एक समय था जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर टिप्पणी से परहेज किया जाता था। यहाँ तक कि संसद के भीतर भी उनकी आलोचना नहीं होती थी। लेकिन समय के साथ वह लिहाज टूटने लगा और अब किसी भी अदालती निर्णय की जमकर आलोचना होने लगी है। इसकी शुरूआत कब हुई, ये पक्के तौर पर कह पाना तो कठिन है किंतु 12 जून 1975 को जब अलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का लोकसभा चुनाव अवैध घोषित किया तब उनके बेटे संजय गाँधी ने इस बात पर अचरज जताया कि करोड़ों लोगों द्वारा चुने प्रधानमंत्री को एक अदना सा न्यायाधीश कैसे अपदस्थ कर सकता है? अनेक स्थानों पर श्री सिन्हा के पुतले जलाए जाने की खबरें भी आईं। कुछ दिनों बाद आपात्काल लगाकर इंदिरा जी ने जनता को अभिव्यक्ति के अधिकार से भी वंचित कर दिया। अखबारों पर सेंसर लग गया। 19 महीने बाद चुनाव होने पर इंदिरा जी सत्ता से बाहर हो गईं और जनता पार्टी की सरकार बनी किंतु वह महज 27 माह में गिर गई। नये चुनाव हुए जिसमें इंदिरा जी की वापसी हुई। उनके बेटे संजय गाँधी के साथ युवाओं की जो टोली संसद और कांग्रेस संगठन में आई वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं की बजाय व्यक्ति केंद्रित राजनीति में विश्वास रखती थी। संसद में होने वाले हंगामे उसी दौर की देन हैं। ये कहना गलत न होगा कि न्यायपालिका की सरे आम आलोचना भी उसी समय से शुरू हुई। इसके लिए संसद के मंच का उपयोग होने लगा क्योंकि वहाँ कही गई किसी भी बात के लिए मानहानि का प्रकरण दर्ज नहीं होता। राजीव गाँधी के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय के शाहबानो को गुजारा भत्ता दिये जाने संबंधी निर्णय को संसद ने पलटकर एक नई शुरुआत कर दी। और उसी के बाद से ये देखने में आने लगा कि जो भी न्यायालायीन फैसला किसी वर्ग विशेष को नापसंद हो तो उसको रद्द करवाने का दबाव बनाया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में आरक्षण व्यवस्था का लाभ कुछ जाति विशेष तक सीमित रहने पर ऐतराज जताते हुए कोटे के भीतर कोटा तय करने का अधिकार राज्यों को दे दिया। साथ ही अनु. जाति / जनजाति वर्ग में भी क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर करने की बात कही। इस फैसले का आम तौर पर स्वागत हुआ। अनु. जाति / जनजाति में बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो संख्या और राजनीतिक वजनदारी में कम होने से आरक्षण से जुड़े लाभों से वंचित रह गया। इस वर्ग में सर्वोच्च न्यायालय ने उम्मीद जगाई कि अब उनकी भी बेहतरी होगी । लेकिन आरक्षण के साथ जुड़ी राजनीति एक बार फिर अवरोध बनकर सामने आ खड़ी हुई। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की जमकर आलोचना की जाने लगी। उसे संविधान की भावनाओं के विरुद्ध बताने में भी संकोच नहीं किया गया। भीम आर्मी के नेता सांसद चंद्र शेखर आजाद ने तो फैसला सुनाने वाले न्यायाधीशों की जाति जानने जैसी बात कह डाली जबकि क्रीमी लेयर वाली टिप्पणी करने वाले न्यायाधीश बी. आर. गवई खुद दलित वर्ग से आते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य को एक नीति लानी चाहिए, ताकि अनु. जाति / जनजाति वर्गों में आरक्षण का लाभ उठाकर समर्थ हो चुके लोगों को इसके दायरे से बाहर किया जा सके। जस्टिस गवई अगले साल देश के प्रधान न्यायाधीश बनने वाले हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि दलित वर्ग के भीतर ही आरक्षण को लेकर असंतोष है जिसकी अभिव्यक्ति श्री गवई ने फैसले के माध्यम से की। बेहतर होता सभी राजनीतिक दल और दलित संगठन उक्त फैसले की मूल भावना को समझते हुए आरक्षण से वंचित वर्ग के कल्याण की बात सोचते किंतु बजाय ऐसा करने के भारत बंद का आव्हान कर डाला गया । विभिन्न विपक्षी दल भी इसके समर्थन में आ गए । इस बंद को कितना जन समर्थन मिला वह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि इसके आयोजन का कोई औचित्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के एक दलित न्यायाधीश के बजाय किसी और न्यायाधीश ने क्रीमी लेयर को आरक्षण न दिये जाने की बात की होती तो उसे दलित विरोधी प्रचारित कर दिया गया होता। उस फैसले की अंतर्निहित भावना को समझे बिना हाय तौबा मचा देना निश्चित रूप से अनुचित है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने आरक्षण को ईमानदार और पारदर्शी बनाने का रास्ता साफ किया तथा दलित/आदिवासियों के बीच उत्पन्न नव सामंतवाद पर चोट की। आज जिन संगठनों ने भारत बंद का आयोजन किया , बेहतर होता वे मायावती , चिराग पासवान, मल्लिकार्जुन खरगे, हेमंत सोरेन जैसे नेताओं से पूछते कि उनकी राजनीतिक विरासत उनके परिवार तक ही सीमित क्यों है?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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