार के समर्थन की उम्मीद तो नहीं थी किंतु भारत में भी बांग्ला देश जैसे हालात बन जाने की धमकियाँ देने वाले नेताओं की निंदा तो अपेक्षित थी ही। वहाँ रह रहे हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध यदि सभी राजनीतिक दल आवाज उठाते तो उसका दबाव वहाँ के शासकों पर पड़ता किंतु ऐसा करने से इसलिए बचा गया ताकि भारत में मुस्लिम वोट हाथ से न खिसक जाए। गत दिवस प्रियंका वाड्रा ने जरूर सोशल मीडिया पर वहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की है किंतु वह महज औपचारिकता प्रतीत होती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 August 2024

सेबी प्रमुख ने तो मुँह खोल दिया किंतु राहुल क्यों चुप हैं


विदेशी सूत्रों से दो सनसनीखेज खबरें आई। पहली में अमेरिका की हिंडनबर्ग नामक संस्था द्वारा भारत के विख्यात अडानी  समूह से जुड़ी कंपनियों में सेबी प्रमुख माधवी बुच और उनके पति  द्वारा किये गए निवेश का खुलासा है। गत वर्ष भी उक्त संस्था ने अडानी समूह द्वारा निवेशकों के साथ धोखाधड़ी किये जाने का खुलासा किया था। परिणाम स्वरूप उसके शेयर धराशायी हो गए और निवेशकों को जबरदस्त नुकसान हुआ। ऐसा लगा कि गौतम अडानी का आर्थिक साम्राज्य तहस - नहस हो जायेगा। वैश्विक  पूंजी बाजारों में  उनकी प्रतिष्ठा बुरी तरह प्रभावित हुई। उस खुलासे को आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहा गया। विपक्ष के हाथ में लोकसभा चुनाव के पहले एक बड़ा हथियार लग गया जिसके जरिये उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ दिया। संसद का सत्र ठप्प हो गया। विपक्ष जेपीसी से जाँच करवाने पर अड़ गया।  लेकिन उसमें तब फूट पड़ गई जब शरद पवार और ममता बैनर्जी ने जेपीसी का विरोध कर दिया। दरअसल राहुल गाँधी चूंकि प्रधानमंत्री की  गौतम अडानी से निकटता को जमकर उछालते थे इसलिए उनको हमलावर होने का बेहतरीन अवसर मिल गया। बात सर्वोच्च न्यायालय तक भी गई। हालांकि  हिंडनबर्ग के ज्यादातर आरोप फुस्स निकले। इधर अडानी समूह ने निवेशकों के पैसे लौटाने का प्रबंध करते हुए अपनी  साख संभाल ली। जिससे उसके शेयरों के भाव फिर चढ़ने लगे और समूह का कारोबार पूर्ववत चलने लगा। हिंडनबर्ग के ताजा खुलासे में निशाना सेबी प्रमुख और उनके पति पर होने से सेबी की निष्पक्षता पर आंच आ सकती है। लेकिन बुच दंपत्ति ने जिस तत्परता से आरोपों का खंडन करते हुए हिँडनबर्ग से स्पष्टीकरण मांग लिया उससे लगता है पिछले खुलासे  की तरह ही इसका भी अंत होगा। हालांकि हिंडनबर्ग ने आरोपों की दूसरी किश्त भी जारी कर दी है किंतु सेबी प्रमुख जिस तरह से प्रत्युत्तर दे रही हैं उससे लगता है वे रक्षात्मक होने की बजाय आक्रामक हैं। लेकिन इसी के साथ एक और खुलासा हुआ है। बांग्ला देश के एक पत्रकार ने एक भारतीय टीवी चैनल पर बताया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी  लंदन में बांग्ला देश के प्रमुख विपक्षी दल   बी.एन.पी की अध्यक्ष खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान से मिले थे और उस मुलाकात में शेख हसीना की तख्ता पलट योजना पर भी चर्चा हुई थी। उनकी माँ खालिदा भ्रष्टाचार के मामले में जेल में थीं किंतु जैसे ही हसीना प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देकर ढाका छोड़कर भारत आईं त्योंही वहाँ के राष्ट्रपति ने उनकी रिहाई के आदेश दे दिये। खालिदा के बेटे को देश का नया प्रधानमंत्री माना जा रहा है। तारिक भी हसीना सरकार के समय विभिन्न आरोपों से घिरने के बाद लंदन में शरण लेकर रह रहे थे। उनकी और श्री गाँधी की मुलाकात की बात बांग्ला देश के पत्रकार द्वारा उजागर किये जाते ही भाजपा ने राहुल पर उक्त खबर पर स्पष्टीकरण देने की मांग उठा दी। बांग्ला देश में हुए सत्ता परिवर्तन के बारे में जानकारी हासिल करने श्री गाँधी  विदेश मंत्री एस. जयशंकर  से मिले थे। सर्वदलीय बैठक में भी उन्होंने शिरकत की किंतु उस घटनाचक्र पर उनकी और कांग्रेस की प्रतिक्रिया संतोषजनक नहीं रही जबकि शेख हसीना और गाँधी परिवार में निकट रिश्ते रहे हैं। लेकिन ऐसे वक़्त में जब उस परिवार पर इतना बड़ा संकट आया हुआ है तब कांग्रेस  उसके प्रति उदासीन है। केंद्र सरकार की भूमिका तो कूटनीतिक शिष्टाचार से निर्देशित होती है किंतु विपक्ष के पास खुलकर बोलने का अवसर है। कम से कम बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध तो श्री गाँधी को खुलकर बोलना चाहिए था जो इन दिनों भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीनने में जुटे हुए हैं। लेकिन बांग्ला देशी पत्रकार द्वारा किये गए खुलासे के बारे में वे मौन क्यों हैं ये बड़ा सवाल है। श्री गाँधी अक्सर विदेश यात्रा पर जाते रहते हैं। कुछ के कार्यक्रम तो सार्वजनिक कर दिये जाते हैं वहीं कुछ पूरी तरह गोपनीय होती हैं। अपनी निजता बनाये रखना उनका अधिकार है किंतु बांग्ला देशी पत्रकार द्वारा जो खुलासा किया गया उसके बारे में श्री गाँधी को अपना स्पष्टीकरण अविलंब देना चाहिए। यदि उन्होंने इसकी जानकारी विदेश मंत्री को दी तो वे यह बताकर भी संदेह से बच सकते हैं। लेकिन  चुप्पी उनको संदिग्ध बना देगी। गौरतलब है अपनी मानसरोवर यात्रा से लौटते समय वे बीजिंग में चीन सरकार के नेताओं से मिले थे। सीमा पर चल रहे तनाव के बीच उनका दिल्ली स्थित चीनी दूतावास में जाना भी विवाद का विषय बना था। लेकिन ताजा मामला बांग्ला देश में सत्ता पलट से जुड़ा है इसलिए इसमें उनका स्पष्टीकरण बेहद जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 August 2024

प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है कि अब भी संभल जाओ वरना....


