Wednesday, 28 August 2024

जम्मू कश्मीर: धारा 370 और अलग झंडे की बहाली पर कांग्रेस अपना रुख साफ करे


जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस और नेकां ( नेशनल  काँफ्रेंस ) के बीच गठजोड़ पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। दोनों के बीच सीटों का जो बंटवारा  हुआ उसके अनुसार नेकां 51 और कांग्रेस 32 सीटें लड़ेगी । इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस ने इस राज्य में छोटे भाई की भूमिका स्वीकार कर ली है। चुनाव के ऐलान के पहले ये उम्मीद थी कि कश्मीर घाटी में असर रखने वाली तमाम पार्टियां मिलकर संयुक्त मोर्चा बना लेंगी। सबसे ज्यादा उम्मीद नेकां और पीडीपी के साथ आने की थी लेकिन अचानक नेकां के वरिष्ट नेता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला ने अकेले लड़ने की घोषणा कर डाली। इससे भाजपा को काफी राहत मिल गई। क्योंकि घाटी में उसका जनाधार कम होने से उसके लिए एक भी सीट जीत पाना मुश्किल है। परिसीमन के बाद जम्मू के हिन्दू बहुल अंचल में विधानसभा सीटें बढ़ जाने से उसको अपने लिए अच्छी संभावनाएं लग रही हैं। लेकिन घाटी में कोई गठबंधन नहीं होने से कांग्रेस  काफी चिंतित थी क्योंकि उसके पास भी गुलाम नबी आजाद के निकल जाने के बाद इस राज्य में अब कोई ऐसा नेता नहीं बचा जिसके नाम पर वह 10 सीटें भी जीत सके। इसीलिए राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ श्रीनगर पहुंचे और अब्दुल्ला परिवार से मिलकर गठबंधन की पेशकश की। इसके बाद नेकां और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। ये गठबंधन  ऊपरी तौर पर काफी ताकतवर नजर आता है। हालांकि लोकसभा चुनाव में नेकां के दूसरे सबसे बड़े नेता उमर अब्दुल्ला एक ऐसे व्यक्ति से बुरी तरह हार गए जो जेल में बंद है। इसी तरह पीडीपी प्रमुख मेहबूबा मुफ्ती भी लंबे अंतर से शिकस्त खा गईं। इससे ये लगा कि घाटी में अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान का आभामंडल फीका पड़ने लगा है। आम कश्मीरी भी  इतना तो बोलता ही है कि उक्त दोनों परिवारों ने कश्मीर को जमकर लूटा और कश्मीरियों को बदहाली में रहने मजबूर कर दिया। बावजूद इसके  धारा 370 उनके लिए नाक का सवाल है। अन्यथा उसके हटने के बाद  घाटी में जो शांति आई उसकी हर कोई तारीफ करता है। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद फारूक को भी ये लगने लगा कि अब घाटी में उनके परिवार का वह प्रभाव नहीं रहा जो पहले हुआ करता था। यही कारण रहा कि जैसे ही राहुल और खरगे जी आये नेकां ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने पर रजामंदी दे दी। हालांकि घाटी में कुछ छोटी - छोटी पार्टियां ऐसी हैं जो एक - दो सीटों पर प्रभावशाली हैं किंतु नेकां और कांग्रेस गठबंधन एक बड़ी ताकत के तौर पर मैदान में हैं। लेकिन इस गठबंधन से कांग्रेस के लिए एक ऐसी मुश्किल पैदा हो गई जिसका सामना करना उसके लिए मुश्किल होगा। और वह है 370 को लेकर नेकां का रवैया। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला पिता - पुत्र कह चुके हैं कि यदि सत्ता में आये तो 370 को बहाल करने संबंधी प्रस्ताव विधानसभा में लाएंगे । और तो और जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा भी दोबारा फहराने की प्रथा वापस लायेंगे। 370 की बहाली और राज्य के अलग झंडे की बात का समर्थन यदि कांग्रेस करती है तो वह उसके लिए आत्मघाती होगा। जम्मू अंचल में तो इन वायदों से उसे नुकसान होना तय है ही किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में भी  समस्या पैदा हुए बिना नहीं रहेगी। स्मरणीय है धारा 370 को हटाने का अनेक कांग्रेसी नेताओं द्वारा  स्वागत किया गया था। बाद में पार्टी ने भी अधिकृत तौर पर निर्णय की प्रक्रिया पर आपत्ति व्यक्त की थी किंतु मोदी सरकार के उस निर्णय के पक्ष में जबरदस्त जनमत होने से पार्टी विरोध करने का साहस न जुटा सकी। 370 हटने के बाद राज्य आतंकवाद और अलगाववाद से पूरी तरह मुक्त हो गया ये कहना तो सही नहीं है किंतु उसमें जो कमी आई उसने घाटी में व्याप्त भय के माहौल को काफी हद तक घटाया है। इसका प्रमाण पर्यटकों की संख्या में रिकार्ड तोड़ वृद्धि है। दूसरी तरफ विकास कार्यों में भी तेजी आई है। हालांकि इसकी वजह से घाटी में भाजपा को सफलता मिलेगी ये उम्मीद करना जल्दबाजी होगी किंतु कांग्रेस के लिए 370 और राज्य के अलग झंडे  की वापसी के वायदे का समर्थन करना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। अभी तक उसने ये स्पष्ट नहीं किया कि वह नेकां के उक्त वायदों का समर्थन करती है या नहीं किंतु जल्द उसे अपनी स्थिति साफ करनी होगी । वरना उसको  कश्मीर के बाहर भी जवाब देना मुश्किल हो जायेगा। विशेष रूप से ये मुद्दा श्री गाँधी के लिए परेशान करने वाला बनेगा क्योंकि नेकां से गठबंधन करने वही गए थे। 


- रवीन्द्र  वाजपेयी

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