बांग्ला देश बनने के 4 साल के भीतर उसके राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान की सपरिवार हत्या कर दी गई। उसका कारण आज तक स्पष्ट नहीं है। उनकी दो बेटियां हसीना और रेहाना विदेश में रहने से बच गईं। वर्षों बाद हसीना ने देश लौटकर पिता की विरासत संभाली। बीच में दो बार और फौजी बगावत हुई किंतु बीते 15 साल से हसीना के शासन के रूप में वहाँ लोकतंत्र था। जिसके बारे में कहा जाता है कि वे तानाशाह बन बैठी थीं। विपक्षी पार्टी बी.एन.पी की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भ्रष्टाचार के आरोप में जेल चली गईं। उनके बेटे ताहिर रहमान भी वतन से दूर रह रहे थे। 5 अगस्त के बाद जिन मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया वे भी उनके राज में विदेश चले गए थे। 2024 के आम चुनाव में बी.एन.पी के बहिष्कार के कारण हसीना की अवामी लीग आसानी से जीत गई। लेकिन अमेरिका सहित अनेक देशों ने चुनाव में धाँधली का आरोप लगाना शुरू कर दिया। हसीना ने इस पर अमेरिका के विरोध में कड़े बयान जारी किये। वहीं जुलाई में वे चीन की यात्रा पर गईं किंतु कुछ मतभेदों के चलते एक दिन पहले लौट आईं। तब तक देश में आरक्षण विरोधी छात्रों का आंदोलन शुरू हो चुका था। जिसमें 500 लोगों की जानें चली गईं। हालात यहाँ तक बिगड़ गए कि हसीना को भागकर भारत आना पड़ा। ढाका छोड़ने के पहले उनसे त्यागपत्र लिखवा लिया गया। बजाय उनकी रक्षा करने के सेनाध्यक्ष ने उन्हें कहा कि यदि देश नहीं छोड़ा तो उनके आवास की ओर बढ़ रही भीड़ उनकी हत्या कर देगी। मजबूर हसीना ने अपने सबसे अच्छे मित्र भारत का रुख किया और दिल्ली आ गईं। यद्यपि अभी भी यह अनिश्चित है कि वे कहाँ रहेंगी क्योंकि अमेरिका और ब्रिटेन ने उन्हें वीजा देने से इंकार कर दिया। उनके और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कूटनीतिक रिश्ते बेहद मजबूत होने से बीते डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सहित अनेक ऐसे मुद्दों पर सहमति बनी जो लंबे समय से उलझे थे। आपसी व्यापार भी खासा बढ़ा। अपने आपको एशिया का चौधरी समझने वाले चीन को यह बर्दाश्त नहीं था। पाकिस्तान तो शुरुआत से ही बांग्ला देश को अस्थिर करने के लिए वहाँ के इस्लामिक कट्टर पंथियों को मदद देता रहा। लेकिन हसीना से अमेरिका भी नाराज हो उठा। मोहम्मद यूनुस काफी समय वहाँ रहे भी। उनको नोबेल और रमन मैगेसेसे से पुरस्कार मिलने के पीछे भी अमेरिकी लॉबी का खेल बताया जाता है। चुनावी धांधली और विपक्ष का दमन तो पाकिस्तान में भी खुलकर होता है किंतु अमेरिका और चीन आँख बंद किये रहते हैं। ज़ाहिर है छात्र आंदोलन के पीछे बड़ी विदेशी साजिश थी वरना जिस आरक्षण को लेकर उसकी शुरुआत हुई थी वह तो सर्वोच्च न्यायालय रद्द कर चुका था। हसीना का त्यागपत्र होते ही वहाँ शेख मुजीब की मूर्ति गिराए जाने के साथ ही हिंदुओं की हत्या, उनकी महिलाओं के साथ दुष्कर्म और मंदिरों के विध्वंस जैसी जो वारदातें हुईं, उनका मुख्य उद्देश्य भारत का विरोध ही है। गत दिवस 1971 का विजय स्मारक भी तोड़ दिया गया क्योंकि उसमें भारतीय सेना की गौरवगाथा थी। भले ही वहाँ के नये शासक और कतिपय छात्र नेता हिंदुओं की सुरक्षा के आश्वसन दे रहे हों किंतु असलियत इसके ठीक विपरीत है। अंतरिम सरकार के गृह मामलों के सलाहकार का माफीनामा अपने आप में काफी कुछ कह जाता है। भारत से सहयोग की अपेक्षा किंतु दखल न देने की समझाइश भारत के प्रति नई सरकार के बदलते रुख का संकेत है। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि भारत के विपक्षी दल बांग्ला देश में हिंदुओं के दमन का विरोध करने के बजाय इस बात पर खुशी मना रहे हैं कि वहाँ धर्मनिरपेक्ष सत्ता बन गई। वहीं असहिष्णुता का ढोल पीटने वाले कथित बुद्धिजीवी यह प्रचार करने में जुटे हैं कि शेख मुजीब तानाशाह थे और उन्होंने एक दलीय प्रणाली को बढ़ावा दिया। दरअसल हसीना की भारत से निकटता चीन के तरफदारों को सहन नहीं थी। इसी के साथ जिन विदेशी शक्तियों ने लोकसभा चुनाव में मोदी विरोधी मुहिम चलाई उनसे उपकृत लॉबी भी हसीना को खलनायिका साबित करने में जुट गई। उल्लेखनीय है 1975 में मुजीब की हत्या के समय हसीना पति और बच्चों के साथ जर्मनी में थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें दिल्ली बुलाकर शरण दी और 1981 में ढाका लौटने तक वे दिल्ली में रहीं। लेकिन आज उनके प्रति सहानुभूति महज इसलिए नहीं दिखाई जा रही है क्योंकि उनका तख्ता पलट करने में अमेरिका , चीन और पाकिस्तान का हाथ माना जा रहा है। श्री मोदी से अच्छे सम्बन्धों के कारण भी विपक्ष हसीना से ख़फ़ा है। बांग्ला देश के निर्माण का श्रेय निश्चित रूप से इंदिरा जी को है लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत के दावेदार वहाँ के ताजा घटनाक्रम के प्रति जिस प्रकार से उदासीन हैं वह हतप्रभ करने वाला है। रही बात केंद्र सरकार के रुख की तो हसीना को भारत आने की अनुमति देना और किसी देश में शरण मिलने तक यहाँ सुरक्षित रहने की सुविधा देकर उसने उनके प्रति मित्रता का निर्वहन कर दिया। विपक्षी दलों से सरकार के समर्थन की उम्मीद तो नहीं थी किंतु भारत में भी बांग्ला देश जैसे हालात बन जाने की धमकियाँ देने वाले नेताओं की निंदा तो अपेक्षित थी ही। वहाँ रह रहे हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध यदि सभी राजनीतिक दल आवाज उठाते तो उसका दबाव वहाँ के शासकों पर पड़ता किंतु ऐसा करने से इसलिए बचा गया ताकि भारत में मुस्लिम वोट हाथ से न खिसक जाए। गत दिवस प्रियंका वाड्रा ने जरूर सोशल मीडिया पर वहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की है किंतु वह महज औपचारिकता प्रतीत होती है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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