बांग्ला देश की उथल - पुथल, संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच रस्साकशी, ओलंपिक में विनेश फोगाट को फाइनल खेलने न मिलना, वक़्फ़ बोर्ड संशोधन विधेयक, राज्यसभा में जया बच्चन और सभापति के बीच विवाद आदि विषयों पर पूरा देश चर्चा करता है। टीवी चैनलों में बैठे अखाड़ची भी जोर  आजमाइश करते देखे जा सकते हैं। क्रिकेट सीरीज भी कुछ लोगों को बुद्धिविलास का अवसर प्रदान करती है। और फिर टीवी के परदे में ओ.टी.टी पर गाली गलौच सुनने का शौक भी पूरा हो जाता है। वरना सोशल मीडिया तो है ही जो  24 X 7 आपको व्यस्त रखने में सक्षम है । लेकिन दुख और चिंता का विषय है कि प्रकृति और पर्यावरण के बदलते स्वभाव के प्रति आम जन में जो बेफिक्री का भाव है उसके दुष्परिणाम हमारे जीवनकाल में ही देखने मिलने लगे हैं। देश के दक्षिणी सिरे केरल के पठारी जिले वायनाड में भारी वर्षा के बाद हुए भूस्खलन से जो तबाही हुई उसने ये बता दिया कि प्रकृति प्रदत्त भौगोलिक रचना के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ करने से आपदा कहीं भी आ सकती है। उत्तर भारत के उत्तराखंड इलाके से तो ऐसी खबरें साल भर आया करती हैं। विशेष तौर पर गढ़वाल अंचल में चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए किये गए विकास कार्य विनाश का कारण बनने लगे हैं। केदारनाथ में आये जल प्रलय की यादें आज भी भयभीत कर देती हैं। बद्रीनाथ के रास्ते में जोशीमठ नगर तो धंसने के कगार पर है । उत्तरकाशी आदि में छुटपुट भूस्खलन रोजमर्रे का किस्सा हो गया है। उधर हिमाचल प्रदेश में शिमला का रास्ता साल दर साल खतरनाक होता जा रहा है। मनाली में भी पर्यटकों के बढ़ने से पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली खबर आई लद्दाख़ से जहाँ पहली बार तापमान 40 डिग्री तक पहुँचने से हाहाकार मच गया।  तापमान अधिक होने से उत्पन्न स्थिति के चलते लद्दाख़ हवाई अड्डे से विमान उड़ान नहीं भर सके। कई दिनों तक हवाई सेवाएं बाधित रहीं। इसकी वजह वहाँ पर्यटकों की बढ़ती संख्या है। जिन दुर्गम इलाकों तक यदाकदा कोई जाता था वहाँ प्रतिवर्ष लाखों सैलानी मौज - मस्ती के लिए जाने लगे। पहले इस क्षेत्र में केवल सैन्य वाहन ही नजर आते थे। लेकिन अब तो खारडूंगला जैसे उच्च शिखर और नुब्रा घाटी  तक लाखों पर्यटक जाने लगे हैं। इस कारण इस पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की आय में वृद्धि तो हुई किंतु वहाँ के जिम्मेदार नागरिक इस बात से चिंतित हैं कि लद्दाख़ में भी मैदान जैसी गर्मी पड़ने लगी है। हाल ही में उत्तराखंड के लोकप्रिय पर्यटन स्थल नैनीताल की टिफिन टॉप नामक पहाड़ी रात के समय धसक गई। गत वर्ष  नैनी झील का जल भी असामान्य तरीके से उछलने लगा जिससे निचली बस्तियों में जल प्लावन का खतरा उत्पन्न हो गया। ये सब बताने का आशय यह है कि प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकार और इस विषय पर कार्य रहे व्यक्तियों तथा संगठनों के जिम्मे छोड़कर निश्चिंत हो जाएं तो हम भी सह अभियुक्त कहलाएंगे । लगातार जिस तरह की खबरें आ रही हैं उन्हें देख - सुनकर अब ये कहना पड़ रहा है कि प्रकृति और पर्यावरण को बचाने में हर नागरिक को अपना योगदान देना होगा। भारतीय जीवन शैली में इसके संस्कार बचपन से दिये जाते थे। घास के तिनके से लेकर वट वृक्ष तक पूजित माना गया। नदी, तालाब, कुए सभी को गंगा का प्रतीक मानकर उनको संरक्षित करने की परंपरा है। पर्वत भी देव तुल्य माने गए। और ऐसे क्षेत्र जो प्रकृति के मूल स्वरूप को बनाये रखने के लिए उपयोगी थे उन्हें निर्जन छोड़ दिया जाता था । लेकिन विकास की वासना  ने सब कुछ उलट - पुलट कर दिया। परिणाम सामने है। ऐसा नहीं है कि हम  आने वाले खतरे से अनजान हों। लेकिन जीवन की आपाधापी में उलझे रहने से इस बारे में सोचने की प्रवृत्ति लुप्त होने लगी है। पहाड़ी पर्यटन केन्द्र की सैर करने वाले वहाँ के खुशनुमा एहसास से  तो सबको परिचित कराते हैं किंतु उनके लिए उत्पन्न खतरों के प्रति आगाह नहीं करते। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि प्रकृति का चेतावनी तंत्र लगातार  संभल जाने के संकेत दे रहा है किंतु हम उसकी उपेक्षा करने से बाज नहीं आ रहे। इसके पहले कि वायनाड, लद्दाख़ और नैनीताल  जैसे हादसे जगह - जगह होने लगें , हमें सतर्क हो जाना चाहिए वरना उससे होने वाले नुकसान के लिए सरकार से ज्यादा हम कसूरवार माने जायेंगे। कुछ और न सही अपनी संतानों की चिंता तो कर लें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 August 2024

