भारत में मानसून की अवधि सामान्यतः 15 जून से 15 सितम्बर तक मानी जाती है। दक्षिण पश्चिम मानसून 1 जून को केरल में दस्तक देता है ।शुरुआती अनिश्चितता के बाद जुलाई तक पूरा देश बरसाती फुहारों से नहा उठता है। हालांकि सभी जगह एक सी बरसात नहीं होती। कई बार तो जिन दक्षिणी राज्यों से मानसून आगे बढ़ता है वहीं सूखा पड़ जाता है जबकि गुजरात और राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले राज्यों में अति वृष्टि होती है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने से वैसे भी ऋतु चक्र की गति और दिशा गड़बड़ाती जा रही है। चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान है इसलिए वर्षा जल की उपयोगिता और अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है। बिजली की उपलब्धता ने खेतों में सिंचाई के लिए जल का उपयोग बढ़ा दिया है। इसके कारण भूजल का स्तर साल दर साल गिरता जा रहा है। वर्षा जल के संग्रहण के लिए किये जाने वाले प्रयास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में बने पुराने तालाब उपेक्षा का शिकार होकर दम तोड़ते जा रहे हैं। वहीं नये बनाये जा रहे सरोवर भ्रष्टाचार का शिकार हैं। बढ़ती आबादी और औद्योगिकीकरण से भी जल की आवश्यकता निरंतर बढ़ती जा रही है। लेकिन मानसून से होने वाली बरसात का इससे कोई सामंजस्य नहीं है। उसकी चाल भी निर्धारित न होकर अप्रत्याशित होती जा रही है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जहां पानी की नितांत आवश्यकता है वहाँ बादल बिन बरसे लौट जाते हैं किंतु जिन क्षेत्रों में जररूत के मुताबिक बारिश हो चुकी है वहाँ बाढ़ की विभीषिका है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मौसम विभाग द्वारा उपग्रहों से प्राप्त सूचना के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणी ज्यादातर गलत निकलती है। इससे अलग हटकर एक नई समस्या हर वर्ष सामने आने लगी है। ज्यादा बरसात में तो फिर भी ठीक किंतु ज्यादातर शहरों में थोड़ी सी बरसात में ही सड़कों पर पानी भर जाता है। देश के लगभग सभी महानगर इस समस्या से जूझ रहे हैं। इसका कारण बेतरतीब बसाहट के साथ स्थानीय निकायों में व्याप्त कामचोरी और भ्रष्टाचार है। इन दिनों गुजरात के सूरत , राजकोट और बड़ोदा में बाढ़ का पानी घरों की छत तक जा पहुंचा है। दिल्ली, राजस्थान भी जलप्लावन से हलाकान हैं। नदियों के किनारे बसे शहरों में भी हालात कभी भी खराब हो जाते हैं। भारी बारिश के चलते बांधों से छोड़ा जाने वाला पानी मुसीबत बन जाता है। कहने का आशय ये है कि हमारे देश में पानी कम बरसे तो मुसीबत और ज्यादा बरसे तो आफत वाली स्थिति है। इसका कारण जल प्रबंधन के समुचित उपाय न किये जाने के अलावा शहरों का अनियोजित विकास है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या व्यवसायिक राजधानी मुंबई, सभी में थोड़ी देर की बरसात जनजीवन को अस्त- व्यस्त कर देती है। आई टी हब के तौर पर विकसित बेंगुलुरु और गुरुग्राम देखने में कितने भी भव्य दिखें किंतु बरसात के मौसम में वहाँ की सड़कें नालों की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। चंडीगढ़ जैसे व्यवस्थित कहे जाने वाले नगर में भी कुछ घंटों की बरसात समस्या बन जाती है। हर साल देश भर में कहीं अनावृष्टि तो कहीं अतिवृष्टि से संकट उत्पन्न होता है । लेकिन वर्षाकाल खत्म होते ही रात गई, बात गई वाली मानसिकता के चलते सब भुला दिया जाता है। बड़ी नदियों पर बांध बनाकर वर्षा जल को संग्रहित करने की सोच गलत नहीं थी किंतु ज्यादा बरसात में उनके गेट खोले जाने पर निचले क्षेत्रों में होने वाला जलप्लावन चिंताजनक हालात पैदा कर देता है। आपदा प्रबन्धन के क्षेत्र में कहने को तो काफी प्रगति हुई किंतु जिन आपदाओं को समय रहते रोका जा सकता है उनसे बचाव न कर पाना ये साबित करता है कि गलतियों से सबक लेने की बुद्धिमत्ता का विकास करने में हमारा तंत्र विफल रहा है। हालांकि जनता भी इस मामले में काफी हद तक जिम्मेदार है। जल के दुरुपयोग को रोकने के साथ वर्षा जल का संग्रहण करने के प्रति दायित्व बोध का अभाव इस समस्या को बढ़ाने वाला है। शहरों में अवैध निर्माण के कारण जल निकासी में अवरोध उत्पन्न होता है। जल की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की फिजूलखर्ची रोकने के अलावा वर्षा जल को जमा करने के प्रयासों ने कई जगह मरुभूमि में भी हरी सब्जियों के उत्पादन जैसा चमत्कार किया है। इसी तरह जल निकासी में रुकावट दूर हो जाए तो शहरों में आने वाली बाढ़ से काफी हद तक मुक्ति पाई जा सकती है। मौसम निश्चित रूप से टेढ़ी चाल चलने लगा है। उस पर मनुष्य का बस नहीं किंतु जो हमारे हाथ में है यदि उसके प्रति भी उदासीन रहा जाए तो फिर प्रकृति को दोष देना कहाँ तक उचित है?
- रवीन्द्र वाजपेयी