Friday, 23 August 2024

बलात्कारियों को फांसी के बाद भी दुष्कर्म नहीं रुकना चिंता का विषय


कोलकाता  में एक महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी नृशंस हत्या  निर्भया कांड से भी वीभत्स है क्योंकि  घटना को अंजाम देने वाले पढ़े - लिखे हैं और उन्हें संरक्षण देने वाले भी जिम्मेदार पदों पर  थे। सर्वोच्च न्यायालय ने Little a as Aa प्रकरण को अपने हाथ में लेकर जाँच सीबीआई को सौंप दी। ये साफ  है कि प. बंगाल की पुलिस ने उस मामले में अव्वल दर्जे की लापरवाही दिखाई। यह उसका निकम्मापन था या राज्य सरकार का दबाव ये कहना जल्दबाजी होगी किन्तु जो बातें सामने आ रही हैं उनसे यह आशंका मजबूत हो रही है कि उक्त कांड  सुनियोजित था। जिस महिला के साथ हैवानियत की गई वह संभवतः किसी अपराध के बारे में जान गई थी। उसका मुँह बन्द करने  उस घटना की साजिश रची गई या फिर यह महज बलात्कार था , ये इस समय कह पाना मुश्किल है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी घटना की जाँच सीबीआई से करवाने कतई राजी न होतीं किंतु सर्वोच्च न्यायालय के कारण वे असहाय होकर रह गईं। उसने भी इस बात पर आश्चर्य और नाराजगी जताई कि मृतका का पोस्टमार्टम पहले किया गया जबकि  प्राथमिकी कई घंटों बाद दर्ज की गई। जिस संस्थान में उक्त वारदात हुई वहाँ के प्राचार्य सहित तमाम लोग हत्या को आत्महत्या प्रचारित करने में लगे रहे। उक्त घटना के बाद देश भर की युवतियों में इसे लेकर गुस्से के साथ भय भी है।  तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी असंतोष के स्वर सुनाई दे रहे हैं। हर मुद्दे पर दहाड़ने वाली मुख्यमंत्री रक्षात्मक  हैं किंतु दिन ब दिन उनकी छवि को बट्टा लग रहा है। राजनीति भी ऐसे अवसरों पर अपनी भूमिका का निर्वहन करती है। भाजपा के साथ ही वामपंथी भी ममता के विरुद्ध हैं।  लेकिन इंडिया गठबंधन में इस घटना का वैसा संगठित विरोध नजर नहीं आ रहा जैसा महाराष्ट्र के बदलापुर में दो अबोध बालिकाओं के साथ हुए अमानुषिक कृत्य पर है। वहाँ की घटना में भी प्राथमिकी देर से दर्ज करवाने का आरोप शिंदे सरकार पर लग रहा है। चूंकि भाजपा भी उसमें भागीदार है लिहाजा उसके दामन पर भी दाग लग रहे है ।  कुल मिलाकर इस प्रकरण में कई बातें एक साथ उठ खड़ी हुई हैं। पहली तो ये कि यह साधारण दुष्कर्म और हत्या नहीं है। दूसरा ये कि  जिस संस्थान में हत्या हुई वहाँ के प्रशासन ने भी  लीपापोती करने का हरसंभव प्रयास किया। पुलिस ने पोस्टमार्टम और प्राथमिकी के समय में जो अंतर रखा वह उसे संदेह के घेरे में लाती है। तीसरा ये कि ममता सरकार ने सीबीआई जाँच से बचने का जो प्रयास किया उससे उसकी मंशा संदिग्ध प्रतीत हो रही है । रही बात महाराष्ट्र के बदलापुर में हुई घटना की तो उसमें भी स्थानीय पुलिस और प्रशासन के साथ ही संबंधित विद्यालय के प्रबंधन की गलती सतह पर तैर रही है। उसकी वजह से देश भर के अभिभावकों में चिंता व्याप्त है क्योंकि इस तरह के मामले अक्सर संस्थान और बच्चियों की पहिचान उजागर होने से बचाने के लिए दबा दिये जाते हैं। जिस व्यक्ति को इस कांड में गिरफ्तार किया गया वह मानसिक रूप से बीमार भी हो सकता है किंतु अबोध बालिकाओं  के साथ इस प्रकार का कुकृत्य करने वाले को तो मृत्युदंड से कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। लेकिन कोलकाता में जिस नृशंस तरीके से महिला चिकित्सक के साथ दुराचार करने के बाद उसकी हत्या की गई वह साधारण अपराध नहीं लगता। लेकिन ये बात  फिर उठ रही है कि ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया बेहद धीमी होने से अपराध करने वालों का खौफ कम हो जाता है। अजमेर में 1992 में हुए  ब्लैकमेलिंग कांड का निपटारा अभी तक पूरी तरह नहीं हो सका क्योंकि एक आरोपी अभी तक फरार है। निर्भया कांड के दोषियों को भी फांसी होने में बरसों लगे। यहाँ तक कि फांसी लगने के कुछ घंटों पहले तक उसे रुकवाने की कोशिशें वकीलों द्वारा की जाती रहीं। संसद भी इस बारे में चिंता व्यक्त कर चुकी है। लेकिन दुष्कर्म की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं। लगभग 100 घटनाएं प्रति दिन होती है। वहीं इससे ज्यादा लोकलाज के फेर में दबी रह जाती हैं। दुःख का विषय ये है कि सामाजिक स्तर पर किसी घटना के बाद गुस्सा तो खूब दिखता है किंतु वह बुलबुले जैसा होता है। कोलकाता में भी खूब प्रदर्शन हो रहे हैं।  पुलिस, प्रशासन और सरकार ऐसे मामलों में कारवाई तो कर सकती है किंतु मानसिकता बदलने का काम तो परिवार और समाज को ही करना होगा। घरों में बेटियों को सावधानी बरतने के साथ ही बेटों को भी लड़कियों के प्रति सम्मान रखने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। इंटरनेट के जरिये परोसी जा रही अश्लील सामग्री हमारे नौनिहालों को यौन अपराधी बना रही है। अभिभावकों को चाहिए  बच्चों को इस बुराई से बचाएं। कोलकाता कांड के बाद देश भर के चिकित्सक हड़ताल पर चले गए। लेकिन ऐसी घटना तो किसी भी महिला के साथ हो सकती है। अपराध होने के बाद अपराधी को दंड मिलना तो स्थापित प्रक्रिया है किंतु इस तरह के अपराध बढ़ते क्यों जा रहे हैं उस कारण को तलाशकर समाधान निकालना जरूरी है। बलात्कारियों को फांसी लगने के बाद भी यदि ऐसा करने वालों में खौफ नहीं है तो स्थिति वाकई गंभीर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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