वक़्फ़ संशोधन विधेयक के विरोध का कोई औचित्य नहीं


केंद्र सरकार ने गत दिवस लोकसभा में वक्फ  संशोधन विधेयक पेश किया। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्ति पर अवैध कब्जे को रोकने के साथ ही वक़्फ़ बोर्ड में पूर्व न्यायाधीश सहित 2 महिलाओं और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि को रखा जाना है जो गैर इस्लामिक भी हो सकता है। मौजूदा कानून के अनुसार  वक्फ द्वारा किसी भी संपत्ति पर अधिकार जताने से वह उसकी हो जाती है । उसके विरुद्ध अपील भी वक़्फ़ बोर्ड और उसके द्वारा बनाये गए ट्रिब्यूनल के समक्ष की जा सकेगी जिसका फैसला अंतिम होगा। संशोधन पारित हो जाने पर ऐसे विवाद अदालत के क्षेत्राधिकार में आ जाएंगे। ये भी शिकायतें  आने लगी थीं कि वक़्फ़ के अंतर्गत आने वाली संपत्ति पर प्रभावशाली मुस्लिम ही कब्जा कर लेते थे जिनमें  उ.प्र के कुख्यात माफिया सरगना अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी भी थे। और भी ऐसी विसंगतियाँ हैं जिन्हें दूर कर  इन संपत्तियों का सही उपयोग करना समय की मांग है। दुर्भाग्य से 21 वीं सदी में भी भारत का मुस्लिम समाज  मध्ययुगीन सोच से प्रभावित और संचालित है। किसी भी  सुधार को इस्लाम विरोधी बताकर आसमान सिर पर उठा लेना आम बात है। समाज के शिक्षित वर्ग में भी इतना साहस नहीं है कि वह मुल्ला - मौलवियों के फरमान पर सवाल उठा सके। मसलन  तीन तलाक़ भले ही अवैध हो गया हो लेकिन अपवाद स्वरूप ही कोई मुस्लिम महिला सार्वजनिक तौर पर उसका स्वागत करने का साहस जुटा पाती है। वक़्फ़ की संपत्ति का उपयोग धार्मिक और सामाजिक हित के कार्यों के लिए किये जाने का प्रावधान है। देश में सेना और रेल्वे के बाद सबसे अधिक भूमि वक़्फ़ की है। जिसका आकार देश की राजधानी दिल्ली से भी तीन गुना अधिक है। लेकिन इतनी विशाल संपत्ति का सही उपयोग न होने से वक़्फ़ का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है। मुस्लिम समाज में अशिक्षा के बोलबाले की वजह से मुल्ला - मौलवियों का वर्चस्व कायम है। जो किसी भी तरह की सुधार प्रक्रिया को इस्लाम और शरीयत  विरोधी प्रचारित करने लगते हैं। मुस्लिम वोट बैंक का दोहन करने वाले राजनीतिक दल भी ऐसी बातों का समर्थन करते हुए खुद को मुसलमानों का हमदर्द साबित करते हैं।  ऐसे नेताओं के कारण ही आजादी के 77 सालों बाद भी मुसलमान मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित हैं। धर्म के प्रति निष्ठा और समर्पण अच्छी बात है किंतु उसको तालाब का ठहरा हुआ पानी बना देना अधकचरापन और अज्ञानता है। भारत में  सभी धर्मों का प्रचलन है। सबके अपने कायदे -कानून और रीति - रिवाज हैं किंतु देश के संविधान के साथ उनकी टकराहट यदि होती भी है तो उसे शांति से दूर कर लिया जाता है। इसके विपरीत मुस्लिम समाज के किसी भी रीति - रिवाज में सुधारात्मक कदम उठाये जाने पर इस्लाम खतरे में है का शोर मचने लगता है। वक़्फ़ संबंधी संशोधन पर भी यही देखने मिल रहा  है। गत दिवस लोकसभा में ज्योंही सरकार विधेयक लेकर आई समूचा  विपक्ष विरोध में खड़ा हो गया। आश्चर्य की बात ये है कि उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना भी मुस्लिम मतों के फेर में विधेयक का विरोध करने लगी।  ये आरोप भी उछाला कि ये संशोधन भाजपा द्वारा महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से लाया जा गया है। विपक्षी बेंचों से ये भी कहा गया कि विधेयक की प्रति विपक्षी सांसदों को देर से दी गई जिसके कारण वे उसे पढ़ नहीं सके।  सर्वदलीय बैठक बुलाकर विधेयक के मसौदे पर चर्चा नहीं किये जाने की शिकायत के साथ उसे वापस लेने का दबाव भी बनाया गया। लेकिन सरकार ने चतुराई दिखाते हुए उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया। पहले ये आशंका थी कि जनता दल (यू) और तेलुगू देशम विधेयक का समर्थन नहीं करेंगी और उस स्थिति में भाजपा उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं उठायेगी। लेकिन उक्त दोनों दलों द्वारा विधेयक का समर्थन करने से लोकसभा में उसका पारित होना सुनिश्चित हो गया। राज्यसभा में अवश्य सत्ता पक्ष को परेशानी हो सकती है क्योंकि बीजू जनता दल और वाई.एस.आर कांग्रेस अब भाजपा से दूरी बनाने का ऐलान कर चुके हैं। लेकिन बीते 10 वर्षों की तरह आगे भी भाजपा नेतृत्व उच्च सदन में बहुमत का प्रबंध कर लेगा ऐसा लगता है। हो सकता है अभी विधेयक समिति के पास विचाराधीन ही रहे किंतु राजनीतिक मंचों पर तो वह विमर्श का विषय बन ही गया। दरअसल विपक्ष भाजपा को हिन्दू कार्ड खेलने से रोकना चाहता है। लेकिन उसने जिस तरह से विधेयक का विरोध किया उसकी  हिन्दू समाज में विपरीत प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है जो बांग्ला देश में हिंदुओं के उत्पीड़न से गुस्से में है। लेकिन राजनीति से हटकर देखें तो वक़्फ़ की अपार सम्पत्ति का सही उपयोग मुस्लिम समाज के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान के लिए होने का रास्ता साफ करने में गलत क्या है ? दुर्भाग्य इस बात का है कि मुसलमानों के बीच एक भी ऐसा नेता या बुद्धिजीवी नहीं है जो सुधारवादी सोच रखता हो। और यदि हैं भी तो उनकी स्थिति दांतों के भीतर जीभ जैसी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 8 August 2024

