Tuesday, 27 August 2024

नई भर्ती वालों को उपकृत करने से भाजपा में पनप रहा असंतोष



कल जम्मू कश्मीर विधानसभा के लिए भाजपा द्वारा   प्रत्याशियों की पहली सूची जारी होते ही हंगामा हो गया। इसके बाद फौरन वह सूची रद्द की गई और कुछ देर बाद संशोधित सूची जारी हुई। पहली सूची में जिन वरिष्ट नेताओं के नाम कटे उनमें से कुछ को उम्मीदवार बना दिया गया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुछ दिनों पहले पार्टी में आये लोगों को टिकिट देने से उन लोगों के मन खट्टे हो जाते हैं जो बरसों से पार्टी की सेवा करते आये हैं और वह भी विपरीत परिस्थितियों में। हालांकि  इस तरह के हंगामे सभी दलों में होने लगे हैं । लेकिन भाजपा अपने को अनुशासित कार्यकर्ताओं की पार्टी  कहते नहीं थकती । इसलिए उसके भीतर इस तरह की घटनाएं हैरत पैदा करती हैं।  जम्मू कश्मीर में गत दिवस जो हुआ वह चुनाव वाले  अन्य राज्यों में भी हो सकता है। इसका एक कारण भाजपा में टिकिटार्थियों की बढती संख्या  भी है। जनसंघ के ज़माने में उम्मीदवार ढूँढे जाते थे क्योंकि हारने के लिए लड़ना पड़ता था। वहीं भाजपा बनने के बाद पार्टी को सत्ता मिलने लगी जिस वजह से हर सीट पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन बीते कुछ समय से  कार्यकर्ताओं के साथ ही उसके परंपरागत समर्थकों तक में इस बात को लेकर नाराजगी  है कि तपे - तपाये कैडर  को किनारे रखकर दूसरे दलों से  नये - नये आये लोगों को टिकिट दे दिया जाता है। हालांकि क्षेत्रीय दलों के उभरने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को नई भर्ती वाले नेताओं को उपकृत करना जरूरी हो गया है। लेकिन कुछ ऐसे मामले हैं जिनमें एक दिन पहले आये व्यक्ति को राज्यसभा की टिकिट दे दी गई। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण इसके ताजा उदाहरण हैं। ऐसा ही हरियाणा में  किया गया जब हाल ही में पार्टी में आईं किरण चौधरी को भी राज्यसभा उम्मीदवारी दे दी गई। हालांकि ऐसे निर्णय चुनाव में लाभ उठाने के लिए ही किये जाते हैं लेकिन हर बार वे सफल होंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। महाराष्ट्र में श्री चव्हाण को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बावजूद उनके प्रभाव वाले इलाकों में भी भाजपा के हाथ पराजय ही आई। श्रीमती चौधरी भी हरियाणा में भाजपा को अपेक्षित सफलता दिलवा सकेंगी इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। ताजा चर्चा झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के भाजपा में आने को लेकर चल पड़ी है। झारखण्ड में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 31 जनवरी को  ईडी द्वारा गिरफ्तार किये जाने पर जब हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया तब चंपई सोरेन को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाया गया किंतु जुलाई में जमानत पर रिहा होते ही हेमंत उन्हें हटाकर हटाकर मुख्यमंत्री बन बैठे। चंपई को गद्दी छोड़ना नागवार गुजरा और वे पार्टी छोड़ने की बात करने लगे। सुना है इसके पीछे भी भाजपा ही है। असम के मुख्यमंत्री  के मुताबिक वे 30 तारीख को भाजपा में आ जाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो क्या भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करेगी ये सवाल उठना स्वाभविक है। चूंकि चंपई  मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के कारण झामुमो छोड़कर आएंगे इसलिए वे उससे कम क्यों चाहेंगे ? लेकिन खबर ये है कि जो विधायक उनके साथ थे वे भी हेमंत के पास लौट गए। ऐसे में वे भाजपा का कितना फ़ायदा चुनाव में करवाएंगे ये अनिश्चित है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना तोड़कर भाजपा के साथ आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर अपने पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का अवमूल्यन कर दिया। कुछ समय बाद एनसीपी के अजीत पवार भी सत्ता की खातिर साथ आ गए और उपमुख्यमंत्री बन बैठे। लेकिन लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में भाजपा को जबरदस्त नुकसान हुआ। पार्टी को ये समझना चाहिए कि इस तरह के नेताओं के साथ आने से पार्टी की छवि भी खराब हुई है। बिहार में नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश में चंद्रा बाबू नायडू के साथ गठबंधन का लाभ इसलिए हुआ क्योंकि वहाँ किसी तरह की तोड़ फोड़ नहीं हुई। ये देखते हुए भाजपा नेतृत्व को नई भर्ती के बारे में बेहद सावधान और सतर्क रहना चाहिए। जम्मू कश्मीर, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में उसका अपना संगठन है जिसमें अनुभवी और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की विशाल संख्या है। बाहर से आने वालों पर रोक भले न लगे किंतु उन्हें सीधे टिकिट दे देना बुद्धिमत्ता नहीं है। ऐसा करने का नुकसान उठाने के बाद भी यदि भाजपा इस परिपाटी को जारी रखेगी तब उसे लोकसभा चुनाव जैसे नतीजों के लिए तैयार रहना होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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