केंद्र सरकार ने कुछ प्रशासकीय पदों पर सीधी नियुक्ति हेतु निजी क्षेत्र के अनुभवी लोगों से आवेदन आमन्त्रित किये हैं। संयुक्त सचिव, संचालक और उपसचिव हेतु तकरीबन 50 पदों पर सीधी नियुक्ति किये जाने के लिए दिये विज्ञापन पर राजनीति गर्मा गई है। राहुल गाँधी सहित अनेक विपक्षी नेताओं का विरोध तो स्वाभविक है किंतु मोदी सरकार में मंत्री चिराग पासवान भी इसके विरोध में आ गए हैं। लेटरल एंट्री नामक इस तरीके से सरकार संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली परीक्षा के बिना विभिन्न पदों पर भर्ती करती है। इसमें आरक्षण का प्रावधान नहीं होने से इसका विरोध किया जा रहा है। राहुल का आरोप है कि सीधी नियुक्ति आरक्षण को खत्म करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है जिसके जरिये सरकार रा .स्व.संघ के लोगों को सरकारी पदों पर बिठाना चाहती है। वहीं चिराग का कहना है कि आरक्षण पर कोई भी किंतु - परंतु स्वीकार्य नहीं है। हो सकता है भाजपा के भीतर से भी विरोध में आवाजें उठें। उल्लेखनीय है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में क्रीमी लेयर संबंधी जो फैसला दिया गया उसको लागू होने से रोकने के लिए आरक्षित वर्ग के भाजपा सांसद प्रधानमंत्री से मिले जिसके बाद मंत्रीपरिषद की बैठक में उस निर्णय पर अमल न करने का प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। हालांकि सीधी नियुक्ति के विवाद में सरकार का बचाव करने के लिए आगे आ रहे कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल खुद आरक्षित वर्ग से हैं और राजनीति में आने से पहले आई.ए.एस अधिकारी भी रहे हैं। भाजपा का आरोप है कि लेटरल एंट्री की शुरुआत कांग्रेस के कार्यकाल में हुई। जिसके अंतर्गत डा. मनमोहन सिंह को वित्त सचिव, मोंटेक सिंह अहलूवालिया को योजना आयोग का उपाध्यक्ष और सोनिया गाँधी को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का अध्यक्ष बनाया गया। जबकि कांग्रेस का कहना है ये प्रथा 2018 में मोदी सरकार ने शुरू की। वैसे केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार की भी सीधी नियुक्ति होती रही है। केंद्र सरकार के अनुसार लेटरल एंट्री के जरिये नियुक्ति संविदा के तौर पर 3 वर्षों के लिए होती है जिसे 2 साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। इस आधार पर देखें तो केंद्र सरकार के इतने बड़े प्रशासनिक ढांचे में यदि 50 लोग सीधी भर्ती से कुछ वर्षों के लिए शामिल किये जाएं तो इससे आरक्षण के प्रावधान की बहुत ज्यादा अवहेलना होने की संभावना नजर नहीं आती। राहुल और चिराग अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भले ही लेटरल एंट्री प्रथा का विरोध कर रहे हों किंतु उन्हें ये भी सुझाना चाहिए कि निजी क्षेत्र में कार्यरत प्रतिभाओं का उपयोग शासन की कार्य प्रणाली में समयोचित सुधार हेतु किस प्रकार किया जा सकता है? श्री गाँधी और श्री पासवान को इस बात का तो अनुभव होगा ही कि विभिन्न क्षेत्रों के योग्य व्यक्तियों को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया जाता रहा है। वर्तमान केंद्र सरकार में एस. जयशंकर, अश्विनी वैष्णव, हरदीप पुरी जैसे मंत्री गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि से आये और अच्छा काम कर रहे हैं। स्व. राजीव गाँधी ने सैम पित्रोदा को इंटरनेट और मोबाइल सेवा प्रारंभ करने अमेरिका से बुलाकर सरकारी पद दिया। बाद में वे मनमोहन सरकार में भी सलाहकार बनाये गए। और फिर कांग्रेस की विदेश शाखा के अध्यक्ष बन गए। खुद डाॅ. मनमोहन सिंह भी विभिन्न सरकारी पदों पर सीधी नियुक्ति के बाद प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे । उक्त सभी महानुभाव अपनी योग्यता और पेशवर अनुभव के कारण ही सरकार के हिस्से बने। आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद चंद्रा बाबू नायडू ने प्रतिभाशाली लोगों की गणना करवाने की बात कही थी ताकि उनका उपयोग देश के विकास हेतु किया जा सके। संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं के जरिये चयनित सामान्य और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी 60 वर्ष की आयु तक के लिए भर्ती किये जाते हैं जबकि लेटरल एंट्री से नियुक्त व्यक्ति अधिकतम 5 साल के लिए सेवा में रहेगा। इस संबंध में नंदन नीलेकणी का नाम भी लिया जा सकता है जिन्हें आधार कार्ड बनाने वाले महत्वपूर्ण प्रकल्प का मुखिया बनाया गया जबकि वे निजी क्षेत्र की प्रमुख आई. टी कंपनी इंफोसिस के सह संस्थापक थे। बाद में उन्हें कांग्रेस ने बेंगुलूरु से लोकसभा चुनाव भी लड़ाया किंतु वे हार गए। रा. स्व. संघ के लोगों को सीधी नियुक्ति से सरकारी पदों पर बिठाने का आरोप लगाने से पहले श्री गाँधी को श्री पित्रोदा और श्री नीलेकणी के बारे में सोचना चाहिए था जो कांग्रेस पार्टी से जुड़े। इस सबसे जाहिर है कि लेटरल एंट्री का विरोध विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थ के लिए किया जा रहा है। लोकसभा में श्री गाँधी ने बजट बनाने वाले अधिकारियों में एक भी ओबीसी या अनु. जाति/जनजाति का न होने का मुद्दा छेड़ा तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनसे पूछा कि राजीव गाँधी ट्रस्ट और फाउंडेशन में आरक्षित वर्ग के कितने न्यासी हैं तो श्री गाँधी ने आज तक उसका उत्तर नहीं दिया। दरअसल लेटरल एंट्री का तरीका सरकारी कामकाज को पेशेवर स्वरूप प्रदान करना है। चूंकि यह व्यवस्था सीमित अवधि के लिए है इसलिए इससे आरक्षण को खतरे जैसी बात बेमानी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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