सलमान और सज्जन के बयान से टुकड़े- टुकड़े गैंग और नक्सलियों का हौसला बढ़ेगा

यद्यपि पूरा समाचार जगत विनेश फोगाट को  ओलंपिक कुश्ती प्रतियोगिता के फाइनल में 100 ग्राम ज्यादा वजन के कारण अयोग्य घोषित किये जाने में उलझा है किंतु  दो ऐसी खबरें ऐसी भी हैं जिनका संबंध लोकतंत्र से होने पर भी उनको अपेक्षित महत्व नहीं मिला। गत दिवस कांग्रेस के दो नेताओं के बयानों ने  बवाल मचा दिया। पहले थे म.प्र शासन के पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा । उन्होंने  कहा कि श्रीलंका और बांग्ला देश में जनता ने क्रमशः राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री  के आवास में घुसकर लूटपाट की। भारत में भी प्रधानमंत्री की गलत नीतियों के कारण जो जनता सड़कों पर हिलोरें मार रही है वह उनके आवास में घुसकर  कब्जा कर लेगी। प्रदेश शासन में मंत्री रह चुका व्यक्ति इस तरह की बात करे तो दो ही बातें मन में आती हैं। पहली , यह कि उनका मानसिक संतुलन डगमगा चुका है और दूसरी यह कि वे ऐसे किसी षडयंत्र का हिस्सा हैं जो देश को अराजकता की खाई में धकेलने पर आमादा है। उनका बयान सामने आने के साथ ही कांग्रेस के बड़े नेता और देश के विदेश मंत्री रह चुके सलमान खुर्शीद ने भी कह दिया कि भारत में भी बांग्ला देश जैसे हालात बन सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के बड़े अधिवक्ताओं में उनकी गिनती होती है। उनके पिता खुर्शीद आलम खान  भी केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल रहे। देश के तृतीय राष्ट्रपति डाॅ. ज़ाकिर हुसैन उनके नाना थे। सज्जन  सिंह का तो पता नहीं किंतु श्री खुर्शीद ने विदेश में  पढ़कर कानून की उपाधि अर्जित की थी। पूर्व विदेश मंत्री को इतना तो पता होगा कि उन जैसों के  सार्वजनिक बयान का संज्ञान न केवल देश बल्कि विदेशों तक में लिया जाता है। कल ही पाकिस्तान के टीवी चैनलों ने उनके बयान को आधार बनाते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया कि  भारत के भीतरी हालात भी अराजकता की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि कांग्रेस पार्टी क्या उक्त बयानों को निजी विचार बताकर अपना पल्ला झाड़ सकेगी? श्री वर्मा तो म.प्र तक ही सीमित हैं किंतु श्री खुर्शीद तो कांग्रेस के बड़े चेहरे रहे हैं। गाँधी परिवार से उनकी निकटता भी सर्वविदित है। यद्यपि वे और उनकी पत्नी लुईस लगातार चुनाव हारने की वजह से जनता से कटे हुए हैं किंतु इस तरह के उनके बयान का प्रभाव कांग्रेस पर पड़े बिना नहीं रहेगा। अतीत में भी श्री खुर्शीद के विवादास्पद बयान पार्टी को मुसीबत में डाल चुके हैं। ये बात सच है कि  उन्होंने  और श्री वर्मा ने बांग्ला देश जैसे अराजक हालात भारत में भी उत्पन्न होने जैसा जो बयान दिया वह उन उपद्रवियों को भड़काने का काम करेगा जो इस देश में संविधान और लोकतंत्र को नष्ट करने पर आमादा हैं। इन नेताओं को ये बात समझना चाहिए थी कि इस देश की  जनता स्वभाव से शांतिप्रिय है। 1977 के  लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी थी। पूरे उत्तर भारत में उसका सफाया हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और उनके पुत्र संजय गाँधी तक हार गए। उस दिन पूरे देश में दूसरी आजादी मिलने जैसा माहौल था। यदि वैसा ही पाकिस्तान या बांग्ला देश में होता तो जनता इंदिरा गाँधी के साथ वैसा ही व्यवहार करती जैसा हम उक्त देशों में देखते हैं। श्रीलंका के राष्ट्रपति और बांग्ला देश की प्रधान मंत्री ने जिन परिस्थितियों में देश छोड़ा उनमें उनका जीवन असुरक्षित था किंतु भारत की जनता उस तरह की हिंसात्मक सोच से सर्वथा दूर है। भ्रष्टाचार में लिप्त अनेक शासकों को जनता ने चुनाव के जरिये सत्ता से उखाड़ फेंका किंतु उनको दंडित करने का जिम्मा अदालत पर छोड़ दिया। केंद्र और राज्य में चुनाव हारते ही प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अविलम्ब  स्तीफा देकर नई सरकार के गठन का रास्ता साफ कर देते हैं। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि चुनाव हारने के बाद किसी भी प्रधानमंत्री या मुख्यमन्त्री ने सत्ता छोड़ने में आनाकानी की हो। श्री खुर्शीद और श्री वर्मा क्रमशः उस केंद्र और राज्य सरकार में मंत्री रहे जिसने चुनाव में हारते ही सत्ता त्यागकर बहुमत हासिल करने वाली पार्टी को सरकार बनाने का अवसर दिया। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी को कांग्रेस से महज 6 सीटें कम मिलीं। राष्ट्रपति भी उनके कार्यकाल में ही चुने गए थे किंतु सबसे बड़े दल के रूप में कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला। ऐसे अनेक प्रसंगों से भारतीय राजनीति का इतिहास भरा हुआ है। वैचारिक मतभेदों के बावजूद सत्ता परिवर्तन का अधिकार हमारे देश में जनता के पास है। वहीं  सेना देश की रक्षा का काम करती है। किसी प्राकृतिक आपदा या फसाद की स्थिति में भी वह बिन बुलाए नहीं आती। कई बार केंद्र में राजनीतिक अनिश्चितता उत्पन्न हुई। जल्दी - जल्दी चुनाव की नौबत भी आई किंतु सेना ने कभी किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं किया। ये सब देखते हुए श्री खुर्शीद और श्री वर्मा जैसे अनुभवी राजनेताओं का संदर्भित बयान बहुत ही खतरनाक है जो टुकड़े - टुकड़े गैंग के  अलावा नक्सलियों को सिर उठाने प्रोत्साहित करेगा। इसलिये इन दोनों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कारवाई होनी चाहिए वरना इस तरह के अराजक बयान देने वालों की बाढ़ आ जायेगी।  कांग्रेस को भी इन नेताओं को पार्टी से निकाल बाहर करना चाहिए जो इस देश के लोकतांत्रिक चरित्र को नष्ट करने का घिनौना कार्य कर रहे हैं। 


