Tuesday, 6 August 2024

हसीना के तख्ता पलट में भारत विरोधी शक्तियों का हाथ


बांग्ला देश में जिस प्रकार से आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन अनियंत्रित होता जा रहा था उसे देखते हुए  शेख हसीना के तख्ता पलट से बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ।  यदि उनकी चचेरी बहिन के बेटे ने, जिन्हें अन्य वरिष्ट अधिकारियों को नाराज कर सेनाध्यक्ष बनाया गया, उन्हें वायुसेना के विमान से भारत भागने में मदद न की होती तो  पिता शेख मुजीबुर्रहमान की तरह उनकी भी हत्या हो जाती। 1971 के मुक्ति संग्राम में भाग लेने वालों को 30 फीसदी आरक्षण  दिये जाने से भड़की हिंसा अंततः उनको ले डूबी। 15 वर्ष से सत्ता पर काबिज हसीना ने इसी वर्ष भारी बहुमत से चुनाव जीता। विपक्षी पार्टी बी.एन.पी ने पहले की तरह उस चुनाव का बहिष्कार किया था। उसकी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में थीं जिन्हें कल ही राष्ट्रपति ने रिहा करने के आदेश दे दिये। जिस तरह  भीड़ ने प्रधानमंत्री निवास में  लूटपाट कर  देश शेख मुजीब की प्रतिमा तोड़ी उससे  स्पष्ट हो गया कि छात्र आंदोलन के पीछे  विदेशी शक्तियों की भूमिका है। 2018 में   उक्त आरक्षण घटा दिया गया तथा हसीना और छात्रों के बीच हुए समझौते के बाद स्थिति सामान्य हो गई किन्तु हाल ही में उच्च न्यायालय ने  उस निर्णय को रद्द करते हुए 30 प्रतिशत को पुनः लागू करवा दिया। उसके बाद ही देशव्यापी हिंसा भड़की। बाद में  सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले की पलटते हुए आरक्षण की  सीमा 5 प्रतिशत कर दी परंतु  आंदोलन  और उग्र होता गया क्योंकि  उसका उद्देश्य दरअसल हसीना को गद्दी से उतारना था। बीएनपी को घोषित भारत विरोधी माना जाता है। उसके साथ ही जमात ए इस्लामी भी जुड़ गई जिसे हसीना सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा था। इस तरह उनके तमाम दुश्मन एक हो गए किन्तु जैसा प्रारंभ  में कहा गया विदेशी शक्तियाँ  भारत और बांग्ला देश के बीच मजबूत होते रिश्तों में दरार डालना चाह रही थीं  जो हसीना के रहते असंभव था। हालांकि 1971 में अस्तित्व में आने के बाद इस देश में कई बार  सत्ता पलटी किन्तु  ये तख्ता पलट किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा है जिसका रिमोट देश के बाहर है। हालांकि अभी तक उस विदेशी शक्ति का नाम स्पष्ट नहीं है किन्तु अमेरिका, चीन और पाकिस्तान तीनों पर शक की सुई घूम रही है। बी.एन.पी के साथ जमात ए इस्लामी का खड़ा हो जाना यह प्रमाणित करता है कि वहां भारत विरोधी शक्तियाँ शक्तिशाली हो उठीं। सबसे बड़ी बात ये है कि जिस हसीना ने देश को कंगाली से उबारकर  तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बनाया और भारत के साथ बेहतर कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते विकसित किये उसे देश छोड़कर भागना पड़ा।  यद्यपि उनके रहते हुए भी हिंदुओं और उनके मंदिरों पर हमले नहीं रुके , फिर भी वहाँ रह रहे हिन्दू उनके शासन में खुद को  अपेक्षाकृत सुरक्षित  समझते थे। पिछले आम चुनाव में उन्होंने खुलकर हसीना की पार्टी अवामी लीग का समर्थन किया जिससे कट्टरपंथी ख़फ़ा थे।  देखना यह है कि सेनाध्यक्ष  जनरल वकार उज जमान भी क्या पद पर रह सकेंगे क्योंकि सेना के अन्य उच्च अधिकारी उनके विरोधी  हैं।  इस संकट के लिए चीन से हसीना के रिश्ते एकाएक खराब होने को भी कारण बताया जा रहा है। अब अंतरिम सरकार सेनाध्यक्ष जमान बनाते हैं जैसा उन्होंने गत दिवस ऐलान किया या फिर बी.एन.पी और जमात ए इस्लामी उसमें हिस्सेदार बनेंगे , यह स्पष्ट होते ही  कहानी काफी हद तक साफ हो जायेगी। यद्यपि इस्लामिक देशों की राजनीति में रिश्ते मायने नहीं रखते और ऐसे में  हसीना को सुरक्षित देश से निकालने वाले सेनाध्यक्ष आगे भी उनके प्रति वफादार रहेंगे इस पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा। शायद इसीलिए कुछ लोग मान रहे हैं कि तनाव समाप्त होने पर उनकी वतन वापसी संभव हो सकेगी किन्तु छात्र आंदोलन जिस तरह हिंसक हुआ और प्रधानमंत्री के देश छोड़ने के बाद अवामी लीग कार्यकर्ताओं और नेताओं पर हमले हो रहे हैं वह उस संभावना को नकारने वाला है।  भारत के लिए निश्चित रूप से ये चिंता का कारण है क्योंकि पड़ोसी देशों में बांग्ला देश ही था जिससे हमारे संबंध अच्छे चल रहे थे। हसीना ने भारत की बजाय किसी यूरोपीय देश जाने का जो निर्णय लिया उसकी वजह ये भी हो सकती है कि भारत ने उनको आश्रय देने से असमर्थता व्यक्त की हो। कल हिंडन हवाई अड्डे पर सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ उनकी एक घंटे की मुलाकात निश्चित रूप से इसी बारे में हुई होगी। सही बात ये है कि हसीना को शरण देने  पर वहाँ रह रहे हिंदुओं पर संकट और बढ़ सकता था। आने वाले दिन निश्चित तौर पर उहापोह भरे होंगे। लेकिन चिंता का विषय ये है कि यदि ढाका में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्तियाँ सत्ता पर काबिज हुईं तो जैसा प. बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुबेन्दु अधिकारी ने आशंका जताई, बांग्ला देश से लाखों हिंदुओं के भारत आने की संभावना है। ज़ाहिर तौर पर वह हमारे लिए चिंता का बड़ा कारण होगा क्योंकि बांग्ला देश से सटे राज्यों के सामने नई समस्या उत्पन्न हो जायेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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