Wednesday, 14 August 2024

ढाका के नये हुक्मरान ये न भूलें कि भारत के दखल से ही बांग्ला देश बना था

1947 में आज के ही दिन भारत का विभाजन हुआ था। पाकिस्तान के रूप में देश के पश्चिमी और पूर्वी सिरे पर एक इस्लामिक देश का जन्म हुआ। यह दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसके दो हिस्सों के बीच में 2000 कि.मी से ज्यादा की दूरी और बीच में भारत जैसा विशाल देश था। सांस्कृतिक और भाषायी दृष्टि से भी दोनों पूर्णतः भिन्न थे। पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना जब 1948 में पूर्वी पाकिस्तान गए तभी ये कहकर आ गए थे कि देश की राष्ट्रभाषा उर्दू ही होगी। उनका वह कथन वह पहली ईंट थी जिस पर पाकिस्तान के विभाजन की नींव रखी गई थी। आखिरकार 1971 में वह आशंका सही साबित हुई और पूर्वी पाकिस्तान के स्थान पर बांग्ला देश नामक नया मुल्क अस्तित्व में आया जहाँ बंगला भाषा और संस्कृति का बोलबाला था। रवीन्द्र संगीत जितना कोलकाता में प्रचलित था उतना ही ढाका में। इस देश के जन्म में भारत का योगदान इतिहास में दर्ज है जिसे पाकिस्तान और बांग्ला देश ही नहीं पूरी दुनिया को स्वीकार करना पड़ेगा। भारतीय सेना यदि वहाँ घुसकर पाकिस्तान की सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचार को न रोकती तो बांग्ला देश की कल्पना करना ही असंभव था। 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्म समर्पण सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी घटना बन गई। बांग्ला देश के राष्ट्रपिता शेख मुजीब पाकिस्तानी कैद से रिहा हुए और विश्व के नक्शे पर नये देश का उदय हुआ । शुरुआत में वह भारत को अपना बड़ा भाई मानता रहा। लेकिन चार साल बाद ही मुजीब परिवार के 18 सदस्यों सहित मार दिये गए। वह भी 15 अगस्त को भोर के समय। उसी दिन भारत का स्वाधीनता दिवस था। उस घटना के बाद बांग्ला देश में भी पाकिस्तान की तरह से ही भारत विरोधी भावनाएं भड़कने लगीं। यहाँ तक कि जिस पाकिस्तान ने वहाँ के लोगों पर आमानुषिक अत्याचार किये उसी के आतंकवादियों को बांग्ला देश अपनी जमीन से भारत विरोधी हरकतें करने की सुविधा और संसाधन उपलब्ध करवाने लगा। लेकिन  जब मुजीब की बेटी शेख हसीना सत्ता में आईं तबसे भारत के साथ उसके रिश्ते सुधरने लगे। हालांकि हिन्दू समुदाय पर हमले और मंदिरों में तोडफ़ोड़ तब भी जारी रही। हसीना के 15 साला राज का गत 5 अगस्त को अंत हो गया। छात्रों की आड़ में कट्टरपंथियों ने उनके विरुद्ध जो आंदोलन किया उसके बाद वे भागकर भारत आ गईं। देखते - देखते  ढाका में भारत विरोधी तत्व सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज हो गए। हसीना विरोधी जो लोग विदेशों में निर्वासित जीवन जी रहे थे वे लौटने लगे। उन्हीं में से एक मो. यूनुस को अंतरिम सरकार का मुखिया बना दिया गया। उधर हसीना के अपदस्थ होते ही पूरे देश में हिंदुओं पर जो कहर टूटा उसने 1947 में हुए रक्तपात की दुखद स्मृतियों को ताजा कर दिया। मुस्लिम गुंडों ने हिंदुओं की हत्या, महिलाओं से दुष्कर्म, मंदिरों पर हमले, और लूटपाट शुरू कर दी। अंतरिम सरकार के गृह मंत्री की हैसियत वाले सेवा निवृत्त फौजी  अधिकारी सनावद हुसैन ने हालांकि हिंदुओं पर हुए हमलों के लिए माफी मांगी किंतु उसी के साथ ये हिदायत भी दे डाली कि भारत हमारे यहाँ दखल न दे। उन्होंने भारत  को व्यापारिक हितों पर आंच आने की चेतावनी भी दी। उनके अलावा मो. यूनुस भी भारत के प्रति अपनी नफरत को व्यक्त करने में पीछे नहीं हैं। दरअसल बांग्ला देश के नये हुक्मरानों को ये बात बर्दाश्त नहीं हो रही कि जब दुनिया के किसी भी देश में उनको पनाह नहीं मिल रही थी तब भारत ने शेख हसीना को अपने यहाँ आने की न सिर्फ अनुमति दी अपितु उनके पूरी तरह से सुरक्षित रहने का प्रबंध भी किया। बीते 10 दिनों से वे यहीं हैं। वे आगे भी भारत में ही रहेंगी या किसी और देश में ठिकाना तलाशेंगी यह अनिश्चित है किंतु बांग्लादेश के नये शासक जिस भाषा  का इस्तेमाल कर रहे हैं वह एहसान फ़रामोशी  है। भारत को उसकी हद समझाने वाले बांग्ला देश के नये हुक्मरान भूल रहे हैं कि भारत यदि दखल न देता तो बांग्ला देश का बनना नामुमकिन था। पश्चिमी पाकिस्तान के फौजी शासक इस इलाके की भाषा  और संस्कृति ही नहीं बंगाली मुसलमानों की नस्ल खत्म करने तक में सफल हो जाते। लाखों लड़कियों को  पाकिस्तानी फौजियों द्वारा गर्भवती किया जाना उसी कार्य योजना का हिस्सा था । 1 करोड़ शरणार्थियों को अपने यहाँ शरण देकर भारत ने जो मानवीयता दिखाई उसका नुकसान आज तक वह भुगत रहा है। यदि नये शासकों में जरा भी स्वाभिमान है तो उनको वापस बुलाने का साहस दिखाएं। भारत ने बांग्ला देश के मौजूदा घटनाक्रम पर अब तक बड़ी ही सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। लेकिन वहाँ की अंतरिम सरकार के कुछ सदस्य जिस तरह का बड़बोलापन दिखा रहे हैं उसके मद्देनजर हमको उंगली टेढ़ी करनी चाहिए। जिस तरह मालदीव के चीन समर्थक शासक की ऐंठ  केंद्र सरकार ने खत्म की वैसा ही ढाका के नये हुक्मरानों के साथ करना जरूरी है। जब भारत चीन जैसी महाशक्ति की नाराजगी के बावजूद दलाई लामा को शरण देने में नहीं डरा तो शेख हसीना को पनाह देने में कैसा डर? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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