 -रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 August 2024

बांग्ला देशी घुसपैठियों को न खदेड़ा गया तो भारत की अखंडता खतरे में पड़ जायेगी



अनेक अरब देश हैं जहाँ लाखों भारतीय हिन्दू कार्यरत हैं। इस्लामिक कट्टरता यहाँ पूरी तरह लागू है। लेकिन वहाँ से कभी ये खबर नहीं आई कि हिंदुओं को परेशान किया जाता हो या  मुस्लिम बनने का दबाव डाला जाता हो।  दुबई और अबू धाबी में तो मन्दिर बनाने हेतु शासकीय भूमि भी प्राप्त हुई। अर्थात अरब देशों की कट्टर इस्लामिक व्यवस्था में भी हिन्दू आराम से अपनी रोजी - रोटी कमा रहे हैं। भारतीय निर्माण कंपनियों को भी इन देशों में बड़े - बड़े ठेके मिले  हैं। लेकिन ये वातावरण पाकिस्तान और बांग्लादेश में नहीं नजर आता।  कई अरबी देश ऐसे भी हैं जो कश्मीर पर भारत के रुख के विरोधी भी किन्तु उनमें कार्यरत  हिंदुओं को कभी किसी भी तरह से परेशान नहीं किया गया। जबकि भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्ला देश में उन हिंदुओं को भी हर तरह से त्रस्त किया जाता है जो वहाँ के मूल निवासी हैं और पीढ़ियों से वहाँ रह रहे हैं। 1947 में देश का विभाजन धर्म के आधार पर होने के बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमान  भारत में रह गए वहीं लाखों हिंदुओं ने पाकिस्तान के पश्चिमी और पूर्वी हिस्से को ही अपना वतन माना।  भारत में रहने वाले मुसलमान तो पूरी तरह सुरक्षित रहे किन्तु पाकिस्तान में  मुस्लिम कट्टरपंथ रंग दिखाने लगा। और उसी के साथ हिंदुओं के उत्पीड़न की खबरें भी आने लगीं।  हिन्दू मंदिरों के बाहर माँस की दुकानें खोल दी गईं। हिन्दू लड़कियों से जबरन  निकाह करने की घटनाएं तो बीते 76 सालों से चली आ रही हैं। जोर जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन करवाने के मामले भी बढ़ते गए। कहने को वहाँ का कानून इन सबको गलत मानता है किन्तु पुलिस से लेकर न्यायाधीश तक घोर हिन्दू विरोधी होने से कोई सुनवाई नहीं होती। कहा जाता है भारत से गए मुसलमानों को वहाँ मुहाजिर ( शरणार्थी) कहा जाता है। उनको दोयम दर्जे का भी माने जाने की जानकारी है किंतु उन्हें प्रताड़ित करने जैसी घटना अपवाद स्वरूप ही हुई होगी। 1971 में बांग्ला देश के जन्म में भारत की भूमिका पूरी दुनिया जानती है। पश्चिमी पाकिस्तान के सैनिकों ने वहाँ की मुस्लिम आबादी के साथ अमानुषिक अत्याचार किये । लाखों लड़कियाँ व्यभिचार की शिकार हुईं। करोड़ों बंगाली मुस्लिम भागकर भारत आये और वापस नहीं गए। लेकिन पाकिस्तान से मुक्त होते ही वहाँ के मुस्लिम अपने मूल स्वभाव पर लौट आये और जो स्थिति पाकिस्तान में  थी वही बांग्ला देश में बना दी गई। हिंदुओं की हत्या, मंदिरों में तोडफ़ोड़ और धर्म परिवर्तन का दबाव आम हो गया। इन घटनाओं को केवल हिन्दू विरोध मान लेना अर्ध सत्य है। दरअसल इसके पीछे भारत का विरोध है जिसे ये दोनों देश अपना शत्रु मानते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में मुसलमानों के साथ छोटी सी घटना घट जाने पर पूरा मुस्लिम जगत छाती पीटने लगता है जबकि पाकिस्तान और बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर मौन साध लिया जाता है। यहाँ तक कि भारत के  मुस्लिम संगठन तक शांत रहते हैं। कश्मीर घाटी में रहने वाले हिंदुओं को किन हालातों में जान बचाकर भागना पड़ा ये पूरी दुनिया को पता है किंतु किसी भी मुस्लिम नेता ने इस्लामिक  आतंकवाद के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं दिखाया। बांग्ला देश बीते काफी दिनों से जलता रहा है। आरक्षण विरोधी  आंदोलन की परिणिती शेख हसीना सरकार के पतन के तौर पर हुई। लेकिन उसके बाद  वहाँ  हिन्दू मंदिरों को आग के हवाले करने की घटनाएं होने लगीं। आतंकित हिन्दू समुदाय जान बचाकर भारत आने की तैयारी कर रहा है। यदि स्थिति नहीं सुधरी तो भारत पर शरणार्थियों का नया बोझ आने वाला है। सवाल ये है कि पाकिस्तान हो या बांग्ला देश, इन्हें अपने यहाँ रहने वाले हिन्दू बर्दाश्त क्यों नहीं होते ? उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत में करोड़ों मुस्लिम आराम से रहते हैं। हिंदुओं से परेशान होकर भारत से शायद ही कोई मुस्लिम परिवार पाकिस्तान या बांग्ला देश गया हो। इससे ये साबित होता है कि भले ही भारत हिन्दू राष्ट्र न हो किंतु पाकिस्तान और बांग्ला देश में रह रहे हिंदुओं को वहाँ के मुसलमान भारतीय मानकर उनको आतंकित और प्रताड़ित करते हैं।  उक्त दोनों पड़ोसी इस्लामिक देश भूल जाते हैं कि उनकी जनसंख्या से अधिक मुस्लिम आबादी भारत में रहती है। पाकिस्तान तो खैर बना ही भारत से नफरत की बुनियाद पर किंतु बांग्ला देश के निर्माण में तो भारत के सैनिकों ने भी अपना बलिदान दिया था। यदि भारत मैदान में न आता तो जनरल याह्या खां के दरिंदे बंगाली मुस्लिम नस्ल को ही नष्ट करने पर आमादा थे। वहाँ  लाखों लड़कियों को गर्भवती करने के पीछे भी यही सोच रही। बांग्ला देश के ताजा हालात ये साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हम कितने भी सहिष्णु हो जाएं किंतु पाकिस्तान और बांग्ला देश में बसे हिंदुओं के प्रति वहाँ के आम मुसलमान नफरत का भाव रखते हैं। ऐसे में भारत को अब बांग्ला देशियों को भगाने का अभियान छेड़ना ही होगा। यूरोप आज जिस समस्या से जूझ रहा है वह भारत में पैदा करने का जो षडयंत्र रचा जा रहा है उसे समय रहते विफल न किया गया तो देश की अखंडता के लिए खतरा और बढ़ता जायेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 August 2024

