ट्रेड यूनियन के मित्रों से सुना करता था कि हड़ताल अंतिम अस्त्र है। फिर बंद नामक उससे बड़ा हथियार ईजाद हुआ । कुछ आंदोलनों में रेल रोककर लोग पटरियों पर बैठे रहे। शाहीन बाग और किसान आंदोलन में सड़क पर कब्जा करने का तरीका भी देखने मिला , जिसे प्रयोग कहा गया। लेकिन इनसे हासिल क्या हुआ? न पटरियों पर बैठने वाले कुछ प्राप्त कर सके और न ही सड़क घेर कर बैठे लोग। सवाल ये है कि इसके बाद क्या होगा क्योंकि पूरा भारत तो बंद हुआ नहीं। दरअसल ऐसे आंदोलन किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित होते हैं जिनका मुहूर्त चुनाव के इर्द - गिर्द होता है। चुनावी लाभ उठाकर वे तो सफल हो जाती हैं जबकि आंदोलनकारी खाली हाथ रह जाते हैं। उदाहरण के लिए रेल यातायात ठप्प करने वाले ठंडे होकर बैठ गए, शाहीन बाग की जमातें भी न जाने कहाँ हैं? किसान आंदोलन का भाग - 2 चाहकर भी शुरू नहीं हो सका। कल के बंद को जिन दलों ने समर्थन दिया, यदि वे खुलकर सामने आते तो उसे ज्यादा सफलता मिल सकती थी किंतु दलितों और आदिवासियों के संगठनों में ही आपसी विश्वास का अभाव है। मायावती को चंद्रशेखर आजाद खटक रहे हैं। कांग्रेस और सपा सहित शेष विपक्षी दल भी जुबानी समर्थन देकर घर बैठे रहे। उनको भी चन्द्रशेखर का उभार खतरे की घण्टी लग रहा है। आजादी के कई दशकों बाद तक कांग्रेस दलितों की निर्विवाद मसीहा थी किंतु 80 का दशक आते तक कांशीराम ने दलित ध्रुवीकरण का जो प्रयास किया उसका प्रतिफल मायावती को उ.प्र की सत्ता तक पहुँचाने के रूप में मिला। 2007 में किसी भी दल की बैसाखी के बिना इस बड़े राज्य में एक दलित महिला का राजतिलक बड़े सामाजिक परिवर्तन के तौर पर देखा गया किंतु मायावती भी जल्द ही सत्ता के मायाजाल में उलझ गईं । दलित राजनीति का वह ज्वार जैसे आया वैसे ही लौट गया। एक जमाना वह था जब मायावती केंद्र सरकार को गिराने या बचाने का माद्दा रखती थीं किंतु आज उनके पास न लोकसभा की सीट है न राज्यसभा की। उ.प्र विधानसभा में भी एकमात्र बसपा विधायक है। इसका कारण दलितों के उत्थान के नाम पर खुद का उत्थान करने की सोच रही । कांशीराम ने उनको राजनीतिक वारिस बनाया किंतु उन्हें अपने भतीजे के सिवाय कोई नहीं मिला । जिससे पार्टी नेताओं से खाली होती चली गई। इसी कारण चंद्रशेखर आज़ाद लोकसभा में पहुँचने में सफल हो गये। ये दोनों नेता एक हो जाएं तो उ.प्र में बसपा फिर ताकतवर हो सकती है किंतु इसकी संभावना न के बराबर है। परिणाम स्वरूप एक भी ऐसा नेता नहीं बचा जिसकी आवाज पर सारे दलित लामबंद हो जाएं। यही स्थिति आदिवासियों के बीच है। समय आ गया है जब दलित/ आदिवासी संख्याबल पर आत्ममुग्ध होने की बजाय अपने बीच में से ऐसा प्रामाणिक नेतृत्व विकसित करें जिसकी प्रतिबद्धता अपने समाज के पिछड़ेपन को दूर करने के साथ ही उन्हें अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना हो। मायावती ने जो धन स्मारकों पर खर्च किया उतना यदि वे दलित बच्चों की शिक्षा पर कर देतीं तो अब तक उनमें से सैकड़ों का भविष्य उज्ज्वल हो जाता। यही हाल ओबीसी नेताओं का भी है। कल के बंद से एक बार फिर ये बात उजागर हो गई कि दलित समुदाय कुछ राजनीतिक नेताओं का मोहताज है। यदि उसके पास राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर प्रभावशाली नेता होते तो कल का बंद पूरी तरह सफल रहता। जहाँ तक बात केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू न करने का आश्वासन देने की है तो उसके पीछे महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड विधानसभा के चुनाव हैं। लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद प्रधानमंत्री किसी भी प्रकार का खतरा नहीं लेना चाहते । लेकिन इसका श्रेय चिराग पासवान को मिला जो मोदी सरकार में मंत्री हैं। दलित अस्मिता को लेकर बातें तो बड़ी - बड़ी होती हैं लेकिन ओबीसी में जितने बड़े राजनीतिक छत्रप हैं उतने दलित और आदिवासियों में नहीं। आजादी के बाद बाबू जगजीवनराम दलितों के बड़े नेता थे किंतु प्रशासनिक दक्षता के बावजूद उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई पहल नहीं हुई। सही बात ये है कि दलितों और आदिवासियों को आरक्षण का झुनझुना पकड़ाकर बहलाया जाता रहा है। और उनके कंधों पर सवाल होकर चंद परिवार अपना और अपनी औलादों का विकास करते रहे। आज भी कमोबेश वही स्थिति है। आरक्षण को हर मर्ज की दवा मानकर ढोने के बजाय उसका ऐसा कोई ऐसा विकल्प तलाशा जाना चाहिए जिससे इन वर्गों का जीवन स्तर सुधरे और वे विकास की मुख्य धारा में शामिल हो सकें।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment