लोकसभा चुनाव में मध्यम वर्ग की नाराजगी का खामियाजा झेलने के बाद केंद्र सरकार ने ओ.पी.एस अर्थात पुरानी पेंशन स्कीम फिर शुरू करने के बजाय बीच का रास्ता निकालते हुए यू .पी.एस (यूनीफाइड पेंशन स्कीम) नामक योजना केंद्रीय कर्मचारियों के लिए लागू करने की घोषणा की है। इस योजना के अंतर्गत सेवा निवृत्ति के पूर्व अंतिम 12 महीने में प्राप्त मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 50 प्रतिशत बतौर पेंशन हर माह दिया जायेगा। इसके लिए 25 वर्ष की सेवा जरूरी होगी वहीं न्यूनतम पेंशन 10 हजार रु. मासिक अनिवार्यतः देय होगी। 1 अप्रैल 2025 से लागू होने वाली इस योजना में कुछ शर्तों के साथ वे कर्मचारी भी शामिल हो सकेंगे जो वर्तमान में लागू एन .पी .एस (न्यू पेंशन स्कीम) योजना के अंतर्गत हैं। केंद्र सरकार के उक्त निर्णय के बारे में कर्मचारी जगत की प्रतिक्रिया मिली - जुली है। कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को कदम पीछे खींचना बताते हुए कहा यह विपक्ष के दबाव का परिणाम है। दूसरी तरफ भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर वायदा खिलाफ़ी का आरोप लगाते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में पुरानी पेंशन योजना लागू करने का आश्वसन देने के बाद वह पलटी मार गई। ऐसे में उसे यूपीएस का विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। कुछ श्रमिक संगठन नई घोषणा से सहमत हैं तो कुछ ने बाद में अपनी राय देने कहा है। ये कहना गलत नहीं है कि कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक होने से मोदी सरकार ने ये फैसला किया। महाराष्ट्र सरकार ने इस योजना को अपने राज्य में लागू करने का ऐलान भी कर दिया। इसे देखते हुए भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी इसको लागू किया जा सकता है ताकि विपक्षी पार्टियों के शासन वाली राज्य सरकारों पर भी दबाव पड़े। इस योजना का आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को कितना लाभ मिलेगा ये तो परिणाम ही स्पष्ट करेंगे किन्तु इससे पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी गंभीर विषय है। कांग्रेस के लिए भी ये गले की हड्डी बन गया है क्योंकि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में वह इसे लागू नहीं कर सकी। लोकसभा चुनाव में इसीलिए वह इसका वायदा नहीं कर सकी। अन्य विपक्षी दल भी असमंजस में हैं जो पुरानी पेंशन योजना का राग अलापते रहे। वाजपेयी सरकार द्वारा इसे समाप्त करने के पीछे आर्थिक कारण ही थे। इसीलिए मनमोहन सरकार के दस वर्षीय कार्यकाल में राहुल गाँधी या अन्य किसी कांग्रेस नेता ने पुरानी पेंशन स्कीम की बात नहीं की। 2014 के बाद 2919 का लोकसभा चुनाव भी हारने के बाद उन्हेँ इसकी याद आई और उसे चुनावी वायदों में शामिल कर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस ने अपनी सरकार भी बना ली किंतु उसको लागू करने में पसीने छूट गए। भाजपा ने भी इसी बात का उसे उलाहना दिया। जिस नई पेंशन योजना की केंद्र सरकार ने घोषणा की उससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ से किस प्रकार निपटा जाएगा ये बताने के लिए कोई तैयार नहीं है। सही बात ये है कि सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं। केंद्रीय सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायत तक में कर्मचारियों की कमी है। अदालतों में न्यायाधीश कम हैं और अस्पतालों में डाक्टर। कंप्युटर आने के बाद अब ए.आई ( रोबोट) और बड़े खतरे का संकेत दे रहा है। आई.ए.एस और आई.पी.एस के अलावा अन्य प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों की भर्ती हेतु तो नियमित परीक्षा होती और परिणाम घोषित होते हैं। लेकिन निचले स्तर पर खाली पड़े सरकारी पदों को भरने के लिए सरकारें पूरी तरह उदासीन हैं। सरकारी शालाओं और महाविद्यालयों के साथ ही विश्व विद्यालयों तक में अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। इसके पीछे आर्थिक कारण ही हैं। ऐसे मैं यू .पी.एस का बोझ सरकार किस प्रकार वहन कर पायेगी ये बड़ा सवाल है। चुनावी लाभ हेतु राजनीतिक दलों द्वारा जो मुफ्त उपहारों की बरसात की जा रही है उसकी वजह से राज्य सरकारों पर कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है। इसकी भरपाई नये टैक्स लगाकर की जाती है। सरकारी कर्मचारी संगठित क्षेत्र के होने से सरकार पर दबाव बनाने की स्थिति में होते हैं। लेकिन जिस तरह से संविदा पर कर्मचारियों को रखे जाने का चलन बढ़ रहा है वह बढ़ते वेतन - भत्तों का ही विपरीत परिणाम है। ये स्थिति अच्छी नहीं है। कुछ लोगों को दिये जा रहे जबरदस्त लाभ का नुकसान संविदा कर्मी भुगत रहे हैं। श्रमिक संगठनो को इस बारे में विचार करते हुए ऐसा कुछ करना चाहिये जिससे कि समूचे कर्मचारी वर्ग को लाभ हो। कुछ का पेट गले तक भर जाए और बाकी के खाली रहें ये अन्याय है। सरकार में बैठे लोगों को भी ये सोचना होगा कि केवल चुनाव जीतने के लिए कुछ लोगों को खुश करना आदर्श व्यवस्था नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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