हसीना के तख्ता पलट में भारत विरोधी शक्तियों का हाथ


बांग्ला देश में जिस प्रकार से आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन अनियंत्रित होता जा रहा था उसे देखते हुए  शेख हसीना के तख्ता पलट से बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ।  यदि उनकी चचेरी बहिन के बेटे ने, जिन्हें अन्य वरिष्ट अधिकारियों को नाराज कर सेनाध्यक्ष बनाया गया, उन्हें वायुसेना के विमान से भारत भागने में मदद न की होती तो  पिता शेख मुजीबुर्रहमान की तरह उनकी भी हत्या हो जाती। 1971 के मुक्ति संग्राम में भाग लेने वालों को 30 फीसदी आरक्षण  दिये जाने से भड़की हिंसा अंततः उनको ले डूबी। 15 वर्ष से सत्ता पर काबिज हसीना ने इसी वर्ष भारी बहुमत से चुनाव जीता। विपक्षी पार्टी बी.एन.पी ने पहले की तरह उस चुनाव का बहिष्कार किया था। उसकी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में थीं जिन्हें कल ही राष्ट्रपति ने रिहा करने के आदेश दे दिये। जिस तरह  भीड़ ने प्रधानमंत्री निवास में  लूटपाट कर  देश शेख मुजीब की प्रतिमा तोड़ी उससे  स्पष्ट हो गया कि छात्र आंदोलन के पीछे  विदेशी शक्तियों की भूमिका है। 2018 में   उक्त आरक्षण घटा दिया गया तथा हसीना और छात्रों के बीच हुए समझौते के बाद स्थिति सामान्य हो गई किन्तु हाल ही में उच्च न्यायालय ने  उस निर्णय को रद्द करते हुए 30 प्रतिशत को पुनः लागू करवा दिया। उसके बाद ही देशव्यापी हिंसा भड़की। बाद में  सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले की पलटते हुए आरक्षण की  सीमा 5 प्रतिशत कर दी परंतु  आंदोलन  और उग्र होता गया क्योंकि  उसका उद्देश्य दरअसल हसीना को गद्दी से उतारना था। बीएनपी को घोषित भारत विरोधी माना जाता है। उसके साथ ही जमात ए इस्लामी भी जुड़ गई जिसे हसीना सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा था। इस तरह उनके तमाम दुश्मन एक हो गए किन्तु जैसा प्रारंभ  में कहा गया विदेशी शक्तियाँ  भारत और बांग्ला देश के बीच मजबूत होते रिश्तों में दरार डालना चाह रही थीं  जो हसीना के रहते असंभव था। हालांकि 1971 में अस्तित्व में आने के बाद इस देश में कई बार  सत्ता पलटी किन्तु  ये तख्ता पलट किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा है जिसका रिमोट देश के बाहर है। हालांकि अभी तक उस विदेशी शक्ति का नाम स्पष्ट नहीं है किन्तु अमेरिका, चीन और पाकिस्तान तीनों पर शक की सुई घूम रही है। बी.एन.पी के साथ जमात ए इस्लामी का खड़ा हो जाना यह प्रमाणित करता है कि वहां भारत विरोधी शक्तियाँ शक्तिशाली हो उठीं। सबसे बड़ी बात ये है कि जिस हसीना ने देश को कंगाली से उबारकर  तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बनाया और भारत के साथ बेहतर कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते विकसित किये उसे देश छोड़कर भागना पड़ा।  यद्यपि उनके रहते हुए भी हिंदुओं और उनके मंदिरों पर हमले नहीं रुके , फिर भी वहाँ रह रहे हिन्दू उनके शासन में खुद को  अपेक्षाकृत सुरक्षित  समझते थे। पिछले आम चुनाव में उन्होंने खुलकर हसीना की पार्टी अवामी लीग का समर्थन किया जिससे कट्टरपंथी ख़फ़ा थे।  देखना यह है कि सेनाध्यक्ष  जनरल वकार उज जमान भी क्या पद पर रह सकेंगे क्योंकि सेना के अन्य उच्च अधिकारी उनके विरोधी  हैं।  इस संकट के लिए चीन से हसीना के रिश्ते एकाएक खराब होने को भी कारण बताया जा रहा है। अब अंतरिम सरकार सेनाध्यक्ष जमान बनाते हैं जैसा उन्होंने गत दिवस ऐलान किया या फिर बी.एन.पी और जमात ए इस्लामी उसमें हिस्सेदार बनेंगे , यह स्पष्ट होते ही  कहानी काफी हद तक साफ हो जायेगी। यद्यपि इस्लामिक देशों की राजनीति में रिश्ते मायने नहीं रखते और ऐसे में  हसीना को सुरक्षित देश से निकालने वाले सेनाध्यक्ष आगे भी उनके प्रति वफादार रहेंगे इस पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा। शायद इसीलिए कुछ लोग मान रहे हैं कि तनाव समाप्त होने पर उनकी वतन वापसी संभव हो सकेगी किन्तु छात्र आंदोलन जिस तरह हिंसक हुआ और प्रधानमंत्री के देश छोड़ने के बाद अवामी लीग कार्यकर्ताओं और नेताओं पर हमले हो रहे हैं वह उस संभावना को नकारने वाला है।  भारत के लिए निश्चित रूप से ये चिंता का कारण है क्योंकि पड़ोसी देशों में बांग्ला देश ही था जिससे हमारे संबंध अच्छे चल रहे थे। हसीना ने भारत की बजाय किसी यूरोपीय देश जाने का जो निर्णय लिया उसकी वजह ये भी हो सकती है कि भारत ने उनको आश्रय देने से असमर्थता व्यक्त की हो। कल हिंडन हवाई अड्डे पर सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ उनकी एक घंटे की मुलाकात निश्चित रूप से इसी बारे में हुई होगी। सही बात ये है कि हसीना को शरण देने  पर वहाँ रह रहे हिंदुओं पर संकट और बढ़ सकता था। आने वाले दिन निश्चित तौर पर उहापोह भरे होंगे। लेकिन चिंता का विषय ये है कि यदि ढाका में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्तियाँ सत्ता पर काबिज हुईं तो जैसा प. बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुबेन्दु अधिकारी ने आशंका जताई, बांग्ला देश से लाखों हिंदुओं के भारत आने की संभावना है। ज़ाहिर तौर पर वह हमारे लिए चिंता का बड़ा कारण होगा क्योंकि बांग्ला देश से सटे राज्यों के सामने नई समस्या उत्पन्न हो जायेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 5 August 2024

