प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना कारण और जरूरत के कोई काम नहीं करते। उनके ज्यादातर निर्णय दूरगामी लक्ष्यों पर केंद्रित होते हैं। हालांकि हर काम में कामयाबी मिली हो ऐसा नहीं है किन्तु वे बिना निराश हुए प्रयास करते रहते हैं। विदेश नीति के क्षेत्र में उनकी सक्रियता इसका प्रमाण है। तीसरी बार स्पष्ट बहुमत के बिना जब उन्होंने सरकार बनाई तब ये कहा गया कि सहयोगियों पर उनकी निर्भरता के चलते वे पहले जैसे मजबूत नहीं रह गए। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी तो इस बात का ढिंढोरा पीटते रहते हैं कि प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डिग गया है।लोकसभा में विपक्ष अपने संख्याबल में हुई वृद्धि के कारण सत्ता पक्ष पर हावी दिखा। सहयोगी दलों के दबाव के चलते सरकार को कुछ कदम पीछे भी खींचने पड़े । लेकिन इस सबके बावजूद श्री मोदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रभावशाली उपस्थिति बनाये हुए हैं। इटली में आयोजित जी - 7 सम्मेलन में उनको विशेष रूप से आमंत्रित किया जाना वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते महत्व का संकेत था। लेकिन उस आयोजन में अमेरिका समर्थक देशों का बोलबाला था जो यूक्रेन युद्ध के कारण रूस विरोधी नीति पर चल रहे हैं। उनमें भारत ही था जिसने उस विवाद में तटस्थ रहने का जोखिम उठाते हुए सर्वप्रथम तो अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखते हुए रूस के हमले की निंदा से दूरी बनाये रखी, वहीं यूक्रेन में फंसे हजारों भारतीय विद्यार्थियों की सकुशल स्वदेश वापसी के अभियान को सफ़लता पूर्वक पूरा किया। इस युद्ध ने दुनिया को शीतयुद्ध वाले दौर में पहुँचा दिया जब ज्यादातर देश अमेरिका और सोवियत संघ नामक दो खेमों में बँटे हुए थे। भारत कहने को तो गुट निरपेक्ष देशों के साथ था किंतु अमेरिका और ब्रिटेन का झुकाव पाकिस्तान की ओर होने से हमको न चाहते हुए भी अघोषित तौर पर ही सही किंतु सोवियत संघ से नजदीकी बढ़ानी पड़ी। सोवियत संघ तो खैर बिखर गया और उसी के साथ उसे बनाने वाले रूस की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन के सत्ता में आते ही रूस सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक तौर पर फिर महाशक्ति की श्रेणी में आ गया। हालांकि वैश्वीकरण के बाद आर्थिक नीतियों में हुए बदलाव ने भारत की विदेश नीति को अमेरिका की तरफ झुकाया किंतु श्री मोदी के सत्ता में आने के बाद हमने जिस संतुलन का रास्ता पकड़ा उसके कारण आज भारत के सभी गुटों से अच्छे रिश्ते हैं। परिणामस्वरूप हमारा निर्यात भी बढ़ा। कोरोना काल में दुनिया के तमाम देशों को वैक्सीन उपलब्ध करवाकर भारत ने जो सम्मान अर्जित किया उसने विदेश नीति के अछूते पहलू को उजागर किया। श्री मोदी हाल ही में रूस गए थे। इस यात्रा से यूक्रेन ही नहीं अमेरिका और उसके पिछलग्गू भी नाराज हुए किंतु रूसी नेतृत्व के समक्ष उन्होंने दो टूक कहा कि युद्ध से कोई मसला नहीं सुलझता। बावजूद इसके राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी की जमकर तारीफ की। अमेरिका में इन दिनों राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी है। मौजूदा राष्ट्रपति के मैदान से हटने के बाद नया चेहरा राष्ट्रपति बनेगा। यदि डोनाल्ड ट्रंप लौटे तब विश्व राजनीति में उथलपुथल और बढ़ेगी। इसका असर विश्व अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा जो रूस- यूक्रेन युद्ध से डगमगा चुकी है। ऐसे में श्री मोदी का रूस के बाद यूक्रेन की यात्रा पर जाना बहुत ही सोचा - समझा कूटनीतिक पैंतरा है। हालाँकि ये मान लेना जल्दबाजी है कि इस यात्रा से युद्ध खत्म हो जायेगा और रूस - यूक्रेन के बीच दोस्ताना कायम हो जायेगा किंतु रूस को न हमलावर न कहने के बावजूद यदि श्री मोदी का यूक्रेन में जोरदार स्वागत हुआ तो यह बड़ी बात है। जिन राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत के प्रधानमंत्री की मास्को यात्रा पर नाराजी दिखाई थी वे ही उनके लिए लाल कालीन बिछाए देखे गए। यूक्रेन में भी श्री मोदी ने युद्ध को समाधान कारक न मानते हुए शांति अपनाने की जो सलाह दी उससे समूचा विश्व प्रभावित है। इसीलिए कहा जा रहा है कि शायद श्री मोदी दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका में हैं। वरना उनकी मास्को यात्रा के बाद यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचना महज तफरीह नहीं हो सकती। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध के लंबा खिंचने से भी दुनिया परेशान है। ईरान के अमेरिका विरोधी तेवर से तीसरे विश्व युद्ध की पटकथा लिखी जा रही है। ऐसे में यदि रूस और यूक्रेन में सुलह हो सके तो ये पूरे विश्व के लिए राहत की बात होगी। हो सकता है कि राष्ट्रपति पुतिन ने श्री मोदी को यूक्रेन से बात कर युद्ध बंद करवाने का अनुरोध किया हो क्योंकि लड़ाई के लम्बे खिंचने के बाद भी यूक्रेन के मुकाबले में डटे रहने और मौका मिलते ही पलटवार करने से रूस भी थकने लगा है। उसे डर है कहीं उसकी हालत वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के फंसने जैसी न हो जाए। यदि श्री मोदी वाकई इस युद्ध को रुकवा सके तो वह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी जिसके बाद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का हमारा दावा और मजबूत हो जायेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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