प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी संघर्षशील राजनेत्री हैं। वाम मोर्चा सरकार की तानाशाही के विरुद्ध उन्होंने जो लड़ाई लड़ी उसी का नतीजा है कि अपने इस मजबूत गढ़ में वामपंथी पार्टियां लगभग अस्तित्वहीन हो चुकी हैं। और उनके साथ रहने से कांग्रेस भी घुटनों पर आ गई । लेकिन सुश्री बैनर्जी ने भी वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये जिनके बल पर वामपंथियों ने लगभग चार दशक राज किया। मसलन बांग्ला देश से आये घुसपैठियों को मतदान का अधिकार देना, असमाजिक तत्वों के जरिये विरोधियों को आतंकित करना, प्रशासन पर तृणमूल का वर्चस्व कायम करना आदि। ममता ने कांग्रेस इसलिए छोड़ी थी क्योंकि वह वामपंथियों के अत्याचार पर उदासीन थी। इसलिए उम्मीद थी वे उन बुराइयों से मुक्ति दिलाएंगी । लेकिन ममता ने भी मुस्लिम तुष्टीकरण , राजनीतिक हिंसा, असामाजिक तत्वों को संरक्षण और भ्रष्टाचार को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बना लिया। यद्यपि समाज के निचले हिस्से में उनका जनाधार है किंतु राज्य की 30 फीसदी मुस्लिम आबादी का एकमुश्त समर्थन उनकी चुनावी सफलता का सबसे बड़ा कारण है। चुनावी हिंसा की जितनी घटनाएं प. बंगाल में होती हैं उतनी अन्य कहीं नहीं। उनके तुनुकमिजाज स्वभाव के चलते विपक्षी दल भी उनसे छड़कते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस या अन्य किसी दल के लिए एक सीट तक नहीं छोड़ी। यहाँ तक कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के विरुद्ध क्रिकेटर युसुफ पठान को उतारकर उन्हें हरवा दिया। उनके बढ़ते गुस्से का एक कारण ये भी है कि जिन राहुल गाँधी को वे पूरी तरह तिरस्कृत करती थीं वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण शख्सियत बन बैठे। कांग्रेस और सपा को तृणमूल से अधिक सीटें मिलने से इंडिया गठबंधन में भी उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिल रही। गलत नीतियों के कारण वे चारों तरफ से घिरती जा रही हैं। संदेशखाली की घटना से राज्य सरकार की जबरदस्त बदनामी हुई थी किंतु हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद नृशंस हत्या की वारदात ने ममता की साख और धाक मिट्टी में मिला दी। उक्त प्रकरण में प्राथमिकी दर्ज करवाने में हुए विलम्ब और उसके पहले ही पोस्ट मार्टम करवाने की वजह से उत्पन्न शंकाओं ने उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। घटनास्थल पर सबूत मिटाने के जो सुनियोजित प्रयास हुए उन्होंने भी कई सवाल खड़े कर दिये। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जाँच सीबीआई को सौंपे जाने का भी ममता सरकार विरोध करती रही। लेकिन ये प्रकरण दूसरा निर्भया कांड बनकर पूरे देश में चर्चित हो गया। सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख की वजह से कोई भी विपक्षी दल सुश्री बैनर्जी के बचाव में आगे नहीं आ रहा। गत दिवस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो प्रतिक्रिया दी उसके बाद प. बंगाल सरकार के पास मुँह छिपाने की जगह नहीं बची। और उसी की बौखलाहट में ममता ने धमकी दे डाली कि यदि प. बंगाल में आग लगी तो असम, बिहार और उ.प्र भी नहीं बचेंगे । आग दिल्ली तक जाएगी तथा मोदी सरकार गिर जाएगी। उनके इस बयान से तो लगता है मानों प. बंगाल कोई अलग देश हो जो अपने भीतरी मामलों में हस्तक्षेप के विरुद्ध धमका रहा हो। कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने भी भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न होने की बात कही थी। सुश्री बैनर्जी ने भले ही उनके शब्दों को न दोहराया हो किंतु गत दिवस भाजपा द्वारा आयोजित प. बंगाल बंद को मिली सफलता से संभवतः उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। उन्होंने गत दिवस जिस प्रकार की धमकी दी वह संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा ली गई शपथ का खुला उल्लंघन है । यदि एक राज्य का मुख्यमंत्री दूसरे राज्यों में आग लगने और केंद्र सरकार गिराने जैसी धमकी देगा तो यह गृहयुद्ध की ओर कदम बढ़ाने जैसा है। दरअसल जबसे बांग्ला देश में तख्ता पलट हुआ है तभी से कुछ लोग भारत में भी वैसा ही देखने के लिए लालायित नजर आते हैं। ममता भी उसी बिरादरी में शामिल हो गई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव के पहले धमकी दी थी कि यदि भाजपा सत्ता में लौटी तो देश में आग लग जायेगी। नरेंद्र मोदी तीसरी बार सत्ता में आ गए किंतु कहीं पत्ता तक नहीं खड़का। अब ममता भी वैसी ही डींग हांक रही हैं तो उसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय को धमकाना भी हो सकता है। बेहतर हो न्यायपालिका उनकी बात का संज्ञान लेते हुए पूछे कि दूसरे राज्यों सहित दिल्ली तक आग पहुँचने और मोदी सरकार के गिरने जैसी बात क्या देश की अखंडता के लिए खतरा नहीं है और इसके बाद उन्हें सत्ता में रहने का क्या अधिकार है ?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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