प्रकृति अकारण रौद्र रूप धारण नहीं करती



भारत  के दक्षिणी छोर पर स्थित राज्य केरल के वायनाड में आई  विभीषिका ने पूरे देश को हिला डाला। जिस बड़े पैमाने पर वहाँ लोग मारे गए वह अकल्पनीय है। उसी के साथ पशु भी चपेट में आ गए। गाँव के गाँव बह गए। बड़ी संख्या में लोग लापता हैं । राहत और पुनर्वास चल  रहा है किन्तु भारी वर्षा की वजह से हुए भूस्खलन ने जो नुकसान किया है उसका आकलन केवल आर्थिक आधार पर करना मूर्खता होगी क्योंकि वहाँ भौगोलिक संरचना को जो क्षति पहुंची उसकी भरपाई असंभव है।  वायनाड केरल का अकेला पठारी जिला है । पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला में बसा हुआ ये जिला कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर है। दर्शनीय चाय बागानों वाला यह हिल स्टेशन  सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बन गया था। बीती 30 जुलाई की रात जब यहां पर लोग निद्रामग्न थे  तभी  अभूतपूर्व वर्षा के कारण  पहाड़ी ढलानों की धरती सरकने लगी । लोग सुरक्षित जगहों की ओर भागने लगे। लेकिन तब तक अनेक कस्बे भूस्खलन के कारण अस्तित्वहीन हो गए। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।  आपदा का प्रकोप रुकने के बाद जब विशेषज्ञों ने कारणों का पता लगाना चाहा तो ये बात सामने आई  कि भूस्खलन  तब होता है जब पहाड़ और  ढलान पर मिट्टी की कसावट ढीली पड़ जाती है।  केरल के तो लगभग आधे भूभाग में 20 डिग्री से अधिक ढलान है, जिसे  मिट्टी के कटाव और भूस्खलन के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता  है। वायनाड की तो पूरी बसाहट ही ऐसी ही है।  ढलान वाले ऐसे क्षेत्रों में अधिक बरसात होने पर मिट्टी गीली होकर  फिसलने लगती हैं।  वर्ष 2022 में लोकसभा में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा  प्रदत्त जानकारी के मुताबिक  2015 से 2022 के बीच देश में आए 3,782 भूस्खलनों में से 2,239 (करीब 59.2 प्रतिशत) केरल को झेलना पड़े। और उनमें से भी अधिकतर वायनाड और उसके इर्द - गिर्द के इलाकों में हुए। 30 जुलाई की प्रलयंकारी घटना का एक कारण  इस इलाके में पिछले कुछ सालों में  होटल सहित अन्य संरचनाओं का निर्माण भी है। राजनीति भी इसके लिए दोषी है। 2010 में भारत सरकार के पर्यावरण विभाग द्वारा केरल सहित  समूचे पश्चिमी घाट के भू संरक्षण हेतु रणनीति बनाने के लिए जो विशेषज्ञ समिति बनाई उसकी रिपोर्ट  में स्पष्ट था कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह की विकास परियोजनाओं के साथ ही  खनन,  ऊर्जा संयत्र और  बांध बनाने पर भी रोक लगे। लेकिन उद्योगपतियों और राज्य सरकारों के विरोध के कारण उस रिपोर्ट को  केंद्र सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इस प्रकार गुजरात से केरल तक का पूरा पश्चिमी घाट प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए खुला छोड़ दिया गया। एक समिति और बनी जिसने कम से कम खनन पर पूर्णतः रोक लगाने कहा किन्तु उसकी भी अनसुनी की गई। वायनाड  हादसे का स्वरूप बहुत विकराल होने से वह पूरे देश के ध्यान में आ गया किन्तु उसी समय हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी ऐसी ही प्राकृतिक विपदाएं आईं। इन सबका एक साथ विश्लेषण करें तो यही  निष्कर्ष निकलेगा कि सरकार चाहे किसी की हो वह प्रकृति  और पर्यावरण के संरक्षण की बातें तो खूब करती है किन्तु खनन माफिया के हाथों खेलने के साथ ही विकास के नाम पर उनको नुकसान पहुंचाने से भी बाज नहीं आती। पूरी हिमालय पर्वत माला भूकंप के  प्रति बेहद संवेदनशील है। टिहरी बाँध का इसीलिए शुरू से ही विरोध होता आया है। बावजूद इसके पूरे हिमालयी क्षेत्र में सैन्य जरूरतों के अलावा भी जिस प्रकार से सड़कें, बिजली उत्पादन संयंत्र, होटल आदि बनाने दिये गए वे खतरे का कारण हैं। प्रश्न ये है कि  विशेषज्ञों की सलाह यदि सरकार को  माननी ही नहीं होती तब उनकी सेवाएं लेने की औपचारिकता क्यों की जाती है ? यदि पश्चिमी घाट संबंधी रिपोर्ट पर अमल कर लिया जाता तो वायनाड की तबाही से काफी हद तक बचा जा सकता था। ऐसा ही हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के बारे में कहा जा सकता है। ये तो सच है कि हर प्राकृतिक आपदा का पूर्वानुमान  संभव नहीं होता किन्तु प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते रहने से जब उसका धैर्य टूट जाता है तब ऐसी घटनाएं होती हैं। दुर्भाग्य ये है कि इसके बाद भी हम केवल राहत और बचाव को ही कर्तव्यपूर्ति समझ बैठे हैं। वायनाड में जो हुआ उसका छोटा स्वरूप अतीत में अनेक स्थानों पर देखने मिल चुका है किन्तु उनसे कोई सबक नहीं लेना गंभीर लापरवाही है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि प्रकृति अकारण रौद्र रूप धारण नहीं करती। जब मानवीय हरकतें उसकी सहनशक्ति के बाहर हो जाती हैं तब ही कोई वायनाड होता है। 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 August 2024

