Thursday, 15 August 2024

देश को तोड़ने का खेल देश के भीतर से ही चल रहा





यह स्वाधीनता दिवस कई मायनों में महत्वपूर्ण है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में मिली - जुली सरकार के साथ ही मजबूत विपक्ष का जनादेश आया। यद्यपि सत्ता में लौटने पर भी भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलना चौंकाने वाला रहा जो अपने लिए 350 से अधिक और  एन.डी.ए नामक गठबंधन के 400 से अधिक सांसद जीतने के आत्मविश्वास से भरी हुई थी। लेकिन उसे 240 और गठबंधन को 292 सीटें मिलने को भाजपा की पराजय के तौर पर देखा गया। विशेष रूप से  उ.प्र में भाजपा की सीटें सपा और कांग्रेस के गठजोड़ से  कम होना आश्चर्यचकित कर गया। उसका मुख्य कारण विपक्ष द्वारा  आरक्षण खत्म किये जाने का खतरा दिखाना रहा। लेकिन उससे भी बड़ा कारण बना मुस्लिम समुदाय का भाजपा के विरुद्ध  ध्रुवीकृत होना। इस प्रकार दलित और मुस्लिमों के विरोध ने भाजपा को बहुमत  से पहले ही रोक दिया। उ.प्र जैसा ही खेल महाराष्ट्र में हुआ। हालांकि विपक्ष का प्रदर्शन  2014 और 19 की तुलना में बेहतर रहा परंतु मतदाताओं ने उसे भी सत्ता संभालने योग्य नहीं माना। इसीलिए कांग्रेस भाजपा के आसपास भी नहीं पहुँच सकी । इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि न तो भाजपा को मनमाने फैसले करने की छूट मिली और न ही विपक्ष को सत्ता का स्वाद चखने का अवसर । लेकिन चुनाव बाद जिस तरह से जाति के नाम पर समाज को टुकड़ों में बाँटने का कुचक्र रचा जा रहा है उससे  लगने लगा है कि हम निजी स्वार्थों को राष्ट्रहित से ज्यादा प्राथमिकता देने की वही भूल दोहराने से बाज नहीं आ रहे जिसने हमें सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रखा। उस दृष्टि से आज के दिन हमें इतिहास के उन पन्नों को उलटना चाहिए जिनमें आपसी फूट की गाथाएँ भरी पड़ी हैं। दुर्भाग्य से हमारे राजनेता उनको अनदेखा कर रहे हैं तभी  पहले प्रांत और भाषा के नाम पर बाँटने का कुकृत्य किया गया और अब धर्म और जाति के नाम पर समाज को टुकड़ों में  बांटने का पाप किया जा रहा है। राजनीति  का मकसद यदि देश और जनता का हित हो तभी उसकी सार्थकता है किंतु हमारे देश में वह सत्ता हासिल कर अपने और अपनों के हितों की पूर्ति करने का माध्यम बन गई है।  इसीलिए जनमानस में उसके प्रति वह सम्मान नहीं रहा जो आज़ादी की लड़ाई और उसके बाद के प्रारंभिक वर्षों में दिखाई देता था। आज देश की  स्थिति  देख कर ये चिंता होने लगी है कि  प्रांतीय और केंद्रीय सत्ता के बीच होने वाला टकराव कहीं देश को दूसरे विभाजन की ओर न धकेल दे। प्रांतीय भावनाओं की कद्र अवश्य होना चाहिए। उनकी सांस्कृतिक विविधता और भाषायी विशिष्टता की भी रक्षा होनी चाहिए। लेकिन इस विविधता में एकता बनाये रखना तभी संभव होगा जब राष्ट्रीयता की भावना सबसे ऊपर हो। आज़ादी के बाद से ही एक तबका इस बात को प्रचारित करने पर तुला हुआ है कि भारत के मूल निवासी दक्षिण में रहने वाले द्रविड़ हैं जबकि आर्य बाहर से आये। भारत के इतिहास को भी बेहद विकृत तरीके से पेश किया जाता रहा । दुष्परिणाम यह हुआ कि नई पीढ़ी को अकबर की  महानता का पाठ महाराणा प्रताप की वीरता और त्याग से कहीं ज्यादा पढ़ाया गया। राष्ट्रवाद को फ़ासिज्म से जोड़ दिया गया और भारतीय संस्कृति को पिछड़ेपन से। जब ये प्रयास भी सफलीभूत नहीं हुए तब जातिवाद का जिन्न बोतल से बाहर निकालकर भारतीय समाज के ढांचे को तहस - नहस करने का ताना - बाना बुना जाने लगा। लोकसभा चुनाव में तमाम हथकंडों के बावजूद सत्ता से वंचित रह गईं ताकतें जाति नामक हथियार का उपयोग कर सत्ता हासिल करने जिस प्रकार जुटी हुई हैं वह बेहद खतरनाक है। लेकिन वे भूल रही हैं कि विभिन्न जातियों के बीच शत्रुता पैदा कर एक - दो चुनाव भले जीत लिए जाएं किंतु कालांतर में ये तरीका आत्मघाती साबित हुए बिना नहीं रहेगा। जो क्षेत्रीय या पारिवारिक  पार्टियां जाति के नाम पर सियासत कर रही हैं  , उनका प्रभावक्षेत्र सीमित है परंतु किसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा जाति को अपना एजेंडा बनाया जाए तो इससे समूचा देश संकट में फंस जायेगा। आज का दिन इन्हीं बातों को सोचने का है। हाल ही में हमारे एक पड़ोसी देश में जिस प्रकार का वातावरण है वैसा  ही भारत में बन जाने की आशंका  किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता द्वारा जताया जाना ये दर्शाता है कि देश को कमजोर करने का खेल देश के भीतर ही चल रहा है।  जनता को इसके विरोध में खुलकर सामने आना होगा क्योंकि सब कुछ सरकार और नेताओं के भरोसे छोड़ना अपने दायित्व से भागना होगा। जिस तरह इस देश की आजादी के संग्राम में हर नागरिक की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी थी उससे अधिक आज आज़ादी की रक्षा के लिए आवश्यक है। हमारे पूर्वजों ने हमें स्वाधीन देश की विरासत सौंपी थी। अब हमें अपनी भावी पीढी़ को एक सुरक्षित, सुविकसित और समृद्ध भारत सौंपने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। 

स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी






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