योगी ने पूरे प्रदेश के गुंडों को संदेश दे दिया


उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2017  में जब सत्ता संभाली तब यह राज्य कानून व्यवस्था के मामले में  बदनाम था। हत्या, अपहरण, लूटपाट, गुंडा टैक्स, महिलाओं से छेड़छाड़, रास्ते में  आभूषण छीना जाना रोजमर्रे की खबरें  थीं। 2007 में  मायावती मुख्यमंत्री बनीं तब उन्होंने भी प्रशासन को चाक - चौबंद किया था किन्तु भ्रष्टाचार की वजह से उनकी सरकार  जनता की नजरों से उतरती चली गई ।  2012 में जनता ने उनको हटाकर सपा को अवसर दिया और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। विदेश में शिक्षित स्व. मुलायम सिंह यादव के पुत्र  अखिलेश ने विकास कार्यों पर तो काफी ध्यान दिया किन्तु कानून व्यवस्था की स्थिति  बदतर होने लगी । थानों में जाति विशेष के लोग पदस्थ किये गए। जिससे सपा  कार्यकर्ता अपने को प्रदेश का मालिक समझने लग गए। पूरा प्रदेश उनकी दादागिरी से त्रस्त हो उठा। सरकारी संरक्षण में  माफिया सरगनाओं का आतंक व्याप्त होने लगा । सूरज ढलते ही महिलाओं का घर से निकलना दूभर हो गया। लड़कियाँ कोचिंग जाने से डरने लगीं। राहजनी, हत्या और बलात्कार राज्य की पहिचान बन गए । लोग उम्मीद करते थे कि मुलायम सिंह ने अपने भाई और सहयोगियों को उपेक्षित कर  जिस अनुभवहीन बेटे की ताजपोशी करवाई वे उसे सरकार चलाने के गुर भी सिखाएंगे । लेकिन  सपा से जुड़े कुछ युवकों द्वारा बलात्कार किये जाने पर उन्होंने बजाय उसकी निंदा करने के ये टिप्पणी कर डाली कि लड़के हैं इस उमर में गलती हो ही जाती है। उससे साबित हो गया कि उ.प्र को अराजकता का पर्याय बनाने के लिए पूरा मुलायम परिवार जिम्मेदार है । अंततः 2017 में उस सरकार का पतन हो गया । 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का जो तूफान उठा उसमें उ.प्र भी शामिल था । भाजपा ने रिकार्ड तोड़ सफलता अर्जित करते हुए केंद्र में सरकार बनाई। उसके तीन साल पश्चात हुए  विधानसभा चुनाव में भी वही माहौल बना और तब सभी को चौंकाते हुए भाजपा ने गोरखपुर पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया जो उस समय  लोकसभा सदस्य  थे । चूंकि सत्ता चलाने का कोई अनुभव  उन्हें नहीं था ऐसे में उ.प्र जैसे बड़े राज्य को संभालने की उनकी क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक था ।  उनकी सफलता पर संदेह करने वाले उनकी अपनी पार्टी में भी कम नहीं थे। लेकिन इस सन्यासी ने दिखा दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तब गुंडागर्दी रोकना बड़ी बात नहीं होती लेकिन  ईमानदारी भी उतनी ही जरूरी है।  अपने को किसी दायरे में न बांधते हुए उन्होंने पुलिस और प्रशासन को ये हिदायत दे दी कि अपराधी की पहुँच कितनी भी ऊँची क्यों न हो, उस पर  शिकंजा कसा जाना चाहिए।  उनके कुछ फैसले आलोचना का कारण भी बने किन्तु उ.प्र जैसे  सूबे की प्रशासनिक व्यवस्था को उन्होंने जिस मुस्तैदी से संभाला उसकी चर्चा पूरे देश में होने लगी। कुख्यात गुंडे जेल भेजे गए। जिन्होंने  भागने की कोशिश की वे एनकाउंटर का शिकार हुए जिस पर उनकी खूब आलोचना भी हुई किन्तु  उन्होंने अपना अभियान जारी रखा। आज़म खाँ जैसी ताकतवर राजनीतिक शख्सियत को जेल की हवा खिलाकर योगी जी ने  सफेदपोश अपराधियों को भी ये संदेश दे दिया कि नेतागिरी को ढाल बनाकर वे बच नहीं सकते।  इसीलिए वहाँ की जनता ने 2022 में उनको दोबारा सत्ता सौंप दी जिसमें महिला मतदाताओं की बड़ी भूमिका थी जो अपने को उनके राज में सुरक्षित मान बैठी थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस राज्य में भाजपा को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं और सपा - कांग्रेस गठबंधन ने बढ़त हासिल कर ली। मुस्लिम मतदाताओं के इकतरफा भाजपा विरोध तथा आरक्षण खत्म होने के मिथ्या भय के कारण दलित वर्ग के भी दूर होने से भाजपा को चोट पहुंची। हालांकि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गये किन्तु उ.प्र में ये भ्रम फैलाया जाने लगा कि योगी जी को हटाया जाने वाला है। इसके पीछे भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी है। इस कारण अपराधियों का हौसला बढ़ने लगा। जिसका प्रमाण लखनऊ में किसी स्थान पर पानी भर जाने पर वहाँ से निकलने वाली महिलाओं के साथ की गई अभद्रता से मिला। उस घटना के वीडियो प्रसारित होने से लोगों में आतंक बढ़ने लगा किन्तु योगी जी ने न केवल संबंधित थाने के समूचे स्टाफ अपितु डीसीपी सहित अनेक उच्च पुलिस अधिकारियों को निलंबित करते हुए अपराधियों की अविलंब पहिचान कर गिरफ्तारी के निर्देश दे दिये। उसका असर हुआ। कुछ लोग पकड़े जा चुके हैं और बाकी भी जल्द जेल में होंगे। इस मुस्तैदी से  पूरे प्रदेश में संदेश चला गया कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से गुंडा तत्वों को खुश होने की जरूरत नहीं है। और ये भी कि बुलडोजर बाबा किसी भी तरह ढीले नहीं पड़े हैं। इसमें दो मत नहीं है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद योगी जी ने उ.प्र की कानून व्यवस्था में जो अविश्वसनीय सुधार किया उससे अन्य राज्यों को भी  सीखना चाहिए। लखनऊ में महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार पर उनकी सख्त कारवाई ने निश्चित रूप से एक उदाहरण पेश किया है। थाने में बैठे स्टाफ का निलंबन तो बेहद आम है किन्तु डीसीपी सदृश अधिकारियों पर गाज गिराना साहसिक निर्णय है जिसके लिए योगी जी प्रशंसा के